Tuesday, 13 June 2023

🌹✨ सीरते मुस्तफा ﷺ पर्ट -2 ✨🌹


 

🌴 •┄┅┅┅┅┅❂ ❀ ﷽ ❀ ❂┅┅┅┅┅┈•🌴

اَلصَّلوٰةُ وَالسَّلَامُ عَلَیۡكَ يَـــــــــــــــــــــــــــارَسُوۡلَ اللّٰهِ ﷺ

*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 265* ༺❘


*❝  फ़त्ह मक्का #05 ¶ अबू सुफ्यान की कोशिश #01  ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐  इस के बाद बहुत तेज़ी के साथ अबू सुफ्यान मदीने गया और पहले अपनी लड़की हज़रते उम्मुल मुअमिनीन बीबी उम्मे हबीबा رضي الله عنها के मकान पर पहुंचा और बिस्तर पर बैठना ही चाहता था कि हज़रते बीबी उम्मे हबीबा ने जल्दी से बिस्तर उठा लिया और अबू सुफ्यान ने हैरान हो कर पूछा कि बेटी तुम ने बिस्तर क्यूं उठा लिया ? क्या बिस्तर को मेरे काबिल नहीं समझा या मुझ को बिस्तर के क़ाबिल नहीं समझा ? उम्मुल मुअमिनीन ने जवाब दिया कि ये रसूलुल्लाह ﷺ का बिस्तर है और तुम मुशरिक और नजिस हो। इस लिये मैं ने येह गवारा नहीं किया कि तुम रसूलुल्लाह ﷺ के बिस्तर पर बैठो। येह सुन कर अबू सुफ्यान के दिल पर चोट लगी और वोह रन्जीदा हो कर वहां से चला आया और रसूलुल्लाह ﷺ की खिदमत में हाज़िर हो कर अपना मक्सद बयान किया। आप ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर अबू सुफ्यान हुज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ व हज़रते उमर व हज़रते अली رضي الله عنه के पास गया। इन सब हज़रात ने जवाब दिया कि हम कुछ नहीं कर सकते।

࿐  हज़रते अली के पास जब अबू सुफ्यान पहुंचा तो वहां हज़रते बीबी फ़ातिमा और हज़रते इमामे हसन भी थे। अबू सुफ्यान ने बड़ी लजाजत से कहा कि ऐ अली ! तुम कौम में बहुत ही रहम दिल हो हम एक मक्सद ले कर यहां आए हैं क्या हम यूं ही नाकाम चले जाएं। हम सिर्फ़ येही चाहते हैं कि तुम मुहम्मद (ﷺ) से हमारी सिफारिश कर दो। हज़रते अली ने फ़रमाया कि ऐ अबू सुफ्यान ! हम लोगों की येह मजाल नहीं है कि हम हुज़ूर ﷺ के इरादे और उन की मरज़ी में कोई मुदाख़लत कर सकें। 
   
 ࿐  हर तरफ़ से मायूस हो कर अबू सुफ्यान ने हज़रते फ़ातिमा ज़हरा से कहा कि ऐ फ़ातिमा ! येह तुम्हारा पांच बरस का बच्चा (इमामे हसन) एक मरतबा अपनी ज़बान से इतना कह दे कि मैं ने दोनों फरीक में सुल्ह करा दी तो आज से येह बच्चा अरब का सरदार कह कर पुकारा जाएगा। हज़रते बीबी फ़ातिमा ने जवाब दिया कि बच्चों को इन मुआमलात में क्या दख़्ल ? बिल आखिर अबू सुफ्यान ने कहा कि ऐ अली ! मुआमला बहुत कठिन नज़र आता है कोई तदबीर बताओ ? हज़रते अली ने फ़रमाया कि मैं इस सिल्सिले में तुम को कोई मुफीद राय तो नहीं दे सकता, लेकिन तुम बनी किनाना सरदार हो तुम खुद ही लोगों के सामने ए'लान कर दो कि मैं ने हुदैबिया के मुआहदे की तजदीद कर दी अबू सुफ्यान ने कहा कि क्या मेरा येह ए'लान कुछ मुफीद हो सकता है ? हज़रते अली ने फ़रमाया कि यक तरफ़ा एलान जाहिर है कि कुछ मुफ़ीद नहीं हो सकता। मगर अब तुम्हारे पास इस के सिवा और चारए कार ही क्या है ?

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह - 417📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 262* ༺❘


                *❝  फ़त्ह मक्का #02 ❞*  
          *कुफ्फारे कुरैश की अहद शिकनी* ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐  सुल्हे हुदैबिया के बयान में आप पढ़ चुके कि हुदैबिया के सुल्ह नामे में एक येह शर्त भी दर्ज थी कि क़बाइले अरब में से जो क़बीला कुरैश के साथ मुआहदा करना चाहे वोह कुरैश के साथ मुआहदा करे और जो हज़रत मुहम्मद ﷺ से मुआहदा करना चाहे वोह हज़रत मुहम्मद ﷺ के साथ मुआहदा करे।  चुनान्चे इसी बिना पर क़बीलए बनी बक्र ने कुरैश से बाहमी इमदाद का मुआहदा कर लिया और क़बीलए बनी खज़ाआ ने रसूलुल्लाह ﷺ से इमदादे बाहमी का मुआहदा कर लिया। येह दोनों क़बीले मक्का के क़रीब ही में आबाद थे लेकिन इन दोनों में अर्सए दराज से सख्त अदावत और मुखालफत चली आ रही थी। 
   
࿐   एक मुद्दत तो कुफ्फारे कुरैश और दूसरे क़बाइले अरब के कुफ्फार मुसलमानों से जंग करने में अपना सारा ज़ोर सर्फ कर रहे थे लेकिन सुल्हे हुदैबिया की ब दौलत जब मुसलमानों की जंग से कुफ्फ़ारे कुरैश और दूसरे क़बाइले कुफ्फार को इत्मीनान मिला तो क़बीलए बनी बक्र ने क़बीलए खजाआ से अपनी पुरानी अदावत का इन्तिकाम लेना चाहा और अपने हलीफ़ कुफ्फ़ारे कुरैश से मिल कर बिल्कुल अचानक तौर पर क़बीलए बनी खजाआ पर हम्ला कर दिया और इस हम्ले में कुफ्फ़ारे कुरैश के तमाम रूअसा या'नी इक्रमा बिन अबी जहल, सफ्वान बिन उमय्या व सुहैल बिन अम्र वगैरा बड़े बड़े सरदारों ने अलानिया बनी खजाआ को क़त्ल किया।

࿐   बेचारे बनी खजाआ इस ख़ौफ़नाक जालिमाना हम्ले की ताब न ला सके और अपनी जान बचाने के लिये हरमे काबा में पनाह लेने के लिये भागे। बनी बक्र के अवाम ने तो हरम में तलवार चलाने से हाथ रोक लिया और हरमे इलाही का एहतिराम किया। लेकिन बनी बक्र का सरदार "नौफ़िल" इस क़दर जोशे इन्तिकाम में आपे से बाहर हो चुका था कि वोह हरम में भी बनी ख़ज़ाओ को निहायत बेदर्दी के साथ कत्ल करता रहा और चिल्ला चिल्ला कर अपनी क़ौम को ललकारता रहा कि फिर येह मौक़अ कभी हाथ नहीं आ सकता। चुनान्चे उन दरिन्दा सिफत खूंखार इन्सानों ने हरमे इलाही के एहतिराम को भी ख़ाक में मिला दिया और हरमे काबा की हुदूद में निहायत ही ज़ालिमाना तौर पर बनी खजाआ का ख़ून बहाया और कुफ्फ़ारे कुरैश ने भी इस क़त्लो गरत और कश्तो वन में खुब खुब हिस्सा लिया।
  
࿐   जाहिर है कि कुरैश ने अपनी इस हरकत से हुदैबिया के मुआहदे को अमली तौर पर तोड़ डाला। क्यूं कि बनी ख़ज़ाआ़ रसूलुल्लाह ﷺ से मुआहदा कर के आप के हलीफ़ बन चुके थे, इस लिये बनी खजाआ पर हम्ला करना, येह रसूलुल्लाह ﷺ पर हम्ला करने के बराबर था। इस हम्ले में बनी खजाआ के तेईस (23) आदमी क़त्ल हो गए।  इस हादिषे के बाद क़बीलए बनी खजाआ के सरदार अम्र बिन सालिम खज़ाई चालीस आदमियों का वफद ले कर फ़रियाद करने और इमदाद तलब करने के लिये मदीना बारगाहे रिसालत में पहुंचे और येही फ़त्ह मक्का की तम्हीद हुई। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 413 📚*

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                *❝  फ़त्ह मक्का #03 ❞*  
     *ताजदारे दो आलम ﷺ से इस्तिआनत* ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐   हज़रते बीबी मैमूना رضي الله عنها का बयान है कि एक रात हुजूरे अकरम ﷺ काशानए नुबुव्वत में वुज़ू फ़रमा रहे थे कि एक दम बिल्कुल ना गहां आप ने बुलन्द आवाज़ से तीन मरतबा येह फ़रमाया कि लब्बैक। लब्बैक। लब्बैक। (मैं तुम्हारे लिये बार बार हाज़िर हूं।) फिर तीन मरतबा बुलन्द आवाज़ से आप ने येह इर्शाद फ़रमाया कि "तुम्हें मदद मिल गई" जब आप वुज़ूखाने से बाहर निकले तो मैं ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ आप तन्हाई में किस से गुफ्तगू फ़रमा रहे थे ? तो इर्शाद फ़रमाया कि ऐ मैमूना ! गज़ब हो गया। मेरे हलीफ़ बनी खजाआ पर बना बक्र और कुफ्फ़ारे कुरैश ने हमला कर दिया है और इस मुसीबत व बे कसी के वक्त में बनी खजाआ ने वहां से चिल्ला चिल्ला कर मुझे मदद के लिये पुकारा है और मुझ से मदद तलब की है और मैं ने उन की पुकार सुन कर उन की ढारस बंधाने के लिये उन को जवाब दिया है। 
  
࿐  हज़रते बीबी मैमूना कहती हैं कि इस वाकिए के तीसरे दिन जब हुजूर ﷺ नमाज़े फज्र के लिये मस्जिद में तशरीफ़ ले गए और नमाज़ से फ़ारिग हुए तो दफ्अतन बनी खजाआ के मज़्लूमीन ने रज्ज के इन अश्आ़र को बुलन्द आवाज़ से पढ़ना शुरू कर दिया और हुजूरे अकरम ﷺ और असहाबे किराम ने उन की इस पुरदर्द और रिक्क़त अंगेज़ फ़रियाद को बगौर सुना। आप भी इस रज्ज़ के चन्द अशआर को मुलाहज़ा फ़रमाइये : 
  
ऐ खुदा ! मैं मुहम्मद को वोह मुआहदा याद दिलाता हूं जो हमारे और इन के बाप दादाओं के दरमियान क़दीम ज़माने से हो चुका है।
     तो खुदा आप को सीधी राह पर चलाए। आप हमारी भरपूर मदद कीजिये और खुदा के बन्दों को बुलाइये। वोह सब इमदाद के लिये आएंगे। 
 उन मदद करने वालों में रसूलुल्लाह भी गज़ब की हालत में हों कि अगर उन्हें जिल्लत का दाग लगे तो उन का तेवर बदल जाएं। 
  उन लोगों (बनी बक्र व कुरैश) ने “मकामे वतीर" में हम सोते हुओं पर शबख़ून मारा और रुकूअ व सज्दे की हालत में भी हम लोगों को बे दर्दी के साथ क़त्ल कर डाला।
   यक़ीनन कुरैश ने आप से वादा खिलाफी की है और आप से मजबूत मुआहदा कर के तोड़ डाला है। 
      इन अशआर को सुन कर हुज़ूर ﷺ ने उन लोगों को तसल्ली दी और फ़रमाया कि मत घबराओ मैं तुम्हारी इमदाद के लिये तय्यार हूं। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 415 📚*

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 *❝  फ़त्ह मक्का #04 / हुजूर ﷺ की अम्न पसन्दी ❞*          ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐  इस के बाद हुजुर ﷺ ने कुरैश के पास क़ासिद भेजा और तीन शर्तें पेश फ़रमाईं कि इन में से कोई एक शर्त कुरैश मंजूर कर लें : 
(1) बनी खजाआ के मक्तूलों का खून बहा दिया जाए। 
(2) कुरैश क़बीलए बनी बक्र की हिमायत से अलग हो जाएं। 
(3) एलान कर दिया जाए कि हुदैबिया का मुआहदा टूट गया। 
     
࿐  जब हुज़ूर ﷺ के क़ासिद ने इन शर्तों को कुरैश के सामने रखा तो करता बिन अब्दे उमर ने कुरैश का नुमाइन्दा बन कर जवाब दिया कि "न हम मक्तूलों के खून का मुआवजा देंगे न अपने हलीफ कबीलए बनी बक्र की हिमायत छोडेंगे। हां तीसरी शर्त हमें मंजूर है और हम ए'लान करते हैं कि हुदैबिया का मुआहदा टूट गया।" 
   
࿐  लेकिन क़ासिद के चले जाने के बाद कुरैश को अपने इस जवाब पर नदामत हुई। चुनान्चे चन्द रूअसाए कुरैश अबू सुफ्यान के पास गए और येह कहा कि अगर येह मुआमला न सुलझा तो फिर समझ लो कि यक़ीनन मुहम्मद (ﷺ) हम पर हम्ला कर देंगे। अबू सुफ्यान ने कहा कि मेरी बीवी हिन्द बिन्ते उत्बा ने एक ख़्वाब देखा है कि मक़ामे "हजून" से मकामे “खन्दमा” तक एक ख़ून की नहर बहती हुई आई है, फिर ना गहां वोह ख़ून गाइब हो गया। कुरैश ने इस ख़्वाब को बहुत ही मनहूस समझा और ख़ौफ़ व दहशत से सहम गए और अबू सुफ्यान पर बहुत ज़यादा दबाव डाला कि वोह फ़ौरन मदीने जा कर मुआहदए हुदैबिया की तजदीद करे।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 416 📚*

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*❝  फ़त्ह मक्का #05 ¶ अबू सुफ्यान की कोशिश #01  ❞*  
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࿐  इस के बाद बहुत तेज़ी के साथ अबू सुफ्यान मदीने गया और पहले अपनी लड़की हज़रते उम्मुल मुअमिनीन बीबी उम्मे हबीबा رضي الله عنها के मकान पर पहुंचा और बिस्तर पर बैठना ही चाहता था कि हज़रते बीबी उम्मे हबीबा ने जल्दी से बिस्तर उठा लिया और अबू सुफ्यान ने हैरान हो कर पूछा कि बेटी तुम ने बिस्तर क्यूं उठा लिया ? क्या बिस्तर को मेरे काबिल नहीं समझा या मुझ को बिस्तर के क़ाबिल नहीं समझा ? उम्मुल मुअमिनीन ने जवाब दिया कि ये रसूलुल्लाह ﷺ का बिस्तर है और तुम मुशरिक और नजिस हो। इस लिये मैं ने येह गवारा नहीं किया कि तुम रसूलुल्लाह ﷺ के बिस्तर पर बैठो। येह सुन कर अबू सुफ्यान के दिल पर चोट लगी और वोह रन्जीदा हो कर वहां से चला आया और रसूलुल्लाह ﷺ की खिदमत में हाज़िर हो कर अपना मक्सद बयान किया। आप ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर अबू सुफ्यान हुज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ व हज़रते उमर व हज़रते अली رضي الله عنه के पास गया। इन सब हज़रात ने जवाब दिया कि हम कुछ नहीं कर सकते।

࿐  हज़रते अली के पास जब अबू सुफ्यान पहुंचा तो वहां हज़रते बीबी फ़ातिमा और हज़रते इमामे हसन भी थे। अबू सुफ्यान ने बड़ी लजाजत से कहा कि ऐ अली ! तुम कौम में बहुत ही रहम दिल हो हम एक मक्सद ले कर यहां आए हैं क्या हम यूं ही नाकाम चले जाएं। हम सिर्फ़ येही चाहते हैं कि तुम मुहम्मद (ﷺ) से हमारी सिफारिश कर दो। हज़रते अली ने फ़रमाया कि ऐ अबू सुफ्यान ! हम लोगों की येह मजाल नहीं है कि हम हुज़ूर ﷺ के इरादे और उन की मरज़ी में कोई मुदाख़लत कर सकें। 
   
 ࿐  हर तरफ़ से मायूस हो कर अबू सुफ्यान ने हज़रते फ़ातिमा ज़हरा से कहा कि ऐ फ़ातिमा ! येह तुम्हारा पांच बरस का बच्चा (इमामे हसन) एक मरतबा अपनी ज़बान से इतना कह दे कि मैं ने दोनों फरीक में सुल्ह करा दी तो आज से येह बच्चा अरब का सरदार कह कर पुकारा जाएगा। हज़रते बीबी फ़ातिमा ने जवाब दिया कि बच्चों को इन मुआमलात में क्या दख़्ल ? बिल आखिर अबू सुफ्यान ने कहा कि ऐ अली ! मुआमला बहुत कठिन नज़र आता है कोई तदबीर बताओ ? हज़रते अली ने फ़रमाया कि मैं इस सिल्सिले में तुम को कोई मुफीद राय तो नहीं दे सकता, लेकिन तुम बनी किनाना सरदार हो तुम खुद ही लोगों के सामने ए'लान कर दो कि मैं ने हुदैबिया के मुआहदे की तजदीद कर दी अबू सुफ्यान ने कहा कि क्या मेरा येह ए'लान कुछ मुफीद हो सकता है ? हज़रते अली ने फ़रमाया कि यक तरफ़ा एलान जाहिर है कि कुछ मुफ़ीद नहीं हो सकता। मगर अब तुम्हारे पास इस के सिवा और चारए कार ही क्या है ?

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 266* ༺❘


*❝ फ़त्ह मक्का #06 ¶ अबू सुफ्यान की कोशिश #02 ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐   अबू सुफ्यान हज़रते अली رضي الله عنه के पास से मस्जिदे नबवी में आया और बुलन्द आवाज़ से मस्जिद में ए'लान कर दिया कि मैं ने मुआहदए हुदैबिया की तजदीद कर दी मगर मुसलमानों में से किसी ने भी कोई जवाब नहीं दिया। अबू सुफ्यान येह ए'लान कर के मक्का रवाना हो गया जब मक्का पहुंचा तो कुरैश ने पूछा कि मदीने में क्या हुवा ? अबू सुफ्यान ने सारी दास्तान बयान कर दी। तो कुरैश ने सुवाल किया कि जब तुम ने अपनी तरफ से मुआहदए हुदैबिया की तजदीद का एलान किया तो महम्मद (ﷺ) ने इस को कबुल कर लिया ? अबू सुफ्यान ने कहा कि "नहीं" येह सुन कर कुरैश ने कहा कि ये तो कुछ भी न हुवा। येह न तो सुल्ह है कि हम इत्मीनान से बैठें न येह जंग है कि लड़ाई का सामान किया जाए। 
     
࿐   इस के बाद हुज़ूर ﷺ ने लोगों को जंग की तय्यारी का हुक्म दे दिया और हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها से भी फ़रमा दिया कि जंग के हथियार दुरुस्त करें और अपने हलीफ़ क़बाइल को भी जंगी तय्यारियों के लिये हुक्म नामा भेज दिया। मगर किसी को हुज़ूर ﷺ ने येह नहीं बताया कि किस से जंग का इरादा है ? यहां तक कि हज़रते अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنها से भी आप ने कुछ नहीं फ़रमाया। 
     
࿐   चुनान्चे हज़रते अबू बक्र सिद्दीक हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها के पास आए और देखा कि वोह जंगी हथियारों को निकाल रही हैं तो आप ने दरयाफ्त किया कि क्या हुज़ूर ﷺ ने हुक्म दिया है ? अर्ज किया : “जी हां” फिर आप ने पूछा कि क्या तुम्हें कुछ मालूम है कि कहां का इरादा है ? हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها ने कहा कि “वल्लाह ! मुझे येह मा'लूम नहीं।" ग़रज़ इन्तिहाई ख़ामोशी और राज़दारी के साथ हुजूर ﷺ ने जंग की तय्यारी फ़रमाई और मक्सद येह था कि अहले मक्का को ख़बर न होने पाए और अचानक उन पर हमला कर दिया जाए।

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*❝  फ़त्ह मक्का #07 ¶ हज़रते हातिब बिन अबी बल्तआ का खत  ❞*  
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࿐  हज़रते हातिब बिन अबी बल्तआ رضي الله عنه जो एक मुअज्जज सहाबी थे उन्हों ने कुरैश को एक ख़त इस मज़मून का लिख दिया कि रसूलुल्लाह ﷺ जंग की तय्यारियां कर रहे हैं, लिहाज़ा तुम लोग होशियार हो जाओ। इस ख़त को उन्हों ने एक औरत के जरीए मक्का भेजा। अल्लाह तआला ने अपने हबीब ﷺ को इल्मे गैब अता फरमाया था। आप ने अपने इस इल्मे गैब की बदौलत से येह जान लिया कि हज़रते हातिब बिन अबी बल्तआ ने क्या कारवाई की है। चुनान्चे आप ने हज़रते अली व हज़रते जुबैर व हज़रते मिक्दाद رضي الله عنه को फ़ौरन रवाना फ़रमाया कि तुम लोग “रौज़ए खाख" में चले जाओ। वहां एक औरत है और उस के पास एक खत है। उस से वोह ख़त छीन कर मेरे पास लाओ। 
     
࿐  चुनान्चे येह तीनो असहाबे किबार رضی الله تعالی عنهم तेज रफ्तार घोड़ों पर सुवार हो कर “रौज़ए खाख" में पहुंचे और औरत को पा लिया। जब उस से ख़त तलब किया तो उस ने कहा कि मेरे पास कोई ख़त नहीं है। हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने फ़रमाया कि खुदा की क़सम ! रसूलुला ﷺ कभी कोई झूटी बात नहीं कह सकते, न हम लोग झूटे हैं लिहाज़ा तू खत निकाल कर हमें दे दे वरना हम तुझ को नंगी कर के तलाशी लेंगे। जब औरत मजबूर हो गई तो उस ने अपने बालों के जूड़े में से वोह खत निकाल कर दे दिया। 
     
࿐  जब येह लोग ख़त ले कर बारगाहे रिसालत में पहुंचे तो आप ने हज़रते हातिब बिन अबी बल्तआ को बुलाया और फ़रमाया कि ऐ हातिब ! यह तुम ने क्या किया ? उन्हों ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ ! आप मेरे बारे में जल्दी न फ़रमाएं न मैं ने अपना दीन बदला है न मुरतद हुवा हूं मेरे इस ख़त के लिखने की वजह सिर्फ येह है कि मक्का में मेरे बीवी बच्चे हैं। मगर मक्का में मेरा कोई रिश्तेदार नहीं है जो मेरे बीवी बच्चों की ख़बर गीरी व निगह दाश्त करे। मेरे सिवा दूसरे तमाम मुहाजिरीन के अज़ीज़ो अकारिब मक्का में मौजूद हैं जो इन के अहलो झ्याल की देखभाल करते रहते हैं। इस लिये मैं ने येह ख़त लिख कर कुरैश पर एक अपना एहसान रख दिया है ताकि मैं उन की हमदर्दी हासिल कर लूं और वोह मेरे अहलो इयाल के साथ कोई बुरा सुलूक न करें। या रसूलल्लाह ﷺ! मेरा ईमान है कि अल्लाह तआला ज़रूर उन काफ़िरों को शिकस्त देगा और मेरे इस ख़त से कुफ्फ़ार को हरगिज़ हरगिज़ कोई फ़ाएदा नहीं हो सकता। 

࿐  हुजूर ﷺ ने हज़रते हातिब رضی الله تعالی عنه को सुन कर उन के उज़्र को क़बूल फ़रमा लिया मगर हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه इस ख़त को देख कर इस क़दर तैश में आ गए कि आपे से बाहर हो गए और अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! मुझे इजाज़त दीजिये कि मैं इस मुनाफ़िक की गरदन उड़ा दूं। दूसरे सहाबए किराम भी गैजो ग़ज़ब में भर गए। लेकिन रहमते आलम ﷺ की जबीने रहमत पर इक जरा शिकन भी नहीं आई और आप ने हज़रते उमर से इर्शाद फ़रमाया कि ऐ उमर ! हातिब अहले बद्र में से है और क्या तुम्हें ख़बर नहीं कि अल्लाह तआला ने अहले बद्र को मुखातब कर के फ़रमा दिया है कि "तुम जो चाहो करो तुम से कोई मुवाखज़ा नहीं" येह सुन कर हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه की आंखें नम हो गई और वोह येह कह कर बिल्कुल ख़ामोशी हो गए कि "अल्लाह और उस के रसूल को हम सब से ज़ियादा इल्म है" इसी मौक़अ पर कुरआन की येह आयत नाज़िल हुई कि : ऐ ईमान वालो ! मेरे और अपने दुश्मन काफिरों को दोस्त न बनाओ।
     बहर हाल हुजूर ﷺ ने हज़रते हातिब बिन अबी बल्तआ को मुआफ फ़रमा दिया। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 419 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 268* ༺❘


  *❝  फ़त्ह मक्का #08 ¶ मक्के पर हम्ला  ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐    गरज़ 10 रमज़ान सि. 8 हि. को रसूले अकरम ﷺ मदीने से दस हज़ार का लश्करे पुर अन्वार साथ ले कर मक्का की तरफ रवाना हुए। बा'ज़ रिवायतों में है कि फ़तहे मक्का में आप के साथ बारह हज़ार का लश्कर था इन दोनों रिवायतों में कोई तआरुज नहीं। हो सकता है कि मदीने से रवानगी के वक्त दस हज़ार का लश्कर रहा। फिर रास्ते में बा'ज़ क़बाइल इस लश्कर में शामिल हो गए हों तो मक्का पहुंच कर इस लश्कर की तादाद बारह हज़ार हो गई हो। 
   
࿐  बहर हाल मदीने से चलते वक़्त हुज़ूर ﷺ और तमाम सहाबए किबार رضی الله تعالی عنهم रोज़ादार थे जब आप "मकामे कदीद" में पहुंचे तो पानी मांगा और अपनी सुवारी पर बैठे हुए पूरे लश्कर को दिखा कर आप ने दिन में पानी नोश फ़रमाया और सब को रोज़ा छोड़ देने का हुक्म दिया। चुनान्चे आप ﷺ और आप के असहाब ने सफ़र और जिहाद में होने की वजह से रोज़ा रखना मौकूफ़ कर दिया। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 421 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 269* ༺❘


*❝  फ़त्ह मक्का #09 ¶ हज़रते अब्बास वगैरा से मुलाकात ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐   जब हुजूर ﷺ मकामे "जुहफा" में पहुंचे तो वहां हुज़ूर ﷺ के चचा हज़रते अब्बास رضي الله عنه अपने अहलो इयाल के साथ ख़िदमते अक्दस में हाज़िर हुए। येह मुसलमान हो कर आए थे बल्कि इस से बहुत पहले मुसलमान हो चुके थे और हुज़ूर ﷺ की मरज़ी से मक्के में मुक़ीम थे और हुज्जाज को ज़मज़म पिलाने के मुअज्जज ओहदे पर फ़ाइज़ थे और आप के साथ में हुज़ूर ﷺ के चचा हारिष बिन अब्दुल मुत्तलिब के फ़रज़न्द जिन का नाम अबू सुफ्यान था और हुज़ूर ﷺ के फूफीज़ाद भाई अब्दुल्लाह बिन अबी उमय्या जो उम्मुल मुअमिनीन हज़रते बीबी उम्मे सलमह के सोतेले भाई भी थे बारगाहे अक्दस में हाज़िर हुए इन दोनों साहिबों की हाज़िरी का हाल जब हुजूर ﷺ को मालूम हुवा तो आप ने उन दोनों साहिबों की मुलाकात से इन्कार फ़रमा दिया। क्यूं कि इन दोनों ने हुजूर ﷺ को बहुत ज़ियादा ईज़ाएं पहुंचाई थीं। 

࿐  खुसूसन अबू सुफ्यान बिन अल हारिष आप के चचाज़ाद भाई जो एलाने नुबुव्वत से पहले आप के इन्तिहाई जां निषारों में से थे मगर एलाने नुबुव्वत के बाद इन्हों ने अपने क़सीदों में इतनी शर्मनाक और बेहूदा हिजू हुज़ूर ﷺ की कर डाली थी कि आप का दिल जख्मी हो गया था। इस लिये आप इन दोनों से इन्तिहाई नाराज़ व बेज़ार थे मगर हज़रते बीबी उम्मे सलमह ने इन दोनों का कुसूर मुआफ़ करने के लिये बहुत ही पुरज़ोर सिफारिश की और अबू सुफ्यान बिन अल हारिष ने येह कह दिया कि अगर रसूलुल्लाह ﷺ ने मेरा कुसूर न मुआफ़ फ़रमाया तो मैं अपने छोटे छोटे बच्चों को ले कर अरब के रेगिस्तान में चला जाऊंगा ताकि वहां बिगैर दाना पानी के भूक प्यास से तड़प तड़प कर मैं और मेरे सब बच्चे मर कर फ़ना हो जाएं। 
    
࿐  हज़रते उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها ने बारगाहे रिसालत में आबदीदा हो कर अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ ! क्या आप के चचा का बेटा और आप की फूफी का बेटा तमाम इन्सानों से ज़ियादा बद नसीब रहेगा ? क्या इन दोनों को आप की रहमत से कोई हिस्सा नहीं मिलेगा ? जान छिड़कने वाली बीवी के इन दर्द अंगेज़ कलिमात से रहूमतुल्लिल आलमीन के रहमत भरे दिल में रहमो करम और अफ्वो दर गुज़र के समुन्दर मोजें मारने लगे। फिर हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने इन दोनों को येह मश्वरा दिया कि तुम दोनों अचानक बारगाहे रिसालत में सामने जा कर खड़े हो जाओ और जिस तरह हज़रते यूसुफ़ भाइयों ने कहा था वोही तुम दोनों भी कहो कि :  _कि यक़ीनन आप को अल्लाह तआला ने हम पर फजीलत दी है और हम बिला शुबा खतावार हैं।_ 
    
࿐   चुनान्चे उन दोनों साहिबों ने दरबारे रिसालत में ना गहां हाज़िर हो कर येही कहा। एक दम रहमते आलम ﷺ की जबीने रहमत पर रहमो करम के हज़ारों सितारे चमकने लगे और आप ने उन के जवाब बि ऐनिही वोही जुम्ला अपनी ज़बाने रहमत निशान से इर्शाद फ़रमाया जो हज़रते यूसुफ ने अपने भाइयों के जवाब में फ़रमाया था कि : _आज तुम से कोई मुवाख़ज़ा नहीं है अल्लाह तुम्हें बख्श दे। वोह अर-हमर्राहिमीन है।_
     
࿐   जब कुसूर मुआफ़ हो गया तो अबू सुफ्यान बिन अल हारिष ने ताजदारे आलम ﷺ की मद्ह में अशआर लिखे और ज़मानए जाहिलिय्यत के दौर में जो कुछ आप की हिजू में लिखा था उस की मा'ज़िरत की और इस के बाद उम्र भर निहायत सच्चे और षाबित क़दम मुसलमान रहे मगर हया की वजह से रसूलुल्लाह ﷺ के सामने कभी सर नहीं उठाते थे और हुजूर ﷺ भी इन के साथ बहुत ज़ियादा महब्बत रखते थे और फ़रमाया करते थे कि मुझे उम्मीद है कि अबू सुफ्यान बिन अल हारिष मेरे चचा हज़रते हम्ज़ा رضی الله تعالی عنه के काइम मकाम षाबित होंगे।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 422 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 270* ༺❘


         *❝  फ़त्ह मक्का #10 ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐  *मीलों तक आग ही आग :-* मक्के से एक मन्ज़िल के फ़ासिले पर "मुर्रुज्ज़हरान" में पहुंच कर इस्लामी लश्कर ने पड़ाव डाला और हुजूर ﷺ ने फ़ौज को हुक्म दिया कि हर मुजाहिद अपना अलग अलग चूल्हा जलाए। दस हज़ार मुजाहिदीन ने जो अलग अलग चूल्हे जलाए तो "मुरुज्ज़हरान" के पूरे मैदान में मीलों तक आग ही आग नज़र आने लगी।  

࿐  *कुरैश के जासूस :-* गो कुरैश को मालूम ही हो चुका था कि मदीने से फ़ौजें आ रही हैं। मगर सूरते हाल की तहक़ीक़ के लिये कुरैश ने अबू सुफ्यान बिन हर्ब, हकीम बिन हिज़ाम व बदील बिन वरका को अपना जासूस बना कर भेजा। हज़रते अब्बास رضي الله عنه बेहद फ़िक्र मन्द हो कर कुरैश के अन्जाम पर अफ़सोस कर रहे थे। वोह येह सोचते थे कि अगर रसूलुल्लाह ﷺ इतने अज़ीम लश्कर के साथ मक्का में फ़ातेहाना दाखिल हुए तो आज कुरैश का ख़ातिमा हो जाएगा। चुनान्चे वोह रात के वक्त रसूलुल्लाह ﷺ के सफेद खच्चर पर सुवार हो कर इस इरादे से मक्का चले कि कुरैश को इस खतरे से आगाह कर के उन्हें आमादा करें कि चल कर हुजूर ﷺ से मुआफ़ी मांग कर सुल्ह कर ले वरना तुम्हारी खैर नहीं।
     
࿐  मगर बुखारी की रिवायत में है कि कुरैश को येह ख़बर तो मिल गई थी कि रसूलुल्लाह ﷺ मदीने से रवाना हो गए हैं मगर उन्हें येह पता न था कि आप का लश्कर "मुर्रुज्ज़हरान" तक आ गया है इस लिये अबू सुफ्यान बिन हर्ब और हकीम बिन हिज़ाम व बदल बिन वराका इस तलाश व जुस्तजू में निकले थे कि रसूलुल्लाह ﷺ का लश्कर कहां है ? जब येह तीनों "मुर्रुज्ज़हरान” के करीब पहुंचे तो देखा कि मीलों तक आग ही आग जल रही है येह मन्ज़र देख कर येह तीनों हैरान रह गए और अबू सुफ्यान बिन हर्ब ने कहा कि मैं ने तो ज़िन्दगी में कभी इतनी दूर तक फैली हुई आग इस मैदान में जलते हुए नहीं देखी। आखिर येह कौन सा क़बीला है ? बदील बिन वरका ने कहा कि बनी अम्र मालूम होते हैं। अबू सुफ्यान ने कहा कि नहीं, बनी अम्र इतनी कषीर तादाद में कहां हैं जो उन की आग से "मुर्रुज्ज़हरान" का पूरा मैदान भर जाएगा। 
     
࿐  बहर हाल हज़रते अब्बास की इन तीनों से मुलाक़ात हो गई और अबू सुफ्यान ने पूछा कि ऐ अब्बास ! तुम कहाँ से आ रहे हो ? और येह आग कैसी है ? आप ने फ़रमाया कि येह रसूलुल्लाह ﷺ के लश्कर की आग है। हज़रते अब्बास ने अबू सुफ्यान बिन हर्ब से कहा कि तुम मेरे खच्चर पर पीछे सुवार हो जाओ वरना अगर मुसलमानों ने तुम्हें देख लिया तो अभी तुम को क़त्ल कर डालेंगे। जब येह लोग लश्कर गाह में पहुंचे तो हज़रते उमर رضي الله عنه और दूसरे चन्द मुसलमानों ने जो लश्कर गाह का पहरा दे रहे थे। अबू सुफ्यान को देख लिया। हज़रते उमर अपने जज्बए इन्तिकाम को जब्त न कर सके और अबू सुफ्यान को देखते ही उन की ज़बान से निकला कि "अरे येह तो खुदा का दुश्मन अबू सुफ्यान है।" दौड़ते हुए बारगाहे रिसालत में पहुंचे और अर्ज किया कि या रसूलल्लाह ﷺ ! अबू सुफ्यान हाथ आ गया है। अगर इजाज़त हो तो अभी उस का सर उड़ा दूं। इतने में हज़रते अब्बास भी उन तीनों मुशरिकों को साथ लिये हुए दरबारे रसूल में हाज़िर हो गए और उन लोगों की जान बख़्शी की सिफारिश पेश कर दी और येह कहा कि या रसूलल्लाह ﷺ! मैं ने इन सभों को अमान दे दी है। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 425 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 271* ༺❘


*❝ फ़त्ह मक्का #11 ¶ अबू सुफ्यान का इस्लाम ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐   अबू सुफ्यान बिन हर्ब की इस्लाम दुश्मनी कोई ढकी छुपी चीज़ नहीं थी। मक्के में रसूले करीम ﷺ को सख्त से सख्त ईज़ाएं देनी, मदीने पर बार बार हम्ला करना, क़बाइले अरब को इश्तिआल दिला कर हुज़ूर ﷺ के क़त्ल की बारहा साज़िशें, यहूदियों और तमाम कुफ्फ़ारे अरब से साज़बाज़ कर के इस्लाम और बानिये इस्लाम के ख़ातिमे की कोशिशें येह वोह ना क़ाबिले मुआफ़ी जराइम थे जो पुकार पुकार कर कह रहे थे कि अबू सुफ्यान का क़त्ल बिल्कुल दुरुस्त व जाइज़ और बर महल है, लेकिन रसूले करीम ﷺ जिन को कुरआन ने “रऊफ़ व रहीम" के लक़ब से याद किया है। उन की रहमत चुम्कार चुम्कार कर अबू सुफ्यान के कान में कह रही थी कि ऐ मुजरिम ! मत डर। येह दुन्या के सलातीन का दरबार नहीं है बल्कि येह रहमतुल्लिल आलमीन ﷺ की बारगाहे रहमत है। 
     
࿐  बुखारी शरीफ़ की रिवायत तो येही है कि अबू सुफ्यान बारगाहे अक्दस में हाज़िर हुए तो फ़ौरन ही इस्लाम क़बूल कर लिया। इस लिये जान बच गई। मगर एक रिवायत येह भी है कि हकीम बिन हिज़ाम और बदल बिन वरका ने तो फ़ौरन रात ही में इस्लाम क़बूल कर लिया मगर अबू सफ्यान ने सुब्ह को कलिमा पढा। और बा'ज़ रिवायात में येह भी आया है कि अबू सुफ्यान और हुज़ूर ﷺ के दरमियान एक मुकालमा हुवा उस के बाद अबू सुफ्यान ने अपने इस्लाम का एलान किया।

࿐  वोह मुकालमा येह है : 
रसूले अकरम ﷺ: क्यूं ऐ अबू सुफ्यान ! क्या अब भी तुम्हें यकीन न आया कि खुदा एक है ? 
अबू सुफ़यान : क्यूं नहीं कोई और खुदा होता तो आज हमारे काम आता। 
रसूले अकरम ﷺ: क्या इस में तुम्हें कोई शक है कि मैं अबू सुफ्यान अल्लाह का रसूल हूं ? 
अबू सुफ़यान : हां ! इस में तो अभी मुझे कुछ शुबा है।       
 
࿐   मगर फिर इस के बाद उन्हों ने कलिमा पढ़ लिया और उस वक्त गो उन का ईमान मुतल्ज़िल था लेकिन बाद में बिल आखिर वोह सच्चे मुसलमान बन गए। चुनान्चे गज्वए ताइफ में मुसलमानों की फ़ौज में शामिल हो कर इन्हों ने कुफ्फ़ार से जंग की और इसी में इन की एक आंख जख्मी हो गई। फिर येह जंगे यरमूक में भी जिहाद के लिये गए। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 428 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 272* ༺❘


*❝  फ़त्ह मक्का #12 ¶ लश्करे इस्लाम का जाहो जलाल ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐   मुजाहिदीने इस्लाम का लश्कर जब मक्का की तरफ बढ़ा तो हुज़ूर ﷺ ने हज़रते अब्बास से फ़रमाया कि आप अबू सुफ्यान को किसी ऐसे मक़ाम पर खड़ा कर दें कि येह अफ़वाजे इलाही का जलाल अपनी आंखों से देख ले। चुनान्चे जहां रास्ता कुछ तंग था एक बुलन्द जगह पर हज़रते अब्बास ने अबू सुफ्यान को खड़ा कर दिया। थोड़ी देर के बाद इस्लामी लश्कर समुन्दर की मौजों की तरह उमंडता हुवा रवाना हुवा और क़बाइले अरब की फौजें हथियार सज सज कर यके बाद दी - गरे अबू सुफ्यान के सामने से गुज़रने लगीं। सब से पहले क़बीलए गिफ़ार का बा वक़ार परचम नज़र आया। अबू सुफ्यान ने सहम कर पूछा कि येह कौन लोग हैं ? हज़रते अब्बास ने कहा कि येह क़बीलए गिफ़ार के शह सुवार हैं। अबू सुफ्यान ने कहा कि मुझे क़बीलए गिफार से क्या मतलब है ? फिर जुहैना फिर सा'द बिन हुजैम, फिर सुलैम के क़बाइल की फौजें जर्क बर्क हथियारों में डूबे हुए परचम लहराते और तक्बीर के नारे मारते हुए सामने से निकल गए। अबू सुफ्यान हर फ़ौज का जलाल देख कर मरऊब हो जाते थे और हज़रते अब्बास से हर फ़ौज के बारे में पूछ जाते थे कि येह कौन हैं ? येह किन लोगों का लश्कर है ?

࿐   इस के बाद अन्सार का लश्करे पुर अन्वार इतनी अजीब शान और ऐसी निराली आन बान से चला कि देखने वालों के दिल दहल गए। अबू सुफ्यान ने इस फ़ौज की शानो शौकत से हैरान हो कर कहा कि ऐ अब्बास ! येह कौन लोग हैं ? आपने फ़रमाया कि येह "अन्सार" हैं ना गहां अन्सार के अलम बरदार हज़रते सा'द बिन उबादा झन्डा लिये हुए अबू सुफ्यान के क़रीब से गुज़रे और जब अबू सुफ्यान को देखा तो बुलन्द आवाज़ से कहा कि ऐ अबू सुफ्यान ! आज घुमासान की जंग का दिन है। आज काबे में खुरेज़ी हलाल कर दी जाएगी। अबू सुफ्यान येह सुन कर घबरा गए और हज़रते अब्बास से कहा कि ऐ अब्बास ! सुन लो ! आज कुरैश की हलाकत तुम्हें मुबारक हो। फिर अबू सुफ्यान को चैन नहीं आया तो पूछा कि बहुत देर हो गई। अभी तक मैं ने मुहम्मद (ﷺ) को नहीं देखा कि वोह कौन से लश्कर में हैं ! इतने में हुजूर ताजदारे दो आलम ﷺ परचमे नुबुव्वत के साए में अपने नूरानी लश्कर के हमराह पैग़म्बराना जाहो जलाल के साथ नमूदार हुए। 

࿐   अबू सुफ्यान ने जब शहनशाहे कौनैन को देखा तो चिल्ला कर कहा कि ऐ हुजूर ﷺ ! क्या आप ने सुना कि सा'द बिन उबादा क्या कहते हुए गए हैं ? इर्शाद फ़रमाया कि उन्हों ने क्या कहा है ? अबू सुफ्यान बोले कि उन्हों ने यह कहा है कि आज काबा हलाल कर दिया जाएगा । आप ने इर्शाद फ़रमाया कि सा'द बिन उबादाने गलत कहा, आज तो काबे की अजमत का दिन है। आज तो काबे को लिबास पहनाने का दिन है और हुजूर ﷺ ने फ़रमाया कि सा'द बिन उबादा ने इतनी ग़लत बात क्यूं कह दी। आप ने उन के हाथ से झन्डा के हाथ से झंडा ले कर उन के बेटे कैस बिन साद के हाथ में दे दिया। और एक रिवायत में येह है कि जब अबू सुफ्यान ने बारगाहे रसूल में येह शिकायत की, कि या रसूलल्लाह अभी अभी सा'द बिन उबादा येह कहते हुए गए हैं कि आज घुमसान की लड़ाई का दिन है। तो हुज़ूर (ﷺ) ने ख़फगी का इज़हार फ़रमाते हुए इर्शाद फ़रमाया कि सा'द बिन उबादा ने ग़लत कहा, बल्कि ऐ अबू सुफ्यान ! आज का दिन तो रहमत का दिन है।
    
࿐   फिर फ़ातेहाना शानो शौकत के साथ बानिये काबा के जा नशीन हुजूर रहूमतुल्लिल आलमीन ﷺ ने मक्का की सर ज़मीन में नुज़ूले इज्लाल फ़रमाया और हुक्म दिया कि मेरा झन्डा मक़ामे "हुजून" के पास गाड़ा जाए और हज़रते ख़ालिद बिन वलीद के नाम फरमान जारी फ़रमाया कि वोह फ़ौजों के साथ मक्का के बालाई हिस्से या'नी “कदाअ" की तरफ से मक्का में दाखिल हों। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 429 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 273* ༺❘


*❝ फ़त्ह मक्का #13 फातेहे मक्का का पहला फ़रमान ❞*  
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࿐  ताजदारे दो आलम ﷺ ने मक्का की सर जमीन में क़दम रखते ही जो पहला फरमान ज़ारी फ़रमाया वो ये एलान था कि जिस के लफ्ज़ में रहमतों के दरिया मोज़े मार रहे है : "जो शख़्स हथियार डाल देगा उस के लिये अमान है। जो शख़्स अपना दरवाज़ा बन्द कर लेगा उस के लिये अमान है। जो काबे में दाखिल हो जाएगा उस के लिये अमान।"  इस मौक़अ पर हज़रते अब्बास رضي الله عنه ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! अबू सुफ्यान एक फख्र पसन्द आदमी है इस के लिये कोई ऐसी इम्तियाज़ी बात फ़रमा दीजिये कि इस का सर फख्र से ऊंचा हो जाए। तो आप ने फ़रमा दिया कि "जो अबू सुफ्यान के घर में दाखिल हो जाए उस के लिये अमान है। इस के बाद अबू सुफ्यान मक्का में बुलन्द आवाज़ से पुकार पुकार कर ए'लान करने लगा कि ऐ कुरैश ! मुहम्मद (ﷺ) इतना बड़ा लश्कर ले कर आ गए हैं कि इस का मुक़ाबला करने की किसी में भी ताक़त नहीं है जो अबू सुफ्यान के घर में दाखिल हो जाए उस का लिये अमान है।

࿐  अबू सुफ्यान की ज़बान से येह कम हिम्मती की बात सुन कर उस की बीवी हिन्द बिन्ते उत्बा जल भुन कर कबाब हो गई और तैश में आ कर अबू सुफ्यान की मूंछ पकड़ ली और चिल्ला कर कहने लगी कि ऐ बनी किनाना ! इस कम बख़्त को क़त्ल कर दो येह कैसी बुजदिली और कम हिम्मती की बात बक रहा है। हिन्द की इस चीखो पुकार की आवाज़ सुन कर तमाम बनू किनाना का ख़ानदान अबू सुफ्यान के मकान में जमा हो गया और अबू सुफ्यान ने साफ़ साफ़ कह दिया कि इस वक्त गुस्सा और तैश की बातों से कुछ काम नहीं चल सकता। मैं पूरे इस्लामी लश्कर को अपनी आंख से देख कर आया हूं और मैं तुम लोगों को यक़ीन दिलाता हूं कि अब हम लोगों से मुहम्मद (ﷺ) का मुक़ाबला नहीं हो सकता। येह खैरिय्यत है कि उन्हों ने ए'लान कर दिया है कि जो अबू सुफ्यान के मकान में चला जाए उस के लिये अमान है। लिहाजा ज़ियादा से ज़ियादा लोग मेरे मकान में आ कर पनाह ले लें। अबू सुफ्यान के ख़ानदान वालों ने कहा कि तेरे मकान में भला कितने इन्सान आ सकेंगे ? अबू सुफ्यान ने बताया कि मुहम्मद (ﷺ) ने उन लोगों को भी अमान दे दी है जो अपने दरवाज़े बन्द कर लें या मस्जिदे हराम में दाखिल हो में जाएं या हथियार डाल दें। अबू सूफ्यान का येह बयान सुन कर कोई अबू सुफ़्यान के मकान में चला गया। कोई मस्जिदे हराम की तरफ़ भागा। कोई अपना हथियार ज़मीन पर रख कर खड़ा हो गया। हुजूर ﷺ के इस एलाने रहमत निशान यानी मुकम्मल अम्नो अमान का फरमान जारी कर देने के बाद एक क़तरा खून बहने का कोई इम्कान ही नहीं था।

࿐  लेकिन इकरमा बिन अबू जहल व सफ्वान बिन उमय्या व सुहैल बिन अम्र और जमाश बिन कैस ने मक़ामे “ख़न्दमा" में मुख़्तलिफ़ क़बाइल के औबाश को जम्अ किया था। इन लोगों ने हज़रते खालिद बिन अल वलीद رضي الله عنه की फ़ौज में से दो आदमियों हज़रते करज़ बिन जाबिर फ़हरी और हुबैश बिन अश्अर رضي الله عنه को शहीद कर दिया और इस्लामी लश्कर पर तीर बरसाना शुरू कर दिया। बुखारी की रिवायत में इन्ही दो हज़रात की शहादत का ज़िक्र है मगर जुरकानी वगैरा किताबों से पता चलता है कि तीन सहाबए किराम को कुफ्फ़ारे कुरैश ने क़त्ल कर दिया। दो वोह जो ऊपर ज़िक्र किये गए और एक हज़रते मुस्लिमा बिन अल मीलाअ رضي الله عنه और बारह या तेरह कुफ़्फ़ार भी मारे गए और बाक़ी मैदान छोड़ कर भाग निकले। हुजूर ﷺ ने जब देखा कि तलवारें चमक रही हैं तो आपने दरयाफ्त फ़रमाया कि मैं ने तो खालिद बिन अल वलीद को जंग करने से मन्अ कर दिया था। फिर येह तलवारें कैसी चल रही हैं ? लोगों ने अर्ज किया कि पहल कुफ्फ़ार की तरफ़ से हुई है। इस लिये लड़ने के सिवा हज़रते खालिद बिन अल वलीद की फ़ौज के लिये कोई चारए कार ही नहीं रह गया था। येह सुन कर इर्शाद फरमाया कि कज़ाए इलाही येही थी और खुदा ने जो चाहा वोही बेहतर है। 

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*❝ फ़त्ह मक्का #14 ¶ ताजदारे दो आलम ﷺ का मक्का में दाखिला  ❞*  
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࿐   हुजूर ﷺ जब फातेहाना हैषिय्यत से मक्का में दाखिल होने लगे तो आप अपनी ऊंटनी "कस्वा" पर सुवार थे। एक सियाह रंग का इमामा बांधे हुए थे और बुखारी में है कि आप के सर पर “मिग्फ़र” था। आप के एक जानिब हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ और दूसरी जानिब उसैद बिन हुजैर رضي الله عنه थे और आप के चारों तरफ़ जोश में भरा हुवा और हथियारों में डूबा हुवा लश्कर था जिस के दरमियान को कुब्बए नबवी था। 

࿐    इस शानो शौकत को देख कर अबू सुफ्यान ने हज़रते अब्बास رضي الله عنه से कहा कि ऐ अब्बास ! तुम्हारा भतीजा तो बादशाह हो गया। हज़रते अब्बास ने जवाब दिया कि तेरा बुरा हो ऐ अबू सुफ्यान ! येह बादशाहत नहीं है बल्कि येह "नुबुव्वत” है। इस शाहाना जुलूस के जाहो जलाल के बा वुजूद शहनशाहे रिसालत ﷺ की शाने तवाजोअ का येह आलम था कि आप सूरए फत्ह की तिलावत फ़रमाते हुए इस तरह सर झुकाए हुए ऊंटनी पर बैठे हुए थे कि आप का सर ऊंटनी के पालान से लग लग जाता था। आप ﷺ की येह कैफ़िय्यते तवाज़ोअ खुदा वन्दे कुद्दूस का शुक्र अदा करने और उस की बारगाहे अजमत में अपने इज्ज़ व नियाज़ मन्दी का इज़्हार करने के लिये थी। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 434📚*

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*❝  फ़त्ह मक्का #15 ¶ मक्का में हुज़ूर ﷺ की कियाम गाह  ❞*  
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࿐   बुखारी की रिवायत है कि  हुज़ूर ﷺ फ़त्ह मक्का के दिन हज़रते अली رضي الله عنه की बहन हज़रते उम्मे हानी बिन्ते अबी तालिब के मकान पर तशरीफ़ ले गए और वहां गुस्ल फ़रमाया फिर आठ रक्अत नमाज़े चाश्त पढ़ी। येह नमाज़ बहुत ही मुख़्तसर तौर पर अदा फ़रमाई लेकिन रुकूअ सज्दा मुकम्मल तौर पर अदा फ़रमाते रहे।
     
࿐  एक रिवायत में येह भी आया है कि आप ﷺ ने हज़रते बीबी उम्मे हानी कि क्या घर में कुछ खाना भी है ? उन्हों ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! खुश्क रोटी के चन्द टुकड़े हैं। मुझे बड़ी शर्म दामन गीर होती है कि उस को आप के सामने पेश कर दूं। इर्शाद फ़रमाया कि "लाओ" फिर आप ﷺ ने अपने दस्ते मुबारक से उन खुश्क रोटियों को तोड़ा और पानी में भिगो कर नर्म किया और हज़रते उम्मे हानी ने उन रोटियों के सालन के लिये नमक पेश किया तो आप ﷺ ने फ़रमाया कि क्या कोई सालन घर में नहीं है ? उन्हों ने अर्ज़ किया कि मेरे घर में "सिर्का" के सिवा कुछ भी नहीं है। आप ने इर्शाद फ़रमाया कि "सिर्का" लाओ। आप ने सिर्का को रोटी पर डाला और तनावुल फ़रमा कर खुदा का शुक्र बजा लाए। 

࿐  फिर फ़रमाया कि "सिर्का बेहतरीन सालन है और जिस घर में सिर्का होगा उस घर वाले मोहताज न होंगे।" फिर हज़रते उम्मे हानीने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! मैं ने हारिष बिन हश्शाम (अबू जहल के भाई) और ज़हीर बिन उमय्या को अमान दे दी है। लेकिन मेरे भाई हज़रते अली رضی الله تعالی عنه चाहते हैं कि इन दोनों को इस जुर्म में क़त्ल करना चाहते है कि इन दोनों ने हज़रते खालिद बिन अल वलीद رضی الله تعالی عنه की फ़ौज से जंग की है तो हुज़ूर ﷺ ने फरमाया ऐ उम्मे हानी ! رضی الله تعالی عنه जिस को तुम ने अमान दे दी उस के लिये हमारी तरफ़ से भी अमान है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 435 📚*

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*❝ फ़त्ह मक्का #16 ¶ बैतुल्लाह में दाखिला ❞*  
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࿐  हुज़ूर ﷺ का झन्डा "हजून" में जिस को आज कल जन्नतुल मअला कहते हैं "मस्जिदुल फ़त्ह" के करीब में गाड़ा गया फिर आप अपनी ऊंटनी पर सुवार हो कर और हज़रते उसामा बिन जैद رضي الله عنه को ऊंटनी पर अपने पीछे बिठा कर मस्जिदे हराम की तरफ रवाना हुए और हजरते बिलाल رضي الله عنه और काबा के कलीद बरदार उषमान बिन तल्हा भी आप के साथ थे। आप ने मस्जिदे हराम में अपनी ऊंटनी को बिठाया और का'बे का तवाफ़ किया और हज़रे अस्वद को बोसा दिया। 
  
࿐  येह इन्क़िलाबे ज़माना की एक हैरत अंगेज़ मिषाल है कि हज़रते इब्राहीम खलीलुल्लाह عليه السلام जिन का लकब "बुत शिकन" है उन की यादगार ख़ानए काबा के अन्दरूने हिसार तीन सो साठ बुतों की कितार थी। फातेहे मक्का ﷺ का हज़रते खलील का जा नशीने जलील होने की हैषिय्यत से फ़र्ज़े अव्वलीन था कि यादगारे ख़लील को बुतों की नजिस और गन्दी आलाइशों से पाक करें। चुनान्चे आप ﷺ खुद ब नफ्से नफीस एक छड़ी ले कर खड़े हुए और इन बुतों को छड़ी की नोक से ठोंके मार मार कर गिराते जाते थे और  ये आयत तिलावत फ़रमाते जाते थे, : _हक़ आ गया और बातिल मिट गया और बातिल मिटने ही की चीज़ थी।_
     
࿐  फिर उन बुतों को जो ऐन काबे के अन्दर थे। हुज़ूर ﷺ ने हुक्म दिया कि वोह सब निकाले जाएं। चुनान्चे वोह सब बुत निकाल बाहर किये गए। उन्ही बुतों में हज़रते इब्राहीम व हज़रते इस्माईल के मुजस्समे भी थे जिन के हाथों में फाल खोलने के तीर थे। आपने उन को देख कर फ़रमाया कि अल्लाह तआला इन काफ़िरों को मार डाले। इन काफ़िरों को ख़ूब मालूम है कि इन दोनों पैगम्बरों ने कभी भी फ़ाल नहीं खोला। 
   
࿐  जब तक एक एक बुत काबे के अन्दर से न निकल गया, आप ﷺ ने का'बे के अन्दर क़दम नहीं रखा जब तमाम बुतों से काबा पाक हो गया तो आप अपने साथ हज़रते उसामा बिन तल्हा हजबी को ले कर खानए काबा के अंदर तशरीफ़ ले गए और बैतुल्लाह शरीफ के तमाम गोशों में तकबीर पढ़ी और दो रकअत नमाज़ भी अदा फ़रमाई इस के बाद बाहर तशरीफ़ लाए। काबए मुक़द्दसा के अन्दर से जब आप बाहर निकले तो उषमान बिन तल्हा को बुला कर काबे की कुन्जी उन के हाथ अता फ़रमाई और इर्शाद फ़रमाया कि लो येह कुन्जी हमेशा हमेशा के लिये तुम लोगों में रहेगी येह कुन्जी तुम से वोही छीनेगा जो जालिम होगा। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 437📚*

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*❝  फ़त्ह मक्का #17 ¶ शहनशाहे रिसालत ﷺ का दरबारे आम ❞*  
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࿐   ताजदारे दो आलम ﷺ ने शहनशाहे इस्लाम की हैषिय्यत से हरमे इलाही में सब से पहला दरबारे आम मुन्अकिद फ़रमाया जिस में अफ़वाजे इस्ला के इलावा हज़ारों कुफ्फार व मुशरिकीन के खुवास व अवाम का एक ज़बर दस्त इदिहाम था। इस शहनशाही खुत्बे में आप ने सिर्फ अहले मक्का ही से नहीं बल्कि तमाम अक्वामे आलम से खिताबे आम फरमाते हुए येह इर्शाद फ़रमाया कि 
  
࿐   “एक खुदा के सिवा कोई माबूद नहीं। उस का कोई शरीक नहीं। उस ने अपना वादा सच कर दिखाया। उस ने अपने बन्दे (हुजूर ﷺ) की मदद की और कुफ्फ़ार के तमाम लश्करों को तन्हा शिकस्त दे दी, तमाम फख्र की बातें, तमाम पुराने ख़ूनों का बदला, तमाम पुराने खून बहा, और जाहिलिय्यत की रस्में सब मेरे पैरों के नीचे हैं। सिर्फ काबा की तौलियत और हुज्जाज को पानी पिलाना, येह दो एजाज़ इस से मुस्तषना हैं। ऐ क़ौमे कुरैश ! अब जाहिलिय्यत का गुरूर और ख़ानदानों का इफ्तिख़ार खुदा ने मिटा दिया। तमाम लोग हज़रते आदम عليه السلام की नस्ल से हैं और हज़रते आदम عليه السلام मिट्टी से बनाए गए हैं।" 
     
࿐  इस के बाद हुजूर ﷺ ने कुरआने मजीद की येह आयत तिलावत फ़रमाई जिस का तर्जमा येह है : _ऐ लोगों ! हम ने तुम को एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हारे लिये क़बीले और ख़ानदान बना दिये ताकि तुम आपस में एक दूसरे की पहचान रखो लेकिन खुदा के नज़दीक सब से ज़ियादा शरीफ़ वोह है जो सब से ज़ियादा परहेज़ गार है। यक़ीनन अल्लाह तआला बड़ा जानने वाला और ख़बर रखने वाला है।_ (पा.26)
     बेशक अल्लाह ने शराब की खरीद व फरोख्त को हराम फरमा दिया है। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 438 📚*

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*❝  फ़त्ह मक्का #18 ¶ कुफ्फारे मक्का से खिताब #01 ❞*  
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࿐   इस के बा'द शहनशाहे कौनैन ﷺ ने उस हज़ारों के मज्मअ में एक गहरी निगाह डाली तो देखा कि सर झुकाए, निगाहे नीची किये हुए लरज़ां व तरसां अश्राफ़े कुरैश खड़े हुए हैं। उन ज़ालिमों और जफ़ाकारों में वोह लोग भी थे जिन्हों ने आप ﷺ के रास्तों में कांटे बिछाए थे। वोह लोग भी थे जो बारहा आप पर पथ्थरों की बारिश कर चुके थे। वोह खूंखार भी थे जिन्हों ने बार बार आप ﷺ पर क़ातिलाना हम्ले किये थे। वोह बे रहम व बे दर्द भी थे जिन्हों ने आप के दन्दाने मुबारक को शहीद और आप के चेहरए अन्वर को लहू लुहान कर डाला था। वोह औबाश भी थे जो बरसहा बरस तक अपनी बोहतान तराशियों और शर्मनाक गालियों से आप के कल्बे मुबारक को ज़ख़्मी कर चुके थे। वोह सफ्फाक व दरिन्दा सिफ़त भी थे जो आप के गले में चादर का फन्दा डाल कर आप का गला घोंट चुके थे। वोह जुल्मो सितम के मुजस्समे और पाप के पुतले भी थे जिन्हों ने आप की साहिब जादी हज़रते जैनब को नेज़ा मार कर ऊंट से गिरा दिया था और उन का हम्ल साक़ित हो गया था। वोह आप के खून के प्यासे भी थे जिन की तिश्ना लबी और प्यास ख़ूने नुबुव्वत के सिवा किसी चीज़ से नहीं बुझ सकती थी। 

࿐   वोह जफ़ाकार व खूंखार भी थे जिन के जारिहाना हम्लों और ज़ालिमाना यलगार से बार बार मदीनए मुनव्वरा के दरो दीवार दहल चुके थे। हुज़ूर ﷺ के प्यारे चचा हज़रते हम्जा़ा के क़ातिल और उन की नाक, कान, काटने वाले, उन की आंखें फोड़ने वाले, उन का जिगर चबाने वाले भी उस मज्मअ में मौजूद थे वोह सितम गार जिन्हों ने शम्ए नुबुव्वत के जां निषार परवानों हज़रते बिलाल, हज़रते सुहैब, हज़रते अम्मार, हज़रते खब्बाब, हज़रते खुबैब, हज़रते जैद बिन दषिना वगैरा को रस्सियों से बांध बांध कर कोड़े मार मार जलती हुई रैतों पर लिटाया था, किसी को आग के दहक्ते हुए कोएलों पर सुलाया था, किसी को चटाइयों में लपेट लपेट कर नाकों में धूएं दिये थे, सेंकड़ों बार गला घोंटा था येह तमाम जोरो जफा और जुल्म व सितम गारी के पैकर, जिन के जिस्म के रोंगटे रोंगटे और बदन के बाल बाल जुल्म व उदवान और सरकशी व तुग्यान के वबाल से ख़ौफ़नाक जुर्मों और शर्मनाक मज़ालिम के पहाड़ बन चुके थे।

࿐  आज येह सब के सब दस बारह हज़ार मुहाजिरीन व अन्सार के लश्कर की हिरासत में मुजरिम बने हुए खड़े कांप रहे थे और अपने दिलों में येह सोच रहे थे कि शायद आज हमारी लाशों को कुत्तों से नुचवा कर हमारी बोटियां चीलों और कव्वों को खिला दी जाएंगी और अन्सार व मुहाजिरीन की ग़ज़ब नाक फ़ौजें हमारे बच्चे बच्चे को ख़ाक व खून में मिला कर हमारी नस्लों को नेस्तो नाबूद कर डालेंगी और हमारी बस्तियों को ताख़त व ताराज कर के तहस नहस कर डालेंगी उन मुजरिमों के सीनों में ख़ौफ़ व हिरास का तूफ़ान उठ रहा था। दहशत और डर से उन के बदनों की बोटी बोटी फड़क रही थी, दिल धड़क रहे थे, कलेजे मुंह में आ गए थे और आलमे यास में उन्हें ज़मीन से आस्मान तक धूएं ही धूएं के ख़ौफ़नाक बादल नज़र आ रहे थे। 
     इसी मायूसी और ना उम्मीदी की ख़तरनाक फ़ज़ा में एक दम शहनशाहे रिसालत ﷺ की निगाहे रहमत उन पापियों की तरफ़ मुतवज्जेह हुई। और उन मुजरिमों से आप ने पूछा...

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 440 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 279* ༺❘


*❝  फ़त्ह मक्का #19 ¶ कुफ्फारे मक्का से खिताब #02  ❞*  
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࿐   इसी मायूसी और ना उम्मीदी की खतरनाक फ़ज़ा में एक दम शहनशाहे रिसालत ﷺ की निगाहे रहमत उन पापियों की तरफ़ मुतवज्जेह हुई। और उन मुजरिमों से आप ने पूछा कि “बोलो ! तुम को कुछ मालूम है ? कि आज मैं तुम से क्या मुआमला करने वाला हूं।"  इस दहशत अंगेज़ और ख़ौफ़नाक सुवाल से मुजरिमीन हवास बाख़्ता हो कर कांप उठे लेकिन जबीने रहमत के पैग़म्बराना तेवर को देख कर उम्मीदो बीम के महशर में लरजते हुए सब यक ज़बान हो कर बोले आप करम वाले भाई और करम वाले बाप के बेटे हैं। सब की ललचाई हुई नज़रें जमाले नुबुव्वत का मुंह तक रही थीं। और सब के कान शहनशाहे नुबुव्वत का फैसला कुन जवाब सुनने के मुन्तज़िर थे कि इक दम दफ्तन फातेहे मक्का ने अपने करीमाना लहजे में इर्शाद फ़रमाया कि : आज तुम पर कोई इल्ज़ाम नहीं, जाओ तुम सब आज़ाद हो। 
   
࿐  बिल्कुल गैर मुतवक्केअ तौर पर एक दम अचानक येह फ़रमाने रिसालत सुन कर सब मुजरिमों की आंखें फ़र्ते नदामत अश्कबार हो गई और उन के दिलों की गहराइयों से जज्बाते शुक्रिया के आषार आंसूओं की धार बन कर उन के रुख़्सारों पर मचलने लगे और कुफ्फार की ज़बानों पर "ला-इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह" के नारों से हरमे काबा के दरो दीवार पर हर तरफ़ अन्वार की बारिश होने लगी। ना गहां बिल्कुल ही अचानक और दफ़अतन एक अजीब इन्क़िलाब बरपा हो गया कि समां ही बदल गया, फ़ज़ा ही पलट गई और एक दम ऐसा महसूस होने लगा कि 
    *जहां तारीक था, बे नूर था और सख़्त काला था*
    *कोई पर्दे से क्या निकला की घर घर में उजाला था*
    
࿐  कुफ़्फ़ार ने मुहाजिरीन की जाएदादों, मकानों, दुकानों पर ग़ासिबाना कब्ज़ा जमा लिया था। अब वक्त था कि मुहाजिरीन को उन के हुकूक दिलाए जाते और उन सब जाएदादों, मकानों, दुकानों और सामानों को मक्का के गासिबों के क़ब्ज़ों से वा गुज़ार कर के मुहाजिरीन के सिपुर्द किये जाते। लेकिन शहनशाहे रिसालत ने मुहाजिरीन को हुक्म दे दिया कि वोह अपनी कुल जाएदादें खुशी खुशी मक्का वालों को हिबा कर दें। 
     
࿐  अल्लाहु अक्बर ! ऐ अक्वामे आलम की तारीखी दास्तानो ! बताओ क्या दुन्या के किसी फातेह की किताबे ज़िन्दगी में कोई ऐसा हसीन व जुरीं वरक़ है ? ऐ धरती ! खुदा के लिये बता ? ऐ आस्मान ! लिल्लाह बोल। क्या तुम्हारे दरमियान कोई ऐसा फ़ातेह गुज़रा है ? जिस ने अपने दुश्मनों के साथ ऐसा हुस्ने सुलूक किया हो ? ऐ चांद और सूरज की चमक्ती और दूरबीन निगाहो ! क्या तुम ने लाखों बरस की गदिश लैलो नहार में कोई ऐसा ताजदार देखा है ? तुम इस के सिवा और क्या कहोगे ? कि येह नबी जमाल व जलाल का वोह बे मिषाल शाहकार है कि शाहाने आलम के लिये इस का तसव्वुर भी मुहाल है। इस लिये हम तमाम दुन्या को चेलेन्ज के साथ दा'वते नज़ारा देते हैं कि 
   *चश्मे अक्वामे येह नज़ारा अबद तक देखे*
    *रिफ्अते शाने رَفَعْنَا لَکَ ذِکْرَکَ देखे* 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 442 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 280* ༺❘


*❝  फ़त्ह मक्का #20 दूसरा खुत्बा  ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐  फ़तहे मक्का के दूसरे दिन भी आपने एक खुत्बा दिया जिस में हरमे काबा के अह्काम व आदाब की तालीम दी कि हरम में किसी का खून बहाना, जानवरों का मारना, शिकार करना, दरख़्त काटना, इज्ख़िर के सिवा कोई घास काटना हराम है और अल्लाह ने घड़ी भर के लिये अपने रसूल को हरम में जंग करने की इजाज़त दी फिर क़ियामत तक के लिये किसी को हरम में जंग की इजाजत नहीं है। अल्लाह ने इस को हरम बना दिया है। न मुझ से पहले किसी के लिये इस शहर में खूंरेज़ी हलाल की गई न मेरे बाद क़ियामत तक किसी के लिये हलाल की जाएगी।

  *❝ अन्सार को फिराके रसूल ﷺ का डर ❞*     

࿐ अन्सार ने कुरैश के साथ जब रसूलुल्लाह ﷺ के इस करीमाना हुस्ने सुलूक को देखा और हुजूर ﷺ कुछ दिनों तक मक्का में ठहर गए तो अन्सार को येह ख़तरा लाहिक हो गया कि शायद रसूलुल्लाह ﷺ पर अपनी क़ौम और वतन की महब्बत ग़ालिब आ गई है कहीं ऐसा न हो कि आप मक्का में इक़ामत फ़रमा लें और हम लोग आप ﷺ से दूर हो जाएं। जब हुजूर ﷺ को अन्सार के इस ख़याल की इत्तिलाअ हुई तो आप ने फ़रमाया मआज अल्लाह ए अन्सार अब तो हमारी ज़िन्दगी और वफ़ात तुम्हारे ही साथ है। 
  
࿐  येह सुन कर फ़र्ते मुसर्रत से अन्सार की आंखों से आंसू जारी हो गए और सब ने कहा कि या रसूलल्लाह ﷺ हम लोगों ने जो कुछ दिल में खयाल किया या ज़बान से कहा इस का सबब आप की जाते मुक़द्दसा के साथ हमारा जज्बए इश्क़ है। क्यूं कि आप की जुदाई का तसव्वुर हमारे लिये ना क़ाबिले बरदाश्त हो रहा था। 

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*❝  फ़त्ह मक्का #21 ¶ का'बे की छत पर अज़ान  ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐   जब नमाज़ का वक़्त आया तो हुजूर ﷺ ने हज़रते बिलाल رضی الله تعالی عنه को हुक्म दिया कि काबे की छत पर चढ़ कर अज़ान दें। जिस वक़्त "अल्लाहु अकबर" की ईमान अफ़रोज़ सदा बुलन्द हुई तो हरम के हिसार और का'बे के दरो दीवार पर ईमानी ज़िन्दगी के आषार नुमूदार हो गए मगर मक्का के वोह नौ मुस्लिम जो अभी कुछ ठन्डे पड़ गए थे अज़ान की आवाज़ सुन कर उन के दिलों में गैरत की आग फिर भड़क उठी। चुनाचे रिवायत है कि हज़रते इताब बिन उसैद ने कहा कि खुदा ने मेरे बाप की लाज रख ली कि इस आवाज़ को सुनने से पहले ही उस को दुन्या से उठा लिया और एक दूसरे सरदारे कुरैश के मुंह से निकला कि “अब जीना बेकार है।" 
    
 ࿐  मगर इस के बाद हुज़ूर ﷺ के फैज़े सोहबत से हज़रते इताब बिन उसैद رضی الله تعالی عنه के दिल में नूरे ईमान का सूरज चमक उठा और वोह सादिकुल ईमान मुसलमान बन गए। चुनान्चे मक्का से रवाना होते वक़्त हुज़ूर ﷺ ने इन्हीं को मक्के का हाकिम बना दिया।

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*❝  फ़त्ह मक्का #22 ¶ बैअते इस्लाम #01 ❞*  
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࿐  इस के बाद हुजूर ﷺ कोहे सफा की पहाड़ी के नीचे एक बुलन्द मक़ाम पर बैठे और लोग जूक दर जूक आ कर आप के दस्ते हक़ परस्त पर इस्लाम की बैअत करने लगे। मर्दों की बैअत ख़त्म हो चुकी तो औरतों की बारी आई। हुजूर ﷺ हर बैअत करने वाली औरत से जब वोह तमाम शराइत का इक्रार कर लेती तो आप उस से फ़रमा देते थे कि “मैं ने तुझ से बैअत ले ली। हज़रते बीबी आइशा رضي الله عنها का बयान है कि खुदा की क़सम ! आप के हाथ ने बैअत के वक्त किसी औरत के हाथ को नहीं छुवा। सिर्फ कलाम ही से बैअत फ़रमा लेते थे। 
    
࿐ इन्ही औरतों में निक़ाब ओढ़ कर हिन्द बिन्ते उत्वा बिन रबीआ भी बैअत के लिये आई जो हज़रते अबू सुफ्यान की बीवी की वालिदा हैं। येह वोही हिन्द जिन्हों ने जंगे उहद में हजरते हम्जा رضي الله عنه का शिकम चाक कर के उनके जिगर को निकाल कर चबा डाला था और उन के कान, नाक को काट कर और आंख को निकाल कर एक धागे में पिरो कर गले का हार बनाया था। जब येह बैअत के लिये आई तो हुजुर ﷺ से निहायत दिलेरी के साथ गुफ्तगू की। उन का मुकालमा हस्बे ज़ैल है। 

रसूलुल्लाह ﷺ   : तुम खुदा के साथ किसी को शरीक मत करना। 

हिन्द बिन्ते उत्बा   :  येह इक्रार आप ने मर्दों से तो नहीं लिया लेकिन बहर हाल हम को मंजूर है। 

रसूलुल्लाह ﷺ    :   चोरी मत करना। 

हिन्द बिन्ते उत्बा   :   मैं अपने शोहर (अबू सुफ्यान) के माल में से कुछ ले लिया करती हूं। मालूम नहीं येह भी जाइज़ है या नहीं ? 

रसूलुल्लाह ﷺ   :  अपनी औलाद को क़त्ल न करना। 

हिन्द बिन्ते उत्बा  : हम ने तो बच्चों को पाला था और जब वोह बड़े हो गए तो आप ने जंगे बद्र में उन को मार डाला। अब आप जानें और वोह जानें। 
    
 ࿐   बहर हाल हज़रते अबू सुफ्यान और उन की बीवी हिन्द बिन्ते उत्बा दोनों मुसलमान हो गए लिहाज़ा इन दोनों के बारे में बद गुमानी या इन दोनों की शान में बद ज़बानी रवाफ़िज़ का मज़हब है। अहले सुन्नत के नज़दीक इन दोनों का शुमार सहाबा और सहाबिय्यात की फेहरिस्त में है।

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*❝  फ़त्ह मक्का #23 ¶ बैअते इस्लाम #02 ❞*  
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࿐   इब्तिदा में गो अबू सुफ़यान और उनकी बीवी हिन्द बीनते उत्बा दोनों के ईमान में कुछ तज़ब्जुब रहा हो मगर बाद में येह दोनों सादिकुल ईमान मुसलमान हो गए और ईमान ही पर इन दोनों का ख़ातिमा हुवा।  हज़रते बीबी आइशा رضي الله عنها का बयान है कि हिन्द बिन्ते उत्बा बारगाहे नुबुव्वत में आई और येह अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! रूए ज़मीन पर आप के घर वालों से ज़ियादा किसी घर वाले का ज़लील होना मुझे महबूब न था। मगर अब मेरा येह हाल है कि रूए ज़मीन पर आप के घर वालों से जियादा किसी घर वाले है का इज़्ज़त दार होना मुझे पसन्द नहीं। 
   
࿐  इसी तरह हज़रते अबू सुफ्यान رضي الله عنه के बारे में मुहद्दिष इब्ने असाकिर की एक रिवायत है कि येह मस्जिदे हराम में बैठे हुए थे और हुजूर ﷺ सामने से निकले तो इन्हों ने अपने दिल में येह कहा कि कौन सी ताक़त इन के पास ऐसी है कि येह हम पर ग़ालिब रहते हैं तो हुजूर ﷺ ने इन के दिल में छुपे हुए ख़याल को जान लिया और क़रीब आ कर आप ने उन के सीने पर हाथ मारा और फ़रमाया कि हम खुदा की ताकत से ग़ालिब आ जाते हैं। यह सुन कर इन्हों ने बुलंद आवाज़ से कहा कि "मैं शहादत देता हूं कि बेशक आप अल्लाह के रसूल हैं।" 
     
࿐  और मुहद्दिष हाकिम और इन के शागिर्द इमाम बैहक़ी ने हज़रते इब्ने अब्बास से येह रिवायत की है कि हज़रते अबू सुफ्यान ने हुजुर ﷺ को देख कर अपने दिल में कहा कि “काश ! मैं एक फ़ौज जम्अ कर के दोबारा इन से जंग करता" इधर इन के दिल में येह ख़याल आया ही था कि हुजुर ﷺ ने आगे बढ़ कर इन के सीने पर हाथ मारा और फ़रमाया कि "अगर तू ऐसा करेगा तो अल्लाह तआला तुझे ज़लीलो ख़्वार कर देगा।" येह सुन कर हज़रते अबू सुफ्यान तौबा व इस्तिग़्फार करने लगे और अर्ज़ किया कि मुझे इस वक़्त आप की नुबुव्वत का यकीन हो गया क्यूं कि आप ने मेरे दिल में छुपे हुए ख़याल को जान लिया। 
    
࿐   येह भी रिवायत है कि जब सब से पहले हुजूर ﷺ ने इन पर इस्लाम पेश फ़रमाया था तो इन्हों ने कहा था कि मैं अपने माबूद उज्ज़ा को क्या करूंगा ? तो हज़रते उमर رضي الله عنه ने बर जस्ता फ़रमाया था कि “तुम उज्ज़ा पर पाखाना फिर देना" चुनान्चे हुजूर ﷺ ने जब उज्ज़ा को तोड़ने के लिये हज़रते खालिद बिन अल वलीद को रवाना फ़रमाया तो साथ में हज़रते अबू सुफ्यान को भी भेजा और इन्हों ने अपने हाथ से अपने माबूद उज्ज़ा को तोड़ डाला। येह मुहम्मद बिन इस्हाक़ की रिवायत है और इब्ने हश्शाम की रिवायत यह है कि उज्जा को हज़रते अली ने तोड़ा था। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 446 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 284* ༺❘


*❝ फ़त्ह मक्का #24 ¶ बुत परस्ती का खातिमा ❞*  
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࿐   गुज़श्ता अवराक़ में हम तहरीर कर चुके कि खानए का'बा के तमाम बुतों और दीवारों की तसावीर को तोड़ फोड़ कर और मिटा कर मक्का को तो हुज़ूर ﷺ ने बुत परस्ती की ला'नत से पाक कर ही दिया था लेकिन मक्का के अतराफ़ में भी बुत परस्ती के चन्द मराकिज़ थे या'नी लात, मनात, सवाअ, उज्ज़ा येह चन्द बड़े बड़े बुत थे जो मुख़्तलिफ़ क़बाइल के मा'बूद थे। हुजूर ﷺ ने सहाबए किराम के लश्करों को भेज कर इन सब बुतों को तोड़ फोड़ कर बुत परस्ती के सारे तिलिस्म को तहस नहस कर दिया और मक्का नीज़ इस के अतराफ़ व जवानिब के तमाम बुतों को नेसतो नाबूद कर दिया। 
  
࿐   इसी तरह बानिये का'बा हज़रते खलीलुल्लाह عليه السلام के जा नशीन हुज़ूर रहूमतुल्लिल आलमीन ने अपने मूरिषे आ'ला के मिशन को मुकम्मल फ़रमा दिया और दर हक़ीक़त फ़त्ह मक्का का सब से बड़ा येही मक्सद था कि शिर्क व बुतपरस्ती का खातिमा और तौहीदे खुदा वन्दी का बोलबाला हो जाए। चुनान्चे येह अज़ीम मक्सद बि हम्दिही तआला ब दरजए अतम हासिल हो गया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 448 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 285* ༺❘


*❝  फ़त्ह मक्का ¶ चन्द ना काबिले मुआफ़ी मुजरिमीन ❞*  
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࿐  जब मक्का फतह हो गया तो हुज़ूर ﷺ ने आम मुआफ़ी का एलान फ़रमा दिया। मगर चन्द ऐसे मुजरिमीन थे जिन के बारे में ताजदारे दो आलम ने येह फरमान जारी फ़रमा दिया कि येह लोग अगर इस्लाम न क़बूल करें तो येह लोग जहां भी मिलें क़त्ल कर दिये जाएं ख़्वाह वोह गिलाफ़े काबा ही में क्यूं न छुपे हों। इन मुजरिमों में से बा'ज़ ने तो इस्लाम क़बूल कर लिया और बा'ज़ क़त्ल हो गए उन में से चन्द का मुख़्तसर तज़किरा तहरीर किया जाता है : 

࿐   (1) "अब्दुल उज्ज़ा बिन ख़तल" येह मुसलमान हो गया था इस को हुज़ूर ﷺ ने जकात के जानवर वसूल करने के लिये भेजा और साथ में एक दूसरे मुसलमान को भी भेज दिया किसी बात पर दोनों में तकरार हो गई तो इस ने मुसलमान को कत्ल कर दिया और क़िसास के डर से तमाम जानवरों को ले कर मक्का भाग निकला और मुरतद हो गया। फ़तहे मक्का के दिन येह भी एक नेज़ा ले कर मुसलमानों से लड़ने के लिये घर से निकला था। लेकिन मुस्लिम अफ़वाज का जलाल देख कर कांप उठा और नेज़ा फेंक कर भागा और काबे के पर्दों में छुप गया। हज़रते सईद बिन हरीष मख़्ज़ूमी और अबू बरज़ा अस्लमी رضي الله عنه ने मिल कर इस को क़त्ल कर दिया।

࿐   (2) "हुवैरष बिन नक़ीद" येह शाइर था और हुजूर ﷺ की हिजू लिखा करता था और खूनी मुजरिम भी था। हज़रते अली رضي الله عنه ने इस को क़त्ल किया। 

࿐   (3) "मुक़ीस बिन सबाबा" इस को नमीला बिन अब्दुल्लाह ने क़त्ल किया। येह भी खूनी था। 

࿐  (4) "हारिष बिन तलातला" येह भी बड़ा ही मूजी था। हज़रते अली ने इस को क़त्ल किया। 

࿐  (5) "कुरैबा" येह इब्ने ख़तल की लौंडी थी। रसूलुल्लाह ﷺ की हिजू गाया करती थी। येह भी क़त्ल की गई। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 449 📚*

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*❝  फ़त्ह मक्का #26 ¶ मक्का से फिरार हो जाने वाले #01 ❞*  
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࿐  चार अश्खास मक्का से भाग निकले थे उन लोगों का मुख़्तसर तज़करा येह है :

࿐  *(1)* "इक्रमा बिन अबी जहल" येह अबू जहल के बेटे हैं। इस लिये इन की इस्लाम दुश्मनी का क्या कहना ? येह भाग कर यमन चले गए लेकिन इन की बीवी "उम्मे हकीम" जो अबू जहल की भतीजी थीं इन्हों ने इस्लाम क़बूल कर लिया और अपने शोहर इक्रमा के लिये बारगाहे रिसालत में मुआफ़ी की दरख्वास्त पेश की। हुजूर ﷺ ने मुआफ़ फ़रमा दिया। उम्मे हकीम खुद यमन गई और मुआफ़ी का हाल बयान किया। इक्रमा हैरान रह गए और इन्तिहाई तअज्जुब के साथ कहा कि क्या मुझ को मुहम्मद (ﷺ) ने मुआफ़ कर दिया ! बहर हाल अपनी बीवी के साथ बारगाहे रिसालत में मुसलमान हो कर हाज़िर हुए हुजूर ﷺ ने जब इन को देखा तो बेहद खुश हुए और इस तेज़ी से इन की तरफ़ बढ़े कि जिस्मे अतहर से चादर गिर पड़ी। फिर हज़रते इक्रमा ने खुशी खुशी हुजूर ﷺ के दस्ते हक़ परस्त पर बैअते इस्लाम की। 

࿐  *(2)* "सफ्वान बिन उमय्या" येह उमय्या बिन खलफ़ के फ़रज़न्द है। अपने बाप उमय्या ही की तरह येह भी इस्लाम के बहुत बड़े दुश्मन थे। फ़त्ह मक्का के दिन भाग कर जद्दा चले गए। हज़रते उमैर बिन वहब ने दरबारे रिसालत में इन की सिफारिश पेश की और अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ! कुरैश का एक रईस सफ्वान मक्का से जिला वतन हुवा चाहता है। हुजुर ﷺ ने उन को भी मुआफ़ी अता फरमा दी और अमान के निशान के तौर पर हज़रते उमैर को अपना इमामा इनायत फ़रमाया। चुनान्चे वोह मुक़द्दस इमामा ले कर "जद्दा" गए और सफ्वान को मक्का ले कर आए सफ्वान जंगे हुनैन तक मुसलमान नहीं हुए। लेकिन इस के बाद इस्लाम क़बूल कर लिया। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 450 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 287* ༺❘


*❝  फ़त्ह मक्का #27 ¶ मक्का से फिरार हो जाने वाले #02  ❞*  
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࿐  (3) "काब बिन ज़हीर" ये सि. 9 ही. में अपने भाई के साथ मदीना आ कर मुशर्रफ ब इस्लाम हुए और हुज़ूर ﷺ की मदह में अपना मशहूर क़सीदा "बि अन्त सआद" पढ़। हुज़ूर ﷺ ने खुश हो कर इन को अपनी चादरें मुबारक इनायत फ़रमाई। हुजूर ﷺ की येह चादरे मुबारक हज़रते काब बिन ज़हीर के पास थी। हज़रते अमीरे मुआविया ने अपने दौरे सल्तनत में इन को दस हज़ार दिरहम पेश किया कि येह मुक़द्दस चादर हमें दे दो। मगर इन्हों ने साफ़ इन्कार कर दिया और फ़रमाया कि मैं रसूलुल्लाह ﷺ की येह चादरे मुबारक हरगिज़ हरगिज़ किसी को नहीं दे सकता। लेकिन आखिर हज़रते अमीरे मुआवियाने हज़रते का'ब बिन ज़हीर की वफ़ात के बाद इन के वारिसों को बीस हज़ार दिरहम दे कर वोह चादर ले ली और अर्सए दराज़ तक वोह चादर सलातीने इस्लाम के पास एक मुक़द्दस तबर्रुक बन कर बाक़ी रही। 
     
࿐    (4) "वहशी" येही वोह वहशी हैं जिन्हों ने जंगे उहुद में हुजूर ﷺ के चचा हज़रते हम्जा को शहीद कर दिया था। येह भी फ़तहे मक्का के दिन भाग कर ताइफ़ चले गए थे मगर फिर ताइफ के एक वफद के हमराह बारगाहे रिसालत में हाज़िर हो कर मुसलमान हो गए। हुजुर ﷺ ने इन की जुबान से अपने चचा के क़त्ल की खूनी दास्तान सुनी और रन्जो ग़म में डूब गए मगर इन को भी आप ने मुआफ़ फ़रमा दिया। लेकिन येह फ़रमाया कि वहशी ! तुम मेरे सामने न आया करो। हज़रते वहशी को इस का बेहद मलाल रहता था। फिर जब हज़रते अबू बक्र सिद्दीक की ख़िलाफ़त के ज़माने में मुसैलमतुल कज्ज़ाब ने नुबुव्वत का दावा किया और लश्करे इस्लाम ने इस मलऊन से जिहाद किया तो हज़रते वहशी भी अपना नेज़ा ले कर जिहाद में शामिल हुए और मुसैलमतुल कज्ज़ाब को क़त्ल कर दिया। हज़रते वहशी अपनी ज़िन्दगी में कहा करते थे कि "मैं ने दौरे जाहिलिय्यत में बेहतरीन इन्सान (हज़रते हम्जा) को कत्ल किया और अपने दौरे इस्लाम में बद तरीन आदमी (मुसैलमतुल कज्जाब) को क़त्ल किया। इन्हों ने दरबारे अक्दस में अपने जराइम का एतिराफ़ कर के अर्ज़ किया कि क्या खुदा मुझ जैसे मुजरिम को भी बख़्श देगा ? तो येह आयत नाज़िल हुई कि :

࿐   _ऐ हबीब आप फ़रमा दीजिये कि ऐ मेरे बन्दो ! जिन्हों ने अपनी जानों पर हद से ज़ियादा गुनाह कर लिया है अल्लाह की रहमत से ना उम्मीद मत हो जाओ। अल्लाह तमाम गुनाहों को बख़्श देगा। वोह यक़ीनन बड़ा बख़्शने वाला और बहुत मेहरबान है।_ 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 451 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 288* ༺❘


*❝ फ़त्ह मक्का #28 ¶ मक्का का इन्तिजाम  ❞*  
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࿐  हुज़ूर ﷺ ने मक्का का नज़्मो नस्क और इन्तिज़ाम चलाने के लिये हज़रते इताब बिन उसैद رضي الله عنه को मक्का का हाकिम मुक़र्रर फ़रमा दिया और हज़रते मुआज़ बिन जबल رضي الله عنه को इस ख़िदमत पर मा'मूर फ़रमाया कि वोह नौ मुस्लिमों को मसाइल व अहकामे इस्लाम की तालीम देते रहें।  
     
࿐  इस में इख़्तिलाफ़ है कि फ़तह के बाद कितने दिनों तक हुज़ूरे अक़्दस ﷺ ने मक्का में कियाम फ़रमाया। अबू दावूद की रिवायत है कि सत्तरह दिन तक आप मक्का में मुक़ीम रहे। और तिरमिजी की रिवायत से पता चलता है कि अठ्ठारह दिन आप का क़ियाम रहा। लेकिन इमाम बुखारी ने हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत की है कि उन्नीस दिन आप मक्का में ठहरे। 
   
࿐  इन तीनों रिवायतों में इस तरह तत्बीक़ दी जा सकती है कि अबू दावूद की रिवायत में मक्का में दाखिल होने और मक्का से रवानगी के दोनों दिनों को शुमार नहीं किया है इस लिये सत्तरह दिन मुद्दते इक़ामत बताई है और तिरमिज़ी की रिवायत में मक्का में आने के दिन को तो शुमार कर लिया। क्यूं कि आप सुब्ह को मक्का में दाखिल हुए थे और मक्का से रवानगी के दिन को शुमार नहीं किया। क्यूं कि आप सुब्ह सवेरे ही मक्का से हुनैन के लिये रवाना हो गए थे और इमाम बुखारी की रिवायत में आने और जाने के दोनों दिनों को भी शुमार कर लिया गया है। इस लिये उन्नीस दिन आप मक्का में मुक़ीम रहे। 
     
࿐  इसी तरह इस में बड़ा इख़्तिलाफ़ है कि मक्का कौन सी तारीख में फतह हुवा ? और आप किस तारीख को मक्का में फ़ातेहाना दाखिल हुए ? इमाम बैहक़ी ने 13 रमज़ान, इमाम मुस्लिम ने 10 रमज़ान, इमाम अहमद ने 18 रमज़ान बताया और बा'ज़ रिवायात में 17 रमज़ान और 18 रमज़ान भी मरवी है। मगर मुहम्मद बिन इस्हाक़ ने अपने मशाइख़ की एक जमाअत से रिवायत करते हुए फ़रमाया कि 20 रमज़ान सि. 8 हि को मक्का फत्ह हुवा। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह - 452 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 289* ༺❘

           *❝  जंगे हुनैन  #01  ❞*  
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࿐   “हुनैन" मक्का और ताइफ के दरमियान एक मक़ाम का नाम है। तारीखे इस्लाम में इस जंग का दूसरा नाम “गज्वए हवाजुन” भी है। इस लिये कि इस लड़ाई में "बनी हवाजुन" से मुक़ाबला था। फ़त्ह मक्का के बा'द आम तौर से तमाम अरब के लोग इस्लाम के हल्का बगोश हो गए क्यूं कि इन में अकषर वोह लोग थे जो इस्लाम की हक्कानिय्यत का पूरा पूरा यक़ीन रखने के बा वुजूद कुरैश के डर से मुसलमान होने में तवक्कुफ़ कर रहे थे और फत्हे मक्का का इन्तिज़ार कर रहे थे। फिर चूंकि अरब के दिलों में का'बे का बेहद एहतिराम था और इन का एतिकाद था कि का'बे पर किसी बातिल परस्त का कब्जा नहीं हो सकता। इस लिये हुज़ूर ﷺ ने जब मक्का को फ़त्ह कर लिया तो अरब के बच्चे बच्चे को इस्लाम की हक्कानिय्यत का पूरा पूरा यक़ीन हो गया और वोह सब के सब जूक दर जूक़ बल्कि फ़ौज दर फ़ौज इस्लाम में दाखिल होने लगे। बाकी मांदा अरब की भी हिम्मत न रही कि अब इस्लाम के मुकाबले में हथियार उठा सकें। 
  
࿐   लेकिन मक़ामे हुनैन में “हवाजुन" और "षकीफ़" नाम के दो क़बीले आबाद थे जो बहुत ही जंगजू और फुनूने जंग से वाक़िफ़ थे। इन लोगों पर फ़तहे मक्का का उलटा अषर पड़ा। उन लोगों पर गैरत सवार हो गई और उन लोगों ने येह ख़याल काइम कर लिया कि फत्हे मक्का के बाद हमारी बारी है इस लिये उन लोगों ने येह तै कर लिया कि मुसलमानों पर जो इस वक्त मक्का में जम्अ हैं एक ज़बर दस्त हम्ला कर दिया जाए। चुनान्चे हुजूर ﷺ ने हजरते अब्दुल्लाह बिन अबी हदरद رضي الله عنه को तहकीकात के लिये भेजा। जब उन्हों ने वहां से वापस आ कर उन क़बाइल की जंगी तय्यारियों का हाल बयान किया और बताया कि क़बीलए हवाजुन और षकीफ़ ने अपने तमाम क़बाइल को जम्अ कर लिया है और क़बीलए हवाजुन का रईसे आज़म मालिक बिन औफ़ इन तमाम अफ़वाज का सिपहसालार है और सो बरस से जाइद उम्र का बूढ़ा। "दुरैद बिन अल सुम्मह" जो अरब का मशहूर शाइर और माना हुवा बहादुर था बतौरे मुशीर के मैदाने जंग में लाया गया है और यह लोग अपनी औरतों बच्चों बल्कि जानवरों तक को मैदाने जंग में लाए हैं ताकि कोई सिपाही मैदान से भागने का ख़याल भी न कर सके। 
    
࿐  हुजूर ﷺ ने भी शव्वाल सि. 8 हि. में बारह हज़ार का लश्कर जम्अ फ़रमाया। दस हज़ार तो मुहाजिरीन व अन्सार वगैरा का वोह लश्कर था जो मदीने से आप के साथ आया था और दो हजार नौ मुस्लिम थे जो फ़तहे मक्का में मुसलमान हुए थे। आप ﷺ ने उस लश्कर को साथ ले कर इस शानो शौकत के साथ हुनैन का रुख किया कि इस्लामी अफ़वाज की कषरत और इस के जाहो जलाल को देख कर बे इख्तियार बाज़ सहाबा की ज़बान से ये लफ्ज़ निकल गया कि "आज भला हम पर कौन ग़ालिब आ सकता है।"

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 452 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 290* ༺❘


             *❝  जंगे हुनैन # 02  ❞*  
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࿐   इस्लामी अफ़वाज की कषरत और इस के जाहो जलाल को देख कर बे इख्तियार बाज़ सहाबा की ज़बान से ये लफ्ज़ निकल गया कि "आज भला हम पर कौन ग़ालिब आ सकता है।" लेकिन खुदा वन्दे आलम को सहाबए किराम का अपनी फ़ौजों की कषरत पर नाज़ करना पसन्द नहीं आया। चुनान्चे इस फख्रो नाज़िश का येह अन्जाम हुवा कि पहले ही हम्ले में क़बीलए हवाजुन व षक़ीफ़ के तीर अन्दाज़ों ने जो तीरों की बारिश की और हज़ारों की तादाद में तलवारें ले कर मुसलमानों पर टूट पड़े तो वोह दो हज़ार नौ मुस्लिम और कुफ्फ़ारे मक्का जो लश्करे इस्लाम में शामिल हो कर मक्का से आए थे एक दम सर पर पैर रख कर भाग निकले। उन लोगों की भगदड़ देख कर अन्सार व मुहाजिरीन के भी पाउं उखड़ गए।

࿐  हुज़ूर ताजदारे दो आलम ﷺ ने जो नज़र उठा कर देखा तो गिनती के चन्द जां निषारों के सिवा सब फ़िरार हो चुके थे। तीरों की बारिश हो रही थी। बारह हज़ार का लश्कर फ़िरार हो चुका था मगर खुदा के रसूल ﷺ के पाए इस्तिकामत में बाल बराबर भी लग्ज़िश नहीं हुई। बल्कि आप अकेले एक लश्कर बल्कि एक आलमे काएनात का मज्मूआ बने हुए न सिर्फ पहाड़ की तरह डटे रहे बल्कि अपने सफ़ेद खच्चर पर सुवार बराबर आगे ही बढ़ते रहे और आप ﷺ की जुबाने मुबारक पर येह अल्फ़ाज़ जारी थे कि "मैं नबी हूं येह झूट नहीं है मैं अब्दुल मुत्तलिब का बेटा हूं।" इसी हालत में आप ﷺ ने दाहिनी तरफ़ देख कर बुलन्द आवाज़ से पुकारा कि "या म-अशरा-ल-अन्सार" फ़ौरन आवाज़ आई कि “हम हाज़िर हैं, या रसूलल्लाह ﷺ" फिर बाई जानिब रुख़ कर के फ़रमाया कि "या लल-मुहजीरिन" फ़ौरन आवाज़ आई कि "हम हाज़िर हैं, या रसूलल्लाह ﷺ" 

࿐  हज़रते अब्बास चूंकि बहुत ही बुलन्द आवाज़ थे। आप ने उन को हुक्म दिया कि अन्सार व मुहाजिरीन को पुकारो। उन्हों ने नारा मारा तो एक दम तमाम फ़ौजें पलट पड़ीं और लोग इस क़दर तेज़ी के साथ दौड़ पड़े कि जिन लोगों के घोड़े इज़दिहाम की वजह से न मुड़ सके उन्हों ने हलका होने के लिये अपनी जिरहें फेंक दीं और घोड़ों से कूद कूद कर दौड़े और कुफ्फ़ार के लश्कर पर झपट पड़े और इस तरह जां बाज़ी के साथ लड़ने लगे कि दम ज़दन में जंग का पांसा पलट गया। कुफ्फ़ार भाग निकले कुछ क़त्ल हो गए जो रह गए गरिफ्तार हो गए। क़बीलए षक़ीफ़ की फ़ौजें बड़ी बहादुरी के साथ जम कर मुसलमानों से लड़ती रहीं। यहां तक कि उन के सत्तर बहादुर कट गए। लेकिन जब उन के अलम बरदार उषमान बिन अब्दुल्लाह क़त्ल हो गया तो उन के पाउं भी उखड़ गए। और फतेह मुबीन ने हुजूर रहूमतुल्लिल आलमीन के कदमों का बोसा लिया और कषीर तादाद व मिक्दार में माले गनीमत हाथ आया। 
    
 ࿐  येही वोह मज़मून है जिस को कुरआने हकीम ने निहायत मुअष्षिर अन्दाज़ में बयान फ़रमाया कि  : _और हुनैन का दिन याद करो जब तुम अपनी कषरत पर नाज़ां थे तो वोह तुम्हारे कुछ काम न आई और ज़मीन इतनी वसीअ होने के बा वुजूद तुम पर तंग हो गई। फिर तुम पीठ फैर कर भाग निकले फिर अल्लाह ने अपनी तस्कीन उतारी अपने रसूल और मुसलमानों पर और ऐसे लश्करों को उतार दिया जो तुम्हें नज़र नहीं आए और काफिरों को अज़ाब दिया और काफ़िरों की येही सज़ा है।_ (पा. 10, सु. तौबा)
      
࿐  हुनैन में शिकस्त खा कर कुफ्फार की फ़ौजें भाग कर कुछ तो "औतास" में जमा हो गई और कुछ "ताइफ़" के किले में जा कर पनाह गाज़ी हो गई। इस लिये कुफ्फार की फौज़ो को मुकम्मल तौर पे शिकस्त देने के लिये "औतास" और "ताइफ़" पर भी हमला करना ज़रूरी हो गया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 554 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 291* ༺❘


               *❝  जंगे औतास #01 ❞*  
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࿐   हुज़ूर ﷺ ने हज़रते अबू आमिर अश्अरी رضي الله عنه की मा तहती में थोड़ी सी फ़ौज "औतास" की तरफ़ भेज दी। दुरैद बिन अस्सुम्मह कई हज़ार की फ़ौज ले कर निकला। दुरैद बिन अस्सुम्मह के बेटे ने हज़रते अबू आमिर अश्अरी के जानू पर एक तीर मारा हज़रते अबू आमिर अश्अरी हज़रते अबू मूसा अश्अरी के चचा थे। अपने चचा को ज़ख़्मी देख कर हज़रते अबू मूसा दौड़ कर अपने चचा के पास आए और पूछा कि चचाजान ! आप को किस ने तीर मारा है ? तो हज़रते अबू आमिर ने इशारे से बताया कि वोह शख़्स मेरा क़ातिल है। हज़रते अबू मूसा  जोश में भरे हुए उस काफ़िर को क़त्ल करने के लिये दौड़े तो वोह भाग निकला। मगर हज़रते अबू मूसा ने उस का पीछा किया और येह कह कर कि ऐ ओ भागने वाले ! क्या तुझ को शर्म और गैरत नहीं आती ? 

࿐  जब उस काफ़िर ने येह गर्मा गर्म ताना सुना तो ठहर गया फिर दोनों में तलवार के दो दो हाथ हुए और हज़रते अबू मूसा ने आखिर उस को क़त्ल कर के दम लिया। फिर अपने चचा के पास आए और खुश खबरी सुनाई कि चचाजान ! खुदा ने आप के क़ातिल का काम तमाम कर दिया। फिर हज़रते अबू मूसा ने अपने चचा के जानू से वोह तीर खींच कर निकाला तो चूंकि ज़हर में बुझाया हुवा था इस लिये ज़ख्म से बजाए खून के पानी बहने लगा। हज़रते अबू आमिर ने अपनी जगह हज़रते अबू मूसा को फ़ौज का सिपह सालार बनाया और येह वसिय्यत की, कि रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में मेरा सलाम अर्ज़ कर देना और मेरे लिये दुआ की दरख्वास्त करना। येह वसिय्यत की और उन की रूह परवाज़ कर गई। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 457 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 292* ༺❘


              *❝  जंगे औतास #02  ❞*  
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࿐  हज़रते अबू आमिर ने अपनी जगह हज़रते अबू मूसा को फ़ौज का सिपह सालार बनाया और येह वसिय्यत की, कि रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में मेरा सलाम अर्ज़ कर देना और मेरे लिये दुआ की दरख्वास्त करना। येह वसिय्यत की और उन की रूह परवाज़ कर गई।

࿐   हज़रते अबू मूसा अश्अरी का बयान है कि जब इस जंग से फ़ारिग हो कर मैं बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुवा और अपने चचा का सलाम और पैग़ाम पहुंचाया तो उस वक्त ताजदारे दो आलम ﷺ एक बान की चारपाई पर तशरीफ़ फ़रमा थे और आप की पुश्ते मुबारक और पहलूए अक्दस में बान के निशान पड़े हुए थे। आप ने पानी मंगा कर वुज़ू फ़रमाया। फिर अपने दोनों हाथों को इतना ऊंचा उठाया कि मैं ने आप की दोनों बगलों की सफ़ेदी देख ली और इस तरह आप ने दुआ मांगी कि "या अल्लाह ! तू अबू आमिर को कियामत के दिन बहुत से इन्सानों से ज़ियादा बुलन्द मर्तबा बना दे।" येह करम देख कर हज़रते अबू मूसा ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! मेरे लिये भी दुआ फ़रमा दीजिये। तो येह दुआ फ़रमाई कि "या अल्लाह ! अब्दुल्लाह बिन कैस के गुनाहों को बख़्श दे और इस को क़ियामत के दिन इज्ज़त वाली जगह में दाखिल फ़रमा। "अब्दुल्लाह बिन कैस हज़रते अबू मूसा अशअरी का नाम है। 
   
࿐    बहर कैफ़ हज़रते अबू मूसा अश्अरी ने दुरैद बिन अस्सुम्मह के बेटे को क़त्ल कर दिया और इस्लामी अलम को अपने हाथ में ले लिया। दुरैद बिन अस्सुम्मह बुढ़ापे की वजह से एक हौदज पर सुवार था। इस को हज़रते रबीआ बिन रफीअ ने खुद उसी की तलवार से क़त्ल कर दिया। इस के बाद कुफ्फ़ार की फ़ौजों ने हथियार डाल दिया और सब गरिफ्तार हो गए। इन कैदियों में हुजूर ﷺ की रज़ाई बहन हज़रते "शीमा" भी थीं। येह हज़रते बीबी हलीमा सादिया की साहिबजादी थीं। जब लोगों ने इन को गरिफ्तार किया तो इन्हों ने कहा कि मैं तुम्हारे नबी की बहन हूं। मुसलमान इन को शनाख्त के लिये बारगाहे नुबुव्वत में लाए तो हुजूर ﷺ ने इन को पहचान लिया और जोशे महब्बत में आप की आंखें नम हो गई और आप ने अपनी चादरे मुबारक ज़मीन पर बिछा कर उन को बिठाया और कुछ ऊंट कुछ बकरियां इन को दे कर फ़रमाया कि तुम आज़ाद हो। अगर तुम्हारा जी चाहे तो मेरे घर पर चल कर रहो और अगर अपने घर जाना चाहो तो मैं तुम को वहां पहुंचा दूं। उन्हों ने अपने घर जाने की ख्वाहिश जाहिर की तो निहायत ही इज़्ज़तो एहतिराम के साथ वोह उन के क़बीले में पहुंचा दी गई। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 458📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 293* ༺❘

          *❝  ताइफ का मुहासरा  ❞*  
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࿐  येह तहरीर किया जा चुका है कि हुनैन से भागने वाली कुफ्फार की फ़ौजें कुछ तो औतास में जा कर ठहरी थीं और कुछ ताइफ़ कल्ए में जा कर पनाह गुज़ीं हो गई थीं। औतास की फ़ौजें तो आप पढ़ चुके कि वोह शिकस्त खा कर हथियार डाल देने पर मजबूर हो गई और सब गरिफ्तार हो गईं। लेकिन ताइफ़ में पनाह लेने वालों से भी जंग ज़रूरी थी। इस लिये हुज़ूर ﷺ ने हुनैन और औतास के अम्वाले गनीमत और कैदियों को "मकामे जिईर्राना" में जम्अ कर के ताइफ़ का रुख फ़रमाया। 
     
࿐  ताइफ खुद एक बहुत ही महफूज शहर था जिस के चारों तरफ शहर पनाह की दीवार बनी हुई थी और यहां एक बहुत ही मज़बूत कल्आ भी था। यहां का रईसे आज़म उर्वह बिन मसऊद षकफ़ी था जो अबू सुफ्यान का दामाद था। यहां षकीफ़ का जो खानदान आबाद था वोह इज्ज़त व शराफ़त में कुरैश का हम पल्ला शुमार किया जाता था। कुफ्फार की तमाम फ़ौजें साल भर का राशन ले कर ताइफ़ के कलए में पनाह गुज़ी हो गई थीं। 
    
࿐   इस्लामी अफ़वाज ने ताइफ़ पहुंच कर शहर का मुहासरा कर लिया मगर कलए के अन्दर से कुफ्फ़ार ने इस ज़ोरो शोर के साथ तीरों की बारिश शुरू कर दी कि लश्करे इस्लाम इस की ताब न ला सका और मजबूरन इस को पसे पा होना पड़ा। अठ्ठारह दिनों तक शहर का मुहासरा जारी रहा मगर ताइफ़ फ़त्ह नहीं हो सका। हुजूर ﷺ ने जब जंग के माहिरों से मश्वरा फ़रमाया तो हज़रते नौफ़िल बिन मुआविया رضي الله عنه ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह ﷺ लौमड़ी अपने भट में घुस गई है। अगर कोशिश जारी रही तो पकड़ ली जाएगी लेकिन अगर छोड़ दी जाए तो भी इस से कोई अन्देशा नहीं। येह सुन कर हुजूर ﷺ ने मुहासरा उठा लेने का हुक्म दे दिया। 
     
࿐   ताइफ़ के मुहासरे में बहुत से मुसलमान जख्मी हुए और कुल बारह असहाब शहीद हुए सात कुरैश, चार अन्सार और एक शख्स बनी लैष के। जुख्मियों में हज़रते अबू बक्र सिद्दीक رضي الله عنه के साहिब जादे अब्दुल्लाह बिन अबू बक्र भी थे येह एक तीर से जख्मी हो गए थे। फिर अच्छे भी हो गए, लेकिन एक मुद्दत के बाद फिर इन का ज़ख़्म फट गया और अपने वालिदे माजिद हज़रते अबू बक्र सिद्दीक के दौरे ख़िलाफ़त में इसी जख्म से इन की वफ़ात हो गई। 

࿐  *ताइफ की मस्जिद :-* येह मस्जिद जिस को हज़रते अम्र बिन उमय्या رضي الله عنه ने ता'मीर किया था एक तारीख़ी मस्जिद है। इस जंगे ताइफ में अज़वाजे मुतहरात में से दो अज्वाज साथ थीं हज़रते उम्मे सलमह और हज़रते जैनब इन दोनों के लिये हुज़ूर ﷺ ने दो खैमे गाड़े थे और जब तक ताइफ़ का मुहासरा रहा आप इन दोनों खैमों के दरमियान में नमाजें पढ़ते रहे। जब बाद में क़बीलए षक़ीफ़ के लोगों ने इस्लाम क़बूल कर लिया तो इन लोगों ने इसी जगह पर मस्जिद बना ली।  

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 460 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 294* ༺❘

      *❝  जंगे ताइफ में बुत शिकनी  ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐   जब हुज़ूर ﷺ ने ताइफ का इरादा फ़रमाया तो हज़रते तुफैल बिन अम्र दौसी رضي الله عنه को एक लश्कर के साथ भेजा कि वोह “जुल कफ़ैन" के बुत खाने को बरबाद कर दें। यहां उमर बिन हममा दौसी का बुत था जो लकड़ी का बना हुवा था। चुनान्चे हज़रते तुफ़ैल बिन अम्र दौसी ने वहां जा कर बुत खाने को मुन्हदिम कर दिया और बुत को जला दिया। बुत को जलाते वक्त वोह इन अशआर को पढ़ते जाते थे :     
   ऐ जल कफ़ैन ! मैं तेरा बन्दा नहीं हूं
   मेरी पैदाइश तेरी पैदाइश से बड़ी है
   में ने तेरे दिल मे आग लगा दी है
     
࿐  हज़रते तुफ़ैल बिन अम्र दौसी चार दिन में इस मुहिम से फ़ारिग हो कर हुजुर ﷺ के पास ताइफ में पहुंच गए। येह “जल कफ़ैन" से कल्आ तोड़ने के आलात मिन्जनीक वगैरा भी लाए थे। चुनान्चे इस्लाम में सब से पहली येही मिन्जनीक है जो ताइफ़ का कल्आ तोड़ने के लिये लगाई गई। मगर कुफ्फ़ार की फ़ौजों ने तीर अन्दाजी के साथ साथ गर्म गर्म लोहे की सलाखें फेंकनी शुरू कर दीं इस वजह से कल्आ तोड़ने में काम्याबी न हो सकी। 
   
࿐   इसी तरह हुजूर ﷺ ने हज़रते अली को भेजा कि ताइफ के अतराफ़ में जो जा बजा षक़ीफ़ के बुत खाने हैं उन सब को मुन्हदिम कर दें। चुनान्चे आप उन सब बुतों और बुत ख़ानों को तोड़ फोड़ कर मिस्मार व बरबाद कर दिया। और जब लौट कर ख़िदमते अक्दस में हाज़िर हुए तो हुजूर ﷺ इन को देख कर बेहद खुश हुए और बहुत देर तक इन से तन्हाई में गुफ़्तगू फ़रमाते रहे, जिस से लोगों को बहुत तअज्जुब हुवा।
    
࿐  ताइफ़ से रवानगी के वक्त सहाबए किराम ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! आप क़बीलए षकीफ़ के कुफ़्फ़ार के लिये हलाकत की दुआ फ़रमा दीजिये। तो आप ने दुआ मांगी कि “या अल्लाह ! षकीफ़ को हिदायत दे और इन को मेरे पास पहुंचा दे।" चुनान्चे आपकी येह दुआ मक़बूल हुई की क़बीलए षकीफ़ का वफ़द मदीने पहुंचा और पूरा क़बीला मुशर्रफ़ ब इस्लाम हो गया। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 462 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 296* ༺❘


           *❝  अन्सारियों से खिताब  ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐   जिन लोगों को आप ﷺ ने बड़े बड़े इन्आमात से नवाजा वोह उमूमन मक्का वाले नौ मुस्लिम थे। इस पर बा'ज़ नौ जवान अन्सारियों ने कहा कि : "रसूलुल्लाह ﷺ कुरैश को इस क़दर अता फ़रमा रहे हैं और हम लोगों का कुछ भी ख़याल नहीं फ़रमा रहे हैं। हालां कि हमारी तलवारों से ख़ून टपक रहा है।" और अन्सार के कुछ नौ जवानों ने आपस में येह भी कहा और अपनी दिल शिकनी का इज़हार किया कि जब शदीद जंग का मौक़ होता है तो हम अन्सारियों को पुकारा जाता है और ग़नीमत दूसरे लोगों को दी जा रही है। आप ﷺ ने जब येह चर्चा सुना तो तमाम अन्सारियों को एक खैमे में जम्अ फ़रमाया और उन से इर्शाद फ़रमाया कि ऐ अन्सार ! क्या तुम लोगों ने ऐसा ऐसा कहा है ? लोगों ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! हमारे सरदारों में से किसी ने भी कुछ नहीं कहा है। हां चन्द नई उम्र के लड़कों ने ज़रूर कुछ कह दिया है। 

࿐  हुज़ूर ﷺ ने अन्सार को मुखातब फ़रमा कर इर्शाद फ़रमाया कि : क्या येह सच नहीं है कि तुम पहले गुमराह थे मेरे जरीए से खुदा ने तुम को हिदायत दी, तुम मुतफ़र्रिक और परा गन्दा थे, खुदा ने मेरे जरीए तुम में इत्तिफ़ाक़ व इत्तिहाद पैदा फ़रमाया, तुम मुफ्लिस थे, खुदा ने मेरे जरीए से तुम को ग़नी बना दिया। हुज़ूर ﷺ येह फ़रमाते जाते थे और अन्सार आप के हर जुम्ले को सुन कर येह कहते जाते थे कि "अल्लाह और रसूल का हम पर बहुत बड़ा एहसान है।" 
     
࿐ आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया कि ऐ अन्सार ! तुम लोग यूं मत कहो, बल्कि मुझ को येह जवाब दो कि या रसूलल्लाह ﷺ जब लोगों ने आप को झुटलाया तो हम लोगों ने आप की तस्दीक की। जब लोगों ने आप को छोड़ दिया तो हम लोगों ने आप को ठिकाना दिया। जब आप बे सरो सामानी की हालत में आए तो हम ने हर तरह से आप की ख़िदमत की। लेकिन ऐ अन्सारियो ! मैं तुम से एक सुवाल करता हूं तुम मुझे इस का जवाब दो। सुवाल येह है कि क्या तुम लोगों को येह पसन्द नहीं कि सब लोग यहां से माल व दौलत ले कर अपने घर जाएं और तुम लोग अल्लाह के नबी को ले कर अपने घर जाओ। खुदा की क़सम ! तुम लोग जिस चीज़ को ले कर अपने घर जाओगे वोह उस माल व दौलत से बहुत बढ़ कर है जिस को वोह लोग ले कर अपने घर जाएंगे।
    
࿐  येह सुन कर अन्सार बे इख़्तियार चीख पड़े कि या रसूलल्लाह ﷺ हम इस पर राज़ी हैं। हम को सिर्फ अल्लाह का रसूल चाहिये और अकषर अन्सार का तो येह हाल हो गया कि वोह रोते रोते बे करार हो गए और आंसूओं से उन की दाढ़ियां तर हो गई। फिर आप ﷺ ने अन्सार को समझाया कि मक्का के लोग बिल्कुल ही नौ मुस्लिम हैं। मैं ने इन लोगों को जो कुछ दिया है येह उन के इस्तिहकाक की बिना पर नहीं है बल्कि सिर्फ उन के दिलों में इस्लाम की उल्फ़त पैदा करने की गरज से दिया है, फिर इर्शाद फरमाया कि अगर हिजरत न होती तो मैं अन्सार में से होता और अगर तमाम लोग किसी वादी और घाटी में चलें और अन्सार किसी दूसरी वादी और घाटी में चलें तो मैं अन्सार की वादी और घाटी में चलूंगा।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 464 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 297* ༺❘


     *❝  कैदियों की रिहाई #01 ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐   आप जब अम्वाले गनीमत की तक्सीम से फ़ारिग हो चुके तो क़बीलए बनी सा'द के रईस ज़हीर अबू सर्द चन्द मुअज्ज़िज़ीन के साथ बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुए और असीराने जंग की रिहाई के बारे में दरख्वास्त पेश की। इस मौक़अ पर ज़हीर अबू सर्द ने एक बहुत मुअष्षिर तकरीर की, जिस का खुलासा यह है कि 
     
࿐  ऐ मुहम्मद ! आप ने हमारे खानदान की एक औरत हलीमा का दूध पिया है। आप ने जिन औरतों को इन छपरों में क़ैद कर रखा है उन में से बहुत सी आप की (रज़ाई) फूफियां और बहुत सी आप की खालाएं हैं। खुदा की क़सम ! अगर अरब के बादशाहों में से किसी बादशाह ने हमारे खानदान की किसी औरत का दूध पिया होता तो हम को उस से बहुत ज़ियादा उम्मीदें होतीं और आप से तो और भी जियादा हमारी तवक्कुआत वाबस्ता हैं। लिहाजा आप इन सब कैदियों को रिहा कर दीजिये। 
    
࿐  ज़हीर की तकरीर सुन कर हुजुर ﷺ बहुत ज़ियादा मुतअष्षिर हुए और आप ने फ़रमाया कि मैं ने आप लोगों का बहुत ज़ियादा इन्तिज़ार किया मगर आप लोगों ने आने में बहुत ज़ियादा देर लगा दी। बहर कैफ़ मेरे ख़ानदान वालों के हिस्से में जिस कदर लौंडी गुलाम आए हैं। मैं ने उन सब को आज़ाद कर दिया। लेकिन अब आम रिहाई की तदबीर येह है कि नमाज़ के वक्त जब मज्मअ हो तो आप लोग अपनी दरख्वास्त सब के सामने पेश करें। चुनान्चे नमाज़े ज़ोहर के वक्त उन लोगों ने येह दरख्वास्त मज्मअ के सामने पेश की और हुज़ूर ﷺ ने मज्मअ के सामने येह इर्शाद फ़रमाया कि मुझ को सिर्फ अपने ख़ानदान वालों पर इख़्तियार है लेकिन मैं तमाम मुसलमानों से सिफारिश करता हूं कि कैदियों को रिहा कर दिया जाए येह सुन कर तमाम अन्सार व मुहाजिरीन और दूसरे तमाम मुजाहिदीन ने भी अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! हमारा हिस्सा भी हाज़िर है। आप इन लोगों को भी आज़ाद फ़रमा दें। इस तरह दफ्तन छे हज़ार असीराने जंग की रिहाई हो गई।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 466 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 298* ༺❘


      *❝  कैदियों की रिहाई #02 ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐   बुख़ारी शरीफ़ की रिवायत यह है कि हुजूर ﷺ दस दिनों तक "हवाजुन" के वफ़द का इन्तिज़ार फ़रमाते रहे। जब वोह लोग न आए तो आप ने माले गनीमत और कैदियों को मुजाहिदीन के दरमियान तक्सीम फ़रमा दिया। इस के बाद जब "हवाजुन" का वफ्द आया और उन्हों ने अपने इस्लाम का एलान कर के येह दरख्वास्त पेश की, कि हमारे माल और कैदियों को वापस कर दिया जाए तो हुजूर ﷺ ने फ़रमाया कि मुझे सच्ची बात ही पसन्द है। लिहाज़ा सुन लो ! कि माल और कैदी दोनों को तो मैं वापस नहीं कर सकता। हां इन दोनों में से एक को तुम इख़्तियार कर लो या माल ले लो या कैदी। येह सुन कर वफ़द ने कैदियों को वापस लेना मंजूर किया। इस के बा'द आप ने फौज के सामने एक खुत्बा पढ़ा और हम्दो षना के बाद इर्शाद फ़रमाया कि :
    
࿐  ऐ मुसलमानो ! येह तुम्हारे भाई ताइब हो कर आ गए हैं और मेरी येह राय है कि मैं इन कैदियों को वापस कर दूं तो तुम में से जो खुशी खुशी इस को मंजूर करे वोह अपने हिस्से के कैदियों को वापस कर दे और जो येह चाहे कि इन कैदियों के बदले में दूसरे कैदियों को ले कर इन को वापस करे तो मैं येह वादा करता हूं कि सब से पहले अल्लाह तआला मुझे जो गनीमत अता फरमाएगा मैं उस में उस का हिस्सा दूंगा। यह सुन कर सारी फ़ौज ने कह दिया कि या रसूलल्लाह ﷺ! हम सब ने खुशी खुशी सब कैदियों को वापस कर दिया। आप ने इर्शाद फ़रमाया कि इस तरह पता नहीं चलता कि किस ने इजाजत दी और किस ने नहीं दी ? लिहाज़ा तुम लोग अपने अपने चौधरियों के जरीए मुझे खबर दो। चुनान्चे हर क़बीले के चौधरियों ने दरबारे रिसालत में आ कर अर्ज कर दिया कि हमारे क़बीले वालों ने खुश दिली के साथ अपने हिस्से के कैदियों को वापस कर दिया है।  

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               *❝  गैब दां रसूल ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐   रसूलुल्लाह ﷺ ने हवाजुन के वफ़द से दरयाफ्त फ़रमाया कि मालिक बिन औफ़ कहां है ? उन्हों ने बताया कि वोह "षक़ीफ़" के साथ ताइफ़ में है। आप ने फ़रमाया कि तुम लोग मालिक बिन औफ़ को ख़बर कर दो कि अगर वोह मुसलमान हो कर मेरे पास आ जाए तो मैं उस का सारा माल उस को वापस दे दूंगा। इस इलावा उस  को एक सो ऊंट और भी दूंगा। मालिक बिन औफ़ को जब येह ख़बर मिली तो वोह रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में मुसलमान हो कर हाज़िर हो गए और हुज़ूर ﷺ ने उन का कुल माल उन के सिपुर्द फ़रमा दिया और वादे के मुताबिक़ एक सो ऊंट इस के इलावा भी इनायत फ़रमाए। मालिक बिन औफ़ आप ﷺ के इस खुल्के अजीम से बेहद मुतअष्षिर हुए और आप की मद्हु में एक क़सीदा पढ़ा जिस के दो शे'र येह हैं : _तमाम इन्सानों में हज़रत मुहम्मद ﷺ का मिष्ल न मैं ने देखा न सुना जो सब से जियादा वादे को पूरा करने वाले और सब से ज़ियादा माले कषीर अता फरमाने वाले हैं। और जब तुम चाहो उन से पूछ लो वोह कल आयन्दा की ख़बर तुम को बता देंगे।_
     
࿐   रिवायत है कि ना'त के येह अश्आर सुन कर हुज़ूर ﷺ इन से खुश हो गए और इन के लिये कलिमाते खैर फ़रमाते हुए इन्हें बतौरे इन्आम एक हुल्ला भी इनायत फ़रमाया।  

࿐   *उम्रए जिइर्राना :*  इस के बाद नबिय्ये करीम ﷺ ने जिइराना ही से उमरे का इरादा फ़रमाया और एहराम बांध कर मक्का तशरीफ ले गए और उमरह अदा करने के बाद फिर मदीने वापस तशरीफ ले गए और जुल का'दह सि. 8 हि. को मदीने में दाखिल हुए। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 468 📚*

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*❝  सि. 8 हि. के मुतफ़र्रिक वाकिआत ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐  (1) इसी साल रसूलुल्लाह ﷺ के फ़रज़न्द हज़रते इब्राहीम हज़रते मारिया क़िब्तिया के शिकम से पैदा हुए। हुज़ूर ﷺ को इन से बेपनाह महब्बत थी। तकरीबन डेढ़ साल की उम्र में इन की वफ़ात हो गई। इत्तिफ़ाक़ से जिस दिन इन की वफ़ात हुई सूरज ग्रहन हुवा चूंकि अरबों का अक़ीदा था कि किसी अज़ीमुश्शान इन्सान की मौत पर सूरज ग्रहन लगता है। इस लिये लोगों ने येह ख़याल कर लिया कि येह सूरज ग्रहन हज़रते इब्राहीम की वफ़ात का नतीजा है। जाहिलिय्यत के इस अक़ीदे को दूर फ़रमाने के लिये हुजूर ﷺ ने एक खुत्बा दिया जिस में आप ने इर्शाद फ़रमाया कि चांद और सूरज में किसी की मौत व हयात की वजह से ग्रहन नहीं लगता बल्कि अल्लाह तआला इस के जरीए अपने बन्दों को ख़ौफ़ दिलाता है। इस के बाद आप ﷺ ने नमाज़े कुसूफ़ जमाअत के साथ पढ़ी। 
     
࿐  (2) इसी साल हुज़ूर ﷺ की साहिब ज़ादी हज़रते जैनब ने वफात पाई। ये साहिब ज़ादी साहिबा हज़रते अबुल आस बिन रबीअ की मन्कूहा थीं। इन्हों ने एक फ़रज़न्द जिस का नाम "अली" था और एक लड़की जिन का नाम “इमामा” था, अपने बाद छोड़ा। हज़रते बीबी फ़ातिमा ज़हरा ने हज़रते अली मुर्तजा को वसिय्यत की थी कि मेरी वफ़ात के बाद आप हज़रते इमामा से निकाह कर लें। चुनान्चे हज़रते अली ने हज़रते सय्यिदा फ़ातिमा की वसिय्यत पर अमल किया। 
 
࿐  (3) इसी साल मदीने में गल्ले की गिरानी बहुत ज़ियादा बढ़ गई तो सहाबए किराम ने दरख्वास्त की, कि या रसूलल्लाह ﷺ आप गल्ले का भाव मुक़र्रर फरमा दे तो हुजूर ने गल्ले की कीमत पर कन्ट्रोल फ़रमाने से इन्कार फ़रमा दिया और इर्शाद फ़रमाया कि अल्लाह ही भाव मुक़र्रर फ़रमाने वाला है वोही रोज़ी को तंग करने वाला, कुशादा करने वाला, रोज़ी रसां है।
     
࿐  (4) बा'ज़ मुअर्रिखीन के बक़ौल इसी साल मस्जिदे नबवी में मिम्बर शरीफ़ रखा गया। इस से क़ब्ल हुज़ूर ﷺ एक सुतून से टेक लगा कर खुत्बा पढ़ा करते थे और बा'ज़ मुअर्रिख़ीन का कौल है कि मिम्बर सि. 7 हि. में रखा गया। येह मिम्बर लकड़ी का बना हुवा था जो एक अन्सारी औरत ने बनवा कर मस्जिद में रखवाया था। हज़रते अमीरे मुआविया ने चाहा कि मैं इस मिम्बर को तबर्रुकन मुल्के शाम ले जाऊं मगर उन्हों ने जब इस को इस की जगह से हटाया तो अचानक सारे शहर में ऐसा अंधेरा छा गया कि दिन में तारे नज़र आने लगे। येह मन्ज़र देख कर हज़रते अमीरे मुआविया बहुत शरमिन्दा हुए और सहाबए किराम से मा'ज़िरत ख़्वाह हुए और उन्हों ने इस मिम्बर के नीचे तीन सीढ़ियों का इज़ाफ़ा कर दिया। जिस से मिम्बर की तीनों पुरानी सीढ़ियां ऊपर हो गई ताकि हुज़ूर ﷺ और खुलफ़ाए राशिदीन जिन सीढ़ियों पर खड़े हो कर खुत्बा पढ़ते थे अब दूसरा कोई खतीब उन पर क़दम न रखे। जब येह मिम्बर बहुत ज़ियादा पुराना हो कर इन्तिहाई कमज़ोर हो गया तो खुलफ़ाए अब्बासिया ने भी इस की मरम्मत कराई। 
  
࿐  (5) इसी साल क़बीलए अब्दिल कैस का वफ़द हाज़िरे ख़िदमत हुवा। हुज़ूर ﷺ ने उन लोगों को खुश आमदीद कहा और उन लोगों के हक़ में यूं दुआ फ़रमाई कि “ऐ अल्लाह ! तू अब्दिल कैस को बख़्श दे" जब येह लोग बारगाहे रिसालत में पहुंचे तो अपनी सुवारियों से कूद कर दौड़ पड़े और हुज़ूर ﷺ के मुक़द्दस कदम को चूमने लगे और आप ﷺ ने उन लोगों को मन्अ नहीं फ़रमाया। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 473📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 301* ༺❘


             *❝  सि. 9 हि.  ❞*  
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࿐   सि. 9 हि. बहुत से वाकिआते अजीबा से लबरेज़ है। लेकिन चन्द वाकआत बहुत ही अहम हैं जिन को मुअर्रिख़ीन ने बहुत ही बस्तो तफ्सील के साथ ज़िक्र किया है। 

࿐   *आयते तख्यीर व ईलाअ #01 :-*  "तख़्यीर" और "ईलाअ" येह शरीअत के दो इस्तिलाही अल्फ़ाज़ हैं। शोहर अपनी बीवी को अपनी तरफ से येह इख़्तियार दे दे कि वोह चाहे तो तलाक़ ले ले और चाहे तो अपने शोहर ही के निकाह में रह जाए इस को “तख़्यीर" कहते हैं। और “ईलाअ" येह है कि शोहर येह कसम खा ले कि मैं अपनी बीवी से सोहबत नहीं करूंगा। हुजूरे अक्दस ﷺ ने एक मरतबा अपनी अज्वाजे मुतहहरात से नाराज़ हो कर एक महीने का “ईलाअ" फ़रमाया या'नी आप ﷺ ने येह कसम खा ली कि मैं एक माह तक अपनी अज्वाजे मुक़द्दसा से सोहबत नहीं करूंगा। फिर इस के बाद आप ﷺ ने अपनी तमाम मुक़द्दस बीवियों को तलाक़ हासिल करने का इख़्तियार भी सोंप दिया मगर किसी ने भी तलाक़ लेना पसन्द नहीं किया।    
    
࿐   हुज़ूर ﷺ की ना राज़ी और इताब का सबब क्या था और आपने "तख़्यीर व ईलाअ" क्यूं फ़रमाया ? इस का वाक़िआ येह है कि हुजूरे अदस ﷺ की मुक़द्दस बीवियां तकरीबन सब मालदार और बड़े घरानों की लड़कियां थीं। “हज़रते उम्मे हबीबा" रईसे मक्का हज़रते अबू सुफ्यानकी साहिब जादी थीं। “हज़रते जुवैरिया" कबीलए बनी अल मुस्तलक के सरदारे आज़म हारिष बिन ज़रार की बेटी थीं। "हज़रते सफिय्या"  बनू नज़ीर और खैबर के रईसे आज़म हुयैय बिन अख़्तब की नूरे नज़र थीं। "हज़रते आइशा" हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ की प्यारी बेटी थीं। "हज़रते हफ्सा" हज़रते उमर फारूक की चहीती साहिब जादी थीं। "हजरते जैनब बिन्ते जहश" और “हज़रते उम्मे सलमह" भी खानदाने कुरैश के ऊंचे ऊंचे घरों की नाज़ो ने'मत में पली हुई लड़कियां थीं। जाहिर है कि येह अमीर ज़ादियां बचपन से अमीराना ज़िन्दगी और रईसाना माहोल की आदी थीं और इन का रहन सहन, खुर्दो नोश, लिबास व पोशाक सब कुछ अमीर जादियों की रईसाना ज़िन्दगी का आईना दार था,

࿐   और ताजदारे दो आलम ﷺ की मुक़द्दस ज़िन्दगी बिल्कुल ही जाहिदाना और दुन्यवी तकल्लुफ़ात से यक्सर बेगाना थी। दो दो महीने काशानए नुबुव्वत में चूल्हा नहीं जलता था। सिर्फ खजूर और पानी पर पुरे घराने की ज़िन्दगी बसर होती थी। लिबास व पोशाक में भी पैग़म्बराना ज़िन्दगी की झलक थी मकान और घर के साजो सामान में भी नुबुव्वत की सा-दगी नुमायां थी। हुजुर ﷺ अपने सरमाए का अकशरो बेशतर हिस्सा अपनी उम्मत के गुरबा व फुकुरा पर सर्फ फरमा देते थे। और अपनी अज़वाजे मुतहहरात को ब क़दरे ज़रूरत ही खर्च अता फरमाते थे जो इन रईस ज़ादियों के हस्बे ख़्वाह जैबो जीनत और आराइश व जैबाइश के लिये काफ़ी नहीं होता था। इस लिये कभी कभी इन उम्मत की माओं का पैमानए सब्रो कनाअत लबरेज़ हो कर छलक जाता था और वोह हुज़ूर ﷺ से मज़ीद रक़मों का मुतालबा और तक़ाज़ा करने लगती थीं। चुनान्चे एक मरतबा अज्वाजे मुतहहरात ने मुत्तफ़िका तौर पर आप से मुतालबा किया कि आप हमारे अख़राजात में इजाफा फरमाएं। अज्वाजे मुतहहरात की येह अदाएं महरे नुबुव्वत के कल्बे नाज़ पर बार गुज़रीं और आप के सुकूने खातिर में इस कदर ख़लल अन्दाज़ हुई कि आप ने बरहम हो कर येह क़सम खा ली कि एक महीने तक अज़वाजे मुतहहरात से न मिलेंगे। इस तरह एक माह का आपने "ईलाअ" फ़रमा लिया। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 475 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 302* ༺❘


  *❝ आयते तख्यीर व ईलाअ #02  ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐   आप ﷺ ने एक माह का "इलाअ" फ़रमा लिया। अजीब इत्तिफ़ाक़ कि इन्ही अय्याम में आप ﷺ घोड़े से गिर पड़े जिस से आप की मुबारक पिंडली में मोच आ गई। इस तक्लीफ़ की वजह से आप ने बालाखाने पर गोशा नशीनी इख़्तियार फ़रमा ली और सब से मिलना जुलना छोड़ दिया। सहाबए किराम ने वाकिआत के क़रीनों से ये कियास आराई कर ली कि आप ﷺ ने अपनी तमाम मुक़द्दस बीवियों को तलाक दे दी और येह ख़बर जो बिल्कुल ही ग़लत थी बिजली की तरह फैल गई। और तमाम सहाबए किराम रन्जो गम से परेशान हाल और इस समए जांकाह से निढाल होने लगे।  इस के बाद जो वाकआत पेश आए वोह बुख़ारी शरीफ़ की मुतअद्दद रिवायात में मुफ़स्सल तौर पर मजकूर हैं। इन वाकआत का बयान हज़रते उमर رضي الله عنه की ज़बान से सुनिये। 
 
࿐   हज़रते उमर رضي الله عنه का बयान है कि मैं और मेरा एक पड़ोसी जो अन्सारी था हम दोनों ने आपस में येह तै कर लिया था कि हम दोनों एक एक दिन बारी बारी से बारगाहे रिसालत में हाज़िरी दिया करेंगे और दिन भर के वाकिआत से एक दूसरे को मुत्तलअ करते रहेंगे। एक दिन कुछ रात गुज़रने के बाद मेरा पड़ोसी अन्सारी आया और ज़ोर ज़ोर से मेरा दरवाजा पीटने और चिल्ला चिल्ला कर मुझे पुकारने लगा। मैं ने घबरा कर दरवाजा खोला तो उस ने कहा कि आज गज़ब हो गया। मैंने उस से पूछा कि क्या गस्सानियों ने मदीने पर हम्ला कर दिया ? (उन दिनों शाम के गस्सानी मदीने पर हम्ले की तय्यारियां कर रहे थे।) अन्सारी ने जवाब दिया कि अजी इस से भी बढ़ कर हादिषा रूनुमा हो गया। वोह येह कि हुज़ूर ﷺ ने अपनी तमाम बीवियों को तलाक़ दे दी। हज़रते उमर कहते हैं कि मैं इस ख़बर से बेहद मुतवह्हीश हो गया और अलस्सबाह मैं ने मदीने पहुंच कर मस्जिदे मैं नबवी में नमाज़े फज्र अदा की। हुजूर ﷺ नमाज़ से जे फ़ारिग होते ही बालाखाने पर जा कर तन्हा तशरीफ़ फ़रमा हो गए और किसी से कोई गुफ्तगू नहीं फ़रमाई। 

࿐   मैं मस्जिद से निकल कर अपनी बेटी हफ्सा के घर गया तो देखा कि वोह बैठी रो रही है। मैं ने उस से कहा कि मैं ने पहले ही तुम को समझा दिया था कि तुम रसूलुल्लाह ﷺ को तंग मत किया करो और तुम्हारे अख़राजात में जो कमी करे वोह मुझ से मांग लिया करो मगर तुम ने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया। फिर मैं ने पूछा कि क्या रसूलुल्लाह ﷺ ने सभों को तलाक़ दे दी है ? हफ्सा ने कहा मैं कुछ नहीं जानती। रसूलुल्लाह ﷺ बालाखाने पर हैं आप उन से दरयाफ्त करें। मैं वहां से उठ कर मस्जिद में आया तो सहाबए किराम को भी देखा कि वोह मिम्बर के पास बैठे रो रहे हैं। मैं उन के पास थोड़ी देर बैठा लेकिन मेरी तबीअत में सुकून व क़रार नहीं था। इस लिये मैं उठ कर बालाखाने के पास आया और पहरेदार गुलाम "रबाह" से कहा कि तुम मेरे लिये अन्दर आने की इजाजत तलब करो। रबाह ने लौट कर जवाब दिया कि मैं ने अर्ज कर दिया लेकिन आप ﷺ ने कोई जवाब नहीं दिया। मेरी उलझन और बेताबी और ज़ियादा बढ़ गई और मैं ने दरबान से दोबारा इजाज़त तलब करने की दरख्वास्त की फिर भी कोई जवाब नहीं मिला। तो मैं ने बुलन्द आवाज़ से कहा कि ऐ रबाह ! तुम मेरा नाम ले कर इजाज़त तलब करो। शायद रसूलुल्लाह ﷺ को येह ख़याल हो कि मैं अपनी बेटी हफ्सा के लिये कोई सिफ़ारिश ले कर आया हूं। तुम अर्ज कर दो कि खुदा की क़सम ! अगर रसूलुल्लाह ﷺ मुझ हुक्म फ़रमाएं तो मैं अभी अभी अपनी तलवार से अपनी बेटी हफ्सा की गरदन उड़ा दूं। 

࿐  इस  के बाद मुझ को इजाज़त मिल गई जब मैं बारगाहे रिसालत में बारयाब हुवा तो मेरी आंखों ने येह मन्ज़र देखा कि आप ﷺ एक खरीबान की चारपाई पर लैटे हुए हैं और आप के जिस्मे नाजुक पर बान के निशान पड़े हुए हैं फिर मैं ने नज़र उठा कर इधर उधर देखा तो एक तरफ़ थोड़े से "जव" रखे हुए थे और एक तरफ़ एक खाल खूंटी पर लटक रही थी। ताजदारे दो आलम के खजाने की येह काएनात देख कर मेरा दिल भर आया और मेरी आंखों में आंसू आ गए। हुजूर ﷺ ने मेरे रोने का सबब पूछा तो मैं ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ! इस से बढ़ कर रोने का और कौन सा मौक़अ होगा ? कि कैसर व किस्रा खुदा के दुश्मन तो नेमतों में डूबे हुए ऐशो इशरत की ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं और आप खुदा के रसूले मुअज्ज़म होते हुए भी इस हालत में हैं। आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया कि ऐ उमर ! क्या तुम इस पर राज़ी नहीं हो कि कैसर व किस्रा दुन्या लें और हम आखिरत! 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 476 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 303* ༺❘


     *❝ आयते तख्यीर व ईलाअ #03  ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐  इस के बाद मैं ने हुज़ूर ﷺ को मानूस करने के लिये कुछ और भी गुफ्तगू की यहां तक कि मेरी बात सुन कर हुजूर ﷺ के लबे अन्वर पर तबस्सुम के आषार नुमायां हो गए। उस वक्त मैं ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ क्या आप ने अपनी अज़वाजे मुतहहरात को तलाक़ दे दी है ? आप ﷺ ने फ़रमाया कि “नहीं”। मुझे इस क़दर खुशी हुई कि फ़र्ते मुसर्रत से मैं ने तक्बीर का नारा मारा। फिर मैं ने येह गुज़ारिश की या रसूलल्लाह ﷺ सहाबए किराम मस्जिद में ग़म के मारे बैठे रो रहे हैं अगर इजाज़त हो तो मैं जा कर उन लोगों को मुत्तलअ कर दूं कि तलाक़ की खबर सरासर गलत है। चुनान्चे मुझे इस की इजाज़त मिल गई और मैं ने जब आ कर सहाबए किराम को इस की ख़बर दी तो सब लोग खुश हो कर हश्शाश बश्शाश हो गए और सब को सुकून व इत्मीनान हासिल हो गया। 
     
࿐  जब एक महीना गुज़र गया और हुज़ूर ﷺ की क़सम पूरी हो गई तो आप बालाखाने से उतर आए इस के बाद ही आयते तख़्यीर नाज़िल हुई जो येह है :  _ऐ नबी ! अपनी बीवियों से फ़रमा दीजिये कि अगर तुम दुन्या की ज़िन्दगी और इस की आराइश चाहती हो तो आओ मैं तुम्हें कुछ माल दूं और अच्छी तरह छोड़ दूं और अगर तुम अल्लाह और उस के रसूल और आख़िरत का घर चाहती हो तो बेशक अल्लाह ने तुम्हारी नेकी वालियों के लिये बहुत बड़ा अज्र तय्यार कर रखा है।_
    
࿐  इन आयाते बय्यिनात का मा हसल और खुलासए मतलब यह है कि रसूले खुदा ﷺ को खुदा वन्दे कुद्दूस ने येह हुक्म दिया कि आप अपनी मुक़द्दस बीवियों को मुत्तलअ फ़रमा दें कि दो चीजें तुम्हारे सामने हैं। एक दुन्या की जीनत व आराइश दूसरी आख़िरत की नेमत। अगर तुम दुन्या की जैबो जीनत चाहती हो तो पैगम्बर की ज़िन्दगी चूंकि बिल्कुल ही जाहिदाना ज़िन्दगी है इस लिये पैग़म्बर के घर में तुम्हें येह दुन्यवी जीनत व आराइश तुम्हारी मरजी के मुताबिक नहीं मिल सकती, लिहाज़ा तुम सब मुझ से जुदाई हासिल कर लो। मैं तुम्हें रुख़सती का जोड़ा पहना कर और कुछ माल दे कर रुख़सत कर दूंगा। और अगर तुम खुदा व रसूल और आख़िरत की नेमतों की तलब गार हो तो फिर रसूले खुदा के दामने रहमत से चिमटी रहो। खुदा ने तुम नेकूकारों के लिये बहुत ही बड़ा अज्रो षवाब तय्यार कर रखा है जो तुम को आखि़रत में मिलेगा। 
     
࿐  इस आयत के नुज़ूल के बाद सब से पहले हुज़ूर ﷺ हज़रते बीबी आइशा के पास तशरीफ़ ले गए और फ़रमाया कि ऐ आइशा ! मैं तुम्हारे सामने एक बात रखता हूं मगर तुम इस के जवाब में जल्दी मत करना और अपने वालिदैन से मश्वरा कर के मुझे जवाब देना। इस के बाद आप ने आयत तिलावत फ़रमा कर उन को सुनाई तो उन्हों ने बर जस्ता अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ इस मुआमले में भला मैं क्या अपने वालिदैन से मश्वरा करूं मैं अल्लाह और उस के रसूल और आखिरत के घर को चाहती हूं।, फिर आप ﷺ ने यके बाद दीगरे तमाम अज्वाजे मुतहहरात को अलग अलग आयते तख़्यीर सुना सुना कर सब को इख़्तियार दिया और सब ने वोही जवाब दिया जो हज़रते आइशा ने जवाब दिया था। 
     
࿐ अल्लाहु अक्बर ! येह वाकिआ इस बात की आफ्ताब से ज़ियादा रोशन दलील है कि अज्वाजे मुतहहरात को हुज़ूर ﷺ की जात से किस क़दर आशिकाना शैफ्तगी और वालिहाना महब्बत थी कि कई कई सोकनों की मौजूदगी और ख़ानए नुबुव्वत की सादा और जाहिदाना तर्ज़े मुआशरत और तंगी तुर्शी की ज़िन्दगी के बा वुजूद येह रईस ज़ादियां एक लम्हे के लिये भी रसूल के दामने रहमत से जुदाई गवारा नहीं कर सकती थीं। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 478📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 304* ༺❘


      *❝  एक गलत फहमी का इजाला  ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐   अहादीष की रिवायतों और तफ्सीरों में "ईलाअ" आयते "तख्यीर" और हज़रते आइशा व हफ्सा का "मुज़ाहरा" इन वाकिआत को आम तौर पर अलग अलग इस तरह बयान किया गया है कि गोया येह मुख़्तलिफ़ ज़मानों के मुख़्तलिफ़ वाकआत हैं। इस से एक कम इल्म व कम फ़हम और ज़ाहिर बीन इन्सान को येह धोका हो सकता है कि शायद रसूले खुदा ﷺ और आप की अज्वाजे मुतहहरात के तअल्लुक़ात खुश गवार न थे और कभी "ईलाअ" कभी "तख़्यीर” कभी "मुज़ाहरा" हमेशा एक न एक झगड़ा ही रहता था लेकिन अहले इल्म पर मख़्फ़ी नहीं कि येह तीनों वाकिआत एक ही सिल्सिले की कड़ियां हैं।

࿐   चुनान्चे बुख़ारी शरीफ़ की चन्द रिवायात खुसूसन बुख़ारी किताबुन्निकाह बाब मौई-ज़तुर्रजुल इब्नतुह लि हालि जौजुहा में हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास की जो मुफ़स्सल रिवायत है, उस में साफ़ तौर पर येह तसरीह है कि हुजुर ﷺ का इलाअ करना और अज्वाजे मुतहरात से अलग हो कर बालाखाने पर तन्हा नशीनी कर लेना, हज़रते आइशा व हज़रते हफ्सा का मुज़ा-हरा करना, आयते तख़्यीर का नाज़िल होना, येह सब वाकिआत एक दूसरे से मुन्सलिक और जुड़े हुए हैं और एक ही वक्त में यह सब वाअ हुए हैं। वरना हुजूर ﷺ और आप की आज़वाजे मुतहरात के खुश गवार तअल्लुकात जिस क़दर आशिकाना उल्फ़त व महब्बत के आईना दार रहे हैं क़ियामत तक इस की मिषाल नहीं मिल सकती और नुबुव्वत की मुक़द्दस ज़िन्दगी के बे शुमार वाकआत इस उल्फ़त व महब्बत के तअल्लुकात पर गवाह हैं। जो अहादीष व सीरत की किताबों में आस्मान के सितारों की तरह चमकने और दास्ताने इश्क़ो महब्बत के च-मनिस्तानों में मौसिमे बहार के फूलों की तरह महकते हैं। 


*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 480 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 305* ༺❘


       *❝  आमिलों का तक़र्रुर ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐  हुज़ूर ﷺ ने सि. 9 हि. मुहर्रम के महीने में ज़कात व सदक़ात की वसूली के लिये आमिलों और मुहस्सिलों को मुख़्तलिफ़ क़बाइल में रवाना फ़रमाया। इन उमरा व आमिलीन की फेहरिस्त में मुन्दरिजए जैल हज़रात खुसूसिय्यत के साथ काबिले ज़िक्र हैं जिन को इब्ने सा'द ने ज़िक्र फ़रमाया है। 

࿐ (1) हज़रते उयैना बिन हसन को बनी तमीम की तरफ, (2) हज़रते यज़ीद बिन हुसैन को अस्लम व गिफार की तरफ, (3) हज़रते उबाद बिन बिशर को सुलैम व मुज़ैना की तरफ,  (4) हज़रते राफेअ बिन मकीष को जुहैना की तरफ, (5) हज़रते अम्र बिन अल आस को बनी फ़ज़ारा की तरफ, (6) हज़रते जहाक बिन सुफ्यान को बनी किलाब की तरफ़, (7) हजरते बिश्र बिन सुफ्यान को बनी काब की तरफ, (8) हज़रते इब्नुल्लिबतिया को बनी ज़बयान की तरफ, (9) हज़रते मुहाजिर बिन अलीय्या को सनआअ की तरफ़, (10) हज़रते ज़ियाद बिन लुबैद अन्सारी को हजर मोत की तरफ, (11) हज़रते अदी बिन हातिम को क़बीलए तय व बनी अस्अद की तरफ, (12) हज़रते मालिक बिन नुवैरह को बनी हन्जला की तरफ, (13) हज़रते जबरकान को बनी साद के निस्फ़ हिस्से की तरफ, (14) हज़रते कैस बिन आसिम को बनी साद के निस्फ़ हिस्से की तरफ, (15) हज़रते अलाअ बिन अल हज़रमी को बहरीन की तरफ, (16) हज़रते अली को नजरान की तरफ
   
࿐   येह हुज़ूर शहनशाहे रिसालत ﷺ के उमरा और आमिलीन हैं जिन को आपने ज़कात व सदका व जिज्या वसूल करने के लिये मुक़र्रर फ़रमाया था। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 481📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 306* ༺❘


            *❝  बनी तमीम का वफ्द  ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐  मुहर्रम सि. 9 हि. में हुज़ूर ﷺ ने बिशर बिन सुफ्यान को बनी खजाआ के सदक़ात वसूल करने के लिये भेजा। उन्हों ने सदक़ात वसूल कर के जम्अ किये ना गहां इन पर बनी तमीम ने हम्ला कर दिया वोह अपनी जान बचा कर किसी तरह मदीना आ गए और सारा माजरा बयान किया। हुज़ूर ﷺ ने बनी तमीम की सरकूबी के लिये हज़रते उयैना बिन हसन फ़ज़ारी को पचास सुवारों के साथ भेजा। उन्हों ने बनी तमीम पर उन के सहरा में हम्ला कर के उन के ग्यारह मर्दों, इक्कीस औरतों और तीस लड़कों को गरिफ्तार कर लिया और उन सब कैदियों को मदीना लाए। इस के बाद बनी तमीम का एक वफ़द मदीना आया जिस में इस क़बीले के बड़े बड़े सरदार थे और इन का रईसे आ'जम अक्रअ बिन हाबिस और ईन का खतीब "अतारद" और शाईर "जबरकान बिन बद्र" भी इस वफ़द में साथ आए थे। येह लोग दन दनाते हुए काशानए नुबुव्वत के पास पहुंच गए और चिल्लाने लगे कि आप ने हमारी औरतों और बच्चों को किस जुर्म में गरिफ्तार कर रखा है। 
     
࿐  उस वक्त हुजुर ﷺ हज़रते आइशा के हुजरए मुबारका में कैलूला फ़रमा रहे थे। हर चन्द हज़रते बिलाल और दूसरे सहाबा ने उन लोगों को मन्अ किया कि तुम लोग काशानए नबवी के पास शोर न मचाओ। नमाज़े जोहर के लिये खुद हुज़ूर ﷺ मस्जिद में तशरीफ़ लाने वाले हैं। मगर येह लोग एक न माने शोर मचाते ही रहे जब आप ﷺ बाहर तशरीफ़ ला कर मस्जिदे नबवी में रौनक अफ़रोज़ हुए तो बनी तमीम का रईसे आज़म अक्रअ बिन हाबिस बोला कि ऐ मुहम्मद ! (ﷺ) हमें इजाजत दीजिये कि हम गुफ्तगू करें क्यूं कि हम वोह लोग हैं कि जिस की मदह कर दें वोह मुज्य्यन हो जाता है और हम लोग जिस की मज़म्मत कर दें वोह ऐब से दाग़दार हो जाता है। हुजूर ﷺ ने फ़रमाया कि तुम लोग गलत कहते हो। येह खुदा वन्दे तआला ही की शान है कि उस की मद्ह जीनत और उस की मज़म्मत दाग है तुम लोग यह कहो कि तुम्हारा मक्सद क्या है ? येह सुन कर बनी तमीम कहने लगे कि हम अपने खतीब और अपने शाइर को ले कर यहां आए हैं ताकि हम अपने क़ाबिले फ़ख्र कारनामों को बयान करें और आप अपने मफ़ाख़िर को पेश करें। 

࿐  आप ﷺ ने फ़रमाया कि न मैं शेरो शाईरी के लिये भेजा गया हूं न इस तरह की मुफ़ाख़रत का मुझे खुदा की तरफ से हुक्म मिला है। मैं तो खुदा का रसूल हूं इस के बावजूद अगर तुम येही करना चाहते हो तो मैं तय्यार हूं।  येह सुनते ही आकरअ बिन हाबिस ने अपने खतीब अतारद की तरफ़ इशारा किया। इस ने खड़े हो कर अपने मफ़ाख़िर और अपने आबाओ अजदाद के मनाकिब पर बड़ी फसाहत व बलागत के साथ एक धुआंधार खुत्बा पढ़ा। आप ﷺ ने अन्सार के खतीब हज़रते षाबित को जवाब देने का हुक्म फ़रमाया। उन्हों ने उठ कर बर जस्ता ऐसा फ़सीहो बलीग और मुअष्षिर खुतबा दिया कि बनी तमीम उन के ज़ोरे कलाम और मफ़ाख़िर की अजमत सुन कर दंग रह गए। और उन का खतीब अतारद भी हक्का बक्का हो कर शरमिन्दा हो गया फिर बनी तमीम का शाइर "ज़बरकान बिन बद्र" उठा और उस ने एक क़सीदा पढ़ा। आप ﷺ ने हज़रते हस्सान बिन षाबित को इशारा फ़रमाया तो उन्हों ने फ़िल बदीह एक ऐसा मुरस्सअ और फ़साहत व बलागत से मामूर क़सीदा पढ़ दिया कि बनी तमीम का शाइर उल्लू बन गया। बिल आखिर अक्रअ बिन हाबिस कहने लगा कि खुदा की क़सम ! मुहम्मद को गैब से ऐसा ताईद व नुसरत हासिल हो गई है कि हर फ़ज़्लो कमाल इन पर ख़त्म है। बिला शुबा इन का खतीब हमारे खतीब से जियादा फ़सीहो बलीग है और इन का शाइर हमारे शाइर से बहुत बढ़ चढ़ कर है। इस लिये इन्साफ़ का तक़ाज़ा येह है कि हम इन के सामने सरे तस्लीम ख़म करते हैं।

࿐   चुनान्चे येह लोग हुज़ूरे अक्दस ﷺ के मुतीओ फ़रमां बरदार हो गए और कलिमा पढ़ कर मुसलमान हो गए। फिर इन लोगों की दरख्वास्त पर हुज़ूर ﷺ ने इन के कैदियों को रिहा फ़रमा दिया और येह लोग अपने क़बीले में वापस चले गए। इन्ही लोगों के बारे में कुरआने मजीद की येह आयत नाज़िल हुई कि  : _बेशक वोह जो आप को हुजरों के बाहर से पुकारते हैं। उन में अकषर बे अकल हैं और अगर वोह सब्र करते यहां तक कि आप उन के पास तशरीफ़ लाते तो येह उन के लिये बेहतर था और अल्लाह बख्शने वाला मेहरबान है।_

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 483 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 307* ༺❘


  *❝  हातिम ताई की बेटी और बेटा मुसलमान ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐  रबीउल आख़िर सि. 9 हि. में हुज़ूर ﷺ ने हज़रते अली رضي الله عنه की मा तहती में एक सो पचास सुवारों को इस लिये भेजा कि वोह क़बीलए "तय" के बुतखाने को गिरा दें। इन लोगों ने शहर फ़लस में पहुंच कर बुतखाने को मुन्हदिम कर डाला और कुछ ऊंटों और बकरियों को पकड़ कर और चन्द औरतों को गरिफ्तार कर के येह लोग मदीना लाए। इन कैदियों में मशहूर सखी हातिम ताई की बेटी भी थी। हातिम ताई का बेटा अदी बिन हातिम भाग कर मुल्के शाम चला गया। हातिम ताई की लड़की जब बारगाहे रिसालत में पेश की गई तो उस ने कहा कि या रसूलल्लाह मैं "हातिम ताई" की लड़की हूं। मेरे बाप का इन्तिकाल हो गया और मेरा भाई "अदी बिन हातिम" मुझे छोड़ कर भाग गया। मैं ज़ईफा हूं आप मुझ पर एहसान कीजिये खुदा आप पर एहसान करेगा। हुजूर ﷺ ने उन को छोड़ दिया और सफ़र के लिये एक ऊंट भी इनायत फ़रमाया। येह मुसलमान हो कर अपने भाई अदी बिन हातिम के पास पहुंची और उस को हुजुर ﷺ के अख़्लाक़े नुबुव्वत से आगाह किया और रसूलुल्लाह ﷺ की बहुत ज़ियादा तारीफ़ की।

࿐   अदी बिन हातिम अपनी बहन की जुबानी हुज़ूर ﷺ के खुल्के अज़ीम और आदाते करीमा के हालात सुन कर बेहद मुतअष्षिर हुए और बिगैर कोई अमान तलब किये हुए मदीना हाज़िर हो गए। लोगों ने बारगाहे नुबुव्वत में येह ख़बर दी कि अदी बिन हातिम आ गया है। हुज़ूर रहूमतुल्लिल आ-लमीन ने इन्तिहाई करीमाना अन्दाज़ से अदी बिन हातिम के हाथ को अपने दस्ते रहमत में ले लिया और फ़रमाया कि ऐ अदी ! तुम किस चीज़ से भागे ? क्या "ला-इलाहा इल्लल्लाह" कहने से तुम भागे ? क्या खुदा के सिवा कोई और माबूद भी है ? अदी बिन हातिम ने कहा कि “नहीं” फिर कलिमा पढ़ लिया और मुसलमान हो गए इन के इस्लाम क़बूल करने से हुज़ूर ﷺ को इस कदर खुशी हुई कि फ़र्ते मुसर्रत से आप का चेहरए अन्वर चमकने लगा और आप ने इन को खुसूसी इनायात से नवाजा। 
     
࿐  हज़रते अदी बिन हातिम भी अपने बाप हातिम की तरह बहुत ही सखी थे। हज़रते इमाम अहमद नाक़िल हैं कि किसी ने इन से एक सो दिरहम का सुवाल किया तो येह ख़फ़ा हो गए और कहा कि तुम ने फ़क़त एक सो दिरहम ही मुझ से मांगा तुम नहीं जानते कि मैं हातिम का बेटा हूं खुदा की क़सम ! तुम को इतनी हक़ीर रक़म नहीं दूंगा। येह बहुत ही शानदार सहाबी हैं, खिलाफ़ते सिद्दीके अक्बर मे जब बहुत से क़बाइल ने अपनी ज़कात रोक दी और बहुत से मुर्तद हो गए येह उस दौर में भी पहाड़ की तरह इस्लाम पर षाबित क़दम रहे और अपनी क़ौम की ज़कात ला कर बारगाहे ख़िलाफ़त में पेश की और इराक़ की फुतूहात और दूसरे इस्लामी जिहादों में मुजाहिद की हैषिय्यत से शरीक हुए और सि. 68 हि. में एक सो बीस बरस की उम्र पा कर विसाल फ़रमाया और सिहाह सित्ता की हर किताब में आपकी रिवायत कर्दा हदीषें मज़्क़ुर हैं। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 485 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 308* ༺❘


         *❝ गज्वए तबूक #01 ❞*  
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࿐  "तबूक" मदीना और शाम के दरमियान एक मक़ाम का नाम है जो मदीने से चौदह मन्ज़िल दूर है। बा'ज़ मुअर्रिख़ीन का क़ौल है कि "तबूक" एक कलए का नाम है और बा'ज़ का क़ौल है कि "तबूक" एक चश्मे का नाम है। मुमकिन है येह सब बातें मौजूद हों ! येह गज्वा सख़्त कहत के दिनों में हुवा। तवील सफ़र, हवा गर्म, सुवारी कम, खाने पीने की तक्लीफ़, लश्कर की तादाद बहुत ज़ियादा, इस लिये इस ग़ज़्वे में मुसलमानों को बड़ी तंगी और तंग दस्ती का सामना करना पड़ा। येही वजह है कि इस गज्वे को "जैशुल उसरह" (तंग दस्ती का लश्कर) भी कहते हैं और चूंकि मुनाफ़िकों को इस ग़ज्वे में बड़ी शरमिन्दगी और शर्मसारी उठानी पड़ी थी। इस वजह से इसका एक नाम "जज़्वए फ़ाज़िहा" (रुस्वा करने वाला गज्वा) भी है। इस पर तमाम मुअर्रिखीन का इत्तिफ़ाक़ है कि इस गज्वे के लिये हुज़ूर ﷺ माहे रजब सि. 9 हि. जुमा'रात के दिन रवाना हुए।

࿐  *गज्वए तबूक का सबब :-* अरब का गुस्सानी खानदान जो कैसरे रूम के ज़ेरे अषर मुल्के शाम पर हुकूमत करता था चूंकि वोह ईसाई था इस लिये कैसरे रूम ने इस को अपना आलए कार बना कर मदीने पर फ़ौज कशी का अज़्म कर लिया। चुनान्चे मुल्के शाम के जो सौदागर रोगने जैतून बेचने मदीने आया करते थे। उन्हों ने ख़बर दी कि कैसरे रूम की हुकूमत ने मुल्के शाम में बहुत बड़ी फ़ौज जम्अ कर दी है। और उस फ़ौज में रूमियों के इलावा क़बाइले लख्म व जुज़ाम व गुस्सान के तमाम अरब भी शामिल हैं। इन ख़बरों का तमाम अरब में हर तरफ चर्चा था और रूमियों की इस्लाम दुश्मनी कोई ढकी छुपी चीज़ नहीं थी इस लिये इन खबरों को ग़लत समझ कर नज़र अन्दाज़ कर देने की भी कोई वजह नहीं थी। इस लिये हुजूरे अकरम ﷺ ने भी फ़ौज की तय्यारी का हुक्म दे दिया। लेकिन जैसा कि हम तहरीर कर चुके हैं कि उस वक्त हिजाज़े मुक़द्दस में शदीद कहत था और बे पनाह शिद्दत की गर्मी पड़ रही थी इन वुजूहात से लोगों को घर से निकलना शाक़ गुज़र रहा था। मदीने के मुनाफ़िक़ीन जिन के निफ़ाक़ का भांडा फूट चुका था वोह खुद भी फ़ौज में शामिल होने से जी चुराते थे और दूसरों को भी मन्अ करते थे। लेकिन इस के बा वुजूद तीस हज़ार का लश्कर जम्अ हो गया। मगर इन तमाम मुजाहिदीन के लिये सुवारियों और सामाने जंग का इन्तज़ाम करना एक बड़ा ही कठिन मरहला था क्यूं कि लोग कहत की वजह से इन्तहाई मफ्लूकुल हाल और परेशान थे। इस लिये हुजूर ﷺ ने तमाम क़बाइले अरब से फौजे और माली इमदाद तलब फ़रमाई। इस तरह इस्लाम मे किसी कारे खैर के लिये चंदा करने की सुन्नत क़ाइम हुई।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 488 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 309* ༺❘


        *❝  गज़्वए तबूक #02 ❞*  
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࿐  *फेहरिस्ते चन्दा दिहन्दगान :-*  हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضي الله عنه ने अपना सारा माल और घर का तमाम अषाषा यहां तक कि बदन के कपड़े भी ला कर बारगाहे नुबुव्वत में पेश कर दिये। और हज़रते उमर फारूक رضي الله عنه ने अपना आधा माल इस चन्दे में दे दिया। मन्कूल है कि हज़रते उमर رضي الله عنه जब अपना निस्फ़ माल ले कर बारगाहे अक्दस में चले तो अपने दिल में येह ख़याल कर के चले थे कि आज मैं हज़रते अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنه से सब्कत ले जाऊंगा क्यूं कि उस दिन काशानए फ़ारूक में इत्तिफ़ाक़ से बहुत ज़ियादा माल था। हुज़ूर ﷺ ने हज़रते उमर फारूक رضی الله تعالی عنه से दरयाफ्त फ़रमाया कि ऐ उमर ! कितना माल यहां लाए और किस क़दर घर पर छोड़ा ? अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ ! आधा माल हाज़िरे ख़िदमत है और आधा माल अहलो इयाल के लिये घर में छोड़ दिया है और जब येही सुवाल अपने यारे गार हज़रते सिद्दीक़े अक्बर से किया तो उन्हों ने अर्ज़ किया कि मैं ने अल्लाह और उस के रसूल को अपने घर का जखीरा बना दिया है। आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया कि तुम दोनों में इतना ही फ़र्क़ है जितना तुम दोनों के कलामों में फर्क है। 

࿐   हज़रते उषमाने गनी एक हज़ार ऊंट और सत्तर घोड़े की मुजाहिदीन की सुवारी के लिये और एक हज़ार अश्रफी फ़ौज के अख़ाजात की मद में अपनी आस्तीन में भर कर लाए और हुज़ूर ﷺ की आगोशे मुबारक में बिखैर दिया। आप ने उन को क़बूल फ़रमा कर येह दुआ फ़रमाई कि _ऐ अल्लाह तू उषमान से राजी हो जा, क्यूं कि मैं इस से खुश हो गया हूं।_

࿐   हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ ने चालीस हज़ार दिरहम दिया और अर्ज किया कि या रसलल्लाह ﷺ मेरे घर में इस वक़्त अस्सी हज़ार दिरहम थे। आधा बारगाहे अकदस में लाया हूं और आधा घर पर बाल बच्चों के लिये छोड़ आया हूं। इर्शाद फ़रमाया कि अल्लाह तआला इस में भी बरकत दे जो तुम लाए और उस में भी बरकत अता फरमाए जो तुम ने घर पर रखा। इस दुआए नबवी का येह अषर हुवा कि हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ़ बहुत जियादा मालदार हो गए।     
  
࿐  इसी तरह तमाम अन्सार व मुहाजिरीन ने हस्बे तौफ़ीक़ इस चन्दे में हिस्सा लिया। औरतों ने अपने ज़ेवरात उतार उतार कर बारगाहे नुबुव्वत में पेश करने की सआदत हासिल की। 
    
࿐  हज़रते आसिम बिन अदी अन्सारी ने खजूरें दीं। और हज़रते अबू अकील अन्सारी जो बहुत ही मुफ्लिस थे फ़क़त एक साअ खजूर ले कर हाज़िरे ख़िदमत हुए और गुज़ारिश की, कि या रसूलल्लाह ﷺ! मैं ने दिन भर पानी भर भर कर मज़दूरी की तो दो साअ खजूरें मुझे मज़दूरी में मिली हैं। एक साअ अहलो इयाल को दे दी है और येह एक साअ हाज़िरे ख़िदमत है। हुजूर रहूमतुल्लिल आलमीन का कल्बे नाजुक अपने एक मुफ्लिस जां निषार के इस नज़रानए खुलूस से बेहद मुतअस्सीरि हुवा और आपने उस खजूर को तमाम मालों के ऊपर रख दिया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 489 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 310* ༺❘


     *❝  गज़्वए तबूक #03  ❞*  
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࿐   *फ़ौज की तय्यारी :*  रसूलुल्लाह ﷺ का अब तक येह तरीका था कि गज़वात के मुआमले में बहुत ज़ियादा राज़दारी के साथ तैयारी फ़रमाते थे। यहां तक कि असाकिरे इस्लामिया को ऐन वक़्त तक यह भी न मा'लूम होता था कि कहां और किस तरफ़ जाना है ? मगर जंगे तबूक के मौकअ पर सब कुछ इन्तिजाम अलानिया तौर पर किया और यह भी बता दिया कि तबूक चलना है और कैसरे रूम की फ़ौजों से जिहाद करना है ताकि लोग ज़ियादा से ज्यादा तय्यारी कर लें। 
   
࿐   हज़राते सहाबए किराम ने जैसा कि लिखा जा चुका दिल खोल कर चन्दा दिया मगर फिर भी पूरी फ़ौज के लिये सुवारियों का इन्तिज़ाम न हो सका। चुनान्चे बहुत से जांबाज़ मुसलमान इसी बिना पर इस जिहाद में शरीक न हो सके कि उन के पास सफ़र का सामान नहीं था येह लोग दरबारे रिसालत में सुवारी तलब करने के लिये हाज़िर हुए मगर जब रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि मेरे पास सुवारी नहीं है तो येह लोग अपनी बे सरो सामानी पर इस तरह बिलबिला कर रोए कि हुज़ूर रहमते आलम ﷺ को उनकी आहो ज़ारी और बे करारी पर रहम आ गया। चुनान्चे कुरआने मजीव गवाह है कि  : _और न उन लोगों पर कुछ हरज है कि वोह जब (ऐ रसूल) आप के पास आए कि हम को सुवारी दीजिये और आप ने कहा कि मेरे पास कोई चीज़ नहीं जिस पर तुम्हें सुवार करूं तो वोह वापस गए और उन की आंखों से आंसू जारी थे कि अफ्सोस हमारे पास खर्च नहीं है।_

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 490 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 311* ༺❘


         *❝  गज़्वए तबूक #04 ❞*  
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࿐  *तबूक को रवानगी :-*  बहर हाल हुज़ूर ﷺ तीस हज़ार का लश्कर साथ ले कर तबूक के लिये रवाना हुए और मदीने का नज़्मो नस्क चलाने के लिये हज़रते अली को अपना ख़लीफ़ा बनाया। जब हज़रते अली ने निहायत ही हसरत व अफ्सोस के साथ अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ क्या आप मुझे औरतों और बच्चों में छोड़ कर खुद जिहाद के लिये तशरीफ़ लिये जा रहे हैं तो इर्शाद फ़रमाया कि "क्या तुम इस पर राजी नहीं हो कि तुम को मुझ से वोह निस्बत है जो हज़रते हारून को हज़रते मूसा के साथ थी मगर येह कि मेरे बाद कोई नबी नहीं है।" यानी जिस तरह हज़रते मूसा कोहे तूर पर जाते वक्त हज़रते हारून को अपनी उम्मत बनी इस्राईल की देखभाल के लिये अपना ख़लीफ़ा बना कर गए थे इसी तरह मैं तुम को अपनी उम्मत सोंप कर जिहाद के लिये जा रहा हूं। 
     
࿐  मदीने से चल कर मकामे “षनिय्यतिल वदाअ" में आप ﷺ ने क़ियाम फ़रमाया। फिर फ़ौज का जाएजा लिया और फ़ौज का मुक़द्दमा, मै-मना, मै-सरा वगैरा मुरत्तब फ़रमाया। फिर वहां से कूच किया। मुनाफ़िक़ीन किस्म किस्म के झूटे उज़्र और बहाने बना कर रह गए और मुख़्लिस मुसलमानों में से भी चन्द हज़रात रह गए उन में येह हज़रात थे : का'ब बिन मालिक, हिलाल बिन उमय्या, मुरारह बिन रबीअ, अबू खैषमा, अबू जर गिफारी। इन में से अबू खैषमा और अबू जर गिफारी तो बाद में जा कर शरीके जिहाद हो गए लेकिन तीन अव्वलुज्जिक्र नहीं गए। 
     
࿐  हज़रते अबू जर गिफ़ारी के पीछे रह जाने का सबब येह हुवा कि उन का ऊंट बहुत ही कमज़ोर और थका हुवा था। इन्हों ने उस को चन्द दिन चारा खिलाया ताकि वोह चंगा हो जाए। जब रवाना हुए तो वोह फिर रास्ते में थक गया। मजबूरन वोह अपना सामान अपनी पीठ पर लाद कर चल पड़े और इस्लामी लश्कर में शामिल हो गए। हज़रते अबू खैषमा जाने का इरादा नहीं रखते थे मगर वोह एक दिन शदीद गर्मी में कहीं बाहर से आए तो उन की बीवी ने छप्पर में छिड़काव कर रखा था। थोड़ी देर उस सायादार और ठन्डी जगह में बैठे फिर ना गहां उन के दिल में हुज़ूर ﷺ का ख्याल आ गया। अपनी बीवी से कहा कि येह कहां का इन्साफ़ है कि मैं तो अपनी छप्पर में ठन्डक और साए में आराम व चैन से बैठा रहूं और खुदा के मुक़द्दस रसूल इस धूप की तमाज़त और शदीद लू के थपेड़ों में सफ़र करते हुए जिहाद के लिये तशरीफ़ ले जा रहे हों एक दम उन पर ऐसी ईमानी गैरत सुवार हो गई कि तोशे के लिये खजूर ले कर एक ऊंट पर सुवार हो गए और तेज़ी के साथ सफ़र करते हुए रवाना हो गए। लश्कर वालों ने दूर से एक शुतर सुवार को देखा तो हुजूर ﷺ ने फ़रमाया कि अबू खैषमा होंगे इस तरह येह भी लश्करे इस्लाम में पहुंच गए।
     
࿐  रास्ते में क़ौमे आद व षमूद की वोह बस्तियां मिलीं जो कहरे इलाही के अज़ाबों से उलट पलट कर दी गई थीं। आप ﷺ ने हुक्म दिया कि येह वोह जगहें हैं जहां खुदा का अज़ाब नाज़िल हो चुका है इस लिये कोई शख़्स यहां क़ियाम न करे बल्कि निहायत तेज़ी के साथ सब लोग यहां से सफ़र कर के इन अज़ाब की वादियों से जल्द बाहर निकल जाएं और कोई यहां का पानी न पिये और न किसी काम में लाए। इस ग़ज्वे में पानी की किल्लत, शदीद गर्मी, सुवारियों की कमी से मुजाहिदीन ने बेहद तक्लीफ़ उठाई मगर मन्ज़िले मक्सूद पर पहुंच कर ही दम लिया। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 492 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 312* ༺❘


        *❝  गज़्वए तबूक #05 ❞*  
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࿐  *रास्ते के चन्द मोजिज़ात_* #01 हुजूर ﷺ ने हज़रते अबू जर गिफारी رضي الله عنه को देखा कि वोह सब से अलग अलग चल रहे हैं। तो इर्शाद फरमाया कि येह सब से अलग ही चलेंगे और अलग ही ज़िन्दगी गुज़ारेंगे और अलग ही वफ़ात पाएंगे। चुनान्चे ठीक ऐसा ही हुवा कि हज़रते उषमान अपने दौरे ख़िलाफ़त में इन को हुक्म दे दिया कि आप "रबज़ा" में रहें आप रबजा में अपनी बीवी और गुलाम के साथ रहने लगे। जब  वफ़ात का वक्त आया तो आप رضي الله عنه ने फ़रमाया कि तुम दोनों मुझ को गुस्ल दे कर और कफ़न पहना कर रास्ते में रख देना। जब शुतर सुवारों का पहला गुरौह मेरे जनाज़े के पास से गुज़रे तो तुम लोग उस से कहना कि येह अबू जर गिफारी का जनाज़ा है इन पर नमाज़ पढ़ कर इन को दफ्न करने में हमारी मदद करो। खुदा की शान कि सब से पहला जो काफिला गुज़रा उस में हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद सहाबी رضي الله عنه थे। आपने जब येह सुना कि येह हज़रते अबू जर गिफ़ारी का जनाज़ा है तो उन्हों ने "اِنَّا لِلّٰهِ وَ اِنَّاۤ اِلَیْهِ رٰجِعُوْنَ" पढ़ा और काफ़िले को रोक कर उतर पड़े और कहा कि बिल्कुल सच्चा फ़रमाया था रसूलुल्लाह ﷺ ने कि “ऐ अबू जर ! तू तन्हा चलेगा, तन्हा मरेगा, तन्हा क़ब्र से उठेगा।" फिर हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद और क़ाफ़िले वालों ने उन को पूरे ए'ज़ाज़ के साथ दफ्न किया। 
  
࿐   बा'ज़ रिवायतों में येह भी आया है कि उन की बीवी के पास कफ़न के लिये कपड़ा नहीं था तो आने वाले लोगों में से एक अन्सारी ने कफ़न के लिये कपड़ा दिया और नमाज़े जनाज़ा पढ़ कर दफ्न किया। 

࿐  *हवा उड़ा ले गई :-* जब इस्लामी लश्कर मक़ामे "हजर" में पहुंचा तो हुज़ूर ﷺ ने हुक्म दिया कि कोई शख़्स अकेला लश्कर से बाहर कहीं दूर न चला जाए पूरे लश्कर ने इस हुक्मे नबवी की इताअत की मगर क़बीलए बनू साइदा के दो आदमियों ने आप ﷺ के हुक्म को नहीं माना। एक शख़्स अकेला ही रफ़ए हाजत के लिये लश्कर से दूर चला गया वोह बैठा ही था कि दफ्अतन किसी ने उस का गला घोंट दिया और वोह उसी जगह मर गया और दूसरा शख्स अपना ऊंट पकड़ने के लिये अकेला ही लश्कर से कुछ दूर चला गया तो ना गहां एक हवा का झोंका आया और उस को उड़ा कर क़बीलए "तय" के दोनों पहाड़ों के दरमियान फेंक दिया और वोह हलाक हो गया आप ﷺ ने उन दोनों का अन्जाम सुन कर फ़रमाया कि क्या मैं ने तुम लोगों को मन्अ नहीं कर दिया था?

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 495 📚*

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           *❝  गज़्वए तबूक #06  ❞*  
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࿐  *रास्ते के चन्द मोजिज़ात_* #02  *गुमशुदा ऊंटनी कहा है ?*  एक मन्जिल पर हुजूर ﷺ की ऊंटनी कहीं चली गई और लोग उस की तलाश में सरगर्दी फिरने लगे तो एक मुनाफ़िक़ जिस का नाम “जैद बिन लसीत" था कहने लगा कि मुहम्मद (ﷺ) कहते हैं कि मैं अल्लाह का नबी हूं और मेरे पास आस्मान की खबरे आती हैं मगर इन को येह पता ही नहीं है कि इन की ऊंटनी कहां है ? हुजूर ﷺ ने अपने असहाब से फ़रमाया कि एक  शख़्स ऐसा ऐसा कहता है हालां कि खुदा की क़सम ! अल्लाह तआला के बता देने से मैं ख़ूब जानता हूं कि मेरी ऊंटनी कहां है ? वोह फुलां घाटी में है और एक दरख़्त में उस की मुहार की रस्सी उलझ गई है। तुम लोग जाओ और उस ऊंटनी को मेरे पास ले कर आ जाओ। जब लोग उस जगह गए तो ठीक ऐसा ही देखा कि उसी घाटी में वोह ऊंटनी खड़ी है और उस की मुहार एक दरख़्त की शाख़ में उलझी हुई है। 

࿐  *तबूक का चश्मा :-*  जब हुज़ूर ﷺ तबूक के करीब में पहुंचे तो इर्शाद फ़रमाया कि इन्शा अल्लाह कल तुम लोग तबूक के चश्मे पर पहुंचोगे और सूरज बुलन्द होने के बाद पहुंचोगे लेकिन कोई शख़्स वहां पहुंचे तो पानी को हाथ न लगाए। रसूलुल्लाह ﷺ जब वहां पहुंचे तो जूते के तस्मे के बराबर उस में एक पानी की धार बह रही थी। आप ﷺ ने उस में से थोड़ा सा पानी मंगा कर हाथ मुंह धोया और उस पानी में कल्ली फरमाई। फिर हुक्म दिया कि इस पानी को चश्मे में उंडेल दो। लोगों ने जब उस पानी को चश्मे में डाला तो चश्मे से ज़ोरदार पानी की मोटी धार बहने लगी और तीस हज़ार का लश्कर और तमाम जानवर उस चश्मे के पानी से सैराब हो गए।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 496 📚*

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          *❝  गज़्वए तबूक #07  ❞*  
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࿐   *रूमी लश्कर डर गया :-* हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने तबूक में पहुंच कर लश्कर को पड़ाव का हुक्म दिया। मगर दूर दूर तक रूमी लश्करों का कोई पता नहीं चला। वाक़िआ येह हुवा कि जब रूमियों के जासूसों ने कैंसर को खबर दी कि रसूलुल्लाह (ﷺ) तीस हज़ार का लश्कर ले कर तबूक में आ रहे हैं तो रूमियों के दिलों पर इस क़दर हैबत छा गई कि वोह जंग से हिम्मत हार गए और अपने घरों से बाहर न निकल सके। रसूलुल्लाह ﷺ ने बीस दिन तबूक में क़ियाम फ़रमाया और अतराफ़ व जवानिब में अफ़वाजे इलाही का जलाल दिखा कर और कुफ़्फ़ार के दिलों पर इस्लाम का रो'ब बिठा कर मदीना वापस तशरीफ़ लाए और तबूक में कोई जंग नहीं हुई। 
     
࿐  इसी सफ़र में “ऐलह" का सरदार जिस का नाम “यखनह" था बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुवा और जिज़या देना क़बूल कर लिया और एक सफ़ेद खच्चर भी दरबारे रिसालत में नज़्र किया जिस के सिले में ताजदारे दो आलम ﷺ ने उस को अपनी चादरे मुबारक इनायत फ़रमाई और उस को एक दस्तावेज़ तहरीर फ़रमा कर अता फरमाई कि वोह अपने गिर्दो पेश के समुन्दर से हर किस्म के फ़वाइद हासिल करता रहे। इसी तरह "जरबाअ" और "अज़रह" के ईसाइयों ने भी हाज़िरे ख़िदमत हो कर जिज़या देने पर रिज़ा मन्दी जाहिर की। 
     
࿐  इस के बाद हुज़ूर ﷺ ने हज़रते खालिद बिन वलीद رضی الله تعالی عنه को एक सो बीस सवारों के साथ "दू-मतिल जन्दल" के बादशाह "अक़ीदर बिन अब्दुल मलिक" की तरफ रवाना फ़रमाया और इरशाद फ़रमाया की वो रात में नीलगाय का शिकार कर रहा होगा तुम उस के पास पहुंचो तो उस को क़त्ल मत करना बल्कि उस को ज़िन्दा गरिफ्तार कर के मेरे पास लाना। चुनान्चे हज़रते खालिद बिन वलीद رضی الله تعالی عنه ने चांदनी रात में अकीदर और उस के भाई हस्सान को शिकार करते हुए पा लिया। हस्सान ने चूंकि हज़रते खालिद बिन वलीद से जंग शुरू कर दी। इस लिये आपने उस को तो क़त्ल कर दिया मगर अकीदर को गरिफ्तार कर लिया और इस शर्त पर उस को रिहा किया कि वोह मदीना बारगाहे अक्दस में हाज़िर हो कर सुल्ह करे। चुनान्वे वोह मदीने आया और हुज़ूर ﷺ ने उस को अमान दी। 
     
࿐ इस ग़ज्वे में जो लोग गैर हाज़िर रहे उन में अकषर मुनाफिकीन थे। जब हुज़ूर ﷺ तबूक से मदीने वापस आए और मस्जिदे नबवी में नुज़ूले इज्लाल फ़रमाया तो मुनाफ़िक़ीन क़समें खा खा कर अपना अपना उज़्र बयान करने लगे। हुज़ूर ﷺ ने किसी से कोई मुवाखज़ा नहीं फ़रमाया लेकिन तीन मुख्लिस सहाबियों हज़रते का'ब बिन मालिक व हिलाल बिन उमय्या व मुरारह बिन रबीआ رضی الله تعالی عنهم का पचास दिनों तक आप ने बायकॉट फ़रमा दिया। फिर इन तीनों की तौबा क़बूल हुई और इन लोगों के बारे में कुरआन की आयत नाज़िल हुई। 
     
࿐  जब हुज़ूर ﷺ मदीने के करीब पहुंचे और उहुद पहाड़ को देखा तो फ़रमाया कि येह उहुद है। येह ऐसा पहाड़ है कि येह हम से महब्बत करता है और हम इस से महब्बत करते हैं। जब आप ने मदीने की सर ज़मीन में क़दम रखा तो औरतें, बच्चे और लौंडी गुलाम सब इस्तिक्बाल के लिये निकल पड़े और इस्तिक्बालिया नज़में पढ़ते हुए आप के साथ मस्जिदे नबवी तक आए। जब आप ﷺ मस्जिदे न बवी में दो रकअत नमाज़ पढ़ कर तशरीफ़ फ़रमा हो गए तो हुज़ूर ﷺ के चचा हज़रते अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब ने आप की मद्ह में एक क़सीदा पढ़ा और अहले मदीना ने बखैरो आफ़िय्यत इस दुश्वार गुज़ार सफ़र से आपकी तशरीफ़ आवरी पर इन्तिहाई मुसर्रत व शादमानी का इज़हार किया और उन मुनाफ़िक़ीन के बारे में जो झूटे बहाने बना कर इस जिहाद में शरीक नहीं हुए थे और बारगाहे नुबुव्वत में क़समें खा खा कर उज़्र पेश कर रहे थे, क़ह्रो ग़ज़ब में भरी हुई कुरआने मजीद की आयतें नाज़िल हुई और उन मुनाफ़िकों के निफ़ाक़ का पर्दा चाक हो गया। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 497 📚*

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          *❝  गज़्वए तबूक #08  ❞*  
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࿐   *जुल बिजादैन की कब्र :-*  गज्वए तबूक में बजुज़ एक हज़रते जुल बिजादैन رضي الله عنه के न किसी सहाबी की शहादत हुई न वफ़ात। हज़रते जुल बिजादैन कौन थे ? और इन की वफ़ात और दफ्न का कैसा मन्ज़र था ? येह एक बहुत ही ज़ौक़ आफरीं और लज़ीज़ हिकायत है। येह क़बीलए मुज़ैना के एक यतीम थे और अपने चचा की परवरिश में थे। जब येह सिने शुऊर को पहुंचे और इस्लाम का चरचा सुना तो इन के दिल में बुत परस्ती से नफरत और इस्लाम क़बूल करने का जज्बा पैदा हुवा। मगर इन का चचा बहुत ही कट्टर काफ़िर था। उस के ख़ौफ़ से येह इस्लाम क़बूल नहीं कर सकते थे। लेकिन फतहे मक्का के बाद जब लोग फ़ौज दर फ़ौज इस्लाम में दाखिल होने लगे तो इन्हों ने अपने चचा को तरगीब दी कि तुम भी दामने इस्लाम में आ जाओ क्यूं कि मैं क़बूले इस्लाम के लिये बहुत ही बे क़रार हूं। येह सुन कर इन के चचा ने इन को बरहना कर के घर से निकाल दिया। इन्हों ने अपनी वालिदा से एक कम्बल मांग कर उस को दो टुकड़े कर के आधे को तहबन्द और आधे को चादर बना लिया और इसी लिबास में हिजरत कर के मदीने पहुंच गए। रात भर मस्जिदे नबवी में ठहरे रहे। नमाज़े फज्र के वक्त जब जमाले मुहम्मदी के अन्वार से इन की आंखें मुनव्वर हुई तो कलिमा पढ़ कर मुशर्रफ़ ब इस्लाम हो गए। हुजूर ﷺ ने इन का नाम दरयाफ्त फ़रमाया तो इन्हों ने अपना नाम अब्दुल उज्ज़ा बता दिया। आप ﷺ ने फ़रमाया कि आज से तुम्हारा नाम अब्दुल्लाह और लकब जुल बिजादैन (दो कम्बलों वाला) है। हुज़ूर ﷺ इन पर बहुत करम फ़रमाते थे और येह मस्जिदे नबवी में असहाबे सुफ्फ़ा की जमाअत के साथ रहने लगे और निहायत बुलन्द आवाज़ से जौको शौक के साथ कुरआने मजीद पढ़ा करते थे। जब हुजूर ﷺ जंगे तबूक के लिये रवाना हुए तो भी मुजाहिदीन में शामिल हो कर चल पड़े और बड़े ही जौको शौक आर इनतिहाई इश्तियाक़ के साथ दरख्वास्त की, कि या रसूलल्लाह ﷺ दुआ फ़रमाइये कि मुझे खुदा की राह में शहादत नसीब हो जाए। आप ने फ़रमाया कि तुम किसी दरख़्त की छाल लाओ। वोह थोड़ी सी बबूल की छाल लाए। आप ﷺ ने उन के बाज़ू पर वोह छाल बांध दी और दुआ की, कि ऐ अल्लाह ! मैं ने इस के खून को कुफ्फ़ार पर हराम कर दिया। इन्हों ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ मेरा मक्सद तो शहादत ही है। इर्शाद फ़रमाया कि जब तुम जिहाद के लिये निकले हो तो अगर बुखार में भी मरोगे जब भी तुम शहीद ही होगे। खुदा की शान कि जब हज़रते जुल बिजादैन तबूक में पहुंचे तो बुखार में मुब्तला हो गए और उसी बुखार में इन की वफ़ात हो गई। 
     
࿐   हज़रते बिलाल बिन हारिष मुज़नी का बयान है कि इन के दफ्न का अजीब मन्ज़र था कि हज़रते बिलाल मुअज्ज़िन हाथ में चराग़ लिये इन की क़ब्र के पास खड़े थे और खुद ब नफ्से नफ़ीस हुज़ूरे अकरम ﷺ इन की क़ब्र में उतरे और हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ व हज़रते उमर फारूक को हुक्म दिया कि तुम दोनों अपने इस्लामी भाई की लाश को उठाओ। फिर आप ﷺ उन को अपने दस्ते मुबारक से लहद में सुलाया और खुद ही क़ब्र को कच्ची ईंटों से बन्द फ़रमाया और फिर येह दुआ मांगी कि या अल्लाह ! मैं जुल बिजादैन से राज़ी हूं तू भी इस से राज़ी हो जा।
     
࿐   हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद ने हज़रते जुल बीजादैन के दफ्न का मन्ज़र देखा तो बे इख़्तियार उन के मुंह से निकला कि काश ! जुल बिजादैन की जगह येह मेरी मय्यित होती।

*मस्जिदे ज़रार* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 500 📚*

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          *❝  गज़्वए तबूक #09  ❞*  
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࿐   *मस्जिदे ज़रार :-* मुनाफ़िक़ों ने इस्लाम की बेख कुनी और मुसलमानों में फूट डालने के लिये मस्जिदे कुबा के मुकाबले में एक मस्जिद ता'मीर की थी जो दर हक़ीक़त मुनाफ़िक़ीन की साज़िशों और इन की दसीसा कारियों का एक ज़बर दस्त अड्डा था। अबू आमिर राहिब जो अन्सार में से ईसाई हो गया था जिस् का नाम हुजूर ﷺ ने अबू आमिर फ़ासिक़ रखा था उस ने मुनाफ़िक़ीन से कहा कि तुम लोग खुफ़या तरीक़े पर जंग की तय्यारियां करते रहो। मैं कैसरे रूम के पास जा कर वहां से फ़ौजें लाता हूं ताकि इस मुल्क से इस्लाम का नामो निशान मिटा दूं। चुनान्चे इसी मस्जिद में बैठ बैठ कर इस्लाम के ख़िलाफ़ मुनाफ़िक़ीन कमेटियां करते थे और इस्लाम व बानिये इस्लाम का ख़ातिमा कर देने की तदबीरें सोचा करते थे। 
     
जब हुजूर ﷺ जंगे तबूक के लिये रवाना होने लगे तो मक्कार मुनाफ़िकों का एक गुरौह आया और महज़ मुसलमानों को धोका देने के लिये बारगाहे अक्दस में येह दरख्वास्त पेश की, कि या रसूलल्लाह ﷺ हम ने बीमारों और माजूरों के लिये एक मस्जिद बनाई है। आप चल कर एक मरतबा इस मस्जिद में नमाज़ पढा दें ताकि हमारी येह मस्जिद खुदा की बारगाह में मक़बूल हो जाए। आप ﷺ ने जवाब दिया कि इस वक्त तो मैं जिहाद के लिये घर से निकल चुका हूं लिहाजा इस वक्त तो मुझे इतना मौक़अ नहीं है। मुनाफ़िक़ीन ने काफ़ी इसरार किया मगर आप ﷺ ने उन की इस मस्जिद में कदम नहीं रखा। जब आप ﷺ जंगे तबूक से वापस तशरीफ़ लाए तो मुनाफ़िक़ीन की चाल बाजियों और इन की मक्कारियों दगा बाजियों के बारे में "सुरए तौबह" की बहुत सी आयात नाज़िल हो गई और मुनाफ़िक़ीन के निफ़ाक़ और इन की इस्लाम दुश्मनी के तमाम रुमूज़ व असरार बे निकाब हो कर नज़रों के सामने आ गए। और उन की इस मस्जिद के बारे में खुसूसिय्यत के साथ येह आयतें नाज़िल हुई कि और वोह लोग जिन्हों ने एक मस्जिद ज़रर पहुंचाने और कुफ्र करने और मुसलमानों में फूट डालने की ग़रज़ से बनाई और इस मक्सद से कि जो लोग पहले ही से खुदा और उस के रसूल से जंग कर रहे हैं उन के लिये एक कमीन गाह हाथ आ जाए और वोह ज़रूर क़समें खाएंगे कि हम ने तो भलाई ही का इरादा किया है और खुदा गवाही देता है कि बेशक येह लोग झूटे हैं आप कभी भी इस मस्जिद में न खड़े हो वोह मस्जिद (मस्जिदे कुबा) जिस की बुन्याद पहले ही दिन से परहेज़ गारी पर रखी हुई है वोह इस बात की जियादा हक़दार है कि आप इस में खड़े हों इस में ऐसे लोग हैं जो पाकी को पसन्द करते हैं और खुदा पाकी रखने वालों को दोस्त रखता है।
     
इस आयत के नाज़िल हो जाने के बाद हुजूरे अक्दस ﷺ ने हज़रते मालिक बिन दख़शम व हज़रते मअन बिन अदी को हुक्म दिया कि उस मस्जिद को मुन्हदिम कर के उस में आग लगा दें।

*सिद्दीके अक्बर अमीरुल हज* की तफ्सील

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          *❝  गज़्वए तबूक #09  ❞*  
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࿐    *सिद्दीके अक्बर رضي الله عنه अमीरुल हज* गज्वए तबूक से वापसी के बाद हुजूर ﷺ ने जुल कादह सि. 9 हि. में तीन सो मुसलमानों का एक काफ़िला मदीनए मुनव्वरह से हज के लिये मक्कए मुकर्रमा भेजा और हज़रते अबू बक्र सिद्दीक को “अमीरुल हज" और हज़रते अली मुर्तजाको "नक़ीबे इस्लाम" और हज़रते साद बिन अबी वक़्क़ास व हज़रते जाबिर बिन अब्दुल्लाह व हज़रते अबू हुरैरा को मुअल्लिम बना दिया और अपनी तरफ़ से कुरबानी के लिये बीस ऊंट भी भेजे। 
     
हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ ने हरमे काबा और अरफ़ात व मिना में खुत्बा पढ़ा इस के बाद हज़रते अली खड़े हुए और "सूरए बराअत" की चालीस आयतें पढ़ कर सुनाई और ए'लान कर दिया कि अब कोई मुशरिक खानए काबा में दाखिल न हो सकेगा न कोई बरहना बदन और नंगा हो कर तवाफ़ कर सकेगा और चार महीने के बा'द कुफ़्फ़ार व मुशरिकीन के लिये अमान ख़त्म कर दी जाएगी। 
     
हज़रते अबू हुरैरा और दूसरे सहाबए किराम जोग ने इस ए'लान की इस क़दर ज़ोर ज़ोर से मुनादी की, कि इन लोगों का गला बैठ गया। इस ए'लान के बाद कुफ्फ़ार व मुशरिकीन फ़ौज की फ़ौज आ कर मुसलमान होने लगे। 

*सि. 9 हि. के वाकिआते मुतफ़र्रिका* की तफ्सील

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 318* ༺❘


          *❝  गज़्वए तबूक #09  ❞*  
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࿐   *सि. 9 हि. के वाकिआते मुतफ़र्रिका* इस साल पूरे मुल्क में हर तरफ़ अम्नो अमान की फ़ज़ा पैदा हो गई और ज़कात का हुक्म नाज़िल हुवा और ज़कात की वसूली के लिये आमिलीन और मुहस्सिलों का तक़र्रुर हुवा। 
     
࿐   जो गैर मुस्लिम कौमें इस्लामी सल्तनत के ज़ेरे साया रहीं उन के लिये जिज़या का हुक्म नाज़िल हुवा और क़ुरआन की ये आयत उतरी की _वोह छोटे बन कर "जिज़या" अदा करें_ (पा.10)
     
࿐   सूद की हुरमत नाज़िल हुई और इस के एक साल बाद सि. 10 हि. में “हिज्जतुल वदाअ” के मौक़अ पर अपने खुत्बों में हुजूर ﷺ ने इस का ख़ूब खूब एलान फ़रमाया। 
     
࿐   हबशा का बादशाह जिन का नाम हज़रते अस्हमा था। जिन के ज़ेरे साया मुसलमान मुहाजिरीन ने चन्द साल हबशा में पनाह ली थी उन की वफ़ात हो गई। हुजूर ﷺ ने मदीने में उनकी गाइबाना नमाज़े जनाज़ा पढ़ी और उन के लिये मगफिरत की दुआ मांगी। 
     
࿐   इसी साल मुनाफ़िकों का सरदार अब्दुल्लाह बिन उबय्य मर गया। इस के बेटे हज़रते अब्दुल्लाह رضي الله عنه की दरख्वास्त पर उन क दिलजूई के वासिते हुज़ूर ﷺ ने उस मुनाफ़िक के कफ़न के लिये अपना पैरहन अता फरमाया और उस की लाश अपने जानूए अक्दस पर रख कर उस के कफ़न में अपना लुआबे दहन डाला और हज़रते उमर के बार बार मन्अ करने के बा वुजूद चूंकि अभी तक मुमानअत नाज़िल नहीं हुई थी इस लिये हुजुर ﷺ ने उस के जनाज़े की नमाज़ पढ़ाई लेकिन इस के बाद ही येह आयत नाज़िल हो गई कि _(ऐ रसूल) इन (मुनाफ़िकों) में से जो मरें कभी आप उन पर नमाज़े जनाजा न पढ़िये और उन की क़ब्र के पास आप खड़े भी न हों यक़ीनन उन लोगों ने अल्लाह और उस के रसूल के साथ कुफ्र किया है और कुफ्र की हालत में येह लोग मरे हैं।
     
࿐   इस आयत के नुज़ूल के बाद फिर कभी आप ﷺ ने किसी मुनाफ़िक की नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ाई न उस की क़ब्र के पास खड़े हुए।

*वुफुदुल अरब* की तफ्सील अगली पोस्ट में..

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 505 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 319* ༺❘


          *❝  गज़्वए तबूक #09  ❞*  
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࿐  *वुफूदुल अरब* हुजूरे अक्दस ﷺ तब्लीगे इस्लाम के लिये तमाम अतराफ़ व अक्नाफ़ में मुबल्लिगीने इस्लाम और आमिलीन व मुजाहिदीन को भेजा करते थे। उन में से बा'ज़ क़बाइल तो मुबल्लिगीन के सामने ही दा'वते इस्लाम कुबूल कर के मुसलमान हो जाते थे मगर थे बा'ज़ क़बाइल इस बात के ख़्वाहिश मन्द होते थे कि बराहे रास्त खुद बारगाहे नुबुव्वत में हाज़िर हो कर अपने इस्लाम का एलान करें। चुनान्चे कुछ लोग अपने अपने क़बीलों के नुमाइन्दा बन कर मदीनए मुनव्वर आते थे और खुद बानिये इस्लाम की जबाने फ़ैज़ तर्जुमान से दा'वते इस्लाम का पैगाम सुन कर अपने इस्लाम का एलान करते थे और फिर अपने अपने क़बीलों में वापस जा कर पूरे क़बीले वालों को मुशर्रफ ब इस्लाम करते थे। इन्ही क़बाइल के नुमाइन्दों को हम "वुफूदुल अरब" के उन्वान से बयान करते हैं। 
     
इस किस्म के वुफूद और नुमाइन्दगान कबाइल मुख़्तलिफ़ ज़मानों में मदीनए मुनव्वरह आते रहे मगर फ़त्ह मक्का के बा'द ना गहां सारे अरब के ख़यालात में एक अज़ीम तगय्युर वाकेअ हो गया और सब लोग इस्लाम की तरफ़ माइल होने लगे क्यूं कि इस्लाम की हक्कानिय्यत वाजेह और ज़ाहिर हो जाने के बा वुजूद बहुत से क़बाइल महज़ कुरैश के दबाव से और अहले मक्का के डर से इस्लाम क़बूल नहीं कर सकते थे। फ़त्ह मक्का ने इस रुकावट को भी दूर कर दिया और अब दावते इस्लाम और कुरआन के मुक़द्दस पैग़ाम ने घर घर पहुंच कर अपनी हक्कानिय्यत और ए'जाज़ी तसर्रुफात से सब के कुलूब पर सिक्का बिठा दिया। जिस का नतीजा येह हुवा कि वोही लोग जो एक लम्हे के लिये इस्लाम का नाम सुनना और मुसलमानों की सूरत देखना गवारा नहीं कर सकते थे आज परवानों की तरह शमए नुबुव्वत पर निषार होने लगे और जूक दर जूक बल्कि फ़ौज दर फ़ौज हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत में दूर दराज़ के सफर तै करते हुए वुफूद की शक्ल में आने लगे और ब रिजा व रग्बत इस्लाम के हल्का बगोश बनने लगे चूंकि इस किस्म के वुफूद अकषरो बेशतर फ़तहे मक्का के बा'द सि. 9 हि. में मदीनए मुनव्वरह आए इस लिये सि. 9 हि. को लोग “स-नतिल वुफूद" (नुमाइन्दा का साल) कहने लगे। 
     
इस किस्म के वुफूद की तादाद में मुसन्निफ़ीने सीरत का बहुत ज़ियादा इख़्तिलाफ़ है। हज़रते शैख अब्दुल हक़ मुहूद्दिष देहलवी ने इन वुफ़ूद की तादाद साठ से ज़ियादा बताई है।
     
और अल्लामा कस्तलानी व हाफ़िज़ इब्ने कय्यिम ने इस क़िस्म के चौदह वफ़दों का तज़किरा किया है हम भी अपनी इस मुख़्तसर किताब में चन्द वुफूद का तकिरा करते हैं। 

*इस्तिक्बाले वुफूद* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 506 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 320* ༺❘


          *❝  गज़्वए तबूक #09  ❞*  
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࿐  *इस्तिक्बाले वुफूद* हुजूर सय्यिदे आलम ﷺ क़बाइल से आने वाले वफ़दों के इस्तिक्बाल, और उन की मुलाकात का ख़ास तौर पर एहतिमाम फ़रमाते थे। चुनान्वे हर वफ़द के आने पर आप ﷺ निहायत ही उम्दा पोशाक जैबे तन फ़रमा कर काशानए अकदस से निकलते और अपने खुसूसी असहाब को भी हुक्म देते थे कि बेहतरीन लिबास पहन कर आएं फिर उन मेहमानों को अच्छे से अच्छे मकानों में ठहराते और उन लोगों की मेहमान नवाज़ी और खातिर मदारात का खास तौर पर ख़याल फ़रमाते थे और उन मेहमानों से मुलाकात के लिये मस्जिदे न-बवी में एक सुतून से टेक लगा कर निशस्त फ़रमाते फिर हर एक वफ्द से निहायत ही खुशरूई और खन्दा पेशानी के साथ गुफ़्तगू फ़रमाते और उन की हाजतों और हालतों को पूरी तवज्जोह के साथ सुनते और फिर उन को ज़रूरी अकाइद व अहकामे इस्लाम की ता'लीम व तल्कीन भी फ़रमाते और हर वफ़द को उन के दरजात व मरातिब के लिहाज से कुछ न कुछ नकद या सामान भी तहाइफ़ और इन्आमात के तौर पर अता फरमाते। 

*वफ्दे षकीफ* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 321* ༺❘


          *❝  गज़्वए तबूक #09  ❞*  
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࿐  *वफ्दे षकीफ* जब हुजूर ﷺ जंगे हुनैन के बाद ताइफ़ से वापस तशरीफ़ लाए और "जिइराना" से उमरह अदा करने के बा'द मदीने तशरीफ़ ले जा रहे थे तो रास्ते ही में क़बीलए षक़ीफ़ के सरदारे आज़म "उर्वह बिन मसऊद ष-कफी" बारगाहे रिसालत में हाज़िर हो कर ब रिज़ा व रगबत दामने इस्लाम में आ गए। येह बहुत ही शानदार और बा वफ़ा आदमी थे और इन का कुछ तज़करा सुल्हे हुदैबिया के मौक़अ पर हम तहरीर कर चुके हैं। इन्हों ने मुसलमान होने के बाद अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ आप मुझे इजाज़त अता फरमाएं कि मैं अब अपनी क़ौम में जा कर इस्लाम की तब्लीग करूं। आपने इजाजत दे दी और येह वहीं से लौट कर अपने क़बीले में गए और अपने मकान की छत पर चढ़ कर अपने मुसलमान होने का एलान किया और अपने क़बीले वालों को इस्लाम की दावत दी। इस अलानिया दावते इस्लाम सुन कर क़बीलए षक़ीफ़ लोग गैज़ो ग़ज़ब में भर कर इस क़दर तैश में आ गए कि चारों तरफ से उन पर तीरों की बारिश करने लगे यहां तक कि इन को एक तीर लगा और येह शहीद हो गए। क़बीलए षक़ीफ़ के लोगों ने इन को क़त्ल तो कर दिया लेकिन फिर येह सोचा कि तमाम क़बाइले अरब इस्लाम क़बूल कर चुके हैं। अब हम भला इस्लाम के ख़िलाफ़ कब तक और कितने लोगों से लड़ते रहेंगे ? फिर मुसलमानों के इन्तिक़ाम और एक लम्बी जंग के अन्जाम को सोच कर दिन में तारे नज़र आने लगे। इस लिये इन लोगों ने अपने एक मुअज्ज़ज् रईस अब्दे यालील बिन अम्र को चन्द मुमताज़ सरदारों के साथ मदीनए मुनव्वरह भेजा। इस वफ़द ने मदीने पहुंच कर बारगाहे अक्दस में अर्ज किया कि हम इस शर्त पर इस्लाम क़बूल करते हैं कि तीन साल तक हमारे बुत “लात" को तोड़ा न जाए। आप ﷺ ने इस शर्त को क़बूल फ़रमाने से साफ़ इन्कार फ़रमा दिया और इर्शाद फ़रमाया कि इस्लाम किसी हाल में भी बुत परस्ती को एक लम्हे के लिये भी बरदाश्त नहीं कर सकता। लिहाजा बुत तो ज़रूर तोड़ा जाएगा येह और बात है कि तुम लोग उस को अपने हाथ से न तोड़ो बल्कि मैं हज़रते अबू सुफ्यान और हज़रते मुग़ीरा बिन शअबा को भेज दूंगा वोह उस बुत को तोड़ डालेंगे। चुनान्चे येह लोग मुसलमान हो गए और हज़रते अबू सुफ्यान और हज़रते मुग़ीरा बिन शअबा को ताइफ़ भेजा और इन दोनों हज़रात ने उन के बुत "लात" को तोड़ फोड़ कर रेज़ा रेज़ा कर डाला।

*वफ्दे कन्दा* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 322* ༺❘


                  *❝  वफ्दे कन्दा  ❞*  
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࿐   येह लोग यमन के अतराफ़ में रहते थे। इस क़बीले के सत्तर या अस्सी सुवार बड़े ठाठ बाट के साथ मदीने आए। खूब बालों में कंघी किये हुए और रेशमी गोंट के जुब्बे पहने हुए, हथियारों से सजे हुए मदीने की आबादी में दाखिल हुए। जब येह लोग दरबारे रिसालत में बारयाब हुए तो आप ﷺ ने उन लोगों से दरयाफ्त फ़रमाया कि क्या तुम लोगों ने इस्लाम क़बूल कर लिया है ? सब ने अर्ज़ किया कि "जी हां" आप ने फ़रमाया कि फिर तुम लोगों ने येह रेशमी लिबास क्यूं पहन रखा है ? येह सुनते ही उन लोगों ने अपने जुब्बों को बदन से उतार दिया और रेशमी गोंटों को फाड़ फाड़ कर जुब्बों से अलग कर दिया। 

*वफ्दे बनी अश्अर* येह लोग यमन के बाशिन्दे और "क़बीलए अश्अर" के मुअज्ज़ज़ और नामवर हज़रात थे। जब येह लोग मदीने में दाखिल होने लगे तो जोशे महब्बत और फ़र्ते अकीदत से रज्ज़ का येह शे'र आवाज़ मिला कर पढ़ते हुए शहर में दाखिल हुए की
*कल हम लोग अपने महबूबो से यानी हज़रत मुहम्मद ﷺ और आप के सहाबा से मुलाकात करेंगे।*
     
हज़रते अबू हुरैरा का बयान है कि मैं ने रसूले खुदा ﷺ को येह इर्शाद फ़रमाते हुए सुना कि यमन वाले आ गए। ये लोग बहुत ही नर्म दिल हैं ईमान तो यमनियों का ईमान है और हिक्मत भी यमनियों में है। बकरी पालने वालों में सुकून व वकार है और ऊंट पालने वालों में फख्र और घमन्ड है। चुनान्चे इस इर्शादे नबवी की बरकत से अहले यमन ईल्म व सफ़ाइये कल्ब और हिक्मत व मारिफ्ते इलाही की दौलतों से हमेशा मालामाल रहे। खास कर हज़रते अबू मूसा अशअरी कि येह निहायत ही खुश आवाज़ थे और कुरआन शरीफ़ ऐसी खुश इल्हानी के साथ पढ़ते थे कि सहाबए किराम में इन का कोई हम मिषल न था। इल्मे अक़ाइद में अहले सुन्नत के इमाम शेख अबुल हसन अशअरी इन्ही हज़रते अबू मूसा अशअरी की औलाद में से है।

*वफ्दे बनी असद* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 323* ༺❘


                  *❝ वफ्दे बनी असद ❞*  
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࿐   इस क़बीले के चन्द अश्खास बारगाहे अक्दस में हाज़िर हुए और निहायत ही खुश दिली के साथ मुसलमान हुए। लेकिन फिर एहसान जताने के तौर पर कहने लगे कि या रसूलल्लाह ﷺ इतने सख़्त कहत के ज़माने में हम लोग बहुत ही दूर दराज से मसाफ़त तै कर के यहां आए हैं। रास्ते में हम लोगों को कहीं शिकम सैर हो कर खाना भी नसीब नहीं हुवा और बिगैर इस के कि आप का लश्कर हम पर हम्ला आवर हुवा हो हम लोगों ने ब रिज़ा व रग्बत इस्लाम कबूल कर लिया है। इन लोगों के इस एहसान जताने पर खुदा वन्दे कुद्दूस यह आयत नाज़िल फ़रमाई कि ऐ महबूब ! येह तुम पर एहसान जताते हैं कि हम मुसलमान हो गए। आप फ़रमा दीजिये कि अपने इस्लाम का एहसान मुझ पर न रखो बल्कि अल्लाह तुम पर एहसान रखता है कि उसने तुम्हें इस्लाम की हिदायत की अगर तुम सच्चे हो।

*वफ्दे फ़ज़ारा* येह लोग उयैना बिन हसन फ़ज़ारी की क़ौम के लोग थे। बीस आदमी दरबारे अक्दस में हाज़िर हुए और अपने इस्लाम का एलान किया और बताया कि या रसूलल्लाह ﷺ हमारे दियार में इतना सख़्त कहत और काल पड़ गया है कि अब फ़क्रो फाका की मुसीबत हमारे लिये ना क़ाबिले बरदाश्त हो चुकी है। लिहाजा आप बारिश के लिये दुआ फ़रमाइये। हुजूर ﷺ ने जुमुआ दिन मिम्बर पर दुआ फ़रमा दी और फ़ौरन ही बारिश होने लगी और लगातार एक हफ्ते तक मसला धार बारिश का सिल्सिला जारी रहा फिर दूसरे जुमुआ को जब कि आप मिम्बर पर खुत्बा पढ़ रहे थे एक आ'राबी ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ चौपाए हलाक होने लगे और बाल बच्चे भूक से बिलकने लगे और तमाम रास्ते मुन्कतेअ हो गए लिहाजा दुआ फ़रमा दीजिये कि येह बारिश पहाड़ों पर बरसे और खेतों बस्तियों पर न बरसे। चुनान्चे आप ने दुआ फ़रमा दी तो बादल शहरे मदीना और इस के अतराफ़ से कट गया और आठ दिन के बाद मदीने में सूरज नज़र आया। 

*वफ्दे बनी मुर्रह* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

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                  *❝ वफ्दे बनी मुर्रह ❞*  
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࿐   इस वफ़द में बनी मुर्रह के तेरह आदमी मदीने आए थे। इन का सरदार हारिष बिन औफ़ भी इस वफ़द में शामिल था। इन सब लोगों ने बारगाहे अकदस में इस्लाम क़बूल किया और कहत की शिकायत और बा रहमत की दुआ के लिये दरख्वास्त पेश की। हुजूर ﷺ ने इन लफ्ज़ों के साथ दुआ मांगी कि (ऐ अल्लाह ! इन लोगों को बारिश से सैराब फ़रमा दे) फिर आप ﷺ ने हज़रते बिलाल को हुक्म दिया कि इन में से हर शख़्स को दस दस ऊक़िया चांदी और चार चार सो दिरहम इन्आम तोहफ़े के तौर पर अता करें। और आप ﷺ ने उन के सरदार हज़रते हारिष बिन औफ को बारह ऊकिया चांदी का शाहाना अतिय्या मर्हमत फ़रमाया। 
     
࿐   जब येह लोग मदीने से अपने वतन पहुंचे तो पता चला कि ठीक उसी वक्त उन के शहरों में बारिश हुई थी जिस वक्त सरकारे दो आलम ﷺ ने उन लोगों की दरख्वास्त पर मदीने में बारिश के लिये दुआ मांगी थी। 

࿐   *वफ्दे बनी अल बुकाअ* इस वफ़द के साथ हज़रते मुआविया बिन षौर बिन उबाद भी आए थे जो एक सो बरस की उम्र के बूढ़े थे। इन सब हजरात ने बारगाहे अक्दस में हाज़िर हो कर अपने इस्लाम का एलान किया फिर हज़रते मुआविया बिन षौर बिन उबाद ने अपने फरज़न्द हज़रते बशीर को पेश किया और येह गुज़ारिश की, कि यारसूलल्लाह ﷺ आप मेरे इस बच्चे के सर पर अपना दस्ते मुबारक फिरा दें। उन की दरख्वास्त पर हुजूरे अकरम ﷺ ने उन के फ़रज़न्द के सर पर अपना मुक़द्दस हाथ फिरा दिया। और उन को चन्द बकरियां भी अता फ़रमाई। और वफ़द वालों के लिये खैरो बरकत की दुआ फ़रमा दी इस दुआए नबवी का येह असर हुवा कि उन लोगों के दियार में जब भी कहत और फ़क्रो फाका की बला आई तो उस क़ौम के घर हमेशा कहत और भुक मरी की मुसीबतों से महफूज़ रहे। 

*वफ्दे बनी किनाना* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 325* ༺❘


                  *❝ वफ्दे बनी किनाना ❞*  
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࿐   इस वफ़द के अमीरे कारवां हज़रते वाषिला बिन अस्कअ थे। येह सब लोग दरबारे रसूल में निहायत ही अकीदत मन्दी के साथ हाज़िर हो कर मुसलमान हो गए और हज़रते वाषिला बिन अस्कअ बैअते इस्लाम कर के जब अपने वतन में पहुंचे तो उन के बाप ने इन से नाराज़ व बेज़ार हो कर कह दिया कि मैं खुदा की क़सम ! तुझ से कभी कोई बात न करूंगा। लेकिन इन की बहन ने सिद्के दिल से इस्लाम क़बूल कर लिया। येह अपने बाप की हरकत से रन्जीदा और दिल शिकस्ता हो कर फिर मदीनए मुनव्वरह चले आए और जंगे तबूक में शरीक हुए और फिर असहाबे सुफ्फ़ा की जमाअत में शामिल हो कर हुजुरे अकरम ﷺ की खिदमत करने लगे। हुजूर ﷺ के बाद येह बसरा चले गए । फिर आखिर उम्र में शाम गए और सि. 85 हि. में शहर दिमश्क के अन्दर वफ़ात पाई।

࿐   *वफ्दे बनी हिलाल* इस वफ़द के लोगों ने भी दरबारे नुबुव्वत में हाज़िर हो कर इस्लाम क़बूल कर लिया। इस वफ़द में हज़रते ज़ियाद बिन अब्दुल्लाह भी थे येह मुसलमान हो कर दन्दनाते हुए हज़रते उम्मुल मुअमिनीन बीबी मैमूना رضي الله عنها के घर में दाखिल हो गए क्यूं कि वोह इन की ख़ाला थीं। 
     
࿐   येह इत्मीनान के साथ अपनी खाला के पास बैठे हुए गुफ्तगू में मसरूफ़ थे जब रसूले खुदा ﷺ मकान में तशरीफ़ लाए और येह पता चला कि हज़रते जियाद उम्मुल मुअमिनीन के भान्जे हैं तो आप ﷺ ने अज़ राहे शक्कत उन के सर और चेहरे पर अपना नूरानी हाथ फैर दिया। इस दस्ते मुबारक की नूरानिय्यत से हज़रते ज़ियाद का चेहरा इस क़दर पुरनूर हो गया कि क़बीलए बनी हिलाल के लोगों का बयान है कि इस के बाद हम लोग हज़रते ज़ियाद बिन अब्दुल्लाह के चेहरे पर हमेशा एक नूर और बरकत का अषर देखते रहे। 

*वफ्दे ज़माम* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 326* ༺❘


        *❝ वफ्दे ज़माम बिन षालबा ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐  येह क़बीलए सा'द बिन बक्र के नुमाइन्दा बन कर बारगाहे रिसालत में आए। येह बहुत ही खूब सूरत सुर्ख व सफेद रंग के गेसू दराज़ आदमी थे। मस्जिदे नबवी में पहुंच कर अपने ऊंट को बिठा कर बांध दिया फिर लोगों से पूछा कि मुहम्मद कौन हैं ? लोगों ने दूर से इशारा कर के बताया कि वोह गोरे रंग के खूबसूरत आदमी जो तकिया लगा कर बैठे हुए हैं वोही हज़रत मुहम्मद ﷺ हैं। हज़रते ज़माम बिन षा’लबा सामने आए और कहा कि ऐ अब्दुल मुत्तलिब के फ़रज़न्द ! मैं आप से चन्द चीजों के बारे में सुवाल करूंगा और मैं अपने सुवाल में बहुत ज्यादा मुबालगा और सख्ती बरतूंगा। आप इस से मुझ पर ख़फ़ा न हों। आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया कि तुम जो चाहों पूछ लो। फिर हस्बे जैल मुकालमा हुवा। 

࿐  जमाम बिन षालबा : मैं आप को उस खदा की कसम दे कर जो आप का और तमाम इन्सानों का परवर दगार है येह पूछता हूं कि क्या अल्लाह ने आप को हमारी तरफ़ अपना रसूल बना कर भेजा है ? 
नबी ﷺ : "हां" नबी ज़माम बिन षालबा : मैं आप को खुदा की कसम दे कर येह सुवाल करता हूं कि क्या नमाज़ व रोजा और हज व ज़कात को अल्लाह ने हम लोगों पर फ़र्ज़ किया है ?  नबी ﷺ : "हां" ज़माम बिन षालबा : आप ने जो कुछ फ़रमाया मैं उस पर ईमान लाया और मैं ज़माम बिन षा'लबा हूं। मेरी क़ौम ने मुझे इस लिये आप के पास भेजा है कि मैं आप के दीन को अच्छी तरह समझ कर अपनी क़ौम बनी सा'द बिन बक्र तक इस्लाम का पैग़ाम पहुंचा दूं। 
     
࿐  हज़रते ज़माम बिन षा'लबा मुसलमान हो कर अपने वतन में पहुंचे और सारी क़ौम को जम्अ कर के सब से पहले अपनी क़ौम के तमाम बुतों या'नी "लात व उज्ज़ा" और "मनात व हबल” को बुरा भला कहने लगे और खूब खूब इन बुतों की तौहीन करने लगे। इन की क़ौम ने जो अपने बुतों की तौहीन सुनी तो एक दम सब चौंक पड़े और कहने लगे कि ऐ षा'लबा के बेटे ! तू क्या कह रहा है ? ख़ामोश हो जा वरना हम को येह डर है कि हमारे येह देवता तुझ को बरस और कोढ़ और जुनून में मुब्तला कर देंगे। आप येह सुन कर तैश में आ गए और तड़प कर फ़रमाया कि ऐ बे अक्ल इन्सानो ! येह पथ्थर के बुत भला हम को क्या नफ्अ व नुक्सान पहुंचा सकते हैं ? सुनो ! अल्लाह तआला जो हर नफ्अ व नुक्सान का मालिक है उस ने अपना एक रसूल भेजा है और एक किताब नाज़िल फ़रमाई है ताकि तुम इन्सानों को इस गुमराही और जहालत से नजात अता फ़रमाए। मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई मा'बूद नहीं है और हज़रत मुहम्मद ﷺ अल्लाह के रसल हैं। मैं अल्लाह के उस की बारगाह में हाजिर हो कर इस्लाम का पैग़ाम तुम लोगों के पास लाया हूं, फिर उन्हों ने आमाले इस्लाम या'नी नमाज़ व रोज़ा और हज व ज़कात को उन लोगों के सामने पेश किया और इस्लाम की हक्कानिय्यत पर ऐसी पुरजोश और मुअशशीर तक़रीर फ़रमाई कि रात भर में क़बीले के तमाम मर्द व औरत मुसलमान हो गए और उन लोगों ने अपने बुतों को तोड़ फोड़ कर पाश पाश कर डाला और अपने क़बीले में एक मस्जिद बना ली और नमाज़ व रोज़ा और हज व ज़कात के पाबन्द हो कर सादिकुल ईमान मुसलमान बन गए। 

*वफ्दे बल्ली* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 517 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 327* ༺❘


                   *❝ वफ्दे बल्ली ❞*  
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࿐  येह लोग जब मदीनए मुनव्वरह पहुंचे तो हज़रते अबू रुवैफअ जो पहले ही से मुसलमान हो कर ख़िदमते अक़दस में मौजूद थे। उन्हों ने इस वफ़द का तआरुफ़ कराते हुए अर्ज़ किया कि रसूलल्लाह ﷺ येह लोग मेरी क़ौम के अफराद हैं। आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया कि मैं तुम को और तुम्हारी क़ौम को "खुश आमदीद" कहता हूं। फिर हज़रते अबू रुवैफअ ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह ﷺ येह सब लोग इस्लाम का इक्रार करते हैं और अपनी पूरी क़ौम के मुसलमान होने की ज़िम्मादारी लेते हैं। आप ने इर्शाद फ़रमाया कि अल्लाह तआला जिस के साथ भलाई का इरादा फ़रमाता है उस को इस्लाम की हिदायत देता है। 
      
इस वफ़द में एक बहुत ही बूढ़ा आदमी भी था। जिस का नाम "अबुज्जैफ़" था उस ने सुवाल किया कि या रसूलल्लाह ﷺ मैं एक ऐसा आदमी हूं कि मुझे मेहमानों की मेहमान नवाज़ी का बहुत ज्यादा शौक है तो क्या इस मेहमान नवाज़ी का मुझे कुछ षवाब भी मिलेगा ? आपने इर्शाद फ़रमाया कि मुसलमान होने के बाद जिस मेहमान की भी मेहमान नवाजी करोगे ख्वाह वो अमीर हो या गरीब तुम षवाब के हक़दार ठहरोगे। फिर उसने ये पूछा कि या रसूलल्लाह ﷺ मेहमान कितने दिनों तक मेहमान नवाज़ी का हकदार है ? आप ﷺ ने फरमाया की तीन दिन तक, इस के बाद वो जो खाएगा वो सदक़ा होगा।

*हिज़रत का दसवां साल* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 328* ༺❘

*❝ हिजरत का दसवां साल,हिज्जतुल वदाअ/01  ❞*  
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࿐  इस साल के तमाम वाकिआत में सब से जियादा शानदार और अहम तरीन वाक़िआ "हिज्जतुल वदाअ" है। येह आप ﷺ का आखिरी हज था और हिजरत के बाद येही आप का पहला हज था। जू कादह सि. 10 हि. में आप ﷺ ने हज के लिये रवानगी का एलान फ़रमाया। येह ख़बर बिजली की तरह सारे अरब में हर तरफ फैल गई और तमाम अरब शरफ़े हम-रिकाबी के लिये उमंड पड़ा। 
     
࿐  हुजूरे अक्दस ﷺ ने आखिर ज़ू कादह में जुमा'रात के दिन मदीने में गुस्ल फ़रमा कर तहबन्द और चादर ज़ैबे तन फ़रमाया और नमाज़े ज़ोहर मस्जिदे नबवी में अदा फ़रमा कर मदीनए मुनव्वरह से रवाना हुए और अपनी तमाम अज्वाजे मुतहहरात को भी साथ चलने का हुक्म दिया। मदीनए मुनव्वरह से छे मील दूर अहले मदीना की मीक़ात “जुल हलीफ़ा" पर पहुंच कर रात भर क़ियाम फ़रमाया फिर एहराम के लिये गुस्ल फ़रमाया और हज़रते बीबी आइशा ने अपने हाथ से जिस्मे अत्हर पर खुश्बू लगाई फिर आप ने दो रक्अत नमाज़ अदा फ़रमाई और अपनी ऊंटनी "कस्वा" पर सुवार हो कर एहराम बांधा और बुलन्द आवाज़ से "लब्बैक" पढ़ा और रवाना हो गए। 
     
࿐  हज़रते जाबिर का बयान है कि मैं ने नज़र उठा कर देखा तो आगे पीछे दाएं बाएं हुद्दे निगाह तक आदमियों का जंगल नज़र आता था। बैहक़ी की रिवायत है कि एक लाख चौदह हज़ार और दूसरी रिवायतों में है एक लाख चौबीस हज़ार मुसलमान हिज्जतुल वदाअ में आप के साथ थे।
     
࿐  चौथी जुल हिज्जा को आप ﷺ मक्कए मुकर्रमा में दाखिल हुए। आप के ख़ानदान बनी हाशिम के लड़कों ने तशरीफ़ आवरी की खबर सुनी तो खुशी से दौड़ पड़े और आप ने निहायत ही महब्बत व प्यार के साथ किसी को आगे किसी को पीछे अपनी ऊंटनी पर बिठा लिया। 
     
࿐  फज्र की नमाज़ आपने मकामे “जी तुवा” में अदा फ़रमाई और गुस्ल फ़रमाया फिर आप मक्कए मुकर्रमा में दाखिल हुए और चाश्त के वक्त यानी जब आफ्ताब बुलन्द हो चुका था तो आप मस्जिदे हराम में दाखिल हुए। जब का'बए मुअज्जमा पर निगाहे महरे नुबुव्वत पड़ी तो आप ने येह दुआ पढ़ी कि : ऐ अल्लाह ! तू सलामती देने वाला है और तेरी तरफ से सलामती है। ऐ रब ! हमें सलामती के साथ ज़िन्दा रख। ऐ अल्लाह ! इस घर की अजमत व शरफ़ और इज्जत व हैबत को ज़ियादा कर और जो इस घर का हज और उमरह करे तू उस की बुजुर्गी और शरफ़ व अज़मत को ज़ियादा कर।

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 329* ༺❘

*❝ हिजरत का दसवां साल,हिज्जतुल वदाअ/02  ❞*  
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࿐  जब हजरे अस्वद के सामने आप ﷺ तशरीफ़ ले गए तो हजरे अस्वद पर हाथ रख कर उस को बोसा दिया फिर ख़ानए काबा का तवाफ़ फ़रमाया। शुरूअ के तीन फेरों में आप ﷺ ने "रमल" किया और बाक़ी चार चक्करों में मामूली चाल से चले हर चक्कर में जब हजरे अस्वद के सामने पहुंचते तो अपनी छड़ी से हजरे अस्वद की तरफ़ इशारा कर के छड़ी को चूम लेते थे। हजरे स्वद का इस्तिलाम कभी आपने छड़ी के जरीए से किया कभी हाथ से छू कर हाथ को चूम लिया कभी लब मुबारक को हजरे अस्वद पर रख कर बोसा दिया और येह भी षाबित है कि कभी रुक्ने यमानी का भी आप ने इस्तिलाम किया। 
     
࿐  जब तवाफ से फारिग हुए तो मकामे इब्राहीम के पास तशरीफ लाए और वहां दो रक्अत नमाज़ अदा की। नमाज़ से फ़ारिग हो कर फिर हजरे अस्वद का इस्तिलाम फ़रमाया और सामने के दरवाज़े से सफ़ा की जानिब रवाना हुए। करीब पहुंचे तो इस आयत की तिलावत फ़रमाई कि _बेशक सफ़ा और मर्वह अल्लाह के दीन के निशानों में से हैं।_ 
     
࿐  फिर सफा और मर्वह की सअय फ़रमाई और चूंकि आप ﷺ के साथ कुरबानी के जानवर थे इस इस लिये उमरह अदा करने के बाद आप ने एहराम नहीं उतारा। 
     
࿐  आठवीं जुल हिज्जा जुमारात के दिन आप ﷺ मिना तशरीफ़ ले गए और पांच नमाजें, जोहर, अस्र, मगरिब, इशा, फज्र, मिना में अदा फ़रमा कर नवीं जुल हिज्जा के दिन आप अरफ़ात तशरीफ़ ले गए। 
     
࿐  ज़मानए जाहिलिय्यत में चूंकि कुरैश अपने को सारे अरब में अफ़ज़लो आ'ला शुमार करते थे इस लिये वोह अरफ़ात की बजाए "मुज्दलिफ़ा" में क़ियाम करते थे और दूसरे तमाम अरब "अरफ़ात" में ठहरते थे लेकिन इस्लामी मुसावात ने कुरैश के लिये इस तख़्सीस को गवारा नहीं किया और अल्लाह ने येह हुक्म दिया कि _(ऐ कुरैश) तुम भी वहीं (अरफ़ात) से पलट कर आओ जहां से सब लोग पलट कर आते हैं।_
     
࿐  हुजूर ﷺ ने अरफ़ात पहुंच कर एक कम्बल के खैमे में क़ियाम फ़रमाया। जब सूरज ढल गया तो आप ने अपनी ऊंटनी "कस्वा" पर सुवार हो कर खुत्बा पढ़ा।

ख़ुत्बे की तफसील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 519 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 330* ༺❘

*❝ हिजरत का दसवां साल,हिज्जतुल वदाअ/03  ❞*  
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࿐  हुजूर ﷺ ने अरफ़ात पहुंच कर एक कम्बल के खैमे में क़ियाम फ़रमाया। जब सूरज ढल गया तो आप ने अपनी ऊंटनी "कस्वा" पर सुवार हो कर खुत्बा पढ़ा। इस खुत्बे में आप ने बहुत से ज़रूरी अहकामे इस्लाम का एलान फ़रमाया और जमाना जाहिलियत की तमाम बराइयों और बेहुदा रस्सों को आप ने मिटाते हुए एलान फ़रमाया की सुन लो ! जाहिलिय्यत के तमाम दस्तूर मेरे दोनों क़दमों के नीचे पामाल है।
     
࿐  इसी तरह जमानए जाहिलिय्यत के खानदानी तफ़ाखुर और रंग व नस्ल की बर तरी और क़ौमिय्यत में नीच ऊंच वगैरा तसव्वुराते जाहिलिय्यत के बुतों को पाश पाश करते हुए और मुसावाते इस्लाम का अलम बुलन्द फ़रमाते हुए ताजदारे दो आलम ﷺ ने अपने इस तारीख़ी खुत्बे में इर्शाद फ़रमाया कि : ऐ लोगो ! बेशक तुम्हारा रब एक है और बेशक तुम्हारा बाप (आदम) एक है। सुन लो ! किसी अरबी को किसी अजमी पर और किसी अजमी को किसी अरबी पर, किसी सुर्ख को किसी काले पर और किसी काले को किसी सुर्ख पर कोई फजीलत नहीं मगर तक्वा के सबब से। 
     
࿐  इसी तरह तमाम दुन्या में अम्नो अमान काइम फ़रमाने के लिये अम्नो सलामती के शहनशाह ताजदारे दो आलम ﷺ ने येह खुदाई फ़रमान जारी फ़रमाया कि तुम्हारा खून और तुम्हारा माल तुम पर ता क़ियामत इसी तरह हराम है जिस तरह तुम्हारा येह दिन, तुम्हारा येह महीना, तुम्हारा येह शहर मोहतरम है। 
     
࿐  अपना खुत्बा ख़त्म फ़रमाते हुए आप ﷺ ने सामिईन से फ़रमाया कि तुम से खुदा के यहां मेरी निस्बत पूछा जाएगा तो तुम लोग क्या जवाब दोगे ?
     
࿐  तमाम सामिईन ने कहा कि हम लोग खुदा से कह देंगे कि आप ने खुदा का पैग़ाम पहुंचा दिया और रिसालत का हक़ अदा कर दिया। येह सुन कर आप ﷺ ने आस्मान की तरफ उंगली उठाई और तीन बार फ़रमाया की ऐ अल्लाह ! तू गवाह रहना 
     
࿐  ऐन इसी हालत में जब कि खुत्बे में आप ﷺ अपना फ़र्ज़े रिसालत अदा फ़रमा रहे थे येह आयत नाज़िल हुई कि _आज मैं ने तुम्हारे लिये तुम्हारे दीन को मुकम्मल कर दिया और अपनी नेमत तमाम कर दी और तुम्हारे लिये दीने इस्लाम को पसन्द कर लिया।_  

*शहनशाहे कौनैन का तख्ते शाही* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 519 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 331* ༺❘

*❝ हिजरत का दसवां साल,हिज्जतुल वदाअ/04  ❞*  
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࿐  *शहनशाहे कौनैन का तख्ते शाही* येह हैरत अंगेज़ व इब्रत खैज़ वाकिआ भी याद रखने के क़ाबिल है कि जिस वक्त शहनशाहे कौनैन, खुदा के नाइबे अकरम और ख़लीफ़ए आ'ज़म होने की हैषिय्यत से फ़रमाने रब्बानी का ए'लान फ़रमा रहे थे आप ﷺ का तख़्ते शहनशाही यानी ऊंटनी का कजावा और अरक़ गीर शायद दस रुपै से जियादा कीमत का न था न उस ऊंटनी पर कोई शानदार कजावा था न कोई हौदज न कोई महमिल न कोई चित्र न कोई ताज।
     
࿐  क्या तारीखे आलम में किसी और बादशाह ने भी ऐसी सादगी का नुमूना पेश किया है ? इस का जवाब येही और फ़क़त यही है कि “नहीं।” येह वोह ज़ाहिदाना शहनशाही है जो सिर्फ शहनशाहे दो आलम ﷺ की शहन्शाहिय्यत का तुर्रए इम्तियाज़ है !
     
࿐  खुत्बे के बाद आप ने जोहर व अस्र एक अज़ान और दो इक़ामतों से अदा फ़रमाई फिर "मौक़िफ़” में तशरीफ़ ले गए और जबले रहमत के नीचे गुरूबे आफ्ताब तक दुआओं में मसरूफ़ रहे। गुरूबे आफ्ताब के बाद अरफ़ात से एक लाख से ज़ाइद हुज्जाज के इज़दिहाम में “मुज़्दलिफ़ा" पहुंचे। यहां पहले मग़रिब फिर इशा एक अज़ान और दो इक़ामतों से अदा फ़रमाई। मुश्इरे हराम के पास रात भर उम्मत के लिये दुआएं मांगते रहे और सूरज निकलने से पहले मुज्दलिफ़ा से मिना के लिये रवाना हो गए और वादिये मुहस्सर के रास्ते से मिना में आप ﷺ "जमरह" के पास तशरीफ़ लाए और कंकरियां मारीं फिर आप ने ब आवाज़े बुलन्द फ़रमाया कि हज के मसाइल सीख लो ! मैं नहीं जानता कि शायद इस के बाद मैं दूसरा हज न करूंगा। 
     
࿐  मिना में भी आप ने एक तवील खुत्बा दिया जिस में अरफ़ात के खुत्बे की तरह बहुत से मसाइल व अहकाम का एलान फ़रमाया। फिर कुरबान गाह में तशरीफ़ ले गए। आप के साथ कुरबानी के एक सो ऊंट थे। कुछ को तो आप ने अपने दस्ते मुबारक से जब्ह फ़रमाया और बाकी हज़रते अली को सोंप दिया और गोश्त, पोस्त, झोल, नकील सब को खैरात कर देने का हुक्म दिया और फ़रमाया कि क़स्साब की मज़दूरी भी इस में से न अदा की जाए बल्कि अलग से दी जाए।

*मुए मुबारक* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 332* ༺❘

*❝ हिजरत का दसवां साल,हिज्जतुल वदाअ/05  ❞*  
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࿐  *मुए मुबारक* कुरबानी के बाद हज़रते मुअम्मर बिन अब्दुल्लाह से आपने सर के बाल उतरवाए और कुछ हिस्सा हज़रते अबू तल्हा अन्सारीको अता फ़रमाया और बाक़ी मूए मुबारक को मुसलमानों में तकसीम कर देने का हुक्म सादिर फ़रमाया।
     
࿐  इस के बाद आप ﷺ मक्का तशरीफ़ लाए और तवाफ़े जियारत फ़रमाया। 

࿐  *साकिये कौषर चाहे ज़मज़म पर* फिर चाहे ज़मज़म के पास तशरीफ़ लाए। खानदाने अब्दुल मुत्तलिब के लोग हाजियों को ज़मज़म पिला रहे थे। आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया कि मुझे येह ख़ौफ़ न होता कि मुझ को ऐसा करते देख कर दूसरे लोग भी तुम्हारे हाथ से डोल छीन कर खुद अपने हाथ से पानी भर कर पीने लगेंगे तो मैं खुद अपने हाथ से पानी भर कर पीता। 
     
࿐  हज़रते अब्बास ने ज़मज़म शरीफ़ पेश किया और आपने किब्ला रुख खड़े खड़े ज़मज़म शरीफ़ नोश फ़रमाया। फिर मिना वापस तशरीफ़ ले गए और बारह जुल हिज्जा तक मिना में मुक़ीम रहे और हर रोज़ सूरज ढलने के बाद जमरों को कंकरी मारते रहे। तेरह जुल हिज्जा मंगल के दिन आप ﷺ ने सूरज ढलने के बाद मिना से रवाना हो कर "मुहस्सब" में रात भर कियाम फ़रमाया और सुबह को नमाज़े फज्र काबे की मस्जिद में अदा फ़रमाई और तवाफ़े वदाअ कर के अन्सार व मुहाजिरीन के साथ मदीनए मुनव्वरह के लिये रवाना हो गए। 

࿐  *गदीर खम का खुत्बा* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

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🌴 •┄┅┅┅┅┅❂ ❀ ﷽ ❀ ❂┅┅┅┅┅┈•🌴

اَلصَّلوٰةُ وَالسَّلَامُ عَلَیۡكَ يَـــــــــــــــــــــــــــارَسُوۡلَ اللّٰهِ ﷺ

*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 333* ༺❘

*❝ हिजरत का दसवां साल,हिज्जतुल वदाअ/06  ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐  *गदीर खम का खुत्बा* रास्ते में मक़ामे "ग़दीर खम" पर जो एक तालाब है यहां तमाम हमराहियों को जम्अ फ़रमा कर एक मुख़्तसर खुत्बा इर्शाद फ़रमाया जिस का तर्जमा येह है : हम्दो षना के बा'द : ऐ लोगो ! मैं भी एक आदमी हूं। मुमकिन है कि खुदा का फिरिश्ता (मलकुल मौत) जल्द आ जाए और मुझे उस का पैग़ाम क़बूल करना पड़े मैं तुम्हारे दरमियान दो भारी चीजें छोड़ता हूं। एक खुदा की किताब जिस में हिदायत और रोशनी है और दूसरी चीज़ मेरे अहले बैत हैं। मैं अपने अहले बैत के बारे में तुम्हें खुदा की याद दिलाता हूं। 
    
࿐  इस खुत्बे में आपने येह भी इर्शाद फ़रमाया कि जिस का मैं मौला हूं अली भी उस के मौला। खुदा वन्दा ! जो अली से महब्बत रखे उस से तू भी महब्बत रख और जो अली से अदावत रखे उस से तू भी अदावत रख।
     
࿐  ग़दीर ख़म के खुत्बे में हज़रते अली व मनाक़िब बयान करने की क्या जरूरत थी इस की कोई तसरीह कही हृदीषों में नहीं मिलती। हां, अलबत्ता बुखारी की एक रिवायत से पता चलता है कि हज़रते अली ने अपने इख़्तियार से कोई ऐसा काम कर डाला था जिस को उन के यमन से आने वाले हमराहियों ने पसन्द नहीं किया यहां तक कि उन में से एक ने बारगाहे रिसालत में इस की शिकायत भी कर दी जिस का हुज़ूर ﷺ ने येह जवाब दिया कि अली को इस से ज़ियादा हक है। मुमकिन है इसी क़िस्म के शुबुहात व शुकूक को मुसलमान यमनियों के दिलों से दूर करने के लिये इस मौक़अ पर हुज़ूर ﷺ ने हज़रते अली और अहले बैत के फ़ज़ाइल भी बयान कर दिये हों। 

*हिजरत का 11वा साल* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 334* ༺❘

*❝ हिजरत का 11वा साल,जैशे उसामा ❞*  
 ••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐   इस लश्कर का दूसरा नाम "सरिय्यए उसामा" भी है। येह सब से आखिरी फ़ौज है जिस के रवाना करने का रसूलुल्लाह ﷺ ने हुक्म दिया। 26 सफर सि. 11 हि. दो शम्बा के दिन हुजूरे अक्दस ﷺ ने रूमियों से जंग की तय्यारी का हुक्म दिया और दूसरे दिन हज़रते उसामा बिन जैद को बुला कर फ़रमाया कि मैं ने तुम को इस फ़ौज का अमीरे लश्कर मुक़र्रर किया तुम अपने बाप की शहादत गाह मक़ामे "उबना" में जाओ और निहायत तेजी के साथ सफ़र कर के उन कुफ्फ़ार पर अचानक हम्ला कर दो ताकि वोह लोग जंग की तय्यारी न कर सकें। बा वुजूदे कि मिज़ाजे अक्दस नासाज थाम इसी हालत में आपने खुद अपने दस्ते मुबारक से झन्डा बांधा और येह निशाने इस्लाम हज़रते उसामा के हाथ में दे कर इर्शाद फ़रमाया : "अल्लाह के नाम से और अल्लाह की राह में जिहाद करो और काफ़िरों के साथ जंग करो।"
     
࿐  हजरते उसामा ने हज़रते बरीदा बिन अल हुसैब को अलम बरदार बनाया और मदीने से निकल कर एक कोस दूर मक़ामे "जरफ़” में पड़ाव किया ताकि वहां पूरा लश्कर जम्अ हो जाए। हुजूरे अक्दस ﷺ ने अन्सार व मुहाजिरीन के तमाम मुअज्ज़िज़ीन को भी इस लश्कर में शामिल हो जाने का हुक्म दे दिया। बा'ज़ लोगों पर येह शाक़ गुज़रा कि ऐसा लश्कर जिस में अन्सार व मुहाजिरीन के अकाबिर व अमाइद मौजूद हैं एक नौ उम्र लड़का जिस की उम्र बीस बरस से ज़ाइद नहीं किस तरह अमीरे लश्कर बना दिया गया ? जब हुजूर ﷺ को इस एतिराज़ की खबर मिली तो आप के कल्बे नाजुक पर सदमा गुज़रा और आप ने अलालत के बावजूद सर में पट्टी बांधे हुए एक चादर ओढ़ कर मिम्बर पर एक खुत्बा दिया जिस में इर्शाद फ़रमाया कि अगर तुम लोगों ने उसामा की सिपहसालारी पर ताना जनी की है तो तुम लोगों ने इस से क़ब्ल इस के बाप के सिपह सालार होने पर भी ताना जनी की थी हालां कि खुदा की क़सम ! इस का बाप (जैद बिन हारिषा) सिपहसालार होने के लाइक़ था और उस के बाद उस का बेटा (उसामा बिन जैद) भी सिपह सालार होने के क़ाबिल है और येह मेरे नज़दीक मेरे महबूब तरीन सहाबा में से है जैसा कि इस का बाप मेरे महबूब तरीन असहाब में से था लिहाजा उसामा के बारे में तुम लोग मेरी नेक वसिय्यत को क़बूल करो कि वोह तुम्हारे बेहतरीन लोगों में से है। 
     
࿐  हुज़ूर ﷺ येह खुत्बा दे कर मकान में तशरीफ़ ले गए और आप की अलालत में कुछ और भी इज़ाफ़ा हो गया। 
     
࿐  हज़रते उसामा हुक्मे नबवी की तक्मील करते हुए मक़ामे जरफ़ में पहुंच गए थे और वहां लश्करे इस्लाम का इजतिमाअ होता रहा यहां तक कि एक अज़ीम लश्कर तय्यार हो गया। 10 रबीउल अव्वल सि. 11 हि. को जिहाद में जाने वाले खवास हुजूर ﷺ से रुख़सत होने के लिये आए और रुख़सत हो कर मक़ामे जरफ़ में पहुंच गए। इस के दूसरे दिन हुज़ूर ﷺ की अलालत ने और जियादा शिद्दत इख़्तियार कर ली। हज़रते उसामा भी आप ﷺ की मिज़ाज पुर्सी और रुख़सत होने के लिये ख़िदमते अक्दस में हाज़िर हुए। आप ﷺ ने हजरते उसामा को देखा मगर जोफ़ की वजह से कुछ बोल न सके, बार बार दस्ते मुबारक को आस्मान की तरफ़ उठाते थे और उन के बदन पर अपना मुक़द्दस हाथ फैरते थे। हज़रते उसामा का बयान है कि इस से मैं ने येह समझा कि हुजुर ﷺ दुआ फ़रमा रहे हैं। इस के बाद हज़रते उसामा रुख्सत हो कर अपनी फ़ौज में तशरीफ़ ले गए और 12 रबीउल अव्वल सि. 11 हि. को कूच करने का एलान भी फ़रमा दिया। अब सुवार होने के लिये तय्यारी कर रहे थे कि उन की वालिदा हज़रते उम्मे ऐमन का फ़रिस्तादा आदमी पहुंचा कि हुजुर ﷺ नज़्अ की हालत में हैं। येह होशरुबा ख़बर सुन कर हज़रते उसामा व हज़रते उमर व हज़रते अबू उबैदा वगैरा फ़ौरन ही मदीना आए तो येह देखा कि आप ﷺ सकरात के आलम में हैं और उसी में दिन दो पहर को या सह पहर के वक्त आप का विसाल हो गया। 
     
࿐  येह ख़बर सुन कर हज़रते उसामा का लश्कर मदीना वापस चला आया मगर जब हज़रते अबू बक्र सिद्दीक मस्नदे ख़िलाफ़त पर रौनक अफरोज़ हो गए तो आप ने बाज़ लोगों की मुखा-लफ़त के बा वुजूद रबीउल आखिर की आखिरी तारीखों में उस लश्कर को रवाना फ़रमाया और हज़रते उसामा मकामे "उबना" में तशरीफ़ ले गए और वहां बहुत ही ख़ूरैज़ जंग के बाद लश्करे इस्लाम फतह याब हुवा और आप ने अपने बाप के क़ातिल और दूसरे कुफ्फ़ार को कत्ल किया और बे शुमार माले गनीमत ले कर चालीस दिन के बाद मदीने वापस तशरीफ़ लाए। 

*वफ़ाते अक्दस* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 335* ༺❘

                *❝ वफ़ाते अक्दस ❞*
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࿐   हुजूर रहूमतुल्लिल आलमीन का इस आलम में तशरीफ़लाना सिर्फ इस लिये था कि आप ﷺ खुदा के आखिरी और क़तई पैग़ाम या'नी दीने इस्लाम के अह्काम उस के बन्दों तक पहुंचा दें और खुदा की हुज्जत तमाम फ़रमा दें। इस काम को आप ﷺ ने क्यूंकर अन्जाम दिया ? और इस में आप को कितनी काम्याबी हासिल हुई ? इस का इज्माली जवाब येह है कि जब से येह दुन्या आलमे वजूद में आई हज़ारों अम्बिया व रुसुल इस अजीमुश्शान काम को अन्जाम देने के लिये इस आलम में तशरीफ़ लाए मगर तमाम अम्बिया व मुर्सलीन के तब्लीगी कारनामों को अगर जम्अ कर लिया जाए तो वोह हुजूर ﷺ के तब्लीगी शाहकारों के मुकाबले में ऐसे ही नज़र आएंगे जैसे आफ्ताबे आलमे ताब के मुकाबले में एक चराग या एक सहरा के मुकाबले में एक जर्रा या एक समन्दर के मुकाबले में एक कतरा। आप ﷺ की तब्लीग ने आलम में ऐसा इन्किलाब पैदा कर दिया कि काएनाते हस्ती की हर पस्ती को मेराजे कमाल की सर बुलन्दी अता फरमा कर ज़िल्लत की ज़मीन को इज्ज़त का आस्मान बना दिया और दीने हनीफ़ के इस मुक़द्दस और नूरानी महल को जिस की तामीर के लिये हज़रते आदम से ले कर हज़रते ईसा عليه السلام तक तमाम अम्बिया व रुसुल मे'मार बना कर भेजे जाते रहे आप ﷺ ने ख़ा-तमुन्नबिय्यीन की शान से इस कस्रे हिदायत को इस तरह मुकम्मल फ़रमा दिया कि हज़रते हक़ ने इस पर "आज में ने तुम्हारे लिये तुम्हारा दीन कामिल कर दिया" की मोहर लगा दी। 
     
जब दीने इस्लाम मुकम्मल हो चुका और दुन्या में आप ﷺ के तशरीफ़ लाने का मक्सद पूरा हो चुका तो अल्लाह तआला के वादए मोहकम "बे शक तुम्हे इन्तिक़ाल फरमाना है और उनको भी मरना है" के पूरा होने का वक़्त आ गया। 

*हुज़ूर को अपनी वफ़ात का इल्म* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 539 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 336* ༺❘

 *❝ हुज़ूर को अपनी वफ़ात का इल्म ❞*
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࿐   हुज़ूर ﷺ को बहुत पहले से अपनी वफ़ात का इल्म हासिल हो गया था और आपने मुख़्तलिफ़ मवाक़ेअ पर लोगों को इस की खबर भी दे दी थी। चुनान्चे हिज्जतुल वदाअ के मौक़अ पर आप ने लोगों को येह फ़रमा कर रुख़्सत फ़रमाया था : "शायद इस के बाद मैं तुम्हारे साथ हज न कर सकूंगा।" 
     
࿐   इसी तरह "ग़दीर खम" के खुत्बे में इसी अन्दाज़ से कुछ इसी क़िस्म के अल्फ़ाज़ आप की जबाने अक्दस से अदा हुए थे अगर्चे इन दोनों खुत्बात में लफ्ज़ लअल्ल (शायद) फ़रमा कर ज़रा पर्दा डालते हुए अपनी वफ़ात की ख़बर दी मगर हिज्जतुल वदाअ से वापस आ कर आप ﷺ ने जो खुत्बात इर्शाद फ़रमाए उस में लअल्ल (शायद) का लफ्ज़ आप ने नहीं फ़रमाया बल्कि साफ़ साफ़ और यक़ीन के साथ अपनी वफ़ात की खबर से लोगों को आगाह फ़रमा दिया।
     
࿐   चुनान्चे बुखारी शरीफ़ में हज़रते उक्बा बिन आमिर से रिवायत है कि एक दिन हुज़ूर ﷺ घर से बाहर तशरीफ़ ले गए और शुहदाए उहुद की क़ब्रों पर इस तरह नमाज़ पढ़ी जैसे मय्यित पर नमाज़ पढ़ी जाती है फिर पलट कर मिम्बर पर रौनक अफरोज हुए और इर्शाद फ़रमाया कि मैं तुम्हारा पेश रू (तुम से पहले वफ़ात पाने वाला) हूं और तुम्हारा गवाह हूं और मैं खुदा की क़सम ! अपने हौज़ को इस वक्त देख रहा हूं।
     
࿐   इस हदीष मे انی فرط لکم फ़रमाया यानी "मैं अब तुम लोगों से पहले ही वफ़ात पा कर जा रहा हूं ताकि वहां जा कर तुम लोगों के लिये हौज़े कौषर का इन्तिज़ाम करूं।" 
     
࿐   येह क़िस्सा मरजे वफ़ात शुरू होने से पहले का है लेकिन इस क़िस्से को बयान फ़रमाने के वक्त आप ﷺ को इस का यक़ीनी इल्म हासिल हो चुका था कि मैं कब और किस वक्त दुन्या से जाने वाला हूं और मरज़े वफ़ात शुरू होने के बाद तो अपनी साहिब जादी हज़रते बीबी फातिमा को साफ़ साफ़ लफ्ज़ों में बिगैर "शायद" का लफ्ज़ फ़रमाते हुए अपनी वफात की ख़बर दे दी। 
     
࿐   चुनान्चे बुखारी शरीफ़ की रिवायत है कि अपने मरज़े वफ़ात में आप ﷺ ने हज़रते फ़ातिमा को बुलाया और चुपके चुपके उन से कुछ फ़रमाया तो वोह रो पड़ीं। फिर बुलाया और चुपके चुपके कुछ फ़रमाया तो वोह हंस पड़ीं जब अज्वाजे मुतहहरात ने इस के बारे में हज़रते बीबी से दरयाफ्त किया तो उन्हों ने कहा कि ने आहिस्ता आहिस्ता मुझ से येह फ़रमाया कि हुजूर ﷺ ने आहिस्ता आहिस्ता मुझ से ये फ़रमाया की में इसी बीमारी में वफ़ात पा जाऊंगा तो मैं रो पड़ी। फिर चुपके चुपके मुझ से फ़रमाया कि मेरे बाद मेरे घर वालों में से सब से पहले तुम वफ़ात पा कर मेरे पीछे आओगी तो में हंस पड़ी।
     
࿐   बहर हाल हुजूर ﷺ को अपनी वफ़ात से पहले अपनी वफ़ात के वक्त का इल्म हासिल हो चुका था। क्यूं न हो कि जब दूसरे लोगों की के अवकात से हुज़ूर ﷺ को अल्लाह ने आगाह फ़रमा दिया था तो अगर खुदा वन्दे अल्लामुल गुयूब के बता देने से हुज़ूर ﷺ को अपनी वफ़ात के वक्त का कब्ल अज़ वक्त इल्म हो गया तो इस में कौन सा इस्तिबआद है ? 
     
࿐   अल्लाह तआला ने तो आप ﷺ को इल्मे मा का-न व मा यकून अता फरमाया। या'नी जो कुछ हो चुका और जो कुछ हो रहा है और जो कुछ होने वाला है सब का इल्म अता फ़रमा कर आप को दुन्या से उठाया।  

*अलालत की इब्तिदा* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 539 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 337* ༺❘

           *❝  अलालत की इब्तिदा ❞*
••─────────•◦❈◦•─────────••

࿐  मरज़ की इब्तिदा कब हुई और हुजुर ﷺ कितने दिनों तक अलील रहे ? इस में मुअर्रिख़ीन का इख़्तिलाफ़ है। बहर हाल 20 या 22 सफ़र सि. 11 हि. को हुजूर ﷺ जन्नतुल बकीअ में जो आम मुसलमानों का क़ब्रिस्तान है आधी रात में तशरीफ़ ले गए वहां से वापस तशरीफ़ लाए तो मिज़ाजे अक्दस नासाज़ हो गया येह हज़रते मैमूना की बारी का दिन था। 
     
࿐  दो शम्बा के दिन आप ﷺ की अलालत बहुत शदीद हो गई। आप की ख़्वाहिश पर तमाम अज्वाजे मुतहहरात ने इजाजत दे दी कि आप हज़रते बीबी आइशा के यहां क़ियाम फरमाएं। चुनान्चे हज़रते अब्बास व हज़रते अली ने सहारा दे कर आप को हज़रते बीबी आइशा के हुजरए मुबारका में पहुंचा दिया। जब तक ताक़त रही आप खुद मस्जिदे नबवी में नमाजें पढ़ाते रहे। जब कमज़ोरी बहुत ज़ियादा बढ़ गई तो आप ने हुक्म दिया कि हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ मेरे मुसल्ले पर इमामत करें। चुनांचे सत्तरह नमाज़ें आप ने पढ़ाई।
     
࿐  एक दिन जोहर की नमाज़ के वक़्त मरज़ में कुछ इफ़ाका महसूस हुवा तो आप ﷺ ने हुक्म दिया कि सात पानी की मश्कें मेरे ऊपर डाली जाएं। जब आप ﷺ गुस्ल फ़रमा चुके तो हज़रते अब्बास और हज़रते अली आप का मुक़द्दस बाजू थाम कर आप को मस्जिद में लाए। हज़रते अबू बक्र नमाज़ पढ़ा रहे थे। आहट पा कर पीछे हटने लगे मगर आप ﷺ ने इशारे से उन को रोका और उन के पहलू में बैठ कर नमाज़ पढ़ाई। आप ﷺ को देख कर हज़रते अबू बक्र और दूसरे मुक्तदी लोग अरकाने नमाज़ अदा करते रहे। नमाज़ के बाद आप ﷺ ने एक खुत्बा भी दिया जिस में बहुत सी वसिय्यतें और अहकामे इस्लाम बयान फ़रमा कर अन्सार के फ़ज़ाइल और इन के हुकूक के बारे में कुछ कलिमात इर्शाद फ़रमाए और सूरए वल अस्र और एक आयत भी तिलावत फ़रमाई। 
     
࿐  घर में सात दीनार रखे हुए थे। आप ﷺ ने हज़रते बीबी आइशा से फ़रमाया कि तुम उन दीनारों को लाओ ताकि मैं उन दीनारों को खुदा की राह में खर्च कर दूं। चुनान्चे हज़रते अली के जरीए आप ﷺ ने उन दीनारों को तक्सीम कर दिया और अपने घर में एक ज़र्रा भर भी सोना या चांदी नहीं छोड़ा।
      
࿐  आप ﷺ के मरज़ में कमी बेशी होती रहती थी। खास वफ़ात के दिन या'नी दो शम्बा के रोज़ तबीअत अच्छी थी। हुजरा मस्जिद से मुत्तसिल ही था। आप ने पर्दा उठा कर देखा तो लोग नमाज़े फजर पढ़ रहे थे।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 543 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 338* ༺❘

           *❝  अलालत की इब्तिदा 02 ❞*
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࿐  आप ﷺ के मरज़ में कमी बेशी होता रहता थी। खास वफात के दिन या'नी दो शम्बा के रोज़ तबीअत अच्छी थी। हुजरा मस्जिद से मुत्तसिल ही था। आप ने पर्दा उठा कर देखा तो लोग नमाज़े फुज्र पढ़ रहे थे। येह देख कर खुशी से आप हंस पड़े। लोगों ने समझा कि आप ﷺ मस्जिद में आना चाहते हैं मारे खुशी के तमाम लोग बे क़ाबू हो गए मगर आप ने इशारे से रोका और हुजरे में दाखिल हो कर पर्दा डाल दिया येह सब से आखिरी मौकअ था कि सहाबए किराम ने जमाले नुबुव्वत की ज़ियारत की हज़रते अनस का बयान है कि आप ﷺ का रुखे अन्वर ऐसा मालूम होता था कि गोया कुरआन का कोई वरक है। या'नी सफ़ेद हो गया था।
     
࿐  इस के बाद बार बार गशी तारी होने लगी। हजरते फ़ातिमा की ज़बान से शिद्दते ग़म से येह लफ्ज़ निकल गया : ”हाए रे मेरे बाप की बेचैनी !" हुजूर ﷺ ने फ़रमाया कि ऐ बेटी ! तुम्हारा बाप आज के बाद कभी बेचैन न होगा। 
     
࿐  इस के बाद बार बार आप ﷺ ये फरमाते रहे कि उन लोगों के साथ जिन पर खुदा का इन्आम है और कभी येह फरमाते कि खुदा वन्दा ! बड़े रफ़ीक़ में और ला-इलाहा-इल्लल्लाह भी पढ़ते थे और फ़रमाते थे कि बेशक मौत के लिये सख़्तियां हैं। हज़रते बीबी आइशा कहती हैं कि तन्दुरुस्ती की हालत में आप ﷺ अकषर फरमाया करते थे कि पैग़म्बरों को इख़्तियार दिया जाता है कि वोह ख़्वाह वफ़ात को कबूल करें या हयाते दुन्या को। जब हुज़ूर ﷺ की ज़बाने मुबारक पर येह कलिमात जारी हुए तो मैं ने समझ लिया कि आप ﷺ ने आखिरत को क़बूल फ़रमा लिया।
     
࿐  वफ़ात से थोड़ी देर पहले हज़रते आइशा के भाई अब्दुर्रहमान बिन अबू बक्र ताज़ा मिस्वाक हाथ में लिये हाजिर हुए। आप ﷺ ने उन की तरफ़ नज़र जमा कर देखा। हज़रते आइशा ने समझा कि मिस्वाक की ख़्वाहिश है। उन्हों ने फ़ौरन ही मिस्वाक ले कर अपने दांतों से नर्म की और दस्ते अक़दस में दे दी आप ﷺ ने मिस्वाक फ़रमाई। सह पहर का वक्त था कि सीनए अक्दस में सांस की घरघराहट महसूस होने लगी इतने में लब मुबारक हिले तो लोगों ने येह अल्फ़ाज़ सुने कि नमाज़ और लौंडी गुलामों का ख्याल रखो। पास में पानी की एक लगन थी उस में बार बार हाथ डालते और चेह्रए अक़दस पर मलते और कलिमा पढ़ते। चादरे मुबारक को कभी मुंह पर डालते कभी हटा देते। हज़रते बीबी आइशा सरे अक्दस को अपने सीने लगाए बैठी हुई थीं। इतने में आप ﷺ ने हाथ उठा कर उंगली से इशारा फ़रमाया और तीन मरतबा येह फ़रमाया कि अब कोई नहीं बल्कि वोह बड़ा रफ़ीक़ चाहिये। येह अल्फ़ाज़ ज़बाने अक्दस पर थे कि ना गहां मुक़द्दस हाथ लटक गए और आंखें छत की तरफ़ देखते हुए खुली की खुली रहीं और आप की कुदसी रूह आलमे कुद्स में पहुंच गई। 

اِنَّ لِلّٰهِ وَاِنَّٓ اِلَيْهِ رَاجِعُوْنَ
     
࿐  तारीखे वफ़ात में मुअरि॑खीन का बड़ा इख़्तिलाफ़ है लेकिन इस पर तमाम उलमाए सीरत का इत्तिफ़ाक़ है कि दो शम्बे का दिन और रबीउल अव्वल का महीना था बहर हाल आम तौर पर येही मशहूर है कि 12 रबीउल अव्वल सि. 11 हि. दो शम्बे के दिन तीसरे पहर आप ने विसाल फ़रमाया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 543 📚*

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           *❝  मुस्तफ़ा ﷺ की ज़िंदगी ❞*
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࿐   *【वफ़ात का अषर】* हुजूरे अक्दस ﷺ की वफात से हजराते सहाबए किराम और अहले बैते इज़ाम को कितना बड़ा सदमा पहुंचा ? और अहले मदीना का क्या हाल हो गया ? इस की तस्वीर कशी के लिये हज़ारों सफ़हात भी मुतहम्मिल नहीं हो सकते। वोह शमए नुबुव्वत के परवाने जो चन्द दिनों तक जमाले नुबुव्वत का दीदार न करते तो उन के दिल बे क़रार और उन की आंखें अश्कबार हो जाती थीं। जाहिर है कि उन आशिकाने रसूल पर जाने आलम ﷺ के दाइमी फ़िराक़ का कितना रूह फरसा और किस कदर जांकाह सदमए अज़ीम हुवा होगा ? जलीलुल कुद्र सहाबए किराम मुबालगा होशो हवास खो बैठे, उन की अक्लें गुम हो गई, आवाज़ें बन्द हो गई और वोह इस क़दर मख़्बूतुल हवास हो गए कि उन के लिये येह सोचना भी मुश्किल हो गया कि क्या कहें ? और क्या करें ? 
     
࿐  हज़रते उषमाने गनी पर ऐसा सक्ता तारी हो गया कि वोह इधर उधर भागे भागे फिरते थे मगर किसी से न कुछ कहते थे न किसी की कुछ सुनते थे। हज़रते अली रन्जो मलाल में निढाल हो कर इस तरह बैठ रहे कि उन में उठने बैठने और चलने फिरने की सकत ही नहीं रही। हज़रते अब्दुल्लाह बिन अनीस के कल्ब पर ऐसा धचका लगा कि वोह इस सदमे को बरदाश्त न कर सके और उन का हार्ट फेल हो गया। 
     
࿐  हज़रते उमर इस क़दर होशो हवास खो बैठे कि उन्हों ने तलवार खींच ली और नंगी तलवार ले कर मदीने की गलियों में इधर उधर आते जाते थे और येह कहते फिरते थे कि अगर किसी ने येह कहा कि रसूलुल्लाह ﷺ की वफ़ात हो गई तो मैं इस तलवार से उसकी गर्दन उड़ा दूंगा।
     
࿐  हज़रते आइशा का बयान है कि वफ़ात के बाद हज़रते उमर व हज़रते मुगीरा बिन शअबा इजाजत ले कर मकान में दाखिल हुए हज़रते उमर ने हुज़ूर ﷺ को देख कर कहा कि बहुत ही सख़्त गशी तारी हो गई है। जब वोह वहां से चलने लगे तो हज़रते मुगीरा ने कहा कि ऐ उमर ! तुम्हें कुछ खबर भी है ? हुजूर ﷺ का विसाल हो चुका है। येह सुन कर हज़रते उमर आपे से बाहर हो गए और तड़प कर बोले कि ऐ मुग़ीरा ! तुम झूटे हो हुजूर ﷺ का उस वक्त तक इन्तिकाल नहीं हो सकता जब तक दुन्या से एक एक मुनाफ़िक का ख़ातिमा न हो जाए। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 547 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 340* ༺❘
           *❝  मुस्तफ़ा ﷺ की ज़िंदगी ❞*
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࿐   *【वफ़ात का अषर 02 】* मवाहिबे लदुन्निय्यह में तबरी से मन्कूल है कि हुजूर ﷺ की वफ़ात के वक्त हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ "सुख” में थे जो मस्जिदे नबवी से एक मील के फासिले पर है। उन की बीवी हज़रते हबीबा बिन्ते ख़ारिजा वहीं रहती थीं। चूंकि दो शम्बे की सुबह को मरज में कमी नज़र आई और कुछ सुकून मालूम हुवा इस लिये हुजूर ﷺ ने खुद हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ को इजाजत दे दी थी कि तुम "सुख" चले जाओ और बीवी बच्चों को देखते आओ। 
     
बुखारी शरीफ़ वगैरा में है कि हज़रते अबू बक्र अपने घोड़े पर सुवार हो कर "सुख" से आए और किसी से कोई बात न कही न सुनी। सीधे हज़रते आइशा के हुजरे में चले गए और हुज़ूर ﷺ के रुखे अन्वर से चादर हटा कर आप ﷺ पर झुके और आप की दोनों आंखों के दरमियान निहायत गर्म जोशी के साथ एक बोसा दिया और कहा कि आप अपनी हुयात और वफ़ात दोनों हालतों में पाकीज़ा रहे। मेरे मां बाप आप पर फ़िदा हों हरगिज़ खुदा वन्दे तआला आप पर दो मौतों को जम्अ नहीं फ़रमाएगा। आप की जो मौत लिखी हुई थी आप उस मौत के साथ वफ़ात पा चुके। 
     
इस के बाद हज़रते अबू बक्र सिद्दीक मस्जिद में तशरीफ़ लाए तो उस वक्त हज़रते उमर तकरीर कर रहे थे। आप ने फरमाया की ऐ उमर बैठ जाओ। हज़रते उमर ने बैठने से इन्कार कर दिया तो हज़रते अबू बक्र सिद्दीक ने उन्हें छोड़ दिया और खुद लोगो को  मुतवज्जेह करने के लिये खुत्बा देना शुरू कर दिया कि...
     
अम्मा बा'द ! जो शख़्स तुम में से मुहम्मद ; ﷺ की इबादत करता था वोह जान ले कि मुहम्मद ﷺ का विसाल हो गया और जो शख़्स तुम में से खुदा की परस्तिश करता था तो खुदा ज़िन्दा है वोह कभी नहीं मरेगा। फिर इस के बाद हज़रते अबू बक्र सिद्दीक ने सूरए आले इमरान की ये आयत तिलावत फ़रमाई : और मुहम्मद तो एक रसूल हैं इन से पहले बहुत से रसूल हो चुके तो क्या अगर वोह इन्तिकाल फ़रमा जाएं या शहीद हो जाएं तो तुम उलटे पाउं फिर जाओगे ? और जो उलटे पाउं फिरेगा अल्लाह का कुछ नुक्सान न करेगा और अन करीब अल्लाह शुक्र अदा करने वालों को षवाब देगा।
     
हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास कहते है कि हज़रते अबू बक्र ने येह आयत तिलावत की तो मालूम होता था कि गोया कोई इस आयत को जानता ही न था। उन से सुन कर हर शख्स इसी आयत को पढ़ने लगा।
     
हज़रते उमर का बयान है कि मैं ने जब हज़रते अबू बक्र सिद्दीकी जबान से सूरए आले इमरान की येह आयत सुनी तो मुझे मालूम हो गया कि वाकेई नबी का विसाल हो गया। फिर हज़रते उमर इजतिराब की हालत में नंगी शमशीर ले कर जो एलान करते फिरते थे कि हुजूर ﷺ का विसाल नहीं हुवा इस से रुजूअ किया और उन के साहिब ज़ादे हज़रते अब्दुलाह बिन उमर कहते हैं कि गोया हम पर एक पर्दा पड़ा हुवा था कि इस आयत की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं गया। हज़रते अबू बक्र सिद्दीक के खुत्बे ने इस पर्दे को उठा दिया। 

*तज्हीज व तक्फीन* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 548 📚*

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࿐  *तज्हीज व तक्फीन :-* चूंकि हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने वसिय्यत फ़रमा दी थी कि मेरी तज्हीज़ो तक्फ़ीन मेरे अहले बैत और अहले खानदान करें। इस लिये येह ख़िदमत आप के खानदान ही के लोगों ने अन्जाम दी। चुनान्चे हज़रते फ़ज़्ल बिन अब्बास व हज़रते कुषुम बिन अब्बास व हज़रते अली व हज़रते अब्बास व हज़रते उसामा बिन जैद رضی الله تعالی عنهم ने मिलजुल कर आपको गुस्ल दिया और नाफ़ मुबारक और पलकों पर जो पानी के क़तरात और तरी जम्अ थी हज़रते अली ने जोशे महब्बत और फ़र्ते अकीदत से उस को ज़बान से चाट कर पी लिया। गुस्ल के बाद तीन सूती कपड़ों का जो "सुहूल" गाउं के बने हुए थे कफ़न बनाया गया उन में क़मीस व इमामा न था। 

࿐  *नमाज़े जनाज़ा :-*  जनाज़ा तय्यार हुवा तो लोग नमाज़े जनाज़ा के लिये टूट पड़े। पहले मर्दो ने फिर औरतों ने फिर बच्चो ने नमाज़े जनाज़ा पढ़ी। जनाज़ए मुबारका हुजरए मुक़द्दस के अंदर ही था। बारी बारी से थोड़े थोड़े लोग अंदर जाते थे और नमाज़ पढ़ कर चले आते थे लेकिन कोई इमाम न था।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 550 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 342* ༺❘
           *❝  मुस्तफ़ा ﷺ की ज़िंदगी ❞*
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࿐   *क़ब्रे अन्वर :-* हज़रते अबू तल्हा رضی الله تعالی عنه ने कब्र शरीफ़ तय्यार की जो बगली थी। जिस्मे अतहर को हज़रते अली व हज़रते फ़ज़्ल बिन अब्बास व हज़रते अब्बास व हज़रते कुषुम बिन अब्बास رضی الله تعالی عنهم ने क़ब्रे मुनव्वर में उतारा। लेकिन अबू दावूद की रिवायतों से मालूम होता है कि हज़रते उसामा और अब्दुर्रहमान बिन औफ़ رضی الله تعالی عنهم भी कब्र में उतरे थे। 
    
࿐  सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم में येह इख़्तिलाफ़ रूनुमा हुवा कि हुजूर ﷺ को कहां दफ्न किया जाए। कुछ लोगों ने कहा कि मस्जिदे नबवी में आप ﷺ का मदफ़न होना चाहिये और कुछ ने येह राय दी कि आप को सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم के कब्रिस्तान में दफ्न करना चाहिये। इस मौकअ पर हज़रते अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنه ने फ़रमाया कि मैं ने रसूलुल्लाह ﷺ से ये सुना है कि हर नबी अपनी वफ़ात के बाद उसी जगह दफ्न किया जाता है जिस जगह उस की वफ़ात हुई हो। हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنه फरमाते है कि इस हदीष को सुन कर लोगों ने हुजूर ﷺ के बिछोने को उठाया और उसी जगह (हुजरए आइशा رضی الله تعالی عنها ) में आप की कब्र तय्यार की और आप ﷺ उसी में मदफून हुए। 
    
࿐  हुज़ूरे अक्दस ﷺ के गुस्ल शरीफ़ और तज्हीज़ो तक्फ़ीन की सआदत में हिस्सा लेने के लिये ज़ाहिर है कि शमए नुबुव्वत के परवाने किस क़दर बे क़रार रहे होंगे ? मगर जैसा कि हम तहरीर कर चुके कि चूंकि हुज़ूर ﷺ ने खुद ही येह वसिय्यत फ़रमा दी थी कि मेरे गुस्ल और तज्हीजो तक्फीन मेरे अहले बैत ही करें। फिर अमीरुल मुअमिनीन हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه ने भी ब हैषिय्यत अमीरुल मुअमिनीन होने के येही हुक्म दिया कि "येह अहले बैत ही का हक़ है" इस लिये हज़रते अब्बास और अहले बैत ने किवाड़ बन्द कर के गुस्ल दिया और कफ़न पहनाया। और शुरूअ से आखिर तक खुद हज़रते अमीरुल मुअमिनीन और दूसरे तमाम सहाबए किराम हुजरए मुक़द्दसा के बाहर हाज़िर रहे। 

࿐ *हुज़ूर ﷺ का तर्का :-* हुज़ूरे अक्दस ﷺ की मुक़द्दस ज़िन्दगी इस क़दर ज़ाहिदाना थी कि कुछ अपने पास रखते ही नहीं थे। इस लिये ज़ाहिर है कि आप ﷺ ने वफ़ात के बाद क्या छोड़ा होगा? चुनान्चे हज़रते अम्र बिन अल हारिष رضی الله تعالی عنه का बयान है कि हुजूर ﷺ ने अपनी वफात के वक़्त न दिरहम व दीनार छोड़ा न लौंडी व गुलाम न और कुछ। सिर्फ अपना सफ़ेद खच्चर और हथियार और कुछ ज़मीन जो आम मुसलमानों पर सदक़ा कर गए छोड़ा था। बहर हाल फिर भी आप ﷺ के मतरूकात में तीन चीजें थीं। (1) बनू नज़ीर, फ़िदक, खैबर की ज़मीनें (2) सुवारी का जानवर (3) हथियार। येह तीनों चीजें काबिले ज़िक्र हैं। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 552 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 343* ༺❘
           *❝  मुस्तफ़ा ﷺ की ज़िंदगी ❞*
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࿐  *ज़मीन :-*  बनू नज़ीर, फ़िदक, खैबर की ज़मीनों के बागात वगैरा की आमदनियां आप ﷺ अपने और अपनी अज्वाजे मुतहहरात के साल भर के अख़राजात और फुक़रा व मसाकीन और आम मुसलमानों की हाजात में सर्फ़ फ़रमाते थे। हुज़ूर ﷺ के बाद हज़रते अब्बास और हज़रते फातिमा और बा'ज़ अज्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن चाहती थीं कि इन जाएदादों को मीराष के तौर पर वारिषों के दरमियान तक्सीम हो जाना चाहिये। चुनान्चे हज़रते अमीरुल मुअमिनीन अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنه के सामने इन लोगों ने इस की दरख्वास्त पेश की मगर आप और हज़रते उमर वगैरा अकाबिर सहाबा رضی الله تعالی عنهم ने उन लोगों को येह हदीष सुना दी कि "हम (अम्बिया) का कोई वारिष नहीं होता हम ने जो कुछ छोड़ा वोह मुसलमानों पर सदका है।" 
     
࿐   और इस हदीष की रोशनी में साफ़ साफ़ कह दिया कि रसूलुल्लाह ﷺ की वसिय्यत के ब मूजिब येह जाएदादें वक्फ़ हो चुकी हैं। लिहाजा हुजुरे अक्दस ﷺ अपनी मुक़द्दस ज़िन्दगी में जिन मद्दात व मसारिफ़ में इन की आमदनियां खर्च फ़रमाया करते थे उस में कोई तब्दीली नहीं की जा सकती। हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه ने अपनी दौरे ख़िलाफ़त में हज़रते अब्बास व हजरते अली رضی الله تعالی عنهم के इस्रार से बनू नज़ीर की जाएदाद का इन दोनों को इस शर्त पर मुतवल्ली बना दिया था कि इस जाएदाद की आमदनियां इन्हीं मसारिफ़ में खर्च करते रहेंगे जिन में रसूलुल्लाह ﷺ खर्च फरमाया करते थे। फिर इन दोनों में कुछ अनबन हो गई और इन दोनों हज़रात ने येह ख़्वाहिश जाहिर की, कि बनू नज़ीर की जाएदाद तक्सीम कर के आधी हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه की तौलिय्यत में दे दी जाए और आधी के मुतवल्ली हजरत अली رضی الله تعالی عنه रहें मगर हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه ने इस दरख्वास्त को ना मंज़ूर फ़रमा दिया। 
     
࿐  लेकिन खैबर और फ़िदक की ज़मीनें हज़रते उमर बिन अब्दुल अजीज رضی الله تعالی عنه के ज़माने तक खुलफ़ा ही के हाथों में रहीं। हाकिमे मदीना मरवान बिन अल हकम ने इस को अपनी जागीर बना ली थी मगर हज़रते उमर बिन अब्दुल अजीज رضی الله تعالی عنه ने अपने ज़मानए ख़िलाफ़त में फिर वोही अमल दर आमद जारी कर दिया जो हज़रते अबू बक्र व हज़रते उमर رضی الله تعالی عنهما के दौरे ख़िलाफ़त में था। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 554 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 344* ༺❘
           *❝  मुस्तफ़ा ﷺ की ज़िंदगी ❞*
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࿐  *सुवारी के जानवर :-*  ज़ुरकानी अलल मवाहिब वग़ैरा में लिखा हुवा है कि हुज़ूर ﷺ की मिल्किय्यत में सात घोड़े, पांच खच्चर, तीन गधे, दो ऊंटनियां थीं।

࿐  लेकिन इस में येह तशरीह नहीं है कि ब वक्ते वफ़ात इन में से कितने जानवर मौजूद थे क्यूं कि हुज़ूर ﷺ अपने जानवर दूसरों को अता फरमाते रहते थे। कुछ नए खरीदते कुछ हदाया और नज़रानों में मिलते भी रहे!

࿐  बहर हाल रिवायाते सहीहा से मालूम होता है कि वफाते अक्दस के वक़्त जो सुवारी के जानवर मौजूद थे उन में एक घोड़ा था जिस का नाम "लहीफ" था एक सफेद खच्चर था जिस का नाम “दुलदुल” था येह बहुत ही उम्र दराज़ हुवा। हज़रते अमीरे मुआविया رضی الله تعالی عنه के ज़माने तक ज़िन्दा रहा इतना बूढ़ा हो गया था कि इस के तमाम दांत गिर गए थे और आखिर में अन्धा भी हो गया था। इब्ने असाकिर की तारीख में है कि हज़रते अली भी जंगे ख़वारिज में इस पर सवार हुए थे। 

࿐   एक अरबी गधा था जिस का नाम " अफ़ीर" था एक ऊंटनी थी, जिस का नाम "अज़बा व स्वा" था। येह वोही ऊंटनी थी जिस को ब वक्ते हिजरत आप ने हज़रते अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنه से खरीदा था इस ऊंटनी पर आप ने हिजरत फ़रमाई और इस की पुश्त पर हिज्जतुल वदा में आप ने अरफात व मिना का खुत्बा पढ़ा था।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 555 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 345* ༺❘
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࿐  *हथयार :-*  चूंकि जिहाद की ज़रूरत हर वक़्त दरपेश रहती थी इसलिये आप ﷺ अस्लिहा खाना में नव या दस तलवारें, सात लोहे की जिरहें, छे कमानें, एक तीरदान, एक ढाल, पांच बरछियां, दो मिग़फर, तीन जुब्बे, एक सियाह रंग का बड़ा झन्डा बाकी सफेद व ज़र्द रंग के छोटे छोटे झन्डे थे और एक खैमा भी था।

࿐   हथयारों में तलवारों के बारे में हज़रते शैख अब्दुल हक़ मुहद्दि देहलवी رحمتہ اللہ تعالیٰ علیہ ने तहरीर फ़रमाया कि मुझे इस का इल्म नहीं कि येह सब तलवारें बयक वक़्त जम्अ थीं या मुख्तलिफ अवकात में आप के पास रहीं।

࿐  *ज़ुरूफ और मुख़्तलिफ़ सामान :-*   ज़ुरूफ और बरतनों में कई प्याले थे एक शीशे का प्याला भी था एक प्याला लकड़ी का था जो फट गया था तो हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه ने उस के शिगाफ़ को बन्द करने के लिये एक चांदी की जन्जीर से उस को जकड़ दिया था। 

࿐   चमड़े का एक डोल, एक पुरानी मशक, एक पथ्थर का तगार एक बड़ा सा प्याला जिस का नाम "अलसआ" था, एक चमड़े का थेला जिस में आप आईना, कैंची और मिस्वाक रखते थे, एक कंघी, एक सुरमा दानी, एक बहुत बड़ा प्याला जिस का नाम "अल गरा" था, साअ और मुद दो नापने के पैमाने।

࿐   इन के इलावा एक चारपाई जिस के पाए सियाह लकड़ी के थे, येह चारपाई हज़रते असअद बिन ज़रारह رضی الله تعالی عنه ने हदिय्यतन ख़िदमते अक्स में पेश की थी। बिछोना और तकिया चमड़े का था जिस में खजूर की छाल भरी हुई थी, मुक़द्दस जूतियां, येह हुज़ूर ﷺ जद के असबाब व सामानों की एक फेहरिस्त है जिन का तज़किरा अहादीस में मुतफ़र्रिक तौर पर आता है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 556 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 346* ༺❘
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࿐  *तबर्रुकाते नुबुव्वत :-*  हुज़ूर ﷺ के इन मतरूका सामानों के इलावा 'बाज् यादगारी तबर्रुकात भी थे जिन को आशिकाने रसूल फ़र्ते अकीदत से अपने अपने घरों में महफूज़ किये हुए थे और इन को अपनी जानों से ज़ियादा अज़ीज़ रखते थे। चुनान्चे मूए मुबारक, ना'लैने शरीफ़ैन और एक लकड़ी का प्याला जो चांदी के तारों से जोड़ा हुवा था हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه ने इन तीनों आसारे मुतबर्रिका को अपने घर में महफूज़ रखा था!

࿐  इसी तरह एक मोटा कम्बल हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها के पास था जिन को वोह बतौरे तबर्रुक अपने पास रखे हुए थीं और लोगों को उस की ज़ियारत कराती थीं। चुनान्चे हज़रते अबू बरदा رضی الله تعالی عنه का बयान है कि हम लोगों को हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها की खिदमते 'मुबारका में हाज़िरी का शरफ़ हासिल हुवा तो उन्हों ने एक मोटा कम्बल निकाला और फ़रमाया कि येह वोही कम्बल है जिस में हुज़ूर ﷺ ने वफात पाई!

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 556 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 347* ༺❘
           *❝  मुस्तफ़ा ﷺ की ज़िंदगी ❞*
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࿐  *तबर्रुकाते नुबुव्वत :-* हुज़ूर ﷺ की एक तलवार जिस का नाम "जुलफ़िकार" था। हज़रते अली رضی الله تعالی عنه के पास थी इन के बाद इन खानदान में रही यहां तक कि येह तलवार करबला में हज़रते इमामे हुसैन رضی الله تعالی عنه के पास थी। इस के बाद इन के फ़रज़न्द व जा नशीन हज़रते इमाम ज़ैनुल आबिदीन رضی الله تعالی عنه के पास रही। चुनान्चे हज़रते इमामे हुसैन رضی الله تعالی عنه की शहादत के बाद जब हज़रते इमाम ज़ैनुल आबदीन رضی الله تعالی عنه यज़ीद बिन मुआविया के पास से रुख्सत हो कर मदीने तशरीफ़ लाए तो मश्हूर सहाबी हज़रते मिस्वर बिन मख़रमा رضی الله تعالی عنه हाज़िरे ख़िदमत हुए और अर्ज़ किया कि अगर आप को कोई हाजत हो या मेरे लाइक कोई कारे ख़िदमत हो तो आप मुझे हुक्म दें मैं आप के हुक्म की तामील के लिये हाज़िर हूं। आप رضی الله تعالی عنه ने फ़रमाया मुझे कोई हाजत नहीं। 

࿐  फिर हज़रते मिस्वर बिन मख़रमा رضی الله تعالی عنه ने येह गुज़ारिश की, कि आप के पास रसूलुल्लाह ﷺ की जो तलवार (जुलफ़िकार) है क्या आप वोह मुझे इनायत फ़रमा सकते हैं? क्यूं कि मुझे ख़तरा है कि कहीं यज़ीद की क़ौम आप पर ग़ालिब आ जाए और येह तबर्रुक आप के हाथ से जाता रहे और अगर आप ने इस मुक़द्दस तलवार को मुझे अता फ़रमा दिया तो खुदा की कसम ! जब तक मेरी एक सांस बाक़ी रहेगी उन लोगों की इस तलवार तक रसाई भी नहीं हो सकती मगर हज़रते इमाम ज़ैनुल आबिदीन رضی الله تعالی عنه ने उस मुक़द्दस तलवार को अपने से जुदा करना गवारा नहीं फ़रमाया। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 557 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 348* ༺❘
           *❝  मुस्तफ़ा ﷺ की ज़िंदगी ❞*
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࿐  *तबर्रुकाते नुबुव्वत :-*  आप ﷺ की अंगूठी और असाए मुबारक पर जा नशीन होने की बिना पर खुलफ़ाए किराम हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ व हज़रते उमर फारूक व हज़रते उसमाने ग़नी رضی الله تعالی عنهم अपने अपने दौरे खिलाफ़त में क़ाबिज़ रहे मगर अंगूठी हज़रते उसमान رضی الله تعالی عنه के हाथ से कूंएं में गिर कर जाएअ हो गई। उस कूंएं का नाम "बीरे उरैस" है जिस को लोग "बीरे खातिम" भी कहते हैं। 

࿐ और असाए मुबारक इस तरह जाएअ हुवा कि हज़रते अमीरुल मोमिनीन उसमाने ग़नी رضی الله تعالی عنه इसी मुक़द्दस असाए नबवी को अपने दस्ते मुबारक में ले कर मस्जिदे नबवी के मिम्बर पर खुत्बा पढ़ रहे थे कि बिल्कुल ना गहां बद नसीब "जहजाह गिफारी" उठा और अचानक आपके हाथ से इस मुबारक तबर्रुक को ले कर तोड़ डाला। इस बे अदबी से उस पर येह कहरे इलाही टूट पड़ा कि उस के हाथ में केन्सर हो गया और पूरा हाथ सड़ गल कर टूट पड़ा और इसी अज़ाब में वोह हलाक हो गया।

࿐  *तम्बीह :-*  हमारी तहक़ीक़ के मुताबिक हज़रते सय्यदुना जहजाह बिन सईद गिफारी رضی الله تعالی عنه सहाबिये रसूल हैं और हमें किसी का भी कोई क़ौल ऐसा नहीं मिला जिस में उन के सहाबी होने की नफ़ी हो, लिहाज़ा उन के लिये ऐसे अलफ़ाज़ हरगिज़ इस्तिमाल न किये जाएं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 558 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 349* ༺❘
           *❝  मुस्तफ़ा ﷺ की ज़िंदगी ❞*
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࿐  *मुसन्निफ़ की तरफ़ से उज़्र :-*  किसी आम मुसलमान से भी यह तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता कि वोह किसी सहाबी के बारे में जान बुझ कर कोई ना ज़ैबा कलिमा इस्ति'माल करे, यकीनन हज़रते मुसन्निफ़ رحمتہ اللہ के इल्म में न होगा कि येह सहाबी हैं क्यूं कि यहां जो मुआमला था वोह सय्यिदुना उसमाने ग़नी رضی الله تعالی عنه के असा के तोड़ने का था जिस की वजह से शायद मुसन्निफ़ से तसामेह हो गया वर्ना वोह हरगिज़ ऐसी बात सहाबिये रसूल के लिये न लिखते क्यूं कि मुसन्निफ़ ने खुद अपनी किताब में सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم के फ़ज़ाइल बयान फ़रमाए हैं जो कि इन के रासिख सुन्नी सहीहुल अक़ीदा और आशिके सहाबए किराम होने की दलील है।

࿐  *सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم के बारे में इस्लामी अक़ीदा :-* सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم के मुतअल्लिक अहले सुन्नत का मौक़फ़ है

*(1)*  ࿐   सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم के बाहम जो वाकेआत हुए, इन में पड़ना हराम, हराम, सख़्त हराम है।
मुसलमानों को तो येह देखना चाहिये कि वोह सब हज़रात आकाए दो आलम ﷺ के जां निसार और सच्चे गुलाम हैं।

*(2)* ࿐  सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم अम्बिया न थे, फ़िरिश्ते न थे कि मासूम हों इन में बा'ज़ के लिये लगुज़िशें हुईं मगर इन की किसी बात पर गरिफ़्त अल्लाह عزوجل व रसूल ﷺ के ख़िलाफ़ है।

📗 बहारे शरीअत, जि. 1, हिस्सए अव्वल, स. 254 मतृबूआ मक्तबतुल मदीना

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 559 📚*

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           *❝  मुस्तफ़ा ﷺ की ज़िंदगी ❞*
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࿐  *तफ़्सील :-*  मज़कूरा वाके़आ की तफ्तीश करते हुए हम ने मुतद्दद अरबी कुतुबे सियर व तारीख़ वग़ैरा देखीं लेकिन इन में "बद नसीब और खुबीसुन्नक्स" या इस की मिस्ल कलिमात नहीं मिले। चुनान्चे “अल इस्तीआब” में है : तर्जमा : और मरवी है कि येह वोही जहजाह (बिन सईद गिफ़ारी رضی الله تعالی عنه हैं जिन्हों ने ब हालते खुत्बा उसमाने गनी رضی الله تعالی عنه के दस्ते मुबारक से असा (छड़ी) छीन कर अपने घुटने पर रख कर तोड़ दिया था तो (सय्यिदुना) जहजाह رضی الله تعالی عنه को घुटने में ज़ख़्म हो गया यहां तक कि वोह रिहलत फ़रमा गए। वोह असा मुबारक रसूले अकरम ﷺ का था।

࿐   इन की सहाबिय्यत के दलाइल : कुतुबे तराजिम में इन के मुतअल्लिक बयान किया गया है कि "वोह बैअते रिज़वान में हाज़िर थे", और मुतद्दद कुतुब में असा तोड़ने वाला वाके़आ इन्ही का लिखा है, जिस की ताईद " इस्तीआब" से बिल खुसूस होती है कि उन्हों ने पहले इन के ईमान लाने का वाकआ बयान किया और फिर "ھذا ھو الذى تَنَاوَلَ العَصَا" के अलफ़ाज़ के ज़रीए येह वाज़ेह कर दिया कि असा तोड़ने वाला वाक़िआ इन्ही का है।

࿐  इसी क़िस्म के दूसरे और भी तबर्रुकाते नबविय्या हैं जो मुख़्तलिफ़ सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم के पास महफूज़ थे जिन का तज़किरा अहादीस और सीरत की किताबों में जा बजा मुतर्रिक तौर पर मज़कूर है और इन मुक़द्दस तबर्रुकात से सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم और ताबिईने इज़ाम رحمتہ اللہ تعالیٰ علیہم  को इस क़दर वालिहाना महब्बत थी कि वोह इन को अपनी जानों से भी ज़ियादा अज़ीज़ समझते थे।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 561 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 351* ༺❘
           *❝   शमाइल व खसाइल ❞*
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࿐  *[सत्तरहवां बाब]  शमाइल व खसाइल :-* हुज़ूरे अक्सदस ﷺ को अल्लाह तआला ने जिस तरह कमाले सीरत में तमाम अव्वलीन व आखिरीन से मुमताज़ और अफ्ज़लो आ'ला बनाया इसी तरह आप को जमाले सूरत में भी बे मिस्ल व बे मिसाल पैदा फ़रमाया। हम और आप हुज़ूरे अकरम ﷺ की शाने बे मिसाल को भला क्या समझ सकते हैं ? हज़राते सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم जो दिन रात सफ़र व हज़र में जमाले नुबुव्वत की तजल्लियां देखते रहे उन्हों ने महबूबे खुदा ﷺ के जमाले बे मिसाल के फ़ज़्लो कमाल की जो मुसव्वरी की है उस को सुन कर येही कहना पड़ता है जो किसी मद्दा रसूल ने क्या खूब कहा है कि (तर्जुमा) यानी अल्लाह तआला ने हज़रते मुहम्मद ﷺ का मिस्ल पैदा फ़रमाया ही नहीं और मैं येही जानता हूं कि वोह कभी न पैदा करेगा। 

࿐   सहाबिये रसूल और ताजदारे दो आलम ﷺ के दरबारी शाइर हज़रते हस्सान बिन साबित رضی الله تعالی عنه ने अपने क़सीदए हमज़िया में जमाले नुबुव्वत ﷺ की शाने बे मिसाल को इस शान के साथ बयान फ़रमाया कि (तर्जुमा) यानी या रसूलल्लाह ﷺ ! आप से ज़ियादा हुस्नो जमाल वाला मेरी आंख ने कभी किसी को देखा ही नहीं और आप से ज़ियादा कमाल वाला किसी औरत ने जना ही नहीं।, या रसूलल्लाह ﷺ! आप हर ऐब व नुक्सान से पाक पैदा किये गए हैं गोया आप ऐसे ही पैदा किये गए जैसे हसीनो जमील पैदा होना चाहते थे।

࿐  हज़रते अल्लामा बूसैरी رحمتہ الله علیہ ने अपने क़सीद ए बुर्दा में फ़रमाया कि (तर्जुमा) या'नी हज़रते महबूबे खुदा अपनी खूबियों में ऐसे यक्ता हैं कि इस मुआमले में इन का कोई शरीक ही नहीं है। क्यूं कि इन में जो हुस्न का जौहर है वोह काबिले तक्सीम ही नहीं।

࿐  आ'ला हज़रत मौलाना अहमद रजा खान अलैहिमुर्रिदवान साहिब किब्ला बरेल्वी ने भी इस मज़्मून की अक्कासी फ़रमाते हुए कितने नफ़ीस अन्दाज़ में फ़रमाया है कि :

     *तेरी  ख़ल्क़  को  हक़  'ने जमील  किया*
      तेरे   खुल्क   को   हक़  ने   अज़ीम  कहा
      *कोई   तुझसा   हुवा   है   न  होगा   शहा*
      तेरे  ख़ालिक़े   हुस्नो   अदा  की   क़सम

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 561-563 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 352* ༺❘
           *❝   शमाइल व खसाइल ❞*
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࿐  बहर हाल इस पर तमाम उम्मत का ईमान है कि तनासुबे आज़ा और हुस्नो जमाल में हुज़ूर नबिय्ये आखिरुज्ज़मान ﷺ बे मिस्ल व बेमिसाल हैं। चुनान्चे हज़रात मुहुद्दिसीन व मुसन्निफीने  सीरत ने रिवायाते सहीहा के साथ आप ﷺ के हर हर उज्वे शरीफा के तनाब और हुस्नो जमाल को बयान किया है। हम भी अपनी इस मुख़्तसर किताब में "हुल्यए मुबारका" के ज़िक्रे जमील से हुस्नो जमाल पैदा करने के लिये इस उन्वान पर हज़रते मौलाना मुहम्मद कामिल साहिब चराग रब्बानी नो'मानी वलीद पूरी के मंजूम हुल्य - मुबारका के चन्द अशआर नक्ल करते हैं ताकि इस आलिमे कामिल की बरकतों से भी येह किताब सरफ़राज़ हो जाए। हज़रते मौलाना मौसूफ़ ने अपनी किताब "पंजए नूर" में तहरीर फ़रमाया कि

                 *••°  हुल्यए  मुक़द्दसा  °••*


रूहे हक़ का मैं सरापा क्या लिखूं, हुल्यए नूरे ख़ुदा मैं क्या लिखूं 
     *पर जमाले रहूमतुल्लिल आलमी, जल्वागर होगा मकाने क़ब्र में*

इस लिये है आ गया मुझ को ख़याल, मुख़्तसर लिख दूं जमाले बे मिसाल
       *ताकि यारों को मेरे पहचान हो, और इस की याद भी आसान हो*

था मियाना क़द व औसत पाक तन, पर सपेदो सुख़ था रंगे बदन
        *चांद के टुकड़े थे आ'ज़ा आप के, थे हसीनो गोल सांचे में ढले*

थीं जबीं रौशन कुशादा आप की, चांद में है दाग़ वोह बेदाग़ थी 
        *दोनों अब्रू थीं मिसाले दो हिलाल, और दोनों को हुवा था इत्तिसाल*

इत्तिसाले दो महे "ईदैन" था, या कि अदना कुर्ब था "क़ौसैन" का
         *थीं बड़ी आंखें हसीनो सुर्मगीं, देख कर कुरबान थीं सब हूरे ईं*

कान दोनों ख़ूब सूरत अरजुमन्द, साथ ख़ूबी के दहन बीनी बुलन्द 
         *साफ़ आईना था चेहरा आप का, सूरत अपनी उस में हर इक देखता*

ता ब सीना रीशे महबूबे इलाह, ख़ूब थी गन्जान मू, रंगे सियाह
       *था सपेद अकसर लिबासे पाक तन,  हो इज़ारो जुब्बा या पैरहन*

सब्ज़ रहता था इमामा आप का, पर कभी सौदो सपेदो साफ़ था
      *मैं कहूं पहचान उम्दा आपकी, दोनों आलम में नहीं ऐसा कोई*

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 563-564 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 353* ༺❘
           *❝   शमाइल व खसाइल ❞*
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࿐  *जिस्मे अतहर :-*  हज़रते अबू हुरैरा رضی الله تعالی عنه का बयान है कि हुज़ूरे अन्वर ﷺ के जिस्मे अक्दस का रंग गोरा सपेद था ऐसा मालूम होता था कि गोया आप का मुक़द्दस बदन चांदी से ढाल कर बनाया गया है। हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि आप ﷺ का जिसमे मुबारक निहायत नर्मो नाजुक था। मैंने दीबा व हरीर (रेशमीं कपड़ों) को भी आप ﷺ के बदन से ज़ियादा नर्म व नाजुक नहीं देखा और आप ﷺ के जिस्मे मुबारक की खुश्बू से ज़ियादा अच्छी कभी कोई खुश्बू नहीं सूंघी!

࿐  हज़रते का'ब बिन मालिक رضی الله تعالی عنه ने फ़रमाया कि जब हुज़ूर ﷺ खुश होते थे तो आप ﷺ का चेहरए अन्वर इस तरह चमक उठता था कि गोया चांद का एक टुकड़ा है और हम लोग इसी कैफियत से हुज़ूर ﷺ की शादमानी व मसर्रत को पहचान लेते थे!

࿐   आप ﷺ के रुखे अन्वर पर पसीने के क़तरात मोतियों की तरह ढलकते थे और उस में मुश्को अम्बर से बढ़ कर खुश्बू रहती थी। चुनान्चे हज़रते अनस की वालिदा हज़रते बीबी उम्मे सुलैम رضی الله تعالی عنها एक चमड़े का बिस्तर हुज़ूर ﷺ के लिये बिछा देती थीं और आप ﷺ उस पर दोपहर को कैलूला फ़रमाया करते थे तो आप के जिसमे अतहर के पसीने को वोह एक शीशी में जम्अ फ़रमा 'लेती थीं फिर उस को अपनी खुश्बू में मिला लिया करती थीं। चुनान्चे हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه ने वसिय्यत की थी कि मेरी वफ़ात के बाद मेरे बदन और कफ़न में वोही खुश्बू लगाई जाए जिस में हुज़ूरे ﷺ अन्वर के जिस्मे अतहर का पसीना मिला हुवा है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 565 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 354* ༺❘
           *❝   शमाइल व खसाइल ❞*
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࿐  *जिस्मे अन्वर का साया न था :-*  आप ﷺ के क़दे मुबारक का साया न था। हकीम तिरमिज़ी (मुतवफ़्फ़ा सि. 255 हि.) ने अपनी किताब “नवादिरुल उसूल” में हज़रते ज़क्वान ताबेई رحمتہ اللہ تعالیٰ علیہ से यह हदीस नक्ल की है कि सूरज की धूप और चांद की चांदनी में रसूलुल्लाह ﷺ का साया नहीं पड़ता था। इमाम इब्ने सब्अ رحمتہ اللہ تعالیٰ علیہ का क़ौल है कि येह आप ﷺ के ख़साइस में से है कि आप ﷺ का साया ज़मीन पर नहीं पड़ता था और आप ﷺ नूर थे इस लिये जब आप ﷺ धूप या चांदनी में चलते तो आप ﷺ का साया नज़र न आता था!

࿐  और बा'ज़ का क़ौल है कि इस की शाहिद वोह हदीस है जिस में आप ﷺ की इस दुआ का ज़िक्र है कि आप ने येह दुआ मांगी कि खुदा वन्दा ! तू मेरे तमाम आ'ज़ा को नूर बना दे और आप ﷺ ने अपनी इस दुआ को इस क़ौल पर ख़त्म फ़रमाया कि ” यानी या अल्लाह ! तू मुझ को सरापा नूर बना दे। ज़ाहिर है कि जब आप सरापा नूर थे तो फिर आप का साया कहां से पड़ता? इसी तरह अब्दुल्लाह बिन मुबारक और इब्नुल जौज़ी رحمتہ اللہ تعالیٰ علیہ ने भी  हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنه से रिवायत की है कि हुज़ूर ﷺ का साया नहीं था। 

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 355* ༺❘
           *❝   शमाइल व खसाइल ❞*
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࿐  *मख्खी, मच्छर, जूओं से महफूज़ :-*  हज़रते इमाम फ़ख़रुद्दीन राज़ी ने इस रिवायत को नक्ल फ़रमाया है और अल्लामा हिजाज़ी, वगैरा से भी येही मन्कूल है कि बदन तो बदन, आप के कपड़ों पर भी कभी मख्खी नहीं बैठी, न कपड़ों में कभी जूएं पड़ीं, न कभी खटमल या मच्छर ने आप को काटा, इस मज़मून को अबुर्रबीअ सुलैमान बिन सबअ رحمتہ الله تعالیٰ علیہ ने अपनी किताब “शिफ़ाउस्सुदूर फी आ’लामु नुबुव्वतिर्रसूल" में बयान फ़रमाते हुए तहरीर फ़रमाया कि इस की एक वजह तो यह है आप ﷺ नूर थे। फिर मख्खियों की आमद, जूओं का पैदा होना चूंकि गन्दगी बदबू वग़ैरा की वजह से हुवा करता है और आप चूंकि हर क़िस्म की गन्दगियों से पाक और आप का जिस्मे अतहर खुश्बूदार था इस लिये आप इन चीज़ों से महफूज़ रहे। इमाम सबती رحمتہ الله تعالیٰ علیہ ने भी इस मज़मून को "आज़मुल मवारिद" में मुफ़स्सल लिखा है।  

࿐   *मोहरे नुबुव्वत :-* हुज़ूरे अक्सद ﷺ के दोनों शानों के दरमियान कबूतर के अन्डे के बराबर मोहरे नुबुव्वत थी। येह ब ज़ाहिर सुर्खी माइल उभरा हुवा गोश्त था, चुनान्चे हज़रते जाबिर बिन समुरह رضی الله تعالی عنه फ़रमाते हैं कि मैं ने हुज़ूर ﷺ के दोनों शानों के बीच में मोहरे नुबुव्वत को देखा जो कबूतर के अन्डे की मिक्दार में सुर्ख उभरा हुवा एक गुदूद था। लेकिन एक रिवायत में येह भी है कि मोहरे नुबुव्वत कबूतर के अन्डे के बराबर थी और उस पर येह इबारत लिखी हुई थी कि : (तर्जुमा) यानी एक अल्लाह है उस का कोई शरीक नहीं (ऐ रसूल !) आप जहां भी रहेंगे आप की मदद की जाएगी और एक रिवायत में येह भी है कि (तर्जुमा) यानी मोहरे नुबुव्वत एक चमकता हुवा नूर था। रावियों ने इस की ज़ाहिरी शक्ल व सूरत और मिक्दार को कबूतर के अन्डे से तश्बीह दी है। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 567 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

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࿐  *कदे मुबारक :-*  हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه का बयान है कि हुज़ूरे अन्वर ﷺ न बहुत ज़ियादा लम्बे थे न पस्ता क़द बल्कि आप ﷺ दरमियानी क़द वाले थे और आप ﷺ का मुक़द्दस बदन इनतिहाई ख़ूब सूरत था जब चलते थे तो कुछ ख़मीदा हो कर चलते थे, 

࿐  इसी तरह हज़रते अली رضی الله تعالی عنه फ़रमाते हैं कि आप ﷺ न तवीलुल कामत थे न पस्ता क़द बल्कि आप मियाना क़द थे। ब वक्ते रफ्तार ऐसा मालूम होता था कि गोया आप ﷺ किसी बुलन्दी से उतर रहे हैं। मैं ने आप का मिस्ल न आप से पहले देखा न आप के बाद। 

࿐  इस पर सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم का इत्तिफ़ाक़ है कि आप ﷺ मियाना क़द थे लेकिन येह आप ﷺ की मो'जिज़ाना शान है कि मियाना क़द होने के बावजूद अगर आप ﷺ हज़ारों इन्सानों के मज्मअ में खड़े होते थे तो आप ﷺ का सरे मुबारक सब से ज़ियादा ऊंचा नज़र आता था।

         *क़दे  बे  साया  के  सायए  मर्हमत*
         जिल्ले ममदूद राफ़त पे लाखों सलाम
        *ताइराने कुदुस जिस की हैं कुमरियां*
         उस सही सरवे क़ामत पे लाखों सलाम

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 567📚*

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࿐  *सरे अक्दस :-*  हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने आप ﷺ का हुल्यए मुबारका बयान फ़रमाते हुए इरशाद फ़रमाया कि "जखमुर्रास" सरे मुबारक "बड़ा” था जो शानदार और वजीह होने का निशान है।

       *जिस  के  आगे  सरे  सरवरां  ख़म  रहें*
         उस सरे ताजे रिफ़अत पे लाखों सलाम

࿐  *मुक़द्दस बाल :-*  हुज़ूरे अन्वर ﷺ के मूए मुबारक न घूंघर दार थे न बिल्कुल सीधे बल्कि इन दोनों कैफ़िय्यतों के दरमियान थे। आप ﷺ के मुक़द्दस बाल पहले कानों की लौ तक थे फिर शानों 'तक खूबसूरत गेसू लटकते रहते थे मगर हिज्जतुल वदाअ के मौक पर आप ﷺ ने अपने बालों को उतरवा दिया। आला हज़रत मौलाना शाह अहमद रजा खान किब्ला बरेल्वी अलैहिमुर्रिदवान ने आप ﷺ के मुक़द्दस बालों की इन तीनों सुरतों को अपने दो शेरों में बहुत ही नफीस व लतीफ अन्दाज़ में बयान फ़रमाया है कि 

    *गोश तक सुनते थे फ़रबाद अब आए ता दौश*
     कि   बनें   खाना   बदोशों   को   सहारे   गेसू
    *आखिरे  हम  गये  उम्मत  में  परेशां   हो  कर*
     तीरह  बख़्तों  की  शफाअत  को सिधारे  गेसू

࿐   आप ﷺ अकसर बालों में तेल भी डालते थे और कभी कभी कंघी भी करते थे और अखीर ज़माने में बीच सर में मांग भी निकालते थे आप ﷺ के मुक़द्दस बाल आखिर उम्र तक सियाह रहे, सर और दाढ़ी शरीफ़ में बीस बालों से ज़ियादा सफ़ेद नहीं हुए थे। 

࿐   हुज़ूर ए अक्दस ﷺ ने हिज्जतुल वदाअ में जब अपने मुक़द्दस बाल उतरवाए तो वोह सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم में बतौरे तबर्रुक तक्सीम हुए और सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم ने निहायत ही अक़ीदत के साथ इस मुए मुबारक को अपने पास महफूज़ रखा और इस को अपनी जानों से ज़ियादा अज़ीज़ रखते थे। हज़रते बीबी उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها ने इन मुक़द्दस बालों को एक शीशी में रख लिया था जब किसी इन्सान को नज़र लग जाती या कोई मरज होता तो आप उस शीशी को पानी में डुबो कर देती थीं और उस पानी से शिफा हासिल होती थी। 

         *वोह करम  की घटा गेसूए  मुश्क सा* 
         *लक्कए अब्रे राफ़त पे लाखों सलाम*

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 568-569 📚*

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࿐  *रुखे अन्वर :-*  हुज़ूरे अक्दस ﷺ का चेहरए मुनव्वरह जमाले 'इलाही का आईना और अन्वारे तजल्ली का मज़हर था। निहायत ही वजीह, पुर गोश्त और किसी क़दर गोलाई लिये हुए था। हज़रते जाबिर बिन समुरह رضی الله تعالی عنه का बयान है कि मैं ने रसूलुल्लाह ﷺ को एक मरतबा चांदनी रात में देखा। मैं एक मरतबा चांद की तरफ़ देखता और एक मरतबा आप के चेहरए अन्वर को देखता तो मुझे आप ﷺ का चेहरा चांद से भी ज़ियादा खूब सूरत नज़र आता था। 

࿐  हज़रते बरा बिन आज़िब رضی الله تعالی عنه से किसी ने पूछा कि क्या रसूलुल्लाह ﷺ का चेहरा (चमक दमक में) तलवार की मानिन्द था ? तो आपने फ़रमाया कि नहीं बल्कि आप ﷺ का चेहरा चांद के मिस्ल था।हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने आप ﷺ के हुल्यए मुबारका को बयान करते हुए यह कहा कि" जो आप को अचानक देखता वोह आप के रो' ब दाब से डर जाता और पहचानने के बाद आप से मिलता वोह आप से महब्बत करने लगता था।

࿐  हज़रते बरा बिन आजिब رضی الله تعالی عنه का कौल है कि रसूलुल्लाह ﷺ तमाम इन्सानों से बढ़ कर खूबरू और सब से ज़ियादा अच्छे अख़्लाक़ वाले थे। हज़रते अब्दुल्लाह बिन सलाम رضی الله تعالی عنه ने आप ﷺ के चेहरए अन्वर के बारे में येह कहा : यानी मैं ने जब हुज़ूर ﷺ के चेहरए अन्वर को बग़ौर देखा तो मैंने पहचान लिया कि आप ﷺ का चेहरा किसी झूटे आदमी का चेहरा नहीं है।

࿐  आ'ला हज़रत फ़ाज़िले बरेल्वी अलैहिर्रहमा ने क्या खूब कहा :

         *चांद से मुंह पे ताबां दरख़्शां दुरूद*
         नमक आगीं सबाहत पे लाखों सलाम
        *जिस से तारीक दिल जग मगाने लगे*
        उस  चमक वाली रंगत पे  लाखों सलाम

࿐  अरबी ज़बान में भी किसी मद्दाहे रसूल ने आप ﷺ 'के रुखे अन्वर के हुस्नो जमाल का कितना हसीन मंजर और कितनी बेहतरीन तरी पेश की है : या'नी हुज़ूर ﷺ हुस्नो जमाल के भी नबी है, यूं तो इन की हर हर चीज़ हुस्न का मो'जिज़ा है लेकिन ख़ास कर इन का चेहरा तो आयते कुब्रा (बहुत ही बड़ा मो 'जिज़ा) है। इन के रुख़्सार के सेहन में इन के तिल का बिलाल इन की रौशन पेशानी की चमक से सुबह सादिक़ को देख कर अज़ान कहा करता था।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 569-571 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 359* ༺❘
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࿐  *मेहराबे अब्रू :-* आप ﷺ की भवें दराज़ व बारीक और घने बाल वाली थीं और दोनों भवें इस क़दर मुत्तसिल थीं कि दूर से दोनों मिली हुई मा'लूम होती थीं और इन दोनों भवों के दरमियान एक रग थी जो गुस्से के वक़्त उभर जाती थी।

࿐  आ'ला हज़रत अलैहिर्मुरिदवान अब्रूए मुबारक की महू में फ़रमाते हैं कि : 

      *जिन के सज्दे को मेहराबे का'बा झुकी*
        उन भवों की लताफ़त पे लाखों सलाम 

࿐   और हज़रते मोहसिन काकोरवी رحمتہ اللہ تعالیٰ علیہ ने चेहरए अन्वर में मेहराबे अब्रू के हुस्न की तस्वीर कशी करते हुए येह लिखा कि :

      *महे कामिल में महे नूर की येह तस्वीरें हैं*
       या  खिंची  मारिकए  बद्र में  शमशीरें हैं

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 571 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 360* ༺❘
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࿐  *नूरानी आंख :-*  आप ﷺ की चश्माने मुबारक बड़ी बड़ी और कुदरती तौर पर सुर्मगीं थीं। पलकें घनी और दराज़ थीं पुतली की सियाही खूब सियाह और आंख की सफ़ेदी खूब सफ़ेद थी जिन में बारीक बारीक सुर्ख डोरे थे। आप ﷺ की मुक़द्दस आंखों का येह एजाज़ है कि आप बयक वक़्त आगे पीछे, दाएं बाएं, ऊपर नीचे, दिन रात, अंधेरे उजाले, में यक्सां देखा करते थे। चुनाचे बुखारी व मुस्लिम की रिवायात में आया है कि यानी ऐ लोगों ! तुम रुकूअ व सुजूद को दुरुस्त तरीके से अदा करो क्यूं कि खुदा की कुसम ! मैं तुम लोगों को अपने पीछे से भी देखता रहता हूं।

࿐  साहिबे मिरकात ने इस हदीस की शर्ह में फ़रमाया कि : यानी येह बाब आप ﷺ के उन मोजिज़ात में से है जो आप को अता किये गए हैं। फिर आप की आंखों का देखना महसूसात ही तक महदूद नहीं था बल्कि आप गैर मरई व गैर महसूस चीज़ों को भी जो आंखों से देखने के लाइक ही नहीं हैं देख लिया करते थे। चुनान्चे बुखारी शरीफ़ की एक रिवायत है कि : या'नी खुदा की कसम ! तुम्हारा रुकूअ व खुशूअ मेरी निगाहों से पोशीदा नहीं रहता। 

࿐   प्यारे मुस्तफा ﷺ की नूरानी आंखों के एजाज़ का क्या कहना ? कि पीठ के पीछे से नमाज़ियों के रुकूअ बल्कि उनके खुशूअ को भी देख रहे हैं। "खुशूअ" क्या चीज़ है ? खुशूअ दिल में खौफ़ और आजिज़ी की एक कैफ़िय्यत का नाम है जो आंख से देखने की चीज़ ही नहीं है मगर निगाहे नुबुव्वत का येह मोजिज़ा देखो कि ऐसी चीज़ को भी आप ﷺ ने अपनी आंखों से देख लिया जो आंख से देखने के क़ाबिल ही नहीं है? سبحان الله 

࿐   चश्माने मुस्तफा ﷺ के एजाज़ की शान का क्या कोई बयान कर सकता है ? आ'ला हज़रत मौलाना अहमद रज़ा खान साहिब किब्ला बरेल्वी अलैहिमुर्रिदवान ने क्या खूब फ़रमाया :

 *शश जिहत सम्त मुक़ाबिल शबो रोज़ एक ही हाल*
       धूम   "वन्नज्म"  में  है   आप   की   बीनाई  की
     *फ़र्श  ता  अर्श सब  आईना ज़माइर  हाज़िर*
      बस   क़सम  खाइये  उम्मी  तेरी  दानाई  की

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 571-572 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 361* ༺❘
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࿐  *बीनी मुबारक :*  आप ﷺ की मुतबर्रक नाक खूब सूरत दराज़ और बुलन्द थी जिस पर एक नूर चमकता था, जो शख्स बगौर नहीं देखता था वोह येह समझता था कि आप की मुबारक नाक बहुत ऊंची है। हालांकि आप ﷺ की नाक बहुत ज़ियादा ऊंची न थी बल्कि बुलन्दी उस नूर की वजह से महसूस होती थी जो आप की मुक़द्दस नाक के ऊपर जल्वा फ़िगन था। 

          *नीची आंखों की शर्मो हया पर दुरूद*
        *ऊंची बीनी की रिफ़अत पे लाखों सलाम*

࿐  *मुकद्दस पेशानी :-* हज़रते हिन्द बिन अबी हाला رضی الله تعالی عنه आप ﷺ के चेहरए अन्वर का हुल्या बयान करते हैं कि यानी आप ﷺ की मुबारक पेशानी कुशादा और चौड़ी थी। 

࿐  कुदरती तौर से आप ﷺ की पेशानी पर एक नूरानी चमक थी। चुनान्चे दरबारे रिसालत के शाइर मद्दाहे रसूल हज़रते हस्सान बिन साबित رضی الله تعالی عنه ने इसी हसीनो जमील नूरानी मंज़र को देख कर येह कहा है कि : या'नी जब अंधेरी रात में आप ﷺ की मुक़द्दस पेशानी जाहिर होती है तो इस तरह चमकती है जिस तरह रात की तारीकी में रौशन चराग चमकते हैं। سبحان الله 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 574 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 362* ༺❘
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࿐  *गोशे मुबारक :-*  आप ﷺ की आंखों की तरह आप ﷺ के कान में भी मोजिज़ाना शान थी। चुनान्चे आप ﷺ ने खुद अपनी ज़बाने अक्दस से इरशाद फ़रमाया कि : या'नी मैं उन चीज़ों को देखता हूं जिन को तुम में से कोई नहीं देखता और मैं उन आवाज़ों को सुनता हूं जिन को तुम में से कोई नहीं सुनता!

࿐   इस हदीस से साबित होता है कि आप ﷺ के सम्अ व बसर की कुव्वत बे मिसाल और मो'जिज़ाना शान रखती थी। क्यूं कि आप ﷺ दूर व नज़दीक की आवाज़ों को यक्सां तौर पर सुन लिया करते थे। चुनान्चे आप के हलीफ़ बनी खुज़ाआ ने, जैसा कि फ़त्हे मक्का के बयान में आप पढ़ चुके हैं, तीन दिन की मसाफ़त से आप को अपनी इमदाद व नुसरत के लिये पुकारा तो आप ने उन की फ़रयाद सुन ली। 

࿐  अल्लामा जुरकानी ने इस हदीस की शर्ह में फ़रमाया कि : यानी अगर हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने तीन दिन की मसाफ़त से एक फ़रयादी की फ़रयाद सुन ली तो येह आप से कोई बईद नहीं है क्यूं कि आप तो ज़मीन पर बैठे हुए आस्मानों की चरचराहट को सुन लिया करते थे बल्कि अर्श के नीचे चांद के सज्दे में गिरने की आवाज़ को भी सुन लिया करते थे। 

        *दूरो नज़दीक के सुनने वाले वोह कान*
           काने ला'ले करामत पे लाखों सलाम

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 574 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 363* ༺❘
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࿐  *दहन शरीफ़ :-*  हज़रते हिन्द बिन अबी हाला " का बयान है कि आप ﷺ के रुख़्सार नर्म व नाजुक और हमवार थे और आप ﷺ का मुंह फ़राख, दांत कुशादा और रौशन थे। जब आप ﷺ गुफ़्तगू फ़रमाते तो आप के दोनों अगले दांतों के दरमियान से एक नूर निकलता था और जब कभी अंधेरे में आप मुस्कुरा देते तो दन्दाने मुबारक की चमक से रौशनी हो जाती थी। 

࿐   आप ﷺ को कभी जमाई नहीं आई और येह तमाम अम्बिया عَلَیْھِمُ الصَّلٰوةُ وَالسَّلَام का ख़ास्सा है कि इन को कभी जमाई नहीं आती क्यूं कि जमाई शैतान की तरफ़ से हुवा करती है और हज़राते अम्बिया عَلَیْھِمُ الصَّلٰوةُ وَالسَّلَام शैतान के तसल्लुत से महफूज़ व मासूम हैं। 

    *वोह दहन जिस की हर बात वहये ख़ुदा*
      *चश्मए इल्मो हिक्मत पे लाखों सलाम*

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 575 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 364* ༺❘
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࿐  *ज़बाने अक्दस :-*  आप ﷺ की ज़बाने अक्दस वहये इलाही की तर्जुमान और सर चश्मए आयात व मख्ज़ने मो'जिजात है इस की फ़साहत व बलागत इस क़दर हद्दे एजाज़ को पहुंची हुई है कि बड़े बड़े फुसहा व बुलगा आप के कलाम को सुन कर दंग रह जाते थे।

 *तेरे  आगे यूं  हैं  दबे लचे फुसहा अरब  के  बड़े  बड़े*
कोई जाने मुंह में ज़बां नहीं, नहीं बल्कि जिस्म में जां नहीं 

࿐  आप ﷺ की मुक़द्दस ज़बान की हुक्मरानी और शान का येह ए’जाज़ था कि ज़बान से जो फ़रमा दिया वोह एक आन में मो'जिज़ा बन कर आलमे वुजूद में आ गया।

      *वोह ज़बां जिस को सब कुन की कुन्जी कहें*
         उस की नाफ़िज़ हुकूमत पे लाखों सलाम 
         *उस की प्यारी फ़साहत पे बेहद दुरूद*
        उस की दिलकश बलाग़त पे लाखों सलाम

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 575 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 365* ༺❘
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࿐  *लुआबे दहन :-* आप ﷺ का लुआबे दहन (थूक) जख्मियों और बीमारों के लिये शिफ़ा और ज़हरों के लिये तिरयाके आ'ज़म था। चुनान्चे आप मोजिज़ात के बयान में पढ़ेंगे कि हज़रते अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنه के पाउं में गारे सौर के अन्दर सांप ने काटा। उस का ज़हर आप ﷺ के लुआबे दहन से उतर गया और ज़ख़्म अच्छा हो गया,  हज़रते अली رضی الله تعالی عنه के आशोबे चश्म के लिये येह लुआबे दहन "शिफ़ाउल ऐन" बन गया।

࿐  हज़रते रिफ़ाआ बिन राफेअ رضی الله تعالی عنه की आंख में जंगे बद्र के दिन तीर लगा और फूट गई मगर आप ﷺ के लुआबे दहन से ऐसी शिफा हासिल हुई दर्द भी जाता रहा और आंख की रौशनी भी बरक़रार रही। हज़रते अबू क़तादा رضی الله تعالی عنه के चेहरे पर तीर लगा, आप ﷺ ने उस पर अपना लुआबे दहन लगा दिया फ़ौरन ही ख़ून बन्द हो गया और फिर ज़िन्दगी भर उन को कभी तीर व तलवार ज़ख़्म न लगा। 

࿐  शिफ़ा के इलावा और भी लुआबे दहन से बड़ी बड़ी मोजिज़ाना बरकात का जुहूर हुवा। चुनान्चे हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه के घर में एक कुंआ था आप ﷺ ने उस में अपना लुआबे दहन डाल दिया तो उस का पानी इतना शीरीं हो गया कि मदीनए मुनव्वरह में इस से बढ़ कर कोई शीरीं कुंआं न था। 

࿐  इमाम बैहक़ी ने येह हदीस रिवायत की है कि रसूलुल्लाह ﷺ आशूरा के दिन दूध पीते बच्चों को बुलाते थे और उन के मुंह में अपना लुआबे दहन डाल देते थे। और उन की माओं को हुक्म देते थे कि वोह रात तक अपने बच्चों को दूध न पिलाएं। आप ﷺ का येही लुआबे दहन उन बच्चों को इस क़दर शिकम सैर और सैराब कर देता था कि उन बच्चों को दिन भर न भूक लगती थी न प्यास। 

        *जिस के पानी से शादाब जानो जिनां* 
         उस दहन की तरावत पे लाखों सलाम 
         *जिस से खारी कूंएं शीरए जां बने*
          उस ज़ुलाले हलावत पे लाखों सलाम

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 576 📚*

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࿐   *आवाज़ मुबारक :-*  येह हज़राते अम्बियाए किराम عَلَیْھِمُ الصَّلٰوةُ وَالسَّلَام के ख़साइस में से है कि वोह खूब सूरत और खुश आवाज़ होते हैं लेकिन हुज़ूर सय्यिदुल मुर्सलीन ﷺ तमाम अम्बिया عَلَیْھِمُ الصَّلٰوةُ وَالسَّلَام से ज़ियादा खूबरू और सब से बढ़ कर खुश गुलू, खुश आवाज़ और खुश कलाम थे, खुश आवाज़ी के साथ साथ आप इस क़दर बुलन्द आवाज़ भी थे कि खुत्बों में दूर और नज़दीक वाले सब यक्सां अपनी अपनी जगह पर आप का मुक़द्दस कलाम सुन लिया करते थे।
 
         *जिस में नहरें हैं शीरो शकर की रवां*
         उस गले की नज़ारत पे लाखों सलाम

࿐   *पुरनूर गरदन :-*  हज़रते हिन्द बिन अबी हाला رضی الله تعالی عنه ने बयान फ़रमाया कि रसूलुल्लाह ﷺ की गरदन मुबारक निहायत ही मो'तदिल, सुराही दार और सुडोल थी। खूब सूरती और सफ़ाई में निहायत ही बे मिस्ल ख़ूब सूरत और चांदी की तरह साफ़ व शफ़्फ़ाफ़ थी।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 577-578📚*

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࿐  *दस्ते रहमत :-* आप ﷺ की मुक़द्दस हथेलियां चौड़ी, पुर गोश्त, कलाइयां लम्बी, बाज़ू दराज़ और गोश्त से भरे हुए थे। हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि मैं ने किसी रेशम और दीबा को आपकी हथेलियों से ज़ियादा नर्म व नाजुक नहीं पाया और न किसी खुश्बू को आप की खुश्बू से बेहतर और बढ़ कर खुश्बूदार पाया।

࿐  जिस शख़्स से आप ﷺ मुसाफहा फ़रमाते वोह दिन भर अपने हाथों को खुश्बूदार पाता। जिस बच्चे के सर पर आप ﷺ अपना दस्ते अक्स फिरा देते थे वोह खुश्बू में तमाम बच्चों से मुमताज़ होता हज़रते जाबिर बिन समुरह رضی الله تعالی عنه का बयान है कि मैं ने हुज़ूर ﷺ के साथ नमाज़े जोहर अदा की फिर आप अपने घर की तरफ़ रवाना हुए और मैं भी आप के साथ ही निकला। आप को देख कर छोटे छोटे बच्चे आप की तरफ दौड़ पड़े तो आप ﷺ उन में से हर एक के रूख़्सार पर अपना दस्ते रहमत फैरने लगे। मैं सामने आया तो मेरे रुख़्सार पर भी आप ने अपना दस्ते मुबारक लगा दिया तो मैं ने अपने गालों पर आप के दस्ते मुबारक की ﷺ ठन्डक महसूस की और ऐसी खुश्बू आई कि गोया आप ने अपना हाथ किसी इत्र फ़रोश की सन्दूकची में से निकाला है।

࿐  इस दस्ते मुबारक से कैसे कैसे मो"जिजात व तसर्रुफ़ात आलमे जुहूर में आए इन का कुछ तज़किरा आप मो'जिज़ात के बयान में पढ़ेंगे।

        *हाथ जिस सम्त उठ्ठा ग़नी कर दिया*
          मौजे बहरे समाहत पे लाखों सलाम 
         *जिस को बारे दो आलम की परवा नहीं*
           ऐसे बाज़ू की कुव्वत पे लाखों सलाम 
         *काबए  दीनो  ईमां  के   दोनों  सुतूं*
            साइदैने रिसालत पे लाखों सलाम 
          *जिस के हर ख़त में है मौजे नूरे करम* 
          उस कफ़े बहरे हिम्मत पे लाखों सलाम
          *नूर  के  चश्मे   लहराएं  दरिया  बहें*
           उंगलियों की करामत पे लाखों सलाम

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 578-579 📚*

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࿐  *शिकम व सीना :-* आप ﷺ का शिकम व सीनए अदस दोनों हमवार और बराबर थे न सीना शिकम से ऊंचा था न शिकम सीने से आप ﷺ का सीना चौड़ा था और सीने के ऊपर के हिस्से से नाफ़ तक मुकद्दस बालों की एक पतली सी लकीर चली गई थी मुक़द्दस छतियां और पूरा शिकम बालों से खाली था हां, शानों और कलाइयों पर कदरे बाल थे!

࿐  आप ﷺ का शिकम सब्र व क़नाअत की एक दुन्या और आप ﷺ का सीना मारिफ़ते इलाही के अन्वार का सफ़ीना और वहये इलाही का गन्जीना था।

      *कुल जहां मिल्क और जव की रोटी गिज़ा*
      *उस शिकम की क़नाअत पे लाखों सलाम*

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 580 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 369* ༺❘
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࿐  *पाए अक्दस :-* आप ﷺ के मुक़द्दस पाउं चौड़े पुर गोश्त, एड़ियां कम गोश्त वाली, तल्वा ऊंचा जो ज़मीन में न लगता था। दोनों पिंडलियां क़दरे पतली और साफ़ व शफ़्फ़ाफ़, पाउं की नर्मी और नज़ाकत का येह आलम था कि उन पर पानी ज़रा भी नहीं ठहरता था।

࿐ आप  ﷺ चलने में बहुत ही वकार व तवाज़ोअ के साथ क़दम शरीफ़ को ज़मीन पर रखते थे। हज़रते अबु हुरैरा رضی الله تعالی عنه का बयान है कि चलने में मैंने हुज़ूर ﷺ से बढ़ कर तेज रफ़्तार किसी को नहीं देखा गोया ज़मीन आप के लिये लपेटी जाती थी। हम लोग आप के साथ दौड़ा करते थे और तेज़ चलने से मशक्कत में पड़ जाते थे मगर आप ﷺ निहायत ही वकार व सुकून के साथ चलते रहते थे मगर फिर भी हम सब लोगों से आप आगे ही रहते थे।  

          *साके अस्ले क़दम शाखे नख़्ले करम*
              शमए  राहे  इसाबत  पे  लाखों     
      *सलाम खाई कुरआं ने खाके गुज़र की क़सम*
        उस  कफ़े  पा  की  हुरमत  पे लाखों  सलाम

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 580 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 370* ༺❘
           *❝   शमाइल व खसाइल ❞*
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࿐  *लिबास :-*  हुज़ूर ﷺ ज़ियादा तर सूती लिबास पहनते थे ऊन और कतान का लिबास भी कभी कभी आपने इस्तिमाल फ़रमाया है, लिबास के बारे में किसी खास पोशाक या इमतियाज़ी लिबास की पाबन्दी नहीं फ़रमाते थे। जुब्बा, कुब्बा, पैरहन, तहमद, हुल्ला, चादर, इमामा, टोपी, मोज़ा इन सब को आप ﷺ ने जैबे तन फ़रमाया है। पाएजामा को आप ने पसन्द फ़रमाया और मिना के बाज़ार में एक पाएजामा खरीदा भी था लेकिन येह साबित नहीं कि कभी आप ने पाएजामा पहना हो।

࿐  *इमामा :-* आप ﷺ इमामे में शिम्ला छोड़ते थे जो कभी एक शाने पर और कभी दोनों शानों के दरमियान पड़ा रहता था। आप ﷺ का इमामा सफ़ेद, सब्ज़, जाफ़रानी, सियाह रंग का काले रंग का इमामा था। फ़त्हे मक्का के दिन आप ﷺ काले रंग का इमामा बांधे हुए थे!

࿐   इमामे के नीचे टोपी' ज़रूर होती थी फ़रमाया करते थे कि हमारे और मुशरिकीन के इमामों में येही फ़र्क़ व इमतियाज़ है कि हम टोपियों पर इमामा बांधते हैं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 581 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 371* ༺❘
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࿐  *चादर :-* यमन की तय्यार शुदा सूती धारीदार चादरें जो अरब में "हबरह" या बुर्दे यमानी कहलाती थीं आप ﷺ को बहुत ज़ियादा पसन्द थीं और आप इन चादरों को ब कसरत इस्ति'माल फ़रमाते थे। कभी कभी सब्ज़ रंग की चादर भी आप ﷺ ने इस्ति'माल फ़रमाई है।

࿐  *कमली :-*  आप ﷺ कमली भी ब कसरत इस्ति' माल फ़रमाते थे यहां तक कि ब वक्ते वफ़ात भी एक कमली ओढ़े हुए थे। हज़रते अबू बरदह رضی الله تعالی عنه का बयान है कि हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها एक मोटा कम्बल और एक मोटे कपड़े का तहबन्द निकाला और फ़रमाया कि इन्ही दोनों कपड़ों में हुज़ूर ﷺ ने वफ़ात पाई।

࿐  *ना'लैने अक्दस :-* हुज़ूर ﷺ की ना'लैने अक्दस की शक्लो सूरत और नक्शा बिल्कुल ऐसा ही था जैसे हिन्दूस्तान में चप्पल होते हैं। चमड़े का एक तला होता था जिस में तस्मे लगे होते थे आप ﷺ की मुक़द्दस जूतियों में दो तस्मे आम तौर पर लगे होते थे जो कुरूम चमड़े के हुवा करते थे।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 581-582 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 372* ༺❘
           *❝   शमाइल व खसाइल ❞*
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࿐  *पसन्दीदा रंग :-*  आप ﷺ ने सफ़ेद, सियाह, सब्ज़, जाफ़रानी रंगों के कपड़े इस्तिमाल फ़रमाए हैं। मगर सफ़ेद कपड़ा आप को बहुत ज़ियादा महबूब व मरगूब था, सुर्ख रंग के कपड़ों को आप बहुत ज़ियादा ना पसन्द फ़रमाते थे। एक मरतबा हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर رضی الله تعالی عنه सुर्ख रंग के कपड़े पहने हुए बारगाहे अक्दस में हाजिर हुए तो आप ﷺ ने ना गवारी जाहिर फ़रमाते हुए दरयाप्त फ़रमाया कि येह कपड़ा कैसा है ? उन्हों ने उन कपड़ों को जला दिया। आप ﷺ ने सुना तो फ़रमाया कि उस को जलाने की ज़रूरत नहीं थी किसी औरत को दे देना चाहिये था क्यूं कि औरतों के लिये सुर्ख लिबास पहनने में कोई हर नहीं है। इसी तरह हुज़ूर ﷺ एक मरतबा एक ऐसे शख़्स के पास से गुज़रे जो दो सुर्ख रंग के कपड़े पहने हुए था उस ने आप ﷺ को सलाम किया तो आप ने उस के सलाम का जवाब नहीं दिया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 583 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 373* ༺❘
           *❝   शमाइल व खसाइल ❞*
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࿐  *अंगूठी :-*  जब आप ﷺ ने बादशाहों के नाम दावते इस्लाम के खुतूत भेजने का इरादा फ़रमाया तो लोगों ने कहा कि सलातीन बिग़ैर मोहर वाले खुतूत को क़बूल नहीं करते तो आप ﷺ ने चांदी की एक अंगूठी बनवाई जिस पर ऊपर तले तीन सत्रों में "مُحَمَّدٌّ رَّسُوْلُ اللّٰه" कन्दा किया हुवा था।

࿐  *खुश्बू :-* आप ﷺ को खुश्बू बहुत ज़ियादा पसन्द थी आप ﷺ हमेशा इत्र का इस्तिमाल फ़रमाया करते थे हालां कि खुद आप ﷺ के जिसमे अतहर से ऐसी खुश्बू निकलती थी कि जिस गली में से आप गुज़र जाते थे वोह गली मुअत्तर हो जाती थी। आप ﷺ फ़रमाया करते थे कि मर्दों की खुश्बू ऐसी होनी चाहिये। कि खुश्बू फैले और रंग नज़र न आए और औरतों के लिये वोह खुश्बू बेहतर है कि वोह खुश्बू न फैले और रंग नज़र आए। कोई आप ﷺ के पास खुश्बू भेजता तो आप कभी रद न फ़रमाते और इरशाद फ़रमाते कि खुश्बू के तोहफ़े को रद मत करो क्यूं कि येह जन्नत से निकली हुई है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 584 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 374* ༺❘
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࿐  *सुरमा :-*  हुज़ूर ﷺ रोज़ाना रात को "इसमिद" का सुरमा लगाया करते थे। आप ﷺ के पास एक सुरमा दानी थी उस में से तीन तीन सलाई दोनों आंखों में लगाया करते थे और फ़रमाया करते थे कि इसमिद का सुरमा लगाया करो येह निगाह को रौशन और तेज़ करता है और पलक के बाल उगाता है। 

࿐  *सुवारी :-*  घोड़े की सुवारी आप ﷺ को बहुत पसन्द थी, घोड़ों के इलावा ऊंट, खच्चर हिमार (अरबी गधा जो घोड़े से ज़ियादा खूब सूरत होता है) पर भी सुवारी फ़रमाई है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 585 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 375* ༺❘
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࿐  *नफासत पसन्दी :-* हुज़ूरे अक्दस ﷺ का मिज़ाजे अक्दस निहायत ही लतीफ़ और नफ़ासत पसन्द था। एक आदमी को आप ﷺ ने मैले कपड़े पहने हुए देखा तो ना गवारी के साथ इरशाद फ़रमाया कि 'इस से इतना भी नहीं होता कि येह अपने कपड़ों को धो लिया करे ? इसी तरह एक शख़्स को देखा कि उस के बाल उलझे हुए हैं तो फ़रमाया कि क्या इस को कोई ऐसी चीज़ (तेलकंघी) नहीं मिलती कि येह अपने बालों को संवार ले।

࿐  इसी तरह एक आदमी आप ﷺ के पास बहुत ही खराब क़िस्म के कपड़े पहने हुए आ गया तो आप ﷺ ने उस से दरयाफ़्त फ़रमाया कि तुम्हारे पास क्या कुछ माल भी है? उस ने अर्ज़ किया कि जी हां मेरे पास ऊंट बकरियां घोड़े गुलाम सभी क़िस्म के माल हैं। तो आप ﷺ ने फ़रमाया कि जब अल्लाह तआला ने तुम को माल दिया है तो चाहिये कि तुम्हारे ऊपर उस की ने'मतों का कुछ निशान भी नज़र आए। (या'नी अच्छे और साफ़ सुथरे कपड़े पहनो)

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 585 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

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࿐  *मरगूब गिज़ाएं :-*  हुज़ूरे अक्दस ﷺ की मुक़द्दस ज़िन्दगी चूंकि बिल्कुल ही ज़ाहिदाना और सब्र व कनाअत का मुकम्मल नुमूना थी इस लिये आप ﷺ कभी लज़ीज़ और पुर तकल्लुफ़ खानों की ख़्वाहिश ही नहीं फ़रमाते थे यहां तक कि कभी आप ने चपाती नहीं खाई फिर भी बाज़ खाने आप ﷺ को बहुत पसन्द थे जिन को बड़ी रग़बत के साथ आप तनावुल फ़रमाते थे। मसलन अरब में एक खाना होता है जो "हैस" कहलाता है येह घी, पनीर और खजूर मिला कर पकाया जाता है इस को आप बड़ी रगबत के साथ खाते थे।

࿐   जव की मोटी मोटी रोटियां अकसर ग़िज़ा में इस्ति'माल फ़रमाते, सालनों में गोश्त, सिर्का, शहद, रोगने जैतून, कद्दू खुसूसिय्यत के साथ मरगूब थे। गोश्त में कद्दू पड़ा होता तो प्याले में से कद्दू के टुकड़े तलाश कर के खाते थे। आप ﷺ ने बकरी, दुम्बा, भेड़, ऊंट, गोरखर, खरगोश, मुर्ग, बटेर, मछली का गोश्त खाया है । इसी तरह खजूर और सत्तू भी ब कसरत तनावुल फ़रमाते थे। तरबूज़ को खजूर के साथ मिला कर, 'खजूर के साथ ककड़ी मिला कर, रोटी के साथ खजूर भी कभी कभी तनावुल फ़रमाया करते थे। अंगूर, अनार वग़ैरा फल फ्रूट भी खाया करते थे।

࿐   ठन्डा पानी बहुत मरगूब था दूध में कभी पानी मिला कर और कभी खालिस दूध नोश फ़रमाते कभी किशमिश और खजूर पानी में मिला कर उस का रस पीते थे जो कुछ पीते तीन सांस में नोश फ़रमाते। टेबल (मेज़) पर कभी खाना तनावुल नहीं फ़रमाया, हमेशा कपड़े या चमड़े के दस्तर ख़्वान पर खाना खाते, मस्नद या तक्ये पर टेक लगा कर या लेट कर कभी कुछ न खाते न इस को पसन्द फ़रमाते। खाना सिर्फ उंगलियों से तनावुल फ़रमाते चमचा कांटा वग़ैरा से खाना पसन्द नहीं फ़रमाते थे। हां उबले हुए गोश्त को कभी कभी छुरी से काट काट कर भी खाते थे।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 586 📚*

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࿐  *'रोज़ मर्रा के मा'मूलात :-* अहादीसे करीमा के मुतालए से पता चलता है कि आप ﷺ ने अपने दिन रात के अवक़ात को तीन हिस्सों में तक्सीम कर रखा था। एक : ख़ुदा की इबादत के लिये, दूसरा : आम मलूक के लिये, तीसरा : अपनी जात के लिये।
 
࿐   आम तौर पर आप ﷺ का येह मामूल था कि नमाज़े फज्र के बाद आप अपने मुसल्ले पर बैठ जाते यहां तक कि आफ्ताब खूब बुलन्द हो जाता। आम लोगों से मुलाकात का ही खास वक़्त था। लोग आपकी खिदमते अक्दस में हाज़िर होते और अपनी हाजात व ज़रूरिय्यात को आप ﷺ की बारगाह में पेश करते। आप ﷺ उन की जरूरिय्यात को पूरी फ़रमाते और लोगों को मसाइल व अहकामे इस्लाम की तालीम व तलक़ीन फ़रमाते। अपने और लोगों के ख़्वाबों की ता' बीर बयान फ़रमाते। इस के बाद मुख्तलिफ किस्म की गुफ्तगू फ़रमाते। कभी कभी लोग ज़मानए जाहिलिय्यत की बातों और रस्मों का तज़किरा करते और हंसते तो हुज़ूर ﷺ भी मुस्कुरा देते कभी कभी सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم आप को अशआर भी सुनाते। 

࿐   अकसर इसी वक़्त में माले गनीमत और वज़ाइफ़ की तक्सीम भी फ़रमाते। जब सूरज खूब बुलन्द हो जाता तो कभी चार रकअत कभी आठ रकअत नमाज़े चाश्त अदा फ़रमाते फिर अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن के हुजरों में तशरीफ़ ले जाते और घरेलू जरूरिय्यात के बन्दोबस्त में मसरूफ़ हो जाते और घर के कामकाज में अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن की मदद फ़रमाते। 

࿐   नमाज़े असर के बाद आप तमाम अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن को शरफे मुलाकात से सरफराज फरमाते और सब के हुजरों में थोड़ी थोड़ी देर ठहर कर कुछ गुफ्तगू फरमाते फिर जिस की बारी होती वहीं रात बसर फ़रमाते, तमाम अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن वहीं जम्अ हो जातीं, इशा तक आप ﷺ उन से बातचीत फ़रमाते रहते फिर नमाज़े इशा के लिये मस्जिद में तशरीफ़ ले जाते और मस्जिद से वापस आ कर आराम फरमाते और इशा के बाद बातचीत को ना पसन्द फ़रमाते!

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 586-588 📚*

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࿐  *सोना जागना :-*  नमाज़े इशा पढ़ कर आराम करना आम तौर पर येही आप ﷺ का मामूल था, सोने से पहले कुरआने मजीद की कुछ सूरतें ज़रूर तिलावत फ़रमाते और कुछ दुआओं का भी विर्द फ़रमाते फिर अकसर येह दुआ पढ़ कर दाहिनी करवट पर लेट जाते कि اللّٰهُمَّ بِاسْمِكَ اَمُوْتُ وَاَحْيٰ या अल्लाह ! तेरा नाम ले कर वफ़ात पाता हूं और ज़िन्दा रहता हूं, नींद से बेदार होते तो अकसर येह दुआ पढ़ते कि اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذِىْ اَحْيَانَا بَعْدَ مَا اَمَاتَنَا وَالَيْهِ النُّشُوْرُ उस खुदा के लिये हम्द है जिस ने मौत के बा'द हम को ज़िन्दा किया और उसी की तरफ़ हश्र होगा।

࿐  आधी रात या पहर रात रहे बिस्तर से उठ जाते मिस्वाक फ़रमाते फिर वुज़ू करते और इबादत में मश्गूल हो जाते। तिलावत फ़रमाते, मुख्तलिफ़ दुआओं का वज़ीफ़ा फ़रमाते, खुसूसिय्यत के साथ नमाज़े तहज्जुद अदा फ़रमाते, तहज्जुद की नमाज़ में कभी लम्बी लम्बी कभी छोटी छोटी सूरतें पढ़ते, जोफ़े पीरी में कभी कुछ रक्तें बैठ कर भी अदा फ़रमाते, नमाज़े तहज्जुद के बाद वित्र पढ़ते और फिर सुबह सादिक़ तुलूअ हो जाने के बाद सुन्नते फज्र अदा फ़रमा कर नमाज़े फज्र के लिये मस्जिद में तशरीफ़ ले जाते, कभी कभी कई बार रात में सोते और जागते और कुरआने मजीद की आयात तिलावत फ़रमाते और कभी अवाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن से गुफ़्तगू भी फ़रमाते।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 588 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 379* ༺❘
           *❝   शमाइल व खसाइल ❞*
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࿐   *रफ़्तार :-*  हुज़ूर ﷺ बहुत ही बा वकार रफ़्तार के साथ चलते थे। हज़रते अली رضی الله تعالی عنه का बयान है कि ब वक्ते रफ़्तार कुछ हुज़ूर ﷺ ज़रा झुक कर चलते और ऐसा मालूम होता था कि गोया आप किसी बुलन्दी से उतर रहे हैं हज़रते अबू हुरैरा رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि आप ﷺ इस क़दर तेज़ चलते थे कि गोया ज़मीन आप के क़दमों के नीचे से लपेटी जा रही है। हम लोग आप के साथ चलने में हांपने लगते और मशक्क़त में पड़ जाते थे मगर हुज़ूर बिला तकल्लुफ़ बिग़ैर किसी मशक्कत के तेज़ रफ़्तारी के साथ चलते रहते थे। 

࿐   *कलाम :-*  हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها ने फ़रमाया कि हुज़ूर  ﷺ बहुत तेज़ी के साथ जल्दी जल्दी गुफ़्तगू नहीं फ़रमाते थे बल्कि निहायत ही मतानत और सन्जीदगी से ठहर ठहर कर कलाम फ़रमाते थे बल्कि कलाम इतना साफ और वाजेह होता था कि सुनने वाले उस को समझ कर याद कर लेते थे। अगर कोई अहम बात होती तो उस जुम्ले को कभी कभी तीन तीन मरतबा फ़रमा देते ताकि सामिईन उस को अच्छी तरह ज़ेह्न नशीन कर लें। आप ﷺ को “जवामिउल कलम” का मो'जिज़ा अता किया गया था कि मुख़्तसर से जुम्ले में लम्बी चौड़ी बात को बयान फ़रमा दिया करते थे। हज़रते हिन्द बिन अबू हाला رضی الله تعالی عنه का बयान है कि आप ﷺ बिला ज़रूरत गुफ़्तगू नहीं फ़रमाते थे बल्कि अकसर ख़ामोश ही रहते थे। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 589 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 380* ༺❘
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࿐  *दरबारे नुबुव्वत :-* हुज़ूर ताजदारे दो आलम ﷺ का दरबार सलातीन और बादशाहों जैसा दरबार न था। येह दरबार तख़्तो ताज, नक़ीब व से क़तअन बे दरबान, पहरेदार और बॉडीगार्ड वगैरा के तकल्लुफात नियाज़ था। मस्जिदे नबवी के सेहन में सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم एक छोटा सा मिट्टी का चबूतरा बना दिया था येही ताजदारे रिसालत ﷺ का वोह तख़्ते शाही था जिस पर एक चटाई बिछा कर दोनों आलम के ताजदार और शहनशाहे कौनैन ﷺ रौनक अफरोज होते थे मगर इस सादगी के वा वुजूद जलाले नुबुव्वत से हर बावजूद शख्स उस दरबार में पैकरे तस्वीर नज़र आता था। बुखारी शरीफ वगैरा की रिवायात में आया है कि लोग आप ﷺ के दरबार में बैठते तो ऐसा मालूम होता था कि गोया उन के सरों पर चिड़ियां बैठी हुई हैं कोई ज़रा जुम्बिश नहीं करता था!

࿐  आप ﷺ अपने इस दरबार में सब से पहले अहले हाजत की तरफ़ तवज्जोह फ़रमाते और सब की दरख्वास्तों को सुनकर उनकी हाजत रवाई फ़रमाते क़बाइल के नुमाइन्दों से मुलाकातें फ़रमाते तमाम हाज़िरीन कमाले अदब से सर झुकाए रहते और जब आप ﷺ कुछ इरशाद फ़रमाते तो मजलिस पर सन्नाटा छा जाता और सब लोग हमातन गोश हो कर शहनशाहे कौनैन ﷺ के फ़रमाने नुबुव्वत को सुनते। आप ﷺ के दरबार में आने वालों के लिये कोई रोक टोक नहीं थी अमीर व फ़क़ीर शहरी और बदवी सब किस्म के लोग हाज़िरे दरबार होते और अपने अपने लहजों में सुवाल व जवाब करते कोई शख्स अगर बोलता तो ख्वाह वोह कितना ही गरीब व मिस्कीन क्यूं न हो मगर दूसरा शख़्स अगर्चे वोह कितना ही बड़ा अमीर कबीर हो उस की बात काट कर बोल नहीं सकता था। سبحان الله 

    *वोह आदिल जिस के मीजाने अदालत में बराबर हैं*
     *गुबारे  मस्कनत  हो  या  वकारे  ताजे  सुल्तानी*

࿐   जो लोग सुवाल व जवाब में हद से ज़ियादा बढ़ जाते तो आप ﷺ कमाले हिल्म से बरदाश्त फ़रमाते और सब को मसाइल व अहकामे इस्लाम की तालीम व तल्कीन और मवाइज व नसाएह फ़रमाते रहते और अपने मख़्सूस अस्साब رضی الله تعالی عنهم से मशवरा भी फ़रमाते रहते और सुल्ह व जंग और उम्मत के निज़ाम व इनतिज़ाम के बारे में ज़रूरी अहकाम भी सादिर फ़रमाया करते थे। इसी दरबार में आप मुक़द्दमात का फ़ैसला भी फ़रमाते थे।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 590-591 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 381* ༺❘
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࿐  *ताजदारे दो आलम ﷺ के खुत्बात :-* नबी व रसूल चूंकि दीन के दाई और शरीअत व मिल्लत के मुबल्लिग होते हैं और तालीमे शरीअत और तल्कीने दीन का बेहतरीन 'जरीआ खुत्बा और वा'ज़ ही है इस लिये हर नबी व रसूल का खतीब और वाइज़ होना ज़रूरिय्यात व लवाज़िमे नुबुव्वत में से है। यही वजह है कि जब अल्लाह तआला ने हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम को अपनी रिसालत से सरफ़राज़ फ़रमा कर फ़िरऔन के पास भेजा तो हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम ने उस वक़्त यह दुआ मांगी कि :

 رَبِّ اشْرَحْ لِیْ صَدْرِیْ(25)وَ یَسِّرْ لِیْۤ اَمْرِیْ(26)وَ احْلُلْ عُقْدَةً مِّنْ لِّسَانِیْ(27)یَفْقَهُوْا قَوْلِیْ(28)

ऐ मेरे रब मेरा सीना खोल दे मेरे लिये मेरा काम आसान कर और मेरी जवान की गिरह खोल दे कि वोह लोग मेरी बात समझें।

࿐   हुज़ूर अक्दस ﷺ चूंकि तमाम रसूलों के सरदार और सब नबियों के खातिम हैं इस लिये खुदा वन्दे कुद्दूस ने आप ﷺ को ख़िताबत व तक़रीर में ऐसा बे मिसाल कमाल अता फरमाया कि आप ﷺ अफ़सहुल अरब (तमाम अरब में सब से बढ़ कर फ़सीह) हुए और आप ﷺ को जवामिउल कलम का मोजिज़ा बख़्शा गया कि आप की ज़बाने मुबारक से निकले हुए एक एक लफ्ज़ में मनी व मतालिब का समुन्दर मौजें मारता हुवा नज़र आता था और आप ﷺ के जोशे तकल्लुम की तासीरात से सामिईन के दिलों की दुन्या में इन्किलाबे अज़ीम पैदा हो जाता था।

࿐   चुनान्चे जुमुआ व ईदैन के खुत्बों के सिवा सेंकड़ों मवाकेअ पर आप ﷺ ने ऐसे ऐसे फ़सीहो बलीग खुत्बात और मुअस्सिर मवाइज़ इरशाद फ़रमाए कि फुसहाए अरब हैरान रह गए और उन खुत्बों के असरात व तासीरात से बड़े बड़े संगदिलों के दिल मोम की तरह पिघल गए और दम ज़दन में उन के कुलूब की दुन्या ही बदल गई। चूंकि आप ﷺ मुख्तलिफ हैसिय्यतों के जामेअ थे इस लिये आप की यह मुख्तलिफ हैसिय्यात आप ﷺ के खुत्बात के तर्जे़ बयान पर असर अन्दाज़ हुवा करती थीं। आप एक दीन के दाई भी थे, फतेह भी थे, अमीरे लश्कर भी थे, मुस्लिहे क़ौम भी थे, फ़रमां रवा भी थे, इस लिये इन हैसियतों के लिहाज़ से आप के खुत्बात में किस्म किस्म का ज़ोरे बयान और तरह तरह का जोशे कलाम हुवा करता था। जोशे बयान का यह आलम था कि वसा अवकात खुत्बे के दौरान में आप की ﷺ आंखें सुर्ख और आवाज़ बहुत ही बुलन्द हो जाती थी और जलाले नुबुव्वत 'के जज्बात से आप के चेहरए अन्वर पर गज़ब के आसार नुमूदार हो जाते थे बार बार उंगलियों को उठा उठा कर इशारा फ़रमाते थे गोया ऐसा मालूम होता था कि आप किसी लश्कर को ललकार रहे हैं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह 591-592 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 382* ༺❘
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࿐  *ताजदारे दो आलम के खुत्बात :-*  चुनान्चे हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर رضی الله تعالی عنه आप ﷺ के पुरजोश खुत्बे और तक़रीर के जोशो खरोश की बेहतरीन तस्वीर खींचते हुए इरशाद फ़रमाते हैं कि मैं ने हुज़ूर ﷺ को मिम्बर पर खुत्बा देते सुना, आप ﷺ फरमा रहे थे खुदा वन्दे जब्बार आस्मानों और ज़मीन को अपने हाथ में ले लेगा, फिर फ़रमाएगा कि मैं जब्बार हूं, मैं बादशाह हूं, कहां हैं जब्बार लोग ? किधर हैं मुतकब्बिरीन? येह फ़रमाते हुए हुज़ूर ﷺ कभी मुठ्ठी बन्द कर लेते कभी मुठ्ठी खोल देते और आप का जिस्मे अक्दस (जोश में) कभी दाएं कभी बाएं झुक झुक जाता यहां तक कि मैं ने यह देखा कि मिम्बर का निचला हिस्सा भी इस क़दर हिल रहा था कि मैं (अपने दिल में) येह कहने लगा कि कहीं येह मिम्बर आप ﷺ को ले कर गिर तो नहीं पड़ेगा! 

࿐  आप ने मिम्बर पर, ज़मीन पर, ऊंट की पीठ पर खड़े हो कर जैसा मौक़अ पेश आया खुत्बा दिया है। कभी कभी आप  ﷺ ने तवील खुत्बात भी दिये लेकिन आम तौर पर आप के खुत्बात बहुत मुख़्तसर मगर जामेअ होते थे। मैदाने जंग में आप ﷺ कमान पर टेक लगा कर खुत्बा इरशाद फ़रमाते और मस्जिदों में जुमुआ का खुबा पढ़ते वक़्त दस्ते मुबारक में "असा" होता था। आप ﷺ के खुत्बों के असरात का यह आलम होता था कि बाज़ मरतबा सख्त से सख्त इश्तिआल अंगेज़ मौकओं पर आप के चन्द जुम्ले महब्बत का दरिया बहा देते थे। 

࿐  हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه का बयान है कि एक दिन आप ﷺ ने ऐसा असर अंगेज़ और वल्वला ख़ैज़ खुत्बा पढ़ा कि मैं ने कभी ऐसा खुत्बा नहीं सुना था दरमियाने खुत्बा में आप ने येह इरशाद फ़रमाया कि ऐ लोगों ! जो मैं जानता हूं अगर तुम जान लेते तो हंसते कम और रोते ज़ियादा। ज़बाने मुबारक से इस जुम्ले का निकलना था कि सामेईन का यह हाल हो गया कि लोग कपड़ों में मुंह छुपा छुपा कर जारो क़ितार रोने लगे। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह 593-594 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 383* ༺❘
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࿐  *सरवरे काएनात की इबादात :-* हुज़ूरे अक्दस ﷺ बा वुजूद बे शुमार मशागिल के इतने बड़े इबादत गुज़ार थे कि तमाम अम्बिया व मुर्सलीन عَلَیْھِمُ الصَّلٰوةُ وَالسَّلَام की मुक़द्दस ज़िन्दगियों में इस की मिसाल मिलनी दुश्वार है बल्कि सच तो येह है कि तमाम अम्बियाए साबिक़ीन के बारे में सहीह तौर से येह भी नहीं मालूम हो सकता कि उन का तरीकए इबादत क्या था? और उन के कौन कौन से अवकात इबादतों के लिये मख़्सूस थे ? तमाम अम्बिया عَلَیْھِمُ الصَّلٰوةُ وَالسَّلَام की उम्मतों में येह फ़ख़्रो शरफ़ सिर्फ हुज़ूर खातमुल अम्बिया ﷺ के सहाबा رضی الله تعالی عنهم ही को हासिल है कि उन्हों ने अपने प्यारे रसूलुल्लाह ﷺ की इबादत के तमाम तरीकों, इनके अवात व कैफिय्यात गरज़ इस के एक एक जुज़इय्ये को महफूज़ रखा है।

࿐  घरों के अन्दर और रातों की तारीकियों में आप ﷺ जो और जिस क़दर इबादतें फ़रमाते थे उन को अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ने देख कर याद रखा और सारी उम्मत को बता दिया और घर के बाहर की इबादतों को हज़राते सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم ने निहायत ही एहतिमाम के साथ अपनी आंखों से देख देख कर अपने ज़ेह्नों में महफूज़ कर लिया और आप ﷺ के क़ियाम व कुऊद, रुकूअ व सुजूद और उन की कमियात व कैफ़िय्यात, अज़कार और दुआओं के बि ऐनही अल्फ़ाज़ यहां तक कि आप के इरशादात और खुशूओ खुजूअ की कैफिय्यात को भी अपनी याददाश्त के खजानों में महफूज़ कर लिया। 

࿐  फिर उम्मत के सामने इन इबादतों का इस क़दर चर्चा किया कि न सिर्फ किताबों के अवराक़ में वोह महफूज़ हो कर रह गए बल्कि उम्मत के एक एक फ़र्द यहां तक कि पर्दा नशीन ख़वातीन को भी उनका इल्म हासिल हो गया और आज मुसलमानों का एक एक बच्चा ख़्वाह वोह कुर्रए ज़मीन के किसी भी गोशे में रहता हो उस को अपने नबी ﷺ की इबादतों के मुकम्मल हालात मालूम हैं और वोह उन इबादतों पर अपने नबी ﷺ की इत्तिबा में जोशे ईमान और जज़्बए अमल के साथ कारबन्द है। आप ﷺ की इबादतों का एक इज्माली खाका हस्बे ज़ैल है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह 594-595 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 384* ༺❘
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࿐  *नमाज़ :-*  ए'लाने नुबुव्वत से क़ब्ल भी आप ﷺ गारे हिरा में कियाम व मुराक़बा और ज़िक्रो फ़िक्र के तौर पर खुदा की इबादत में मसरूफ़ रहते थे, नुज़ूले वहय के बाद ही आप को नमाज़ का तरीका भी बता दिया गया, फिर शबे मेराज में नमाज़े पन्जगाना फ़र्ज़ हुई। हुज़ूर ﷺ नमाज़े पन्जगाना के इलावा नमाज़े इश्राक, नमाज़े चाश्त, तहिय्यतुल वुज़ू, तहिय्यतुल मस्जिद, सलातुल अव्वाबीन वग़ैरा सुनन व नवाफ़िल भी अदा फ़रमाते थे। रातों को उठ उठ कर नमाजें पढ़ा करते थे। तमाम उम्र नमाज़े तहज्जुद के पाबन्द रहे, रातों के नवाफिल के बारे में मुख्तलिफ़ रिवायात हैं। बा'ज़ रिवायतों में येह आया है कि आप ﷺ नमाज़े इशा के बाद कुछ देर सोते फिर कुछ देर तक उठ कर नमाज़ पढ़ते फिर सो जाते फिर उठ कर नमाज़ पढ़ते। गरज़ सुबह तक येही हालत काइम रहती। 

࿐  कभी दो तिहाई रात गुज़र जाने के बा'द बेदार होते और सुब्हे सादिक तक नमाज़ों में मश्गूल रहते। कभी निस्फ़ रात गुज़र जाने के बाद बिस्तर से उठ जाते और फिर सारी रात बिस्तर पर पीठ नहीं लगाते थे और लम्बी लम्बी सूरतें नमाज़ों में पढ़ा करते कभी रुकूअ व सुजूद तवील होता कभी कियाम तवील होता। कभी छे रक्अत, कभी आठ रकअत, कभी इस से कम कभी इस से ज़ियादा। अखीर उम्र शरीफ़ में कुछ रक्तें खड़े हो कर कुछ बैठ कर अदा फ़रमाते, नमाज़े वित्र नमाज़े तहज्जुद के साथ अदा फ़रमाते, रमज़ान शरीफ़ खुसूसन आखिरी अशरे में आप ﷺ की इबादत बहुत ज़ियादा बढ़ जाती थी। आप सारी रात बेदार रहते और अपनी अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن से बे तअल्लुक़ हो जाते थे और घर वालों को नमाज़ों के लिये जगाया करते थे और उमूमन ए'तिकाफ़ फ़रमाते थे। 

࿐  नमाज़ों के साथ साथ कभी खड़े हो कर, कभी बैठ कर, कभी सर ब सुजूद हो कर निहायत आहो ज़ारी और गिर्या व बुका के साथ गिड़गिड़ा गिड़गिड़ा कर रातों में दुआएं भी मांगा करते, रमज़ान शरीफ़ में हज़रते जिब्रील अलैहिस्सलाम के साथ कुरआने अज़ीम का दौर भी फ़रमाते और तिलावते कुरआने मजीद के साथ साथ तरह तरह की मुख्तलिफ दुआओं का विर्द भी फ़रमाते थे और कभी कभी सारी रात नमाज़ों और दुआओं में खड़े रहते यहां तक कि पाए अक्स में वरम आ जाया करता था।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 596 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 385* ༺❘
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࿐  *रोज़ा :-*  रमज़ान शरीफ़ के रोज़ों के इलावा शाबान में भी क़रीब क़रीब महीना भर आप रोज़ादार ही रहते थे। साल के बाकी महीनों में भी येही कैफ़िय्यत रहती थी कि अगर रोज़ा रखना शुरूअ फ़रमा 'देते तो मालूम होता था कि अब कभी रोज़ा नहीं छोड़ेंगे फिर तर्क फ़रमा देते तो मालूम होता था कि अब कभी रोज़ा नहीं रखेंगे। खास कर हर महीने में तीन दिन अय्यामे बीज़ के रोज़े, दो शम्बा व जुमारात के रोज़े, आशूरा के रोज़े, अशरए जुल हिज्जा के रोज़े, शव्वाल के छे रोज़े, मामूलन रखा करते थे। 

࿐  कभी कभी आप "सौमे विसाल" भी रखते थे, यानी कई कई दिन रात का एक रोज़ा, मगर अपनी उम्मत को ऐसा रोज़ा रखने से मन्अ फ़रमाते थे, बाज़ सहाबा رضی الله تعالی عنهم अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ आप तो सौमे विसाल रखते हैं। इरशाद फ़रमाया कि तुम में मुझ जैसा कौन है? मैं अपने रब के दरबार में रात बसर करता हूं और वोह मुझ को (रूहानी गिजा) खिलाता और पिलाता है। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 597 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 386* ༺❘
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࿐  *ज़कात :-*  चूंकि हज़राते अम्बिया عَلَیْھِمُ الصَّلٰوةُ وَالسَّلَام पर खुदा वन्दे कुद्दूस ने ज़कात फ़र्ज़ ही नहीं फ़रमाई है इस लिये आप ﷺ पर ज़कात फ़र्ज़ ही नहीं थी। लेकिन आप ﷺ के सदक़ात व खैरात का येह आलम था कि आप ﷺ अपने पास सोना चांदी या तिजारत का कोई सामान या मवेशियों का कोई रेवड़ रखते ही नहीं थे बल्कि जो कुछ भी आप के पास आता सब खुदा की राह में मुस्तहिकीन पर तक्सीम फ़रमा दिया करते थे। 

࿐  आप ﷺ को येह गवारा ही नहीं था कि रात भर कोई माल व दौलत काशानए नुबुव्वत में रह जाए। एक मरतबा ऐसा इत्तिफ़ाक़ पड़ा कि खिराज की रकम इस क़दर ज़ियादा आ गई कि वोह शाम तक तक्सीम करने के बा वुजूद ख़त्म न हो सकी तो आप ﷺ रात भर मस्जिद ही में रह गए जब हज़रते बिलाल رضی الله تعالی عنه ने आ कर येह ख़बर दी कि या रसूलल्लाह ﷺ! सारी रकम तक्सीम हो चुकी तो आप ने अपने मकान में क़दम रखा।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 597 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 387* ༺❘
           *❝   शमाइल व खसाइल ❞*
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࿐  *हज :-* ए'लाने नुबुव्वत के बाद मक्कए मुकर्रमा में आप ﷺ ने दो या तीन हज किये। लेकिन हिजरत के बा'द मदीनए मुनव्वरह से सि. 10 हि. में आप ﷺ ने एक हज फ़रमाया जो हिज्जतुल वदाअ के नाम से मश्हूर है जिस का मुफ़स्सल तज़किरा गुज़र चुका। हज के इलावा हिजरत के बा'द आप ने चार उमरे भी अदा फ़रमाए। 

࿐  *ज़िक्रे इलाही :-* हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها का बयान है कि आप ﷺ हर वक़्त हर घड़ी हर लहजा ज़िक्रे इलाही में मसरूफ़ रहते थे। उठते बैठते, चलते फिरते, खाते पीते, सोते जागते, वुज़ू करते, नए कपड़े पहनते, सुवार होते, सुवारी से उतरते, सफ़र में जाते, सफ़र से वापस होते, बैतुल खला में दाखिल होते और निकलते, मस्जिद में आते जाते, जंग के वक़्त, आंधी, बारिश, बिजली कड़कते वक़्त, हर वक़्त हर हाल में दुआएं विर्दे ज़बान रहती थीं। 

࿐  खुशी और गमी के अवक़ात में, सुब्हे सादिक़ तुलूअ होने के वक़्त, गुरूबे आफ्ताब के वक़्त, मुर्ग की आवाज़ सुन कर, गधे की आवाज़ सुन कर, गरज़ कौन सा ऐसा मौक़अ था कि आप कोई दुआ न पढ़ते दिन ही में नहीं बल्कि रात के सन्नाटों में भी बराबर दुआ ख़्वानी और ज़िक्रे इलाही में मश्गूल रहते यहां तक कि ब वक्ते वफ़ात भी जो फ़िक़रा बार बार विर्दे ज़बान रहा वोह اَللّٰھُمَّ فِى الرَّفِیْقِ الْاَعْلٰى की दुआ थी।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 598 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 388* ༺
                         *अठारहवां बाब*
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  आप ﷺ के अख़्लाके हसना के बारे में खल्के खुदा से क्या पूछना ? जब कि खुद खालिके अख़लाक़ ने येह फ़रमा दिया (सूरह क़लम की आयत नम्बर 4)

                          اِنَّكَ لَعَلٰى خُلُقٍ عَظِیْمٍ 

यानी ऐ हबीब ! बिला शुबा आप अख़्लाक़ के बड़े दरजे पर हैं।

࿐  आज तकरीबन चौदह सो बरस गुज़र जाने के बाद दुश्मनाने रसूल की क्या मजाल कि आप को ﷺ बद अख़लाक़ कह सकें उस वक़्त जब कि आप ﷺ अपने दुश्मनों के मज्मओं में अपने अमली किरदार का मुजाहरा फ़रमा रहे थे। खुदा वन्दे कुद्दूस ने कुरआन में ए'लान फ़रमाया कि (सूरह आले इमरान आयत नम्बर 159)

فَبِمَا  رَحْمَةٍ  مِّنَ  اللّٰهِ  لِنْتَ  لَهُمْۚ-وَ  لَوْ  كُنْتَ  فَظًّا  غَلِیْظَ  الْقَلْبِ  لَا  نْفَضُّوْا  مِنْ  حَوْلِكَ۪-

(ऐ हबीब) ख़ुदा की रहमत से आप लोगों से नर्मी के साथ पेश आते हैं अगर आप कहीं बद अख़्लाक़ और सख़्त दिल होते तो पेह लोग आप के पास से हट जाते।

࿐  दुश्मनाने रसूल ने कुरआन की जुबान से येह खुदाई ए'लान सुना मगर किसी की मजाल नहीं हुई कि इस के खिलाफ कोई बयान देता या इस आफ्ताब से ज़ियादा रौशन हक़ीक़त को झुटलाता बल्कि आप ﷺ के बड़े से बड़े दुश्मन ने भी इस का एतिराफ़ किया कि आप बहुत ही बुलन्द अख़्लाक़, नर्म खू और रहीम व करीम हैं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 599 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 389* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  बहर हाल हुजूर नबिय्ये करीम ﷺ महासिने अख़लाक़ के तमाम गोशों के जामेअ थे। यानी हिल्म व अफ़्व, रहम व करम, अदलो इन्साफ, जूदो सखा, ईसार व कुरवानी, मेहमान नवाजी, अदमे तशद्दुद शुजाअत ईफाए अहद, हुस्नो मुआमला, सब्र व क़नात नर्म गुफ्तारी, खुशरूई, मिलन सारी, मसावात, ग़म ख़्वारी, सादगी व बे तकल्लुफ़ी, तवाजोअ व इन्किसारी, हयादारी की इतनी बुलन्द मन्ज़िलों पर आप ﷺ फाइज़ व सरफ़राज़ हैं कि हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها ने एक जुम्ले में इस की सहीह तस्वीर खींचते हुए इरशाद फ़रमाया कि यानी तालीमाते कुरआन पर पूरा पूरा अमल येही आप ﷺ के अख़्लाक़ थे।

࿐  अख़्लाके नुबुव्वत का एक मुफ़स्सल वाज़ हम ने अपनी किताब "हक्कानी तकरीरें" में तहरीर कर दिया है यहां भी हम अलाके नुबुव्वत के "शजरतुल खुल्द" की चन्द शाखों के कुछ फूल फल पेश कर देते हैं। ताकि हम और आप इन पर अमल कर के अपनी इस्लामी ज़िन्दगी को कामिल व अक्मल बना कर आलमे इस्लाम में मुकम्मल मुसलमान बन जाएं और दारुल अमल से दारुल जज़ा तक खुदा वन्द अज़्ज़वजल के शामियानए रहमत में इस के आला व अफज़ल इन्आमों के मीठे मीठे फल खाते रहें।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 600📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 390* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *हुज़ूर ﷺ की अक्ल :-*  चूंकि तमाम इल्मी व अमली और अख़्लाक़ी कमालात का दारो मदार अक़्ल ही पर है इस लिये हुज़ूर ﷺ की अक्ल के बारे में भी कुछ तहरीर कर देना इनतिहाई ज़रूरी है। चुनान्चे इस सिल्सिले में हम यहां सिर्फ एक हवाला तहरीर करते हैं :

࿐   वहब बिन मुनब्बेह رضی الله تعالی عنه ने फ़रमाया कि मैं ने इकहत्तर किताबों में येह पढ़ा है कि जब से दुन्या आलमे वुजूद में आई है उस वक़्त से क़ियामत तक के तमाम इन्सानों की अक्लों का अगर हुज़ूर ﷺ की अक्ल शरीफ़ से मुवाना किया जाए तो तमाम इन्सानों की अक्लों को हुज़ूर ﷺ की अक्ल शरीफ़ से वोही निस्बत होगी जो एक रैत के ज़र्रे को तमाम दुन्या के रेगिस्तानों से निस्बत है या'नी तमाम इन्सानों की अक्लें एक रैत के ज़र्रे के बराबर हैं और हुज़ूर ﷺ की अक्ल शरीफ़ तमाम दुन्या के रेगिस्तानों के बराबर है। इस हदीस को अबू नुऐम मुहद्दिस ने हिल्या में रिवायत किया और मुहद्दिस इब्ने असाकिर ने भी इस को रिवायत किया है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 601📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 391* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *हिल्म व अफ्व :-* हज़रते जैद बिन सअना رضی الله تعالی عنه जो पहले एक यहूदी आलिम थे उन्हों ने हुज़ूर ﷺ से खजूरें खरीदी थीं। खजूरें देने की मुद्दत में अभी एक दो दिन बाकी थे कि उन्हों ने भरे मज्मअ में हुज़ूर ﷺ से इनतिहाई तल्ख व तुर्श लहजे में सख्ती के साथ तक़ाज़ा किया और आप ﷺ का दामन और चादर पकड़ कर निहायत तुन्द व तेज़ नज़रों से आप ﷺ की तरफ़ देखा और चिल्ला चिल्ला कर येह कहा कि ऐ मुहम्मद !(ﷺ) तुम सब अब्दुल मुत्तलिब की अवलाद का येही तरीका है कि तुम लोग हमेशा 'लोगों के हुकूक अदा करने में देर लगाया करते हो और टाल मटोल करना तुम लोगों की आदत बन चुकी है। 

࿐   येह मंज़र देख कर हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه आपे से बाहर हो गए और निहायत ग़ज़बनाक और ज़हरीली नज़रों से घूर घूर कर कहा कि ऐ खुदा के दुश्मन ! तू खुदा के रसूल से ऐसी गुस्ताखी कर रहा है? ख़ुदा की कसम ! अगर हुज़ूर ﷺ का अदब मानेअ न होता तो मैं अभी अभी अपनी तलवार से तेरा सर उड़ा देता। येह सुन कर आप ﷺ ने फ़रमाया कि ऐ उमर ! तुम क्या कह रहे हो ? तुम्हें तो येह चाहिये था कि मुझ को अदाए हक़ की तरगीब दे कर और इस को नर्मी के साथ तकाज़ा करने की हिदायत कर के हम दोनों की मदद करते। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 601-602📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 392* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  फिर आप ﷺ ने हुक्म दिया कि ऐ उमर ! इसको इस के हक के बराबर खजूरें दे दो और कुछ ज़ियादा भी दे दो, हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه ने जब हक़ से ज़ियादा खजूरें दीं तो हज़रते जैद बिन सअना رضی الله تعالی عنه ने कहा कि ऐ उमर मेरे हक से ज़्यादा क्यूं दे रहे 'हो? आप رضی الله تعالی عنه ने फरमाया कि चूंकि मैं ने टेढ़ी तिरछी नज़रों से देख कर तुम को ख़ौफ़ज़दा कर दिया था इस लिये हुज़ूर ﷺ ने तुम्हारी दिलजूई व दिलदारी के लिये तुम्हारे हक़ से कुछ ज़ियादा देने का मुझे हुक्म दिया है।

࿐  येह सुन कर हज़रते जैद बिन सअना رضی الله تعالی عنه ने कहा कि ऐ उमर ! क्या तुम मुझे पहचानते हो, मैं ज़ैद बिन सअना हूं ? आप رضی الله تعالی عنه ने फरमाया कि तुम वोही जैद बिन सअना رضی الله تعالی عنه हो जो यहूदियों का बहुत बड़ा आलिम है। उन्हों ने कहा जी हां येह सुन कर हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه ने दरयाप्त फरमाया कि फिर तुम ने हुज़ूर ﷺ के साथ ऐसी गुस्ताखी क्यूं की? हजरते जैद बिन सअना رضی الله تعالی عنه ने जवाब दिया कि ऐ उमर ! दर अस्ल बात यह है कि मैं ने तौरात में नबिय्ये आखिरुज़्ज़मान की जितनी निशानियां पढ़ी थीं उन सब को मैं ने इन की जात में देख लिया मगर दो निशानियों के बारे में मुझे इन का इमतिहान करना बाकी रह गया था। 

࿐  एक येह कि इन का हिल्म जहल पर ग़ालिब रहेगा और जिस क़दर ज़ियादा इन के साथ जहल का बरताव किया जाएगा उसी क़दर इन का हिल्म बढ़ता जाएगा। चुनान्चे मैं ने इस तरकीब से इन दोनों निशानियों को भी इन में देख लिया और मैं शहादत देता हूं कि यकीनन यह नबिय्ये बरहक हैं और मैं बहुत ही मालदार आदमी हूं मैं तुम्हें गवाह बनाता हूं किऐ उमर ! मैं ने अपना आधा माल हुज़ूर ﷺ की उम्मत पर सदक़ा कर दिया फिर येह बारगाहे रिसालत में आए और कलिमा पढ़ कर दामने इस्लाम में आ गए। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह 602-603📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 393* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *हिल्म व अफ्व :-* हज़रते जुबैर बिन मुतइम رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि जंगे हुनैन से वापसी पर देहाती लोग आप ﷺ से चिमट गए और आप ﷺ से माल का सुवाल करने लगे, यहां तक आप ﷺ को चिमटे कि आप पीछे हटते हटते एक बबूल के दरख़्त के पास ठहर गए, इतने में एक बदवी आप ﷺ की चादरे मुबारक उचक कर ले भागा फिर आप ﷺ ने खड़े हो कर इरशाद फ़रमाया कि तुम लोग मेरी चादर तो मुझे दे दो अगर मेरे पास इन झाड़ियों के बराबर चौपाए होते तो मैं उन सब को तुम्हारे दरमियान तक्सीम कर देता, तुम लोग मुझे न बखील पाओगे न झूटा न बुज़दिल। 

࿐   हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه का बयान है कि मैं हुज़ूर ﷺ के हमराह चल रहा था और आप ﷺ एक नजरानी चादर ओढ़े हुए थे जिस के कनारे मोटे और खुरदरे थे।एक दम एक बदवी ने आप ﷺ को पकड़ लिया और इतने ज़बरदस्त झटके से चादर मुबारक को उस ने खींचा कि हुज़ूर ﷺ की नर्मो नाज़ुक गरदन पर चादर की कनार से ख़राश आ गई फिर उस बदवी ने येह कहा कि अल्लाह का जो माल आप के पास है आप हुक्म दीजिये कि उस में से मुझे कुछ मिल जाए। हुज़ूर रहमते आलम ﷺ ने जब उस बदवी की तरफ़ तवज्जोह फ़रमाई तो कमाले हिल्म व अफ्व से उस की तरफ़ देख कर हंस पड़े और फिर उस को कुछ माल अता फरमाने का हुक्म सादिर फ़रमाया ।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 603📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 394* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐   जंगे उहद में उत्बा बिन अबी वक्कास ने आप ﷺ के दन्दाने मुबारक को शहीद कर दिया और अब्दुल्लाह बिन कमीआ ने चेहरए अन्वर को ज़ख़्मी और ख़ून आलूद कर दिया मगर आप ﷺ ने उन लोगों के लिये इस के सिवा कुछ भी न फ़रमाया यानी ऐ अल्लाह ! मेरी क़ौम को कि हिदायत दे क्यूं कि येह लोग मुझे जानते नहीं!

࿐   ख़ैबर में ज़ैनब नामी यहूदी औरत ने आप ﷺ को जहर दिया मगर आपने उस से कोई इनतिकाम नहीं लिया, लुबैद बिन आ'सम ने आप ﷺ पर जादू किया और ब ज़रीअए वहय इस का सारा हाल मालूम हुवा मगर आप ﷺ ने उस से कुछ मुवाखजा नहीं फ़रमाया, गौरस बिन अल हारिस ने आप ﷺ के कत्ल के इरादे से आप ﷺ की तलवार ले कर नियाम से खींच ली, जब हुज़ूर ﷺ नींद से बेदार हुए तो गौरस कहने लगा कि ऐ मुहम्मद ! (ﷺ) अब कौन है जो आप को मुझ से बचा लेगा? आप ﷺ ने फ़रमाया कि “अल्लाह।" नुबुव्वत की हैबत से तलवार उस के हाथ से गिर पड़ी और हुज़ूर ﷺ ने तलवार हाथ में ले कर फ़रमाया कि बोल ! अब तुझ को मेरे हाथ से कौन बचाने वाला है? गौरस गिड़गिड़ा कर कहने लगा कि आप ही मेरी जान बचा दें, रहमते आलम ﷺ ने उस को छोड़ दिया और मुआफ़ फ़रमा दिया। चुनान्चे गौरस अपनी कौम में आ कर कहने लगा कि ऐ लोगो मैं ऐसे शख्स के पास से आया हूं जो तमाम दुन्या के इन्सानों में सब से बेहतर है!

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 604📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 395* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  कुफ़्फ़ारे मक्का ने वोह कौन सा ऐसा जालिमाना बरताव था जो आप ﷺ के साथ न किया हो मगर फत्हे मक्का के दिन जब यह सब जब्बाराने कुरैश, अन्सार व मुहाजिरीन के लश्करों के मुहासरे में महसूर व मजबूर हो कर हरमे का'बा में खौफ व दहशत से कांप रहे थे और इनतिकाम के डर से उन के जिस्म का एक एक बाल लरज रहा था। रसूले रहमत ﷺ ने उन मुजरिमों और पापियों को यह फ़रमा कर छोड़ दिया और मुआफ़ फ़रमा दिया कि आज तुम से कोई मुवाखज़ा नहीं है जाओ तुम सब आज़ाद हो।

࿐  एक काफिर को सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم पकड़ कर लाए कि या रसूलल्लाह (ﷺ) इस ने आप के क़त्ल का इरादा किया था वोह शख्स खौफ व दहशत से लरजा वर अन्दाम हो गया! रहमतुल्लिल आलमीन ﷺ ने फ़रमाया कि तुम कोई ख़ौफ़ न रखो बिल्कुल मत डरो अगर तुम ने मेरे क़त्ल का इरादा किया था तो क्या हुवा? तुम कभी मेरे ऊपर गालिब नहीं हो सकते थे क्यूं कि खुदा वन्दे तआला ने मेरी हिफ़ाज़त का वादा फरमा लिया है।

࿐  अल गरज़ इस तरह के नबिय्ये रहमत ﷺ की हयाते तय्यबा में हज़ारों वाक़िआत हैं जिन से पता चलता है कि हिल्म व अफ़्व या'नी ईज़ाओं का बरदाश्त करना और मुजरिमों को कुदरत के बा वजूद बिगैर इनतिकाम के छोड़ देना और मुआफ़ कर देना आप ﷺ की येह आदते करीमा भी आप ﷺ के अलाके हसना का वोह अज़ीम शाहकार है जो सारी दुन्या में अदीमुल मिसाल है। हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنهال फ़रमाती हैं कि अपनी जात के लिये कभी भी रसूलुल्लाह ﷺ ने किसी से इनतिकाम नहीं लिया हां अलबत्ता अल्लाह तआला की हराम की हुई चीज़ों का अगर कोई मुर्तकिब होता तो ज़रूर उस से मुवाखजा फ़रमाते।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह 605-606 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 396* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *तवाज़ोअ :-* हुज़ूर ﷺ की शाने तवाजोअ भी सारे आलम से निराली थी, अल्लाह तआला ने आप ﷺ को येह इख़्तियार अता फरमाया कि ऐ हबीब ! ﷺ अगर आप चाहें तो शाहाना ज़िन्दगी बसर फ़रमाएं और अगर आप चाहें तो एक बन्दे की ज़िन्दगी गुजारें, तो आप ﷺ ने बन्दा बन कर ज़िन्दगी गुजारने को पसन्द फ़रमाया। हज़रते इस्राफील अलैहिस्सलाम ने आप ﷺ की येह तवाज़ोआ देख कर फ़रमाया कि या रसूलल्लाह (ﷺ) ! आप की इस तवाज़ोअ के सबब से अल्लाह तआला ने आप ﷺ को येह जलीलुल क़द्र मर्तबा अता फ़रमाया है कि आप ﷺ तमाम औलादे आदम में सब से ज़ियादा बुजुर्ग और बुलन्द मर्तबा हैं और क़ियामत के दिन सब से पहले आप ﷺ अपनी कब्रे अन्वर से उठाए जाएंगे और मैदाने महशर में सब से पहले आप ﷺ शफाअत फरमाएंगे।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 606 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 397* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  हजुरते अबू उमामा رضی الله تعالی عنه रावी हैं कि हुज़ूरे अक्दस ﷺ अपने असाए मुबारक पर टेक लगाते हुए काशानए नुबुव्वत से बाहर तशरीफ़ लाए तो हम सब सहाबा ताज़ीम के लिये खड़े हो गए येह देख कर तवाजोअ के तौर पर इरशाद फ़रमाया कि तुम लोग इस तरह न खड़े रहा करो जिस तरह अजमी लोग एक दूसरे की ताज़ीम के लिये खड़े रहा करते हैं मैं तो एक बन्दा हूं बन्दों की तरह खाता हूं और बन्दों की तरह बैठता हूं। 

࿐  हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها का बयान है कि हुज़ूर ताजदारे दो आलम ﷺ कभी कभी अपने पीछे सुवारी पर अपने किसी ख़ादिम को भी बिठा लिया करते थे। तिरमिजी शरीफ़ की रिवायत है कि जंगे कुरैज़ा के दिन आप ﷺ की सुवारी के जानवर की लगाम छाल की रस्सी से बनी हुई थी।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 607📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 398* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि हुज़ूर ﷺ गुलामों की दावत को भी कबूल फरमाते थे। जब की रोटी और पुरानी चरबी खाने की दावत दी जाती थी तो आप ﷺ उस दावत को कबूल फरमाते थे। मिस्कीनों की बीमार पुर्सी फरमाते, फुकरा के साथ हम नशीनी फ़रमाते और अपने सहाबा के दरमियान मिलजुल कर निशस्त फ़रमाते!

࿐  हज़रते अबू सईद खुदरी رضی الله تعالی عنه ने फ़रमाया कि हुज़ूर ﷺ अपने घरेलू काम खुद अपने दस्ते मुबारक से कर लिया करते थे। अपने खादिमों के साथ बैठ कर खाना तनावुल फरमाते थे और घर के कामों में आप ﷺ अपने खादिमों की मदद फरमाया करते थे।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 600📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 399* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  एक शख़्स दरबारे रिसालत ﷺ में हाज़िर हुवा तो जलालते नुबुव्वत की हैबत से एक दम खाइफ़ हो कर लरज़ा बर अन्दाम हो गया और कांपने लगा तो आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि तुम बिल्कुल मत डरो। मैं न कोई बादशाह हूं, न कोई जब्बार हाकिम, मैं तो कुरैश की एक औरत का बेटा हूं जो खुश्क गोश्त की बोटियां खाया करती थी। 

࿐  फत्हे मक्का के दिन जब फातेहाना शान के साथ आप अपने लश्करों के हुजूम में शहरे मक्का के अन्दर 'दाखिल होने लगे तो उस वक़्त आप ﷺ पर तवाज़ोअ और इन्किसार की ऐसी तजल्ली नुमूदार थी कि आप ﷺ ऊंटनी की पीठ पर इस तरह सर झुकाए हुए बैठे थे कि आप ﷺ का सरे मुबारक कजावा के अगले हिस्से से लगा हुवा था।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 607 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 400* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  इसी तरह जब हिज्जतुल वदाअ में आप ﷺ एक लाख शमए नुबुव्वत के परवानों के साथ अपनी मुक़द्दस ज़िन्दगी के आखिरी हज में तशरीफ़ ले गए तो आप ﷺ  की ऊंटनी पर एक पुराना पालान था और आप ﷺ के जिस्मे अन्वर पर एक चादर थी जिस की कीमत चार दिरहम से जियादा न थी उसी ऊंटनी की पुश्त पर और उसी लिबास में आप ﷺ ने खुदा वन्दे जुल जलाल के नाइबे अकरम और ताजदारे दो आलम ﷺ होने की हैसिय्यत से अपना शहनशाही खुत्बा पढ़ा जिस को एक लाख से ज़ाइद फ़रज़न्दाने तौहीद हमातन गोश बन कर सुन रहे थे। 

࿐  हज़रते अब्दुल्लाह बिन आमिर رضی الله تعالی عنه बयान करते हैं कि एक मरतबा आप ﷺ की नालैने अक्दस का तस्मा टूट गया और आप ﷺ अपने दस्ते मुबारक से उस को दुरुस्त फ़रमाने लगे। मैं ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह (ﷺ) ! मुझे दीजिये मैं इस को दुरुस्त कर दूं, मेरी इस दरख्वास्त पर इरशाद फ़रमाया कि येह सहीह है कि तुम इस को ठीक कर दोगे मगर मैं इस को पसन्द नहीं करता कि मैं तुम लोगों पर अपनी बर्तरी और बड़ाई ज़ाहिर करूं, इसी तरह सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم आप ﷺ को किसी काम में मश्गूल देख कर बार बार दरख्वास्त अर्ज़ करते कि या रसूलल्लाह (ﷺ) ! आप खुद येह काम न करें इस काम को हम लोग अन्जाम देंगे मगर आप ﷺ येही फ़रमाते कि येह सच है कि तुम लोग मेरा सब काम कर दोगे मगर मुझे येह गवारा नहीं है कि मैं तुम लोगों के दरमियान किसी इमतियाज़ी शान के साथ रहूं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 609📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 401* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *हुस्ने मुआशरत :-* हुज़ूरे अक्दस ﷺ अपनी अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنها अपने अहबाब, अपने अस्हाब رضی الله تعالی عنهم, अपने रिश्तेदारों, अपने पड़ोसियों हर एक के साथ इतनी खुश अख़लाक़ी और मिलनसारी का बरताव फ़रमाते थे कि उन में से हर एक आप ﷺ के अख़लाके हसना का गिरवीदा और मद्दाह था, 

࿐   खादिमे ख़ास हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه का बयान है कि मैं ने दस बरस तक सफ़र व वतन में हुज़ूर ﷺ की खिदमत का शरफ़ हासिल किया मगर कभी भी हुज़ूर ﷺ ने न मुझे डांटा न झिड़का और न कभी येह फ़रमाया कि तूने फुलां काम क्यूं किया और फुलां काम क्यूं नहीं किया?

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 610📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 402* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *हुस्ने मुआशरत :-* हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنهما कहती हैं कि हुज़ूर ﷺ से ज़ियादा कोई खुश अख़लाक़ नहीं था। आप ﷺ के अस्हाब رضی الله تعالی عنهم या आप ﷺ के घर वालों में से जो कोई भी आप ﷺ को पुकारता आप लब्बैक कह कर जवाब देते।

࿐  हज़रते जरीर इरशाद फ़रमाते हैं कि मैं जब से मुसलमान हुवा कभी भी हुज़ूर ﷺ ने मुझे पास आने से नहीं रोका और जिस वक़्त भी मुझे देखते तो मुस्कुरा देते और आप ﷺ अपने अस्हाब से खुश तबई भी फ़रमाते और सब के साथ मिलजुल कर रहते और हर एक से गुफ़्तगू फ़रमाते!

࿐  और सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم के बच्चों से भी खुश तबई फ़रमाते और उन बच्चों को अपनी मुक़द्दस गोद में बिठा लेते और आज़ाद नीज़ लौंडी गुलाम और मिस्कीन सब की दावतें क़बूल फ़रमाते और मदीने के इनतिहाई हिस्से में रहने वाले मरीज़ों की बीमार पुर्सी के लिये तशरीफ़ ले जाते और उज्र पेश करने वालों के उज़्र को क़बूल फ़रमाते।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 610📚*

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                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *हुस्ने मुआशरत :-* हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه रावी हैं कि अगर कोई शख़्स हुज़ूर ﷺ के कान में कोई सरगोशी की बात करता तो आप ﷺ उस वक़्त तख अपना सर उस के मुंह से अलग न फ़रमाते जब तक वोह कान में कुछ कहता रहता और आप ﷺ अपने अस्हाब رضی الله تعالی عنهم की मजलिस में कभी पाउं फैला कर नहीं बैठते थे और जो आप के सामने आता आप सलाम करने में पहल करते और मुलाकातियों से मुसाफड़ा फ़रमाते और अकसर अवकात अपने पास आने वाले मुलाकातियों के लिये आप ﷺ अपनी चादर मुबारक बिछा देते और अपनी मस्नद भी पेश कर देते और अपने अस्हाब رضی الله تعالی عنهم को उन की कुन्यतों और अच्छे नामों से पुकारते कभी किसी बात करने वाले की बात को काटते नहीं थे। 

࿐   हर शख़्स से खुशरूई के साथ मुस्कुरा कर मुलाक़ात फ़रमाते, मदीने के खुद्दाम और नोकर चाकर बरतनों में सुबह को पानी ले कर आते ताकि हुज़ूर ﷺ उन के बरतनों में दस्ते मुबारक डबों दें और पानी मुतबर्रक हो जाए तो सख्त जाड़े के मौसिम में भी सुब्ह को हुज़ूर ﷺ हर एक के बरतन में अपना मुक़द्दस हाथ डाल दिया करते थे और जाड़े की सर्दी के बावजूद किसी को महरूम नहीं फ़रमाते थे। سبحان الله 🌹👌🏻

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 611📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 404* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *हुस्ने मुआशरत :-* हज़रते अम्र बिन साइब رضی الله تعالی عنه ने कहा कि मैं एक मरतबा हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर था तो आप ﷺ के रज़ाई बाप या'नी हज़रते बीबी हलीमा رضی الله تعالی عنها के शोहर तशरीफ़ लाए तो आप ﷺ ने अपने कपड़े का एक हिस्सा उन के लिये बिछा दिया और वोह उस पर बैठ गए फिर आप ﷺ की रज़ाई मां हज़रते बीबी हलीमा رضی الله تعالی عنها तशरीफ़ लाई तो आप ﷺ ने अपने कपड़े का बाकी हिस्सा उन के लिये बिछा दिया फिर आप ﷺ के रज़ाई भाई आए तो आप ﷺ ने उन को अपने सामने बिठा लिया और हुज़ूर ﷺ हज़रते सुवैबा رضی الله تعالی عنها के पास हमेशा कपड़ा वग़ैरा भेजते रहते थे येह अबू लहब की लौंडी थीं और चन्द दिनों तक हुज़ूर ﷺ को इन्हों ने भी दूध पिलाया था।

࿐  आप ﷺ अपने लिये कोई मख़्सूस बिस्तर नहीं रखते थे बल्कि हमेशा अज़्वाजे मुतहहरात के बिस्तरों ही पर आराम फ़रमाते थे और अपने प्यार व महब्बत से हमेशा अपनी मुक़द्दस बीवियों رضی الله تعالی عنهم को खुश रखते थे। हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها फ़रमाती हैं कि मैं प्याले में पानी पी कर हुज़ूर ﷺ को जब प्याला देती तो आप ﷺ प्याले में उसी जगह अपना लब मुबारक लगा कर पानी नोश फ़रमाते जहां मेरे होंट लगे होते और मैं गोश्त से भरी कोई हड्डी अपने दांतों से नोच कर वोह हड्डी हुज़ूर ﷺ को देती तो आप ﷺ भी उसी जगह से गोश्त को अपने दांतों से नोच कर तनावुल फ़रमाते जिस जगह मेरा मुंह लगा होता।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 612📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 405* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *हुस्ने मुआशरत :-* आप ﷺ रोज़ाना अपनी अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن से मुलाकात फ़रमाते और अपनी साहिब ज़ादियों के घरों पर भी रौनक़ अफ़रोज़ हो कर उन की ख़बर गीरी फ़रमाते और अपने नवासों और नवासियों को भी अपने प्यार व शफ़्क़त से बार बार नवाज़ते और सब की दिलजूई व रवादारी फ़रमाते और बच्चों से भी गुफ्तगू फ़रमा कर उन की बातचीत से अपना दिल खुश करते और उन का भी दिल बहलाते अपने पड़ोसियों की भी ख़बर गीरी और उन के साथ इनतिहाई करीमाना और मुश्फ़िकाना बरताव फ़रमाते!

࿐  अल गरज़ आप ﷺ ने अपने तर्जे़ अमल और अपनी सीरते मुक़द्दसा से ऐसे इस्लामी मुआशरे की तश्कील फ़रमाई कि अगर आज दुन्या आप ﷺ की सीरते मुबारका पर अमल करने लगे तो तमाम दुन्या में अम्नो सुकून और महब्बत व रहमत का दरिया बहने लगे और सारे आलम से जिदाल व क़िताल और निफ़ाक़ व शिक़ाक़ का जहन्नम बुझ जाए और आलमे काएनात अम्न व राहत और प्यार व महब्बत की बिहिश्त बन जाए।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 613📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 406* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *हया :-*  हक़ हुज़ूरे अक्दस ﷺ की "हया" के बारे में अल्लाह तआला का कुरआन में येह फ़रमान सब से बड़ा गवाह है कि : बेशक तुम्हारी यह बात नबी को ईज़ा पहुंचाती है लेकिन वोह तुम लोगों से हया करते हैं (और तुम को कुछ कह नहीं सकते)

࿐ आप ﷺ की शाने हया की तस्वीर खींचते हुए एक मुअज़्ज़ज़ सहाबी हज़रते अबू सईद खुदरी رضی الله تعالی عنه ने फ़रमाया आप ﷺ कंवारी पर्दा नशीन औरत से भी कहीं ज़्यादा हयादार थे।

࿐  इस लिये हर क़बीह क़ौल व फ़ेल और काबिले मज़म्मत हरकात व सकनात से उम्र भर हमेशा आप ﷺ का दामने इस्मत पाक व साफ़ ही रहा और पूरी हयाते मुबारका में वकार व मुरुव्वत के खिलाफ आप ﷺ से कोई अमल सरज़द नहीं हुवा, हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها ने फ़रमाया कि हुज़ूर ﷺ न फोहश कलाम थे न बेहूदा गो न बाज़ारों में शोर मचाने वाले थे। बुराई का बदला बुराई से नहीं दिया करते थे बल्कि मुआफ फ़रमा दिया करते थे। आप यह भी फ़रमाया करती थीं कि कमाले हया की वजह से मैं ने कभी भी हुज़ूर ﷺ को बरना नहीं देखा।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 614📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 407* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *वा'दे की पाबन्दी :-* ईफ़ाए अहद और वादे की पाबन्दी भी दरख़्ते अख़लाक़ की एक बहुत ही अहम और निहायत ही हरी भरी शाख़ है इस खुसूसियत में भी रसूले अरबी ﷺ का खुल्के अज़ीम बे मिसाल ही है। हज़रते अबुल हम्सा رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि ए'लाने नुबुव्वत से पहले मैंने हुज़ूर ﷺ से कुछ सामान खरीदा इसी सिल्सिले में आप ﷺ की कुछ रक़म मेरे ज़िम्मे बाकी रह गई मैं ने आप ﷺ से कहा कि आप यहीं ठहरिये मैं अभी अभी घर से रक़म ला कर इसी जगह पर आपको देता हूं। 

࿐  हुज़ूर ﷺ ने उसी जगह ठहरे रहने का वादा फ़रमा लिया मगर मैं घर आ कर अपना वादा भूल गया फिर तीन दिन के बाद मुझे जब ख़याल आया तो रकम ले कर उस जगह पर पहुंचा तो क्या देखता हूं कि हुज़ूर ﷺ उसी जगह ठहरे हुए मेरा इनतिज़ार फरमा रहे हैं। मुझे देख कर ज़रा भी आप ﷺ की पेशानी पर बल नहीं आया और इस के सिवा ﷺ ने और कुछ नहीं फ़रमाया कि ऐ नौ जवान ! तुम ने तो मुझे मशक़्क़त में डाल दिया क्यूं कि मैं अपने वादे के मुताबिक तीन दिन से यहां तुम्हारा इनतिज़ार कर रहा हूं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 615📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 408* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *अद्ल :-*  ख़ुदा عزوجل के मुकद्दस रसूल ﷺ तमाम जहान में सब से ज़ियादा अमीन सब से बढ़ कर आदिल और पाक दामन व रास्त बाज़ थे। येह वोह रौशन हक़ीक़त है कि आप ﷺ के बड़े बड़े दुश्मनों ने भी इस का एतिराफ़ किया। चुनान्चे ए'लाने नुबुव्वत से कब्ल तमाम अहले मक्का आपको "सादिकुल वाद" और "अमीन" के मुअज्ज़ज़ लकब से याद करते थे। हज़रते रबीअ बिन खसीम رضی الله تعالی عنه का बयान है कि मक्का वालों का इस बात पर इत्तिफ़ाक़ था कि आप ﷺ आला दरजे के अमीन और आदिल हैं इसी लिये ए'लाने नुबुव्वत से पहले अहले मक्का अपने मुकद्दमात और झगड़ों का आपसे फ़ैसला कराया करते थे और आप के तमाम फ़ैसलों को इनतिहाई एहतिराम के साथ बिला चूनो चरा तस्लीम कर लेते थे और कहा करते थे कि येह अमीन का फैसला है।

࿐  हुज़ूरे अक्दस ﷺ किस क़दर बुलन्द मर्तबा आदिल थे इस बारे में बुखारी शरीफ़ की एक रिवायत सब से बढ़ कर शाहिदे अदल है। क़बीलए कुरैश के खानदान बनी मख़्ज़ूम की एक औरत ने चोरी की, इस्लाम में चोर की येह सजा है कि उस का दायां हाथ पहुंचों से काट डाला जाए। क़बीलए कुरैश को इस वाक़िए से बड़ी फ़िक्र दामन गीर हो गई कि अगर हमारे क़बीले की इस औरत का हाथ काट डाला गया तो येह हमारी खानदानी शराफ़्त पर ऐसा बदनुमा दाग होगा जो कभी मिट न सकेगा और हम लोग तमाम अरब की निगाहों में जलीलो ख़्वार हो जाएंगे इस लिये उन लोगों ने येह है किया कि बारगाहे रिसालत ﷺ में कोई ज़बरदस्त सिफारिश पेश कर दी जाए ताकि आप ﷺ औरत का हाथ न काटें। चुनान्चे उन लोगों ने हज़रते उसामा बिन जैद رضی الله تعالی عنه को जो निगाहे नुबुव्वत में इनतिहाई महबूब थे दबाव डाल कर इस बात के लिये आमादा कर लिया कि वोह दरबारे अक्दस में सिफारिश पेश करें।

࿐  हज़रते उसामा बिन जैद رضی الله تعالی عنه ने अशराफ़े कुरैश के इस्रार से मुतअस्सिर हो कर बारगाहे रिसालत में सिफारिश अर्ज़ कर दी। येह सुन कर पेशानिये नुबुव्वत पर जलाल के आसार नुमूदार हो गए और आप ﷺ ने निहायत ही ग़ज़ब नाक लहजे में फ़रमाया कि, कि ऐ उसामा ! तू अल्लाह तआला की मुकर्रर की हुई सजाओं में से एक सजा के बारे में सिफारिश करता है? फिर इस के बाद आप ﷺ ने खड़े हो कर एक खुत्बा दिया और उस खुत्बे में येह इरशाद फ़रमाया कि : *ऐ लोगों !* तुम से पहले के लोग इस वजह से गुमराह हो गए कि जब उन में कोई शरीफ़ चोरी करता था तो उस को छोड़ देते थे और जब कोई कमज़ोर आदमी चोरी करता तो उस पर सजाएं काइम करते थे खुदा की कसम ! अगर मुहम्मद की बेटी फ़ातिमा भी चोरी करेगी तो यक़ीनन मुहम्मद उस का हाथ काट लेगा।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 615-617📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 409* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐ *वकार :-*  हज़रते खारिजा बिन ज़ैद رضی الله تعالی عنه फ़रमाया करते थे हुजूर नबिय्ये करीम ﷺ अपनी मजलिसों में जिस क़दर वक़ार के साथ रौनक अफरोज़ रहते थे बड़े से बड़े बादशाहों के दरबार में भी इस की मिसाल नहीं मिल सकती।हज़रते जाबिर बिन समुरह फ़रमाया करते थे कि आप ﷺ की मजलिस हिल्म व हया और ख़ैर व अमानत की मजलिस हुवा करती थी। आप ﷺ की मजलिस में कभी कोई बुलन्द आवाज़ से गुफ्तगू नहीं कर सकता था और जब आप ﷺ कलाम फ़रमाते थे तो तमाम अहले मजलिस इस तरह सर झुकाए हुए हमातन गोश बन कर आप ﷺ का कलाम सुनते थे कि गोया उनके सरों पर चिड़ियां बैठी हुई हैं। 

࿐   हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها इरशाद फ़रमाती हैं कि हुज़ूर ﷺ निहायत ही वकार के साथ इस तरह ठहर ठहर कर गुफ्तगू फ़रमाते थे कि अगर कोई शख्स आप ﷺ के ज़ुम्लों को गिनना चाहता तो वोह गिन सकता था। आप ﷺ की निशस्त व बरखास्त, वकार व गुफ्तार, हर अदा में एक खालिस पैग़म्बराना वकार पाया जाता था जिस से आप ﷺ की अज़मते नुबुव्वत का जाहो जलाल आफ्ताबे आलमे ताब की तरह हर खासो आम की नज़रों में नुमूदार रहता था। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 617 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 410* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *जाहिदाना ज़िन्दगी :-*  आप ﷺ शहनशाहे कौनैन और ताजदारे दो आलम होते हुए ऐसी जाहिदाना और सादा ज़िन्दगी बसर फ़रमाते थे तारीखे नुबुव्वत में इस की मिसाल नहीं मिल सकती, खूराक व पोशाक, मकान व सामान, रहन सहन गरज़ हयाते मुबारका के हर गोशे में आप ﷺ का जोहद और दुन्या से बे रग़बती का आलम इस दरज़े नुमायां था कि जिस को देख कर यही कहा जा सकता है कि दुन्या की नेमतें और लज़्ज़तें आप ﷺ की निगाहे नुबुव्वत में एक मच्छर के पर से भी ज़ियादा जलील व हक़ीर हैं। 

࿐  हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها का बयान है कि हुज़ूर ﷺ की मुक़द्दस ज़िन्दगी में कभी तीन दिन लगातार ऐसे नहीं गुज़रे कि आप ﷺ ने शिकम सैर हो कर रोटी खाई हो एक एक महीने तक काशानए नुबुव्वत में चूल्हा नहीं जलता था और खजूर व पानी के सिवा आप ﷺ के घर वालों की कोई दूसरी खुराक नहीं हुवा करती थी। हालां कि अल्लाह तआला ने आप ﷺ से फ़रमाया कि ऐ हबीब ! अगर आप चाहें तो मैं मक्का की पहाड़ियों को सोना बना दूं और वोह आप ﷺ के साथ साथ चलती रहें और आप ﷺ उन को जिस तरह चाहें खर्च करते रहें मगर आप ﷺ ने इस को पसन्द नहीं किया और बारगाहे खुदा वन्दी عزوجل में अर्ज़ किया कि ऐ मेरे रब ! عزوجل मुझे येही ज़ियादा महबूब है कि मैं एक दिन भूका रहूं और एक दिन खाना खाऊं ताकि भूक के दिन खूब गिड़गिड़ा कर तुझ से दुआएं मांगूं और आसूदगी के दिन तेरी हम्द करूं और तेरा शुक्र बजा लाऊं।

࿐  हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها ने बताया कि हुज़ूर ﷺ जिस बिस्तर पर सोते थे वोह चमड़े का गद्दा था जिस में रूई की जगह दरख़्तों की छाल भरी हुई थी। हज़रते हफ़्सा رضی الله تعالی عنها कहती हैं कि मेरी बारी के दिन हुज़ूरे अक्दस ﷺ एक मोटे टाट पर सोया करते थे जिस को मैं दो तेह कर के बिछा दिया करती थी। एक मरतबा मैं ने उस टाट को चार तेह कर के बिछा दिया तो सुबह को आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि पहले की तरह इस टाट को तुम दोहरा कर के बिछा दिया करो क्यूं कि मुझे अन्देशा है कि इस बिस्तर की नर्मी से कहीं मुझ पर गहरी नींद का हम्ला हो जाए तो मेरी नमाज़े तहज्जुद में खलल पैदा हो जाएगा। रिवायत है कि कभी कभी हुज़ूर ﷺ एक ऐसी चारपाई पर भी आराम फरमाया करते थे जो खुरदरे बान से बनी हुई थी जब आप ﷺ बिगैर बिछोने के उस चारपाई पर लेटते थे तो जिस्मे नाज़ुक पर बन के निशान पड़ जाया करते थे।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 618-619 📚*

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اَلصَّلوٰةُ وَالسَّلَامُ عَلَیۡكَ يَـــــــــــــــــــــــــــارَسُوۡلَ اللّٰهِ ﷺ

*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 411* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *शुजाअत :-* हुज़ूर रसूले अकरम ﷺ की बेमिसाल शुजाअत का येह आलम था कि हज़रते अली رضی الله تعالی عنه जैसे बहादुर सहाबी का येह क़ौल है कि जब लड़ाई खूब गर्म हो जाती थी और जंग की सिद्दत देख कर बड़े बड़े बहादुरों की आंखें पथरा कर सुर्ख पड़ जाया करती थीं उस वक़्त में हम लोग रसूलुल्लाह ﷺ के पहलू में खड़े हो कर अपना बचाव करते थे। और आप ﷺ हम सब लोगों से ज़ियादा आगे बढ़ कर और दुश्मनों के बिल्कुल क़रीब पहुंच कर जंग फ़रमाते थे। और हम लोगों में सब से ज़ियादा बहादुर वोह शख़्स शुमार किया जाता था जो जंग में रसूलुल्लाह ﷺ के क़रीब रह कर दुश्मनों से लड़़ता था।

࿐  हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर رضی الله تعالی عنه फ़रमाया करते थे कि हुज़ूर ﷺ से ज़ियादा बहादुर और ताक़त वर, सखी और पसन्दीदा मेरी आंखों ने कभी किसी को नहीं देखा। हज़रते बरा बिन आज़िब رضی الله تعالی عنه और दूसरे सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم ने बयान फ़रमाया है कि जंगे हुनैन में बारह हज़ार मुसलमानों का लश्कर कुफ़्फ़ार के हम्लों की ताब न ला कर भाग गया था और कुफ़्फ़ार की तरफ से लगातार तीरों का मींह बरस रहा था उस वक़्त में भी रसूलुल्लाह ﷺ जब एक क़दम भी पीछे नहीं हटे बल्कि एक सफेद खच्चर पर सुवार थे और हज़रते अबू सुफ्यान बिन अल हारिस رضی الله تعالی عنه आप ﷺ के खच्चर की लगाम पकड़े हुए थे और आप ﷺ अकेले दुश्मनों के दल बादल लश्करों के हुजूम की तरफ़ बढ़ते चले जा रहे थे। और रज्ज़ के येह कलिमात ज़बाने अक्दस पर जारी थे कि :

                 _मैं नबी हूं येह झूट नहीं है_ 
            _मैं अब्दुल मुत्तलिब का बेटा हूं।_

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 619-620 📚*

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                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *ताक़त :-*  हुज़ूरे अक्दस ﷺ की जिस्मानी ताकत भी हद्दे एजाज़ को पहुंची हुई थी और आप ﷺ ने अपनी इस मो'जिज़ाना ताक़त व कुव्वत से ऐसे ऐसे मुहय्युरुल उकूल कारनामों और कमालात का मुज़ाहरा फ़रमाया कि अक्ले इन्सानी इस के तसव्वुर से हैरान रह जाती है। गज़्वए अहज़ाब के मौक पर सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم जब खन्दक खोद रहे थे एक ऐसी चट्टान जाहिर हो गई जो किसी तरह किसी शख्स से भी नहीं टूट सकी मगर जब आप ﷺ ने अपनी ताकते नुबुव्वत से उस पर फावड़ा मारा तो वोह रैत के भुरभुरे टीले की तरह बिखर कर पाश पाश हो गई जिस का मुफ़स्सल तज़किरा जंगे खन्दक़ में हम तहरीर कर चुके हैं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 621 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 413* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *रकाना पहलवान से कुश्ती :-* अरब का मशहूर पहलवान रकाना आप ﷺ के सामने से गुज़रा आप ﷺ ने उस को इस्लाम की दावत दी वोह कहने लगा कि ऐ मुहम्मद (ﷺ) ! अगर आप मुझ कुश्ती लड़ कर मुझे पछाड़ दें तो मैं आप की दावते इस्लाम को क़बूल कर लूंगा। हुज़ूरे अकरम ﷺ तय्यार हो गए और उस से कुश्ती लड़ कर उस को पछाड़ दिया, फिर उस ने दोबारा कुश्ती लड़ने की दावत दी आप ﷺ ने दूसरी मरतबा भी अपनी पैग़म्बराना ताकत से उस को इस ज़ोर के साथ ज़मीन पर पटक दिया कि वोह देर तक उठ न सका और हैरान हो कर कहने लगा कि ऐ मुहम्मद (ﷺ) ! खुदा की कसम ! आप की अजीब शान है कि आज तक अरब का कोई पहलवान मेरी पीठ ज़मीन पर नहीं लगा सका मगर आप ने दम ज़दन में मुझे दो मरतबा ज़मीन पर पछाड़ दिया। बा'ज़ मुअर्रिखीन का क़ौल है कि रकाना फ़ौरन ही मुसलमान हो गया मगर बा'ज़ मुअर्रिखीन ने लिखा है कि रकाना ने फत्हे मक्का के दिन इस्लाम कबूल किया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 621 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 414* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *यज़ीद बिन रकाना से मुकाबला :-* इसी रकाना का बेटा यज़ीद बिन रकाना भी माना हुवा पहलवान था येह तीन सो बकरियां ले कर बारगाहे नुबुव्वत में हाज़िर हुवा और कहा कि ऐ मुहम्मद (ﷺ) ! आप मुझ से कुश्ती लड़िये । आप ﷺ ने फ़रमाया कि अगर मैं ने तुम्हें पछाड़ दिया तो तुम कितनी बकरियां मुझे इन्आम में दोगे ? उस ने कहा कि एक सो बकरियां मैं आप को दे दूंगा। हुज़ूर ﷺ तय्यार हो गए और उस से हाथ मिलाते ही उस को ज़मीन पर पटक दिया और वोह हैरत से आप ﷺ का मुंह तकने लगा और वादे के मुताबिक़ एक सो बकरियां उसने आप ﷺ को दे दीं। मगर फिर दोबारा उस ने कुश्ती लड़ने के लिये चेलेन्ज दिया आप ने दूसरी मरतबा भी उस की पीठ ज़मीन पर लगा दी उस ने फिर एक सो बकरियां आप ﷺ को दे दीं। 

࿐  फिर तीसरी बार उस ने कुश्ती के लिये ललकारा आप ﷺ ने उस का चेलेन्ज क़बूल फ़रमा लिया और कुश्ती लड़ कर इस ज़ोर के साथ उस को ज़मीन पर दे मारा कि वोह चित हो गया, उस ने बाक़ी एक सो बकरियों को भी आप ﷺ की ख़िदमत में पेश कर दिया, मगर कहने लगा कि ऐ मुहम्मद (ﷺ)! सारा अरब गवाह है कि आज तक कोई पहलवान मुझ पर ग़ालिब नहीं आ सका, मगर आप ﷺ ने तीन बार जिस तरह मुझे कुश्ती में पछाड़ा है इस से मेरा दिल मान गया कि यक़ीनन आप ﷺ ख़ुदा عزوجل के नबी हैं, येह कहा और कलिमा पढ़ कर दामने इस्लाम में आ गया, हुज़ूर ﷺ उस के मुसलमान हो जाने से बेहद खुश हुए और उस की तीन सो बकरियां वापस कर दीं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 622📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 415* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *अबुल अस्वद से ज़ोर आज़माई :-* इसी तरह अबुल अस्वद जमही इतना बड़ा ताक़त वर पहलवान था कि वोह एक चमड़े पर बैठ जाता था और दस पहलवान उस चमड़े को खींचते थे ताकि वोह चमड़ा उस के नीचे से निकल जाए मगर वोह चमड़ा फट फट कर टुकड़े टुकड़े हो जाने के बा वुजूद उस के नीचे से निकल नहीं सकता था। उस ने भी बारगाहे अक्दस ﷺ में आ कर येह चेलेन्ज दिया कि अगर आप ﷺ मुझे कुश्ती में पछाड़ दें तो मैं मुसलमान हो जाऊंगा। हुज़ूर ﷺ उस से कुश्ती लड़ने के लिये खड़े हो गए और उस का हाथ पकड़ते ही उस को ज़मीन पर पछाड़ दिया। वोह आप ﷺ की इस ताकते नुबुव्वत से हैरान हो कर फ़ौरन ही मुसलमान हो गया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 623📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 416* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *सखावत :-*  हुज़ूरे अक्दस ﷺ की शाने सखावत मोहताजे बयान नहीं। हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنه का बयान है कि नबिय्ये करीम ﷺ तमाम इन्सानों से ज़ियादा बढ़ कर सखी थे। खुसूसन माहे रमज़ान में आप ﷺ की सखावत इस क़दर बढ़ जाती थी कि बरसने वाली बदलियों को उठाने वाली हवाओं से भी ज़ियादा आप ﷺ सखी हो जाते थे।

࿐  हज़रते जाबिर बिन अब्दुल्लाह رضی الله تعالی عنه फ़रमाते हैं कि हुज़ूर ﷺ ने किसी साइल के जवाब में ख़्वाह वोह कितनी ही बड़ी चीज़ का सुवाल क्यूं न करे आप ﷺ ने "ला” (नहीं) का लफ्ज़ नहीं फ़रमाया। येही वोह मज़्मून है जिस को फरजदक शाहर ताबेई मुतवफ्फा सि. 110 हि. ने क्या खूब कहा है कि : इसी का तर्जमा किसी फ़ारसी के शाइर ने इस तरह किया है कि : या'नी हुज़ूर ﷺ ने किसी साइल के जवाब में "ला" (नहीं) का लफ्ज़ नहीं फरमाया बल्कि हमेशा "नअ्म" (हां) ही कहा मगर कलिमए शहादत में "ला" (नहीं) का लफ्ज़ ज़रूर आप ﷺ की ज़बाने मुबारक पर आता था और अगर कलिमए शहादत में "ला" कहने की ज़रूरत न होती तो उस में भी "ला" (नहीं) की जगह आप ﷺ "नअम" (हां) ही फ़रमाते।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 624📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 417* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *सखावत :-*  हुज़ूरे अक्दस ﷺ की सखावत किसी साइल के सुवाल ही पर महदूद व मुन्हसर नहीं थी बल्कि बिग़ैर मांगे हुए भी आप ﷺ ने लोगों को इस क़दर ज़ियादा माल अता फरमा दिया कि आलमे सखावत में इस की मिसाल नादिरो नायाब है, आप ﷺ के बहुत बड़े दुश्मन उमय्या बिन खुलफ़ काफ़िर का बेटा सफवान बिन उमय्या जब मकामे "जिइर्राना" में हाज़िरे दरवार हुवा तो आप ﷺ ने उस को इतनी कसीर तादाद में ऊंटों और बकरियों का रेवड़ अता फरमा दिया कि दो पहाड़ियों के दरमियान का मैदान भर गया। चुनान्चे सफवान मक्का जा कर चिल्ला चिल्ला कर अपनी क़ौम से कहने लगा कि ऐ लोगों ! दामने इस्लाम में आ जाओ मुहम्मद (ﷺ) इस कदर ज़ियादा माल अता फरमाते हैं कि फकीरी का कोई अन्देशा ही बाकी नहीं रहता इस के बाद फिर सफवान खुद भी मुसलमान हो गए।

࿐  बहर हाल आप ﷺ के जूदो नवाल और सखावत के अहवाल इस क़दर अदीमुल मिसाल और इतने ज़ियादा हैं कि अगर इन का तज़किरा तहरीर किया जाए तो बहुत सी किताबों का अम्बार तय्यार हो सकता है मगर इस से पहले के अवराक़ में हम जितना और जिस क़दर लिख चुके हैं वोह सखावते नुबुव्वत को समझने के लिये बहुत काफी है। ख़ुदा वन्दे करीम हम सब मुसलमानों को हुज़ूरे अक्दस ﷺ की सीरते मुबारका पर ज़ियादा से ज़्यादा अमल करने की तौफीक अता फरमाए। (आमीन)

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 625 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 418* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *अस्माए मुबारका :-* अरब का मश्हूर मकूला है कि यानी किसी चीज़ के नामों का बहुत ज़ियादा होना इस बात की दलील हुवा करती है कि वोह चीज़ इज्ज़त व शरफ़ वाली है। हुज़ूरे अक्दस ﷺ को चूंकि खल्लाके आलम جلَّ جلاله ने इस क़दर एजाज़ो इक्राम और इज़्ज़त व शरफ़ से सरफ़राज़ फ़रमाया है कि आप इमामुन्नबिय्यीन, सय्यदुल मुर्सलीन, महबूबे रब्बुल आलमीन ﷺ हैं इस लिये आप ﷺ के अस्माए मुबारका और अल्क़ाब बहुत ज़ियादा हैं। 

࿐  हज़रते जुबैर बिन मुतइम رضی الله تعالی عنه रिवायत करते हैं कि हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि मेरे पांच नाम हैं मैं (1) "मुहम्मद" व (2) "अहमद " हूं और मैं (3) "माही" हूं कि अल्लाह तआला मेरी वजह से कुफ्र को मिटाता है और मैं (4) "हाशिर" हूं कि मेरे क़दमों पर सब लोगों का हश्र होगा और (5) "आकिब" हूं। (1) (यानी सब से आखिरी नबी)

࿐  कुरआने मजीद में हुज़ूर ﷺ के अल्काब व अस्मा बहुत ज़यादा तादाद में मज़कूर हैं। चुनान्चे बाज़ उलमाए किराम ने फ़रमाया कि खुदा वन्दे कुद्दूस के नामों की तरह हुज़ूर ﷺ के भी निन्नानवे नाम और अल्लामा इब्ने दहिय्या ने अपनी किताब में तहरीर फ़रमाया कि अगर हुज़ूर ﷺ के उन तमाम नामों को शुमार किया जाए जो कुरआन व हदीस और अगली किताबों में मज़कूर हैं तो आपके नामों की गिनती तीन सो तक पहुंचती है और बाज़ सूफ़ियाए किराम का बयान है कि अल्लाह तआला के भी एक हज़ार नाम हैं और हुज़ूर ﷺ के नामों की तादाद भी एक हज़ार है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 625-626📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 419* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *अस्माए मुबारका :-*  बहर हाल हुज़ूरे अक्दस ﷺ के तमाम अस्मा मुबारका में से दो नाम सब से ज़ियादा मशहूर हैं एक “मुहम्मद” दूसरा "अहमद" (ﷺ) आप ﷺ के दादा अब्दुल मुत्तलिब ने आपका नाम "मुहम्मद " रखा और इसी नाम पर आपका अकीका किया जब लोगों ने पूछा कि ऐ अब्दुल मुत्तलिब ! आप ने अपने पोते का नाम “मुहम्मद" क्यूं रखा आप के आबाओ अज्दाद में किसी का भी येह नाम नहीं रहा है। तो आप ने जवाब दिया कि मैं ने इस निय्यत से और इस उम्मीद पर इस बच्चे का नाम "मुहम्मद" रखा है कि तमाम रूए जमीन के लोग इस की तारीफ़ करेंगे। और एक रिवायत में येह है कि आप ने येह कहा कि मैं ने इस उम्मीद पर "मुहम्मद" नाम रखा कि अल्लाह तआला आस्मानों में इस की तारीफ फरमाएगा और ज़मीन में ख़ुदा की तमाम मलूक इस की तारीफ़ करेगी, 

࿐  और हज़रते अब्दुल मुत्तलिब की इस निय्यत और उम्मीद की वजह यह है कि इन्हों ने एक ख़्वाब देखा था कि मेरी पीठ से एक चांदी की ज़न्जीर निकली जिस का एक कनारा ज़मीन में है और एक सिरा आस्मान को छू रहा है और तमाम मशरिक व मरिब के इन्सान उस ज़न्जीर से चिमटे हुए हैं हज़रते अब्दुल मुत्तलिब ने जब कुरैश के काहिनों से इस ख़्वाब की ताबीर दरयाफ़्त की तो उन्हों ने इस ख़्वाब की येह ता'वीर बताई कि ऐ अब्दुल मुत्तलिब! आप की नस्ल से अन क़रीब एक ऐसा लड़का पैदा होगा कि तमाम अहले मशरिक व मगरिब उस की पैरवी करेंगे और तमाम आस्मान व जमीन वाले उस की मदहो सना का खुत्बा पढ़ेंगे।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 627 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 420* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *अस्माए मुबारका :-*  और बाज़ का क़ौल है कि हुज़ूर ﷺ की वालिदए माजिदा رضی الله تعالی عنه ने आप का नाम "मुहम्मद" रखा है क्यूं कि जब हुज़ूर ﷺ इन के शिकम मुबारक में रौनक अफरोज़ थे तो इन्हों ने ख़्वाब में एक फ़िरिश्ते को येह कहते हुए सुना था कि ऐ आमिना ! सारे जहान के सरदार तुम्हारे शिकम में तशरीफ़ फ़रमा हैं जब येह पैदा हों तो तुम इन का नाम "मुहम्मद" रखना।

࿐  इन दोनों रिवायतों में कोई तआरुज नहीं। हो सकता है कि हज़रते अब्दुल मुत्तलिब ने अपने और हज़रते बीबी आमिना رضی الله تعالی عنها के ख़्वाबों की वजह से दोनों ने बाहमी मश्वरे से हुज़ूर ﷺ का नाम "मुहम्मद" रखा हो।

࿐  अल्लाह तआला ने कुरआने मजीद में कई जगह आप ﷺ को "मुहम्मद" के नाम से ज़िक्र फ़रमाया है और हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम "अहमद" के नाम से तमाम ज़िन्दगी आप ﷺ के ज़िक्रे जमील का डंका बजाते रहे। चुनान्चे कुरआने मजीद में है कि : यानी हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम खुश ख़बरी सुनाते हुए तशरीफ लाए थे कि मेरे बाद एक रसूल तशरीफ़ लाने वाले हैं जिन का नामे नामी व इस्मे गिरामी "अहमद" है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 628 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 421* ༺                        
                  *❝  अख़्लाके़ नुबुव्वत ❞*
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࿐  *आप ﷺ की कुन्यत :-* आप ﷺ की मशहूर कुन्यत "अबुल क़ासिम" है। चुनान्चे बहुत सी अहादीस में आप ﷺ की येह कुन्यत मज़कूर है, मगर हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه ने रिवायत की है कि आप ﷺ की कुन्यत "अबू इब्राहीम" भी है। चुनान्चे हज़रते जिब्रील (अलैहिस्सलाम) ने हुज़ूर ﷺ को इन लफ़्ज़ों से सलाम किया कि यानी ऐ इब्राहीम के वालिद ! आप पर सलाम।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 628📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 422* ༺                        
                   *❝  तिब्बे नबवी ❞*
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࿐  हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि ऐ अल्लाह के बन्दो ! तुम लोग दवाएं इस्तिमाल करो इस लिये कि अल्लाह तआला ने एक बीमारी के सिवा तमाम बीमारियों के लिये दवा पैदा फ़रमाई है। लोगों ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह (ﷺ)! वोह कौन सी बीमारी है जिस की कोई दवा नहीं है? आप ﷺ ने इरशाद फरमाया कि वोह "बुढ़ापा" है!

࿐   हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنه ने रिवायत की है कि हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि तुम लोग जिन जिन तरीकों से इलाज करते हो उन में सब से बेहतर चार तरीक़ए इलाज हैं : *सऊत :-* नाक के जीए दवा चढ़ाना, *लदूद :-* मुंह के किसी एक जानिब से दवा पिलाना, *हिजामह :-* किसी उज़्व पर पछना लगवा कर खून निकलवा देना, *मशी :-* जुल्लाब लेना.!

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 629 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 423* ༺                        
                   *❝  तिब्बे नबवी ❞*
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࿐  बाज़ दवाएं खुद हुज़ूर ﷺ ने इस्ति'माल फ़रमाई हैं और बाज़ दवाओं के औसाफ़ और उन के फ़वाइद से अपनी उम्मत को आगाह फ़रमाया है। हम यहां उन में से तबर्रुकन चन्द दवाओं का ज़िक्र तहरीर करते हैं ताकि हमारी इस मुख्तसर किताब के सफहात "तब्बे नबवी" के अहम बाब से महरूम न रह जाएं।

࿐  *इसमद (सुर्मए सियाह इस्फहानी) :-* हुज़ूरे अकरम ﷺ ने इस के बारे में इरशाद फ़रमाया कि तुम लोग इसमद को इस्तिमाल में रखो येह निगाह को तेज़ करता है और पलक के बाल उगाता है!

࿐  हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنه का बयान है हुज़ूरे अक्दस ﷺ के पास एक सुरमा दानी थी जिस में इसमद का सुरमा रहता था सोने से पहले हर रात तीन तीन सलाई दोनों आंखों में लगाया करते थे। 

࿐  *हिना मेहंदी :-*  हुज़ूर ﷺ के कोई फुन्सी निकलती या कांटा चुभ जाता तो आप ﷺ उस पर मेहंदी रख दिया करते थे। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 630📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

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                   *❝  तिब्बे नबवी ❞*
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࿐  *अल हब्बतुस्सौदाउ :-*  (कलोंजी जिस को शोनेज़ भी कहते हैं और बा'ज़ जगह इस को मुंगरीला भी कहा जाता है) : हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि इस के इस्ति' माल को लाज़िम पकड़ो क्यूं कि इस में मौत के सिवा सब बीमारियों से शिफा है। 

࿐  *अत्तल्बीनह :-*  (आटा, पानी, शहद, तेल मिला कर हरीरा की तरह बनाया जाता है) हुज़ूर ﷺ के घर वालों में जब कोई शख्स जाड़ा बुखार में मुब्तला होता था तो आप ﷺ इस तआम के तय्यार करने का हुक्म देते थे और फ़रमाते थे कि येह खाना गमगीन आदमी के दिल को तक्विय्यत देता है और बीमार दिल से तक्लीफ़ को इस तरह दूर कर देता है जिस तरह तुम लोग पानी से अपने चेहरों के मैल कुचैल को दूर कर देते हो। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 630 📚*

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࿐  *अल असल (शहद) :-* हुज़ूर ﷺ की खिदमत में एक शख्स ने आ कर शिकायत की, कि इस के भाई को दस्त आ रहे हैं आप ﷺ ने फ़रमाया कि उस को शहद पिलाओ। फिर वोह दोबारा आया और कहने लगा कि दस्त बन्द नहीं होते। इरशाद फ़रमाया कि उस को शहद पिलाओ। फिर वोह तीसरी बार आ कर कहने लगा कि दस्त का सिल्सिला जारी है। आप ﷺ ने फिर शहद पिलाने का हुक्म दिया उस ने कहा कि वह इलाज तो मैं कर चुका हूं। आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह तआला सच्चा है। और तेरे भाई का पेट झूटा है उस को शहद पिलाओ उस ने जा कर शहद पिलाया तो वोह शिफ़ायाब हो गया।

࿐  हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि जो शख्स हर महीने में तीन दिन सुबह के वक़्त शहद चाट लिया करे उस को कोई बड़ी बला न पहुंचेगी। 

࿐  आप ﷺ ने येह भी फ़रमाया कि दो शिफ़ाओं को 'लाज़िम पकड़ो, एक शहद, दूसरी कुरआन शरीफ़।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 631 📚*

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࿐  *ख़ल्लु (सिर्का) :-*  हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि बेहतरीन सालन सिर्का है ऐ अल्लाह ! सिर्के में बरकत अता फरमा, क्यूं कि येह अम्बिया عَلَیْھِمُ الصَّلٰوةُ وَالسَّلَام का सालन है और जिस घर में सिर्का होगा वोह घर कभी मोहताज नहीं होगा।

࿐  *ज़ैत (रोगने जैतून) :-* हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि तुम लोग रोगने जैतून को सालन के तौर पर इस्ति'माल करो और इस को बदन पर भी मलते रहो क्यूं कि येह मुबारक दरख़्त से निकला हुवा है। और दूसरी हदीस में यूं वारिद हुवा कि तुम लोग रोगने ज़ैतून को खाओ और इस को बदन में लगाओ क्यूं कि येह बरकत वाली चीज़ है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 632📚*

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࿐  *मुसम्मिन (बदन को फ़र्बा करने वाली दवा :-* हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها कहती हैं कि मेरी वालिदा ने जब मेरी रुख़्सती का इरादा किया तो मेरा इलाज करने लगीं कि मैं ज़रा फ़र्बा बदन हो जाऊं मगर कोई इलाज कारगर न हुवा। मगर जब मैं ने ककड़ी को ताज़ा खजूरों के साथ खाना शुरूअ कर दिया तो मैं खूब फ़र्बा बदन वाली हो गई। हज़रते अब्दुल्लाह बिन जाफ़र رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ककड़ी ताज़ा खजूरों के साथ तनावुल फ़रमाया करते थे।

࿐  *अशा (रात का खाना) :-* हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि रात का खाना तर्क न करो, कुछ न मिले तो एक मुठ्ठी खजूर ही खा लिया करो क्यूं कि रात को खाना छोड़ देने से जल्द बुढ़ापा आ जाता है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 632📚*

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                   *❝  तिब्बे नबवी ❞*
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࿐  *हिम्यह (मुज़िर चीज़ों से परहेज़) :-* हुज़ूर ﷺ अपने साथ हज़रते अली رضی الله تعالی عنه को ले कर हज़रते उम्मुल मुन्ज़िर सहाबिया   رضی الله تعالی عنها के मकान पर तशरीफ़ ले गए उन्हों ने कच्ची पक्की खजूरों का एक खोशा पेश किया और हुज़ूर ﷺ उस में से खाने लगे। हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने भी हाथ बढ़ाया तो आप ﷺ ने फ़रमाया : ऐ अली ! तुम अभी बीमारी से उठे हो और नक़ाहत बाक़ी है इस लिये तुम इस को मत खाओ। इस के बा'द हज़रते उम्मुल मुन्ज़िर رضی الله تعالی عنها ने जव और चुकुन्दर मिला कर खाना पकाया तो हुज़ूर ﷺ ने हज़रते अली رضی الله تعالی عنه से फ़रमाया कि तुम येह खाओ येह तुम्हारे लिये बहुत ज़ियादा मुफ़ीद ग़िज़ा है।

࿐  हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि तुम लोग ज़बरदस्ती कर के अपने मरीज़ों को खाने पीने पर मजबूर मत किया करो, अल्लाह तआला उन लोगों को खिला पिला दिया करता है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 633 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 429* ༺                        
                   *❝  तिब्बे नबवी ❞*
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࿐  *ज़न्जबील (सूंठ) :-* बादशाहे रूम ने एक घड़ा ज़न्जबील से भरा हुवा आप ﷺ के पास हदिय्यतन भेजा था, आप ﷺ ने उस में से एक एक टुकड़ा अपने अस्हाब को खाने के लिये दिया इस रिवायत को अबू नुऐम मुहद्दिस ने अपनी किताब “तिब्बे नबवी" में बयान किया है।

࿐  *अजवा :-*  मदीनए मुनव्वरह की खजूरों में से एक खजूर का नाम है इस के बारे में इरशादे नबवी है कि "अजवा" जन्नत से है और वोह जुनून या ज़हर से शिफा है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 633-634 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 430* ༺                        
                   *❝  तिब्बे नबवी ❞*
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࿐  *कमअह :-*  जिस को बाज़ लोग ककरमता और बाज़ लोग सांप की छत्री कहते हैं इस के बारे में हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि कमअह “मन्न" के मिस्ल है जो बनी इस्राईल पर नाज़िल हुवा था (या'नी जैसे वोह मुफ़्त की चीज़ और बहुत ही मुफ़ीद चीज़ थी ऐसी ही येह है) और इस का अरक़ आंखों के लिये शिफ़ा है। 

࿐  *सना (सनामकी एक दवा है) :-* हज़रते अस्मा बिन्ते मैस رضی الله تعالی عنها से हुज़ूर ﷺ ने दरयाफ़्त फ़रमाया कि तुम किस दवा से जुल्लाब लेती हो ? उन्हों ने अर्ज़ किया कि “शबरम" से, आप ﷺ ने फ़रमाया येह तो बहुत ही गर्म दवा है, फिर आप ﷺ ने उस को सना का जुल्लाब लेने के लिये हुक्म फ़रमाया और इरशाद फ़रमाया कि अगर मौत से शिफ़ा देने वाली कोई चीज़ होती तो वोह सना है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 634 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 431* ༺                        
                   *❝  तिब्बे नबवी ❞*
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࿐  *सन्नूत :-*  इस के मा'ना में शारिहीने हदीस का इख़्तिलाफ़ है मगर अतिब्बा ने एक खास तफ्सीर को तरजीह दी है। यानी वोह शहद जो घी के बरतन में रखा गया हो और उस में घी के कुछ असरात पहुंच गए हों, हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि तुम लोग सना और सन्नूत को इस्तिमाल करते रहो कि इन दोनों में मौत के सिवा तमाम अमराज़ से शिफ़ा है।

࿐   बा'ज़ अतिब्बा ने वजहे तरजीह में कहा है कि शहद और घी से सना की इस्लाह और सहाल की इआनत हो जाती है।

࿐  *सम (ज़हर) :-*  हज़रते अबू हुरैरा رضی الله تعالی عنه का बयान है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने ख़बीस दवा यानी ज़हर से मन्अ फ़रमाया है।

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࿐  *ऊद हिन्दी (क़िस्त शीरीं) :-* हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि इस ऊद हिन्दी को इस्तिमाल में लाया करो क्यूं कि इस में सात शिफ़ाएं हैं हल्क़ में कव्वों के लिये इस का सऊत करना चाहिये और निमोनिया के लिये इस का जोशांदा पिलाना चाहिये। 

࿐  *दवा इर्कुन्निसा :-* हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه ने कहा कि मैं ने रसूलुल्लाह ﷺ को येह फ़रमाते हुए सुना कि जंगल में चरने वाली बकरी के सुरीन को गला कर तीन टुकड़े कर लिये जाएं और तीन दिन नहार मुंह एक टुकड़ा खाएं इस में "इर्कुन्निसा " की शिफ़ा है।

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 433* ༺                        
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࿐  *हराम दवाएं :-*  हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने बीमारी भी उतारी है और दवा भी और हर बीमारी की दवा बना दी है।लिहाज़ा तुम लोग दवा करो मगर हराम चीज़ से दवाइलाज मत करो।

࿐   *शराब :-* हज़रते सुवैद बिन तारिक رضی الله تعالی عنه ने हुज़ूर ﷺ से शराब के बारे में दरयाफ़्त किया तो आप ﷺ ने इस के इस्ति'माल से मन्अ फ़रमाया। फिर दोबारा पूछा तो आप ﷺ ने मन्अ फ़रमाया। तीसरी बार उन्हों ने अर्ज़ किया : या नबिय्यल्लाह ! येह तो दवा है, आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि "नहीं" येह बीमारी है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 636📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 434* ༺                        
                   *❝  तिब्बे नबवी ❞*
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࿐  *ज़ख़्मों का इलाज :-* हज़रते सहल  बिन साद साइदी رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि जंगे उहुद के दिन हुज़ूर ﷺ के दन्दाने मुबारक शहीद हो गए और लोहे की टोपी आप ﷺ के सरे अक़्दस पर तोड़ डाली गई तो हज़रते फातिमा رضی الله تعالی عنها चेहरए अन्वर से ख़ून धो रही थीं और हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ढाल में पानी रख कर ज़ख़्म पर बहा रहे थे लेकिन जब खून बहने का सिल्सिला बढ़ता ही रहा तो हज़रते फ़ातिमा رضی الله تعالی عنها ने खजूर की चटाई का एक टुकड़ा लिया और उस को जला कर राख बना डाला फिर उसी राख को ज़ख़्मों पर चिपका दिया तो ख़ून बहना बन्द हो गया। 

࿐ *ताऊन :-* (प्लेग) के बारे में हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने फ़रमाया कि येह एक अज़ाब है जिस को अल्लाह तआला ने बनी इस्राईल पर भेजा था। जब तुम सुनो कि किसी ज़मीन में ताऊन फैल गया है तो तुम लोग उस ज़मीन में दाखिल न हुवा करो और जब तुम्हारी ज़मीन में ताऊन आ जाए तो तुम उस ज़मीन से निकल कर न भागो।

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 435* ༺                        
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࿐  *अनाड़ी तबीब :-* हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि जो शख़्स इल्मे तिब को नहीं जानता और इलाज करता है तो वोह (मरीज़ को अगर कोई नुक्सान पहुंचा) ज़ामिन है यानी उस से नुक्सान का तावान लिया जाएगा। 

࿐  *बुख़ार :-*  एक शख़्स ने हुज़ूर ﷺ के रू बरू बुखार को गाली दी तो आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि तुम बुखार को गाली मत दो, बुखार की बीमारी मरीज़ के गुनाहों को इस तरह दूर कर देती है जिस तरह लोहे के मैल को आग दूर कर देती है। 

࿐  *बुखार का इलाज :-* हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि बुख़ार जहन्नम के जोश मारने से है। लिहाज़ा तुम लोग इस को पानी से (पिला कर और गुस्ल करा कर) ठन्डा करो।

⚠️ *नोट :-* बुख़ार का येह इलाज एक खास किस्म के बुखार का इलाज है जो अरब में होता है जिस को अतिब्बा सफ़रावी बुखार या हमी नारिया (लू लगने का बुख़ार कहते हैं) येह हर किस्म के बुखार का इलाज नहीं है। 

࿐  इस लिये हर क़िस्म के बुख़ारों में येह इलाज काम्याब नहीं हो सकता लिहाज़ा किसी तबीबे हाज़िक से अच्छी तरह बुखार की तशखीस करा लेने के बा'द ही इस का इलाज कराना चाहिये। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 637 📚*

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                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  खुदा वन्दे कुद्दूस के दरबार में बन्दों की दुआओं का बहुत ही बड़ा दरजा है और दवाओं की तरह दुआओं में भी ख़ल्लाके़ आलम جلَّ جلاله ने बड़ी बड़ी खास खास तासीरात पैदा फ़रमा दी हैं। चुनान्चे परवर दगारे आलम عزوجل ने कुरआने मजीद में बार बार बन्दों को दुआएं मांगने का हुक्म दिया और इरशाद फ़रमाया कि 

                             ادْعُوْنِیْۤ اَسْتَجِبْ لَكُمْؕ-

࿐   या'नी ऐ बन्दो ! तुम लोग मुझ से दुआएं मांगो मैं तुम्हारी दुआओं को क़बूल करूंगा।

            (सूरह मोमिन आयत नम्बर - 60)
*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 638📚*

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اَلصَّلوٰةُ وَالسَّلَامُ عَلَیۡكَ يَـــــــــــــــــــــــــــارَسُوۡلَ اللّٰهِ ﷺ

*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 437* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  और हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने भी दुआओं की अहम्मिय्यत और इन के फ़वाइद का ज़िक्र फ़रमाते हुए अपनी उम्मत को दुआएं मांगने की तरगीब दिलाई और फ़रमाया कि : अल्लाह तआला के दरबार में दुआ से बढ़ कर इज़्ज़त वाली कोई चीज़ नहीं है। 

࿐  और दुआओं की फजीलत व अहम्मिय्यत का इज़हार फ़रमाते हुए यहां तक इरशाद फ़रमाया कि दुआ इबादत का मग़्ज़ है और येह भी फ़रमाया जो खुदा से दुआ नहीं मांगता खुदा عزوجل उस से नाराज़ हो जाता है। 

࿐  इस लिये तिब्बे नबवी की तरह हुज़ूरे अक्दस ﷺ की उन चन्द दुआओं का तज़किरा भी हम इस किताब में तहरीर करते हैं जो आप ﷺ के मा'मूलात में रही हैं और जिन के फ़ज़ाइल व फ़वाइद से आप ﷺ ने अपनी उम्मत को आगाह फ़रमा कर उन के विर्द का हुक्म फ़रमाया है ताकि सीरते नबविय्या के इस मुक़द्दस बाब से भी येह किताब मुशर्रफ़ हो जाए और मुसलमान इन दुआओं का विर्द कर के दुन्या व आखि़रत के बेशुमार मनाफ़ेअ व फुवाइद से मालामाल होते रहें।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 638📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 438* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  *हर बला से नजात :-* हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि जो शख़्स सुब्ह व शाम तीन मरतबा येह दुआ पढ़े तो उस को दुन्या की कोई चीज़ नुक्सान नहीं पहुंचाएगी। 

بِسْمِ اللّٰهِ الَّذِي لَا يَضُرُّ مَعَ اسْمِهِ شَيْءٌ فِى الْأَرْضِ وَلَا فِى السَّمَاءِ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيْمُ

࿐  *सोते वक्त की दुआएं :-*  हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि जो शख़्स बिछोने पर येह दुआ तीन मरतबा पढ़ कर सोएगा तो अल्लाह तआला तमाम गुनाहों को बख़्श देगा अगर्चे उस के गुनाह दरख़्तों के पत्तों और टीलों की रैत की तादाद में हों। 

اَسْتَغْفِرُ اللّٰهَ الْعَظِيمَ الَّذِى لَا اِلٰهَ اِلَّا هُوَ الْحَىُّ الْقَيُّومُ ، وَاَتُوْبُ إِلَيْهِ

࿐ हुज़ूरे अकरम ﷺ सोते वक़्त येह दुआ पढ़ा करते थे 
                           اللّٰهُمَّ بِاسْمِكَ اَمُوْتُ وَاَحْيٰ 

और जब नींद से बेदार होते तो येह दुआ पढ़ते थे : 
اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذِىْ اَحْيَانَا بَعْدَ مَا اَمَاتَنَا وَالَيْهِ النُّشُوْرُ

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 640📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 439* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  *रात में जागे तो क्या पढ़े :-* हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि जो शख़्स रात में नींद से बेदार हो तो येह दुआ पढ़े फिर इस के बाद जो दुआ मांगेगा वोह क़बूल होगी और वुज़ू कर के जो नमाज़ पढ़ेगा वोह नमाज़ भी मक़बूल हो जाएगी।

لَا اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ وَحْدَهٗ لَا شَرِيكَ لَهٗ لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ ‌‌‌‌‌‏وَّسُبْحَانَ اللّٰهِ وَالْحَمْدُ لِلّٰهِ وَلَا اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ وَاللّٰهُ اَكْبَرُ وَلَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ اِلَّا بِاللّٰهِ

࿐  *घर से निकलते वक़्त की दुआ :-* हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि जो शख़्स अपने घर से बाहर निकलते वक़्त येह दुआ पढ़ ले तो उस की मुश्किलात दूर हो जाएंगी और वोह दुश्मनों के शर से महफूज़ रहेगा और शैतान उस से अलग हट जाएगा।

  بِسْمِ اللّٰهِ تَوَكَّلْتُ عَلَى اللَٰهِ لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ اِلَّا بِاللَّهِ

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 640📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 440* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  *बाज़ार में दाखिल हो तो येह पढ़े :-* इरशादे नबवी है कि जो शख़्स बाज़ार में दाखिल होते वक़्त इन कलिमात को पढ़ ले तो खुदा वन्दे तआला दस लाख नेकियां उस के नामए आ'माल में लिखने का हुक्म फ़रमाएगा और उस के दस लाख गुनाहों को मिटा देगा और उस के दस लाख दरजे बुलन्द फ़रमाएगा।

لَا اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ وَحْدَهٗ لَا شَرِيكَ لَهٗ ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ يُحْيِىْ وَيُمِيْتُ وَهُوَ حَيٌّ لَّا يَمُوْتُ بِيَدِهِ الْخَيْرُ وَهُوَ عَلٰی كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ

࿐  *दुआए सफर :-* हज़रते अब्दुल्लाह बिन सरजिस رضی الله تعالی عنه का बयान है कि हुज़ूर ﷺ जब सफ़र के लिये रवाना होते तो येह दुआ पढ़ते थे। 

اَللّٰهُمَّ اَنْتَ الصَّاحِبُ فِى السَّفَرِ وَالْـخَلِيْفَةُ فِى الْاَهْلِ، اَللّٰهُمَّ اصْحَبْنَا فِى سَفَرِنَا وَاخْلُفْنَا فِىْ اَھْلِنَا اَللّٰهُمَّ اِنِّىْ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ وَعْثَاءِ السَّفَرِ وَكَآبَةِ الـْمُنْقَلَبِ وَمِنَ الْحَوْرِ بَعْدَ الْکَوْرِ

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 641 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 441* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  *सफ़र से आने की दुआ :-* हुज़ूर ﷺ जब सफ़र से लौट कर अपने काशानए नुबुव्वत पर मदीना तशरीफ़ लाते तो येह दुआ पढ़ते।

               اٰئِبُوْنَ تَائِبُوْنَ عَابِدُوْنَ لِرَبِّنَا حَامِدُوْنَ

࿐  *मन्जिल पर इस दुआ का विर्द करे :-*  रहूमतुल्लिल आलमीन ﷺ का इरशाद है कि जो शख़्स सफ़र में किसी जगह पड़ाव करे और येह दुआ पढ़ ले तो उसको उस जगह किसी क़िस्म का नुक्सान नहीं पहुंचेगा।

            اَعُوْذُ بِكَلِمَاتِ اللّٰهِ التَّآمَّاتِ مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ،

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 642 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 442* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  *बेचैनी के वक़्त की दुआ :-* हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنه फ़रमाते हैं कि हुज़ूर ﷺ को जब कोई बेचैनी और परेशानी लाहिक हुवा करती थी तो उस वक़्त आप इस दुआ का विर्द फ़रमाते थे। 

لَآ اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ الْحَلِيْمُ الْحَكِيمُ لَآ اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيْمِ لَآ اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ رَبُّ السَّمٰوٰتِ وَالْاَرْضِ وَرَبُّ الْعَرْشِ الْكَرِيْمِ

 ࿐  *किसी मुसीबत ज़दा को देख कर येह पढ़े :-* हुज़ूर सरवरे दो आलम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि जो शख्स किसी बला में मुब्तला होने वाले को देखे (बीमार या मुसीबत ज़दा को) तो येह दुआ पढ़ ले तो तमाम उम्र वोह उस बला (बीमारी या मुसीबत) से बचा रहेगा। 

اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذِىْ عَافَانِىْ مِمَّا ابْتَلَاكَ بِهٖ  وَفَضَّلَنِىْ عَلٰى كَثِيرٍ مِّمَّنْ خَلَقَ تَفْضِيْلًا

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 642 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 443* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  *किसी को रुख्सत करने की दुआ :-* हुज़ूर ﷺ जब किसी इन्सान को रुख़्सत फ़रमाते थे तो येह कलिमात ज़बाने मुबारक से इरशाद फ़रमाते थे।

       اَسْتَوْدِعُ اللّٰهَ دِيْنَكَ وَاَمَانَتَكَ وَخَوَاتِيْمَ عَمَلِكَ

࿐  *खाना खा कर क्या पढ़े :-* हज़रते अबू उमामा رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि हुजूरे अक्दस ﷺ के सामने से जब दस्तर ख़्वान उठाया जाता था तो आप ﷺ येह दुआ पढ़ते थे।

اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ حَمْدًا كَثِيْرًا طَيِّبًا مُّبَارَكًا فِيْهِ، غَيْرَ مُوَدَّعٍ، وَّلَا مُسْتَغْنًى عَنْهُ رَبَّنَا

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 643 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 444* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  *आंधी के वक़्त की दुआ :-* हुज़ूरे अक्दस ﷺ जब आंधी चलती तो येह दुआ पढ़ते थे।

اَللّٰهُمَّ اِنِّىْ اَسْئَلُكَ مِنْ خَيْرِهَا وَ خَيْرِ مَا فِيْهَا وَ خَيْرِ مَا اُرْسِلَتْ بِهٖ وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ شَرِّهَا وَ شَرِّ مَا فِيْهَا وَ شَرِّ مَا اُرْسِلَتْ بِهٖ

࿐  *बिजली गरजने की दुआ :-*  हुज़ूर ﷺ बादलों की गरज और बिजली की कड़क के वक़्त यह दुआ पढ़ते थे। 

اَللّٰهُمَّ لَا تَقْتُلْنَا بِغَضَبِكَ وَ لَا تُهْلِكْنَا بِعَذَابِكَ وَ عَافِنَا قَبْلَ ذٰلِكَ

࿐  *किसी कौम से डरे तो क्या पढ़े :-* हुज़ूरे अकरम ﷺ ने फ़रमाया कि अगर किसी क़ौम या किसी लश्कर से जान व माल वगैरा का ख़ौफ़ हो तो येह दुआ पढ़े :

اَللّٰهُمَّ اِنَّا نَجْعَلُكَ فِىْ نُحُوْرِهِمْ وَ نَعُوْذُ بِكَ مِنْ شُرُوْرِهِمْ

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 643📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 445* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  *कर्ज़ अदा होने की दुआ :-* मशहूर सहाबी हज़रत अबू सईद खुदरी رضی الله تعالی عنه का बयान है कि हुज़ूर सय्यिदे आलम ﷺ एक दिन मस्जिद में तशरीफ ले गए तो आप ﷺ ने वहां हज़रते अबू उमामा अन्सारी رضی الله تعالی عنه को देखा आपने फ़रमाया कि ऐ अबू उमामा رضی الله تعالی عنه तुम इस वक़्त में जब कि नमाज़ का वक़्त नहीं है मस्जिद में क्यूं और कैसे 'बैठे हुए हो, हजरते अबू उमामा رضی الله تعالی عنه ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह (ﷺ) ! मैं बहुत से अफ्कार और क़र्जो़ के बार से ज़ेरे बार हो रहा हूं। इरशाद फ़रमाया कि क्या मैं तुम को एक ऐसा कलाम न तालीम करूं कि जब तुम उस को पढ़ो तो अल्लाह तआला तुम्हारी फिक्र को दफ़अ फ़रमा दे और तुम्हारे कर्ज को अदा कर दे ते अबू उमामा رضی الله تعالی عنه ने अर्ज़ किया कि क्यूं नहीं! या रसूलल्लाह (ﷺ) ! जरूर मुझे इरशाद फ़रमाइये। 

࿐  तो आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि तुम रोज़ाना सुबह व शाम को यह दुआ पढ़ लिया करो

وَاَعُوْذُبِكَ مِنَ الْعَجْزِ وَالْكَسْلِ وَاَعُوذُبِكَ مِنَ الْجُبْنِ وَالبُخْلِ وَاَعُوْذُبِكَ مِنْ غَلَبَةِ الدِّيْنِ وَقَهْرِ الرِّجَالِ

࿐  हज़रते अबू उमामा رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि मैं ने इस दुआ को पढ़ा तो मेरी फिक्र जाती रही और खुदा वन्दे तआला ने मेरे क़र्ज़ को भी अदा फरमा दिया!

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 644 📚*

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اَلصَّلوٰةُ وَالسَّلَامُ عَلَیۡكَ يَـــــــــــــــــــــــــــارَسُوۡلَ اللّٰهِ ﷺ

*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 446* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  *जुमुआ के दिन ब कसरत दुरूद शरीफ पढ़ो :-*  हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि तुम्हारे दिनों में सब से अफ़्ज़ल दिन जुमुआ का दिन है, लिहाज़ा इस दिन मुझ पर ब कसरत दुरूद पढ़ा करो क्यूं कि तुम लोगों का दुरूद शरीफ़ मेरे हुज़ूर पेश किया जाता है। सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह (ﷺ) ! जब क़ब्र शरीफ़ में आप का जिस्मे मुबारक बिखर कर पुरानी हड्डियों की सूरत में हो जाएगा तो हम लोगों का दुरूद शरीफ़ कैसे आफ ﷺ के दरबार में पेश हुवा करेगा ? तो ने इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने हज़राते अम्बिया عَلَیْھِمُ الصَّلٰوةُ وَالسَّلَام के जिस्मों को ज़मीन पर हराम फरमा दिया है। 

࿐  *ज़रूरी तम्बीह :-*  इस हदीस से मालूम हुवा कि तमाम हज़राते अम्बिया عَلَیْھِمُ الصَّلٰوةُ وَالسَّلَام के मुक़द्दस अजसाम उन की मुबारक कब्रों में सलामत रहते हैं और ज़मीन पर हज़रते हक़ جَلَّ جَلَالُهٗ ने हराम फरमा दिया है कि इन के मुक़द्दस जिस्मों पर किसी किस्म का तगय्युर व तबद्दुल पैदा करे। जब तमाम अम्बिया عَلَیْھِمُ الصَّلٰوةُ وَالسَّلَام की येह शान है तो फिर भला हुज़ूर सय्यिदुल अम्बिया व सय्यदुल मुर्सलीन और इमामुल अम्बिया व खातमुन्नबिय्यीन ﷺ के मुक़द्दस जिसमे अन्वर को ज़मीन क्यूंकर खा सकती है ? इस लिये तमाम उलमाए उम्मत व औलियाए उम्मत का येही अकीदा है कि हुजूरे अक्दस गजब अपनी क़ब्रे अतहर में ज़िन्दा हैं और खुदा عزوجل के हुक्म से बड़े बड़े तसर्रुफ़ात फ़रमाते रहते हैं और अपनी खुदा दाद पैगम्बराना कुव्वतों और मोजिज़ाना ताक़तों से अपनी उम्मत की मुश्किल कुशाई और उन की फ़रयाद रसी फ़रमाते रहते हैं। *खूब याद रखिये !!* कि जो शख्स इस के खिलाफ अकीदा रखे वोह यकीनन बारगाहे अक्दस का गुस्ताख बद अक़ीदा, गुमराह और अहले सुन्नत के मज़हब से खारिज है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 645📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 447* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  *मुर्ग की आवाज़ सुन कर दुआ :-* हज़रते अबू हुरैरा رضی الله تعالی عنه रावी हैं कि हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि जब तुम लोग मुर्ग की आवाज़ सुनो तो अल्लाह तआला से उस के फ़ज़्ल का सुवाल करो क्यूं कि मुर्ग फ़िरिश्ते को देख कर बोलता है। (यानी येह दुआ पढ़ो اَسْئَلُ اللّٰهُ مِن فَضلِهِ الْعظِیْمِ)

࿐  *गधा बोले तो क्या पढ़े :-* हज़रते अबू हुरैरा رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि हुज़ूरे अक्दस ﷺ का इरशाद है कि गधे की आवाज़ सुन कर शैतान से अल्लाह तआला की पनाह मांगो (यानी اَعُوْذُ بِاللّٰهِ مِنَ الشَّيْطَنِ الرَّجِیْمِ)

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 646 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 448* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  *जन्नत का खज़ाना :-*  हज़रते अब्दुल्लाह बिन कैस رضی الله تعالی عنه का बयान है कि मुझ से हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने फ़रमाया कि मैं तेरी रहनुमाई ऐसे कलिमे पर न करूं जो जन्नत के खजानों में से है? मैं ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह (ﷺ) ! वोह कौन सा कलिमा है? तो इरशाद है फ़रमाया कि वोह कलिमा لَاحَوْلَ وَلَاقُوَّةَ اِلَّا بِاللّٰهِ الْعَلِىِّ الْعَظِیْمِ है!

࿐  *बिहिश्त का टिकट :-* हुज़ूरे अन्वर ﷺ ने फ़रमाया कि जो इस दुआ को पढ़ता रहे उस के लिये जन्नत वाजिब हो गई। वोह दुआ येह है

رَضِيْتُ بِاللّٰهِ رَبًّا وَّ بِالْاِسْلَامِ دِيْنًا وَّ بِمُحَمَّدٍ صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَيْهِ وَسَلَّمَ رُسُوْلًا

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 647 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 449* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  *सय्यदुल इस्तिग़्फ़ार :-* हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि जो मुसलमान यकीने कल्ब के साथ दिन में इस दुआ को पढ़ लेगा अगर उस दिन शाम से पहले मरेगा तो जन्नती होगा। और अगर रात में पढ़ लेगा और सुबह से पहले मरेगा तो जन्नती होगा इस दुआ का नाम सय्यदुल इस्तिग़्फ़ार है जो येह है :

اَللّٰهُمَّ اَنْتَ رَبِّىْ لَآ اِلٰهَ اِلَّا اَنْتَ خَلَقْتَنِىْ وَ اَنَا عَبْدُكَ وَ اَنَا عَلٰى عَهْدِكَ وَ وَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ اَعُوْذُبِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ اَبُوْءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَىَّ وَ اَبُوْءُ بِذَنْبِىْ فَاغْفِرْلِىْ فَاِنَّهٗ لَا يَغْفِرُ الذُّنُوْبَ اِلَّا اَنْتَ 

࿐  *जिमाअ की दुआ :-* हुज़ूरे अक्दस ﷺ का इरशादे गिरामी है अगर कोई मुसलमान अपनी बीवी से सोहबत करने से पहले येह दुआ पढ़ ले तो उस सोहबत से जो औलाद पैदा होगी उस को कभी हरगिज़ शैतान कोई नुक्सान नहीं पहुंचा सकेगा। दुआ येह है :

بِسْمِ اللّٰهِ اَللّٰهُمَّ جَنِّبْنَا الشَّيْطَانَ وَ جَنِّبِ الشَّيْطَانَ مَا رَزَقْتَنَا

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 647 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 450* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  *शिफ़ाए अमराज़ के लिये :-* रिवायत है कि अब्दुल अज़ीज़ बिन सुहैब और साबित बनानी رضی الله تعالی عنهما दोनों हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه की खिदमत में हाज़िर हुए और साबित बनानी رضی الله تعالی عنه ने अर्ज़ किया कि ऐ अबू हम्ज़ा ! (अनस) मैं बीमार हो गया हूं। हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه ने फ़रमाया कि क्या मैं उस दुआ से तुम्हारे मरज़ का झाड़ फूंक न कर दूं जिस दुआ से हुज़ूर ﷺ मरीज़ों पर शिफ़ा के लिये दम फ़रमाया करते थे? साबित बनानीرضی الله تعالی عنه ने कहा कि क्यूं नहीं। इस के बा'द हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه ने येह दुआ पढ़ी कि :

اَللَٰهُمَّ رَبَّ النَّاسِ مُذْهِبَ الْبَاْسِ اِشْفِ اَنْتَ الشَّافِىْ لَا شَافِىَ اِلَّا اَنْتَ شِفَاءً لَايُغَادِرُ سَقَمًا

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 648📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 451* ༺                        
                   *❝  पैग़म्बरी दुआएं ❞*
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࿐  *मुसीबत पर ने'मल बदल मिलने की दुआ :-* हज़रते उम्मुल मोमिनीन बीबी उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها कहती हैं कि मैं ने हुज़ूरे अक्दस ﷺ से येह सुना था कि किसी मुसलमान को कोई मुसीबत पहुंचे तो वोह

اِنَّا لِلّٰهِ وَاِنَّا اِلَيْهِ رٰجِعُوْنَ اَللّٰهُمَّ اَجِرْنِىْ فِىْ مُصِيْبَتِىْ وَاخْلُفْ لِىْ خَيْرًا مِّنْهَا

पढ़ ले तो अल्लाह तआला उस मुसलमान को उस की जाएअ शुदा चीज़ से बेहतर चीज़ अता फरमाएगा।

࿐   हज़रते बीबी उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها फ़रमाती हैं कि जब मेरे शोहर हज़रते अबू सलमह رضی الله تعالی عنه का इनतिकाल हो गया तो मैं ने (दिल में) कहा कि भला अबू सलमह رضی الله تعالی عنه से बेहतर कौन मुसलमान होगा? येह पहला घर है जो हुज़ूर ﷺ के पास मक्का से हिजरत कर के मदीने पहुंचा लेकिन फिर मैं ने इस दुआ को पढ़ लिया तो अल्लाह तआला ने मुझे अबू सलमह رضی الله تعالی عنه से बेहतर शोहर अता फ़रमाया कि रसूलुल्लाह ﷺ ने मुझ से निकाह फ़रमा लिया। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 649📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 452* ༺                            
*❝ उन्नीसवां बाब // मुतअल्लिकीने रिसालत ❞*
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*उन के मौला की उन पर करोड़ो दुरूद, उन के अस्हाबो इतरत पे लाखों सलाम* पारहाए सुहुफ़ गुन्चहाए कुदुस अहले बैते नुबुव्वत पे लाखों सलाम, *अहले इस्लाम की मादराने शफ़ीक़ बानुवाने तहारत पे लाखों सलाम*

*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*

࿐  हुज़ूरे अक्दस ﷺ की निस्बते मुबारका की वजह से अवाजे मुतहहरात का भी बहुत ही बुलन्द मर्तबा है इन की शान में कुरआन की बहुत सी आयाते बय्यिनात नाज़िल हुई जिन में इन की अज़मतों का तज़किरा और इन की रिफ़अते शान का बयान है। चुनान्चे खुदा वन्दे कुद्दूस ने कुरआने मजीद में इरशाद फ़रमाया कि

یٰنِسَآءَ النَّبِیِّ لَسْتُنَّ كَاَحَدٍ مِّنَ النِّسَآءِ اِنِ اتَّقَیْتُنَّ

ऐ नबी की बीवियो! तुम और औरतों की तरह नहीं हो अगर अल्लाह से डरो।

࿐  दूसरी आयत में येह इरशाद फ़रमाया कि :
                  وَ اَزْوَاجُهٗۤ اُمَّهٰتُهُمْؕ-

और इस (नबी) की बीवियां उन (मोमिनीन) की माएं हैं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 649📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 453* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  येह तमाम उम्मत का मुत्तफिक अलैह मस्अला है कि हुज़ूर ﷺ की मुक़द्दस बीवियां दो बातों में हक़ीक़ी मां के मिस्ल हैं। एक येह कि उन के साथ हमेशा हमेशा के लिये किसी का निकाह जाइज़ नहीं। दुवुम येह कि उन की ताज़ीम व तकरीम हर उम्मती पर इसी तरह लाज़िम है जिस तरह हक़ीक़ी मां की बल्कि इस से भी बहुत ज़ियादा लेकिन नज़र और खल्वत के मुआमले में अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن का हुक्म हक़ीक़ी मां की तरह नहीं है। क्यूं कि कुरआने मजीद में हज़रते हक़ جَلَّ جَلَالُهٗ का इरशाद है कि : जब नबी की बीवियों से तुम लोग कोई चीज़ मांगो तो पर्दे के पीछे से मांगो।

࿐  इसी तरह हक़ीक़ी मां के मां बाप, लड़कों के नानी नाना और हकीकी मां के भाई बहन, लड़कों के मामूं और खाला हुवा करते हैं मगर अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن के मां बाप उम्मत के नानी नाना और अवाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن के भाई बहन उम्मत के मामूं खाला नहीं हुवा करते। 

࿐  येह हुक्म हुज़ूर ﷺ की उन तमाम अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن के लिये है जिन से हुज़ूर ﷺ ने निकाह फ़रमाया, चाहे हुज़ूर ﷺ से पहले उन का इन्तिकाल हुवा हो या हुज़ूर ﷺ के बाद उन्हों ने वफात पाई हो। येह सब की सब उम्मत की माएं हैं और हर उम्मती के लिये उस की हक़ीक़ी मां से बढ़ कर लाइके ताज़ीम व वाजिबुल एहतिराम हैं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 650 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 454* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐   अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن की तादाद और उन के निकाहों की तरतीब के बारे में मुअर्रिखीन का क़दरे इख़्तिलाफ़ है मगर ग्यारह उम्महातुल मोमिनीन رضی الله تعالی عنهن के बारे में किसी का भी इख़्तिलाफ नहीं इन में से हज़रते ख़दीजा और हज़रते ज़ैनब बिन्ते खुज़ैमा رضی الله تعالی عنهما का तो हुज़ूर ﷺ के सामने ही इनतिकाल हो गया था मगर नव बीवियां हुज़ूर ﷺ की वफाते अक्दस के वक़्त मौजूद थीं। 

࿐  इन ग्यारह उम्मत की माओं में से छे खानदाने कुरैश के ऊंचे घरानों की चश्मो चराग थीं जिन के अस्माए मुबारका येह हैं : (1) खदीजा बिन्ते खुवैलद (2) आइशा बिन्ते अबू बक्र सिद्दीक़ (3) हफ्सा बिन्ते उमर फारूक (4) उम्मे हबीबा बिन्ते अबू सुफ्यान (5) उम्मे सलमह बिन्ते अबू उमय्या (6) सौदह बिन्ते ज़म्आ رضی الله تعالی عنهن

࿐  और चार अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن खानदाने कुरैश से नहीं थीं बल्कि अरब के दूसरे क़बाइल से तअल्लुक रखती थीं वोह येह हैं : (1) ज़ैनब बिन्ते जहश (2) मैमूना बिन्ते हारिस (3) ज़ैनब बिन्ते खुज़ैमा “उम्मुल मसाकीन" (4) जुवैरिया बिन्ते हारिस और एक बीवी यानी सफ़िय्या बिन्ते हुयैय येह अरबिय्युन्नस्ल नहीं थीं बल्कि खानदाने बनी इस्राईल की एक शरीफुन्नसब रईस ज़ादी थीं।

࿐  इस बात में भी किसी मुअर्रिख का इख़्तिलाफ़ नहीं है कि सब से पहले हुज़ूर ﷺ ने हज़रते खदीजा رضی الله تعالی عنها से निकाह फ़रमाया और जब तक वोह ज़िन्दा रहीं आप ﷺ ने किसी दूसरी औरत से अ़क़्द नहीं फ़रमाया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 651 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 455* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते खदीजा رضی الله تعالی عنها :-*  येह हुज़ूरे अक्दस ﷺ की सब से पहली रफीकए हयात हैं। इन के वालिद का नाम खुवैलद बिन असद और इन की वालिदा का नाम फातिमा बिन्ते ज़ाइदा है येह खानदाने कुरैश की बहुत ही मुअज़्ज़ज़ और निहायत दौलत मन्द खातून थीं। हम इस किताब के तीसरे बाब में लिख चुके हैं कि अहले मक्का इन की पाक दामनी और पारसाई की बिना पर इन को "ताहिरा" के लकब से याद करते थे। इन्हों ने हुज़ूर ﷺ के अख़लाक़ व आदात और जमाले सूरत व कमाले सीरत को देख कर खुद ही हुज़ूरे अक्दस ﷺ से निकाह की रग़बत जाहिर की और फिर बा काइदा निकाह हो गया जिस का मुफ़स्सल तज़किरा गुज़र चुका। 

࿐  अल्लामा इब्ने असीर और इमाम ज़हबी का बयान है कि इस बात पर तमाम उम्मत का इज्माअ है कि रसूलुल्लाह ﷺ पर सब से पहले येही ईमान लाई और इब्तिदाए इस्लाम में जब कि हर तरफ से आपकी मुखालफत का तूफ़ान उठ रहा था ऐसे कठिन वक़्त में सिर्फ इन्हीं की एक जात थी जो रसूलुल्लाह ﷺ की मूनिसे हयात बन कर तस्कीने खातिर का बाइस थी। इन्हों ने इतने ख़ौफ़नाक और खतरनाक अवकात में जिस इस्तिक़्लाल और इस्तिक़ामत के साथ खतरात व मसाइब का मुकाबला किया और जिस तरह तन मन धन से बारगाहे नुबुब्बत में अपनी कुरबानी पेश की इस खुसूसिय्यत में तमाम अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن पर इन को एक 'खुसूसी फजीलत हासिल है। 

࿐   चुनान्चे वलिय्युद्दीन इराक़ी का बयान है कि कौले सहीह और मज़हबे मुख्तार येही है कि उम्महातुल मोमिनीन में हज़रते खदीजा رضی الله تعالی عنها सबसे ज़्यादा अफ़ज़ल हैं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 649📚*

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࿐  इन के फ़ज़ाइल में चन्द हदीसें वारिद भी हुई हैं। चुनान्चे हज़रते अबू हुरैरा رضی الله تعالی عنه रावी हैं कि हज़रते जिब्रील अलैहिस्सलाम रसूलुल्लाह ﷺ के पास तशरीफ़ लाए और अर्ज़ किया कि ऐ मुहम्मद (ﷺ)! येह खदीजा हैं जो आप के पास एक बरतन ले कर आ रही हैं जिस में खाना है। जब येह आप के पास आ जाएं तो आप इन से इनके रब का और मेरा सलाम कह दें और इन को येह खुश खबरी सुना दें कि जन्नत में इन के लिये मोती का एक घर बना है जिस में न कोई शोर होगा न कोई तक्लीफ़ होगी।

࿐  इमाम अहमद व अबू दावूद व नसाई, हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنهما से रावी हैं कि अहले जन्नत की औरतों में सब से अफज़ल हज़रते ख़दीजा, हज़रते फातिमा, हज़रते मरयम व हज़रते आसिया हैं। (رضی الله تعالی عنهن)

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 653 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 457* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते खदीजा رضی الله تعالی عنها :-*  इसी तरह रिवायत है कि एक मरतबा जब हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها ने हुज़ूर ﷺ की ज़बाने मुबारक से हज़रते खदीजा رضی الله تعالی عنها की बहुत ज़ियादा तारीफ़ सुनी तो उन्हें ग़ैरत आ गई और उन्होंने यह कह दिया कि अब तो अल्लाह तआला ने आप को उन से बेहतर  बीवी अता फरमा दी है। येह सुन कर आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि नहीं खुदा की कसम ! ख़दीजा से बेहतर मुझे कोई बीवी नहीं मिली जब सब लोगों ने मेरे साथ कुफ्र किया उस वक़्त वोह मुझ पर ईमान लाई और जब सब लोग मुझे झुटला रहे थे उस वक़्त उन्हों ने मेरी तस्दीक़ की और जिस वक़्त कोई शख्स मुझे कोई चीज़ देने के लिये तय्यार न था उस वक़्त खदीजा ने मुझे अपना सारा माल दे दिया और उन्हीं के शिकम से अल्लाह तआला ने मुझे औलाद अता फरमाई। 

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࿐  *हज़रते खदीजा رضی الله تعالی عنها :-*  हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها का बयान है कि अज़्वाजे मुतहहरात में सब से ज़ियादा मुझे हज़रते खदीजा के बारे में गैरत आया करती थी हालां कि मैं ने उन को देखा भी नहीं था। ग़ैरत की वजह यह थी कि हुज़ूर ﷺ बहुत ज़ियादा उन का ज़िक्रे खैर फ़रमाते रहते थे और अकसर ऐसा हुवा करता था कि आप जब कोई बकरी जब्ह फ़रमाते थे तो कुछ गोश्त हज़रते ख़दीजा की सहेलियों के घरों में ज़रूर भेज दिया करते थे इस से मैं चिड़ जाया करती थी और कभी कभी कह दिया करती थी कि "दुन्या में बस एक ख़दीजा ही तो आप की बीवी थीं।" मेरा येह जुम्ला सुन कर आप फ़रमाया करते थे कि हां हां बेशक वोह थीं वोह थीं उन्हीं के शिकम से तो अल्लाह तआला ने मुझे औलाद अता फरमाई।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 653 📚*

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࿐  *हज़रते खदीजा رضی الله تعالی عنها :-* इमाम तबरानी ने हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها से एक हदीस नक्ल की है कि हुज़ूर ﷺ ने हज़रते खदीजा رضی الله تعالی عنها को दुन्या में जन्नत का अंगूर खिलाया। इस हदीस को इमाम सुहैली ने भी नक्ल फ़रमाया है!

࿐   हज़रते ख़दीजा رضی الله تعالی عنها पच्चीस साल तक हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत गुज़ारी से सरफ़राज़ रहीं, हिजरत से तीन बरस क़ब्ल पैंसठ बरस की उम्र पा कर माहे रमज़ान में मक्कए मुअज्ज़मा के अन्दर उन्हों ने वफात पाई। हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने मक्कए मुकर्रमा के मश्हूर कब्रिस्तान हजून (जन्नतुल मअला) में खुद ब नफ़्से नफ़ीस इन की क़ब्र में उतर कर अपने मुक़द्दस हाथों से इन को सिपुर्दे खाक फ़रमाया चूंकि उस वक़्त तक नमाज़े जनाज़ा का हुक्म नाज़िल नहीं हुवा था इस लिये आप ﷺ ने इन की नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ाई।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 655 📚*

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࿐  *हज़रते सौदह رضی الله تعالی عنها:-* इन के वालिद का नाम “ज़मआ" और इन की वालिदा का नाम शमूस बिन्ते कैस बिन अम्र है। येह पहले अपने चचाज़ाद भाई सकरान बिन अम्र से बियाही गई थीं। येह मियां बीवी दोनों इब्तिदाई इस्लाम में ही मुसलमान हो गए थे और इन दोनों ने हबशा की हिजरते सानिया में हबशा की तरफ़ हिजरत भी की थी, लेकिन जब हबशा से वापस आ कर येह दोनों मियां बीवी मक्कए मुकर्रमा आए तो इन के शोहर सकरान बिन अम्र رضی الله تعالی عنه वफ़ात पा गए और येह बेवा हो गईं इन के एक लड़का भी था जिन का नाम " अब्दुर्रहमान" था।

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࿐  *हज़रते सौदह رضی الله تعالی عنها:-* हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنه का बयान है कि हज़रते सौदह رضی الله تعالی عنها ने एक ख्वाब देखा कि हुज़ूर ﷺ पैदल चलते हुए इन की तरफ़ तशरीफ़ लाए और इन की गरदन पर अपना मुक़द्दस पाउं रख दिया। जब हज़रते सौदह رضی الله تعالی عنها ने इस ख़्वाब को अपने शोहर से बयान किया तो उन्हों ने कहा कि अगर तेरा ख्वाब सच्चा है तो मैं यक़ीनन अन क़रीब ही मर जाऊंगा और हुज़ूर ﷺ तुझ से निकाह फ़रमाएंगे।

࿐  इस के बाद दूसरी रात में हज़रते सौदह رضی الله تعالی عنها ने येह ख़्वाब देखा कि एक चांद टूट कर इन के सीने पर गिरा है सुबह को इन्हों ने इस ख़्वाब का भी अपने शोहर से ज़िक्र किया तो इन के शोहर हज़रते सकरान رضی الله تعالی عنه ने चौंक कर कहा की अगर तेरा येह ख़्वाब सच्चा है तो मैं अब बहुत जल्द इनतिकाल कर जाऊंगा और तुम मेरे बाद हुज़ूर ﷺ से निकाह करोगी। चुनान्चे ऐसा ही हुवा कि उसी दिन हज़रते सकरान رضی الله تعالی عنه बीमार हुए और चन्द दिनों के बाद वफ़ात पा गए।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 655 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 462* ༺                            
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࿐  *हज़रते सौदह رضی الله تعالی عنها:-* हुज़ूरे अक्दस ﷺ हज़रते खदीजा رضی الله تعالی عنها की वफ़ात से हर वक़्त बहुत जियादा मग़मूम और उदास रहा करते थे। यह देख कर हज़रते खोला बिन्ते हकीम رضی الله تعالی عنه ने हुज़ूर ﷺ की खिदमत में येह दरख्वास्त पेश की, कि या रसूलल्लाह (ﷺ) ! आप हज़रते सौदह رضی الله تعالی عنها से निकाह फ़रमा लें ताकि आप का खानए मईशत आबाद हो जाए और एक वफादार और खिदमत गुजार बीवी की सोहबत व रफाकत से आप ﷺ का गम मिट जाए। आपने उन के इस मुख़िलसाना मश्वरे को क़बूल फरमा लिया। 

࿐  चुनान्चे हज़रते खौला رضی الله تعالی عنه ने हज़रते सौदह رضی الله تعالی عنها के बाप से बातचीत कर के निस्बत तै करा दी और निकाह हो गया और येह उम्महातुल मोमिनीन के ज़ुमरे में दाखिल हो गईं। और अपनी ज़िन्दगी भर हुज़ूर ﷺ की ज़ौजिय्यत के शरफ से सरफराज रहीं और इनतिहाई बालिहाना अक़ीदत व महब्बत के साथ आप की वफ़ादार और ख़िदमत गुज़ार रहीं। 

࿐  येह बहुत ही फय्याज़ और सखी थीं एक मरतबा हज़रते अमीरुल मोमिनीन उमर رضی الله تعالی عنه ने दिरहमों से भरा हुवा एक थेला इन की ख़िदमत में भेजा आप رضی الله تعالی عنها ने पूछा येह क्या है? लाने वाले ने बताया कि दिरहम हैं। आपने फ़रमाया कि भला दिरहम खजूरों के थेले में भेजे जाते हैं? यह कहा और उठ कर उसी वक़्त उन तमाम दिरहमों को मदीने के फुक़रा व मसाकीन पर तक्सीम कर दिया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 656 📚*

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࿐  *हज़रते सौदह رضی الله تعالی عنها:-* हदीस की मशहूर किताबों में इन की रिवायत की हुई पांच हदीसें मज़कूर हैं जिन में से एक हदीस बुखारी शरीफ़ में भी है हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास और हज़रते यहया बिन अब्दुर्रहमान رضی الله تعالی عنهما शागिर्दों में बहुत ही मुमताज़ हैं।

࿐  इन की वफ़ात के साल में मुख्तलिफ़ और मुतज़ाद अक्वाल हैं, इमाम ज़हबी और इमाम बुखारी ने इस रिवायत को सही बताया है कि हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه के आखिरी दौरे खिलाफ़त सि. 23 हि. में मदीनए मुनव्वरह के अन्दर इन की वफ़ात हुई लेकिन वाक़िदी ने इस क़ौल को तरजीह दी है कि इन की वफ़ात का साल सि. 54 हि. है और साहिबे अमाल ने भी इन का सिने वफ़ात शव्वाल सि. 54 हि. ही तहरीर किया है मगर हज़रते अल्लामा इब्ने हजर अस्क़लानी ने अपनी किताब तक़ीबुत्तहज़ीब में येह लिखा है कि इन की वफ़ात शव्वाल सि. 55 हि. में हुई। والله تعالیٰ اعلم

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 657 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 464* ༺                            
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࿐  *हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها :-*  येह अमीरुल मोमिनीन हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه की नूरे नज़र और दुख़्तरे नेक अख़्तर हैं। इन की वालिदए माजिदा का नाम "उम्मे रूमान" है येह छे बरस की थीं जब हुज़ूर ﷺ ने 'ए'लाने नुबुव्वत के दसवें साल माहे शव्वाल में हिजरत से तीन साल क़ब्ल निकाह फ़रमाया और शव्वाल सि. 2 हि. में मदीनए मुनव्वरह के अन्दर येह काशानए नुबुव्वत में दाखिल हो गई और नव बरस तक हुज़ूर ﷺ की सोहबत से सरफ़राज़ रहीं। अवाजे मुतहहरात में येही कंवारी थीं और सब से ज़ियादा बारगाहे नुबुव्वत में महबूब तरीन बीवी थीं। हुज़ूरे अक्दस ﷺ का इन के बारे में इरशाद है कि किसी बीवी के लिहाफ़ में मेरे ऊपर वहय नाज़िल नहीं हुई मगर हज़रते आइशा जब मेरे साथ बिस्तरे नुबुव्वत पर सोती रहती हैं तो इस हालत मुझ पर वहये इलाही उतरती रहती है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 658 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 465* ༺                            
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࿐  *हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها :-* बुख़ारी व मुस्लिम की रिवायत है कि हुज़ूर ﷺ ने हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها से फ़रमाया कि तीन रातें मैं ख़्वाब में देखता रहा कि एक फ़िरिश्ता तुम को एक रेशमी कपड़े में लपेट कर मेरे पास लाता रहा और मुझ से येह कहता रहा कि येह आप की बीवी हैं। जब मैं ने तुम्हारे चेहरे से कपड़ा हटा कर देखा तो ना गहां वोह तुम ही थीं। इस के बाद मैं ने अपने दिल में कहा कि अगर येह ख़्वाब अल्लाह तआला की तरफ़ से है तो वोह इस ख़्वाब को पूरा कर दिखाएगा। 

࿐  फ़िक्ह व हदीस के उलूम में अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن के अन्दर इन का दरजा बहुत ही बुलन्द है। दो हज़ार दो सो दस हदीसें इन्हों ने हुज़ूर ﷺ से रिवायत की हैं। इन की रिवायत की हुई हदीसों में से एक सो चोहत्तर हदीसें ऐसी हैं जो बुखारी व मुस्लिम दोनों किताबों में हैं और चौवन हदीसें ऐसी हैं जो सिर्फ बुखारी शरीफ में हैं और अड़सठ हदीसें वोह हैं जिन को सिर्फ इमाम मुस्लिम ने अपनी किताब सही मुस्लिम में तहरीर किया है। इन के इलावा बाक़ी हदीसें अहादीस की दूसरी किताबों में मज़कूर हैं।  

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 658 📚*

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࿐  *हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها :-*  इब्ने सा'द ने हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها से नक्ल किया है कि खुद हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها फ़रमाया करती थीं कि मुझे तमाम  अज़्वाजे मुतहहरात पर ऐसी दस फ़ज़ीलतें हासिल हैं जो दूसरी अज़्वाजे मुतहहरात को हासिल नहीं हुई।

(1) ࿐  हुज़ूर ﷺ ने मेरे सिवा किसी दूसरी कंवारी और से निकाह नहीं फ़रमाया।

(2) ࿐  मेरे सिवा अज़्वाजे मुतहहरात में से कोई भी ऐसी नहीं जिस के मां बाप दोनों मुहाजिर हों।

(3) ࿐  अल्लाह तआला ने मेरी बराअत और पाक दामनी का बयान आसमान से कुरआन में नाज़िल फ़रमाया।

(4) ࿐  निकाह से क़ब्ल हज़रते जिब्रील अलैहिस्सलाम ने एक रेशमी कपड़े में मेरी सूरत ला कर हुज़ूर ﷺ को दिखला दी थी और आप तीन रातें ख़्वाब में मुझे देखते रहे।

(5) ࿐  मैं और हुज़ूर ﷺ एक ही बरतन में से पानी ले ले कर गुस्ल किया करते थे येह शरफ़ मेरे सिवा अज़्वाजे मुतहहरात में से किसी को भी नसीब नहीं हुवा।

(6) ࿐  हुज़ूरे अक्दस ﷺ नमाज़े तहज्जुद पढ़ते थे और मैं आप के आगे सोई रहती थी उम्महातुल मोमिनीन में से कोई भी हुज़ूर ﷺ की इस करीमाना महब्बत से सरफ़राज़ नहीं हुई।

(7) ࿐  मैं हुज़ूर ﷺ के साथ एक लिहाफ़ में सोती रहती थी और आप पर खुदा की वहय नाज़िल हुवा करती थी येह वोह ए'ज़ाज़े खुदा वन्दी है जो मेरे सिवा हुज़ूर ﷺ की किसी ज़ौजए मुतहहरा को हासिल नहीं हुवा।

(8)  ࿐  वफ़ाते अक्दस के वक्त मैं हुज़ूर ﷺ को अपनी गोद में लिये हुए बैठी थी और आप का सरे अन्वर मेरे सीने और हल्क़ के दरमियान था और इसी हालत में हुज़ूर ﷺ का विसाल हुवा।

(9) ࿐ हुज़ूर ﷺ ने मेरी बारी के दिन वफात पाई।

(10) ࿐ हुज़ूरे अक्दस ﷺ की कब्रे अन्वर खास मेरे घर में बनी। 

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࿐  *हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها :-*  इबादत में भी आप رضی الله تعالی عنها का मर्तबा बहुत ही बुलन्द है आप رضی الله تعالی عنها के भतीजे हज़रते इमाम कासिम बिन मुहम्मद बिन अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنهم का बयान है कि हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها रोजाना बिला नागा नमाज़े तहज्जुद पढ़ने की पाबन्द थीं और अकसर रोज़ादार भी रहा करती थीं।

࿐  सखावत और सदकात व खैरात के मुआमले में भी तमाम उम्महातुल मोमिनीन رضی الله تعالی عنهن में खास तौर पर बहुत मुमताज़ थीं उम्मे दुर्रह رضی الله تعالی عنها कहती हैं कि मैं हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها के पास थी उस वक्त एक लाख दिरहम कहीं से आप के पास आया आप رضی الله تعالی عنها ने उसी वक्त उन सब दिरहमों को लोगों में तक्सीम कर दिया और एक दिरहम भी घर में बाकी नहीं छोड़ा। उस दिन में वोह रोज़ादार थीं मैं ने अर्ज़ किया कि आप ने सब दिरहमों को बांट दिया और एक 'दिरहम भी बाकी नहीं रखा ताकि आप गोश्त खरीद कर रोजा इफ्तार करतीं तो आप رضی الله تعالی عنها ने फ़रमाया कि तुम ने अगर मुझ से पहले कहा होता तो मैं एक दिरहम का गोश्त मंगा लेती।

࿐  हज़रते उर्वह बिन जुबैर رضی الله تعالی عنه जो आप رضی الله تعالی عنها के भान्जे थे इन का बयान है कि फिक्ह व हदीस के इलावा मैं ने हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها से बढ़ कर किसी को अश्आरे अरब का जानने वाला नहीं पाया वोह दौराने गुफ्तगू में हर मौक पर कोई न कोई शे'र पढ़ दिया करती थीं जो बहुत ही बर महल हुवा करता था।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 660 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 468* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها :-*   इल्मे तिब और मरीज़ों के इलाज मुआलजे में भी इन्हें काफी बहुत महारत थी। हज़रते उर्वह बिन जुबैर رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि मैं एक दिन हैरान हो कर हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها से अर्ज़ किया कि ऐ अम्मांजान ! मुझे आप के इल्मे हदीस व फिक्ह पर कोई तअज्जुब नहीं क्यूं कि आप ने रसूलुल्लाह ﷺ की ज़ौजिय्यत और सोहबत का शरफ़ पाया है और आप रसूलुल्लाह ﷺ की सब से ज़ियादा महबूब तरीन जौजए मुक़द्दसा हैं इसी तरह मुझे इस पर भी कोई तअज्जुब और हैरानी नहीं है कि आप को इस क़दर ज़ियादा अरब अशआर क्यूं और किस तरह याद हो गए? इस लिये कि मैं जानता हूं कि आप हज़रते अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنه की नूरे नज़र हैं और वोह अशआरे अरब के बहुत बड़े हाफ़िज़ व माहिर थे, मगर मैं इस बात पर बहुत ही हैरान हूं कि आखिर येह तिब्बी मालूमात और इलाज व मुआलजा की महारत आप को कहां से और कैसे हासिल हो गई ? येह सुन कर हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها ने फ़रमाया कि हुज़ूरे अकरम ﷺ अपनी आखिरी उम्र शरीफ़ में अकसर अलील हो जाया करते थे और अरब व अजम के अतिब्बा आप के लिये दवाएं तजवीज़ करते थे और मैं उन दवाओं से आप का इलाज, किया करती थी इसलिये मुझे तिब्बी मालूमात भी हासिल हो गई।

࿐  आप رضی الله تعالی عنها के शागिर्दों में सहाबा और ताबिईन की एक बहुत बड़ी जमाअत है और आप के फ़ज़ाइल व मनाकिब में बहुत सी हदीसें भी वारिद हुई हैं।  17 रमज़ान शबे सेह शम्बा सि. 57 हि. या सि. 58 हि. में मदीनए मुनव्वरह के अन्दर आपका विसाल हुवा। हज़रते अबू हुरैरा رضی الله تعالی عنه ने आप رضی الله تعالی عنها की नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और आप की वसिय्यत के मुताबिक़ रात में लोगों ने आप को जन्नतुल बक़ी के क़ब्रिस्तान में दूसरी अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن की क़ब्रों के पहलू में दफ़्न किया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 661 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 469* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते हफ़्सा رضی الله تعالی عنها :-*  उम्मुल मोमिनीन हज़रते हफ़्सा رضی الله تعالی عنها के वालिदे माजिद अमीरुल मोमिनीन हज़रते उमर इब्नुल खत्ताब رضی الله تعالی عنه हैं और इन की वालिद माजिदा हज़रते ज़ैनब बिन्ते मज़ऊन رضی الله تعالی عنها एक मशहूर सहाबिया हैं। हज़रते हफ्सा رضی الله تعالی عنها की पहली शादी हज़रते खुनैस बिन हुज़ाफ़ा सहमी رضی الله تعالی عنه से हुई और उन्हों ने अपने शोहर के साथ मदीनए तय्यबा को हिजरत भी की थी लेकिन इन के शोहर जंगे बद्र या जंगे उहुद में ज़ख़्मी हो कर वफ़ात पा गए और येह बेवा हो गई फिर रसूलुल्लाह ने सि. 3 हि. में इन से निकाह फ़रमाया और उम्मुल मोमिनीन की हैसिय्यत से काशानए नबवी ﷺ की सुकून से मुशर्रफ़ हो गई।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 662 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 470* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते हफ़्सा رضی الله تعالی عنها :-*   येह बहुत ही शानदार, बुलन्द हिम्मत और सखावत शिआर खातून हैं। हक गोई हाजिर जवाबी और फ़हमो फ़िरासत में अपने वालिदे बुजुर्गवार का मिज़ाज पाया था। अकसर रोज़ादार रहा करती थीं और तिलावते कुरआने मजीद और दूसरी क़िस्म क़िस्म की इबादतों में मसरूफ़ रहा करती थीं। इन के मिज़ाज में कुछ सख्ती थी इस लिये हज़रते अमीरुल मोमिनीन उमर बिन अल खत्ताब رضی الله تعالی عنه हर वक्त इस फ़िक्र में रहते थे कि कहीं इन की किसी सख़्त कलामी से हुज़ूरे अक्दस ﷺ की दिल आज़ारी न हो जाए। चुनान्चे आप رضی الله تعالی عنه बार बार इन से फ़रमाया करते थे कि ऐ हफ्सा ! तुम जिस चीज़ की ज़रूरत हो मुझ से तलब कर लिया करो, ख़बरदार कभी हुज़ूरे अक्दस ﷺ से किसी चीज़ का तक़ाज़ा न करना न हुज़ूर ﷺ की कभी हरगिज़ हरगिज़ दिल आज़ारी करना वरना याद रखो कि अगर हुजूर ﷺ तुम से नाराज़ हो गए तुम तो खुदा के गज़ब में गरिफ्तार हो जाओगी।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 663 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 471* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते हफ़्सा رضی الله تعالی عنها :-*  ये बहुत बड़ी इबादत गुज़ार होने के साथ साथ फिक्ह व हदीस में भी एक मुमताज़ दरजा रखती हैं। इन्हों ने रसूलुल्लाह ﷺ से साठ हदीसें रिवायत की हैं जिन में से पांच हदीसें बुखारी शरीफ़ में मज़कूर हैं बाक़ी अहादीस दूसरी कुतुबे हदीस में दर्ज हैं।

࿐  इल्मे हदीस में बहुत से सहाबा और ताबिईन इन के शागिर्दों की फेहरिस्त में नज़र आते हैं जिन में खुद इन के भाई अब्दुल्लाह बिन उमर رضی الله تعالی عنه बहुत मशहूर हैं। शा'बान सि. 45 हि. में मदीनए मुनव्वरह के अन्दर इन की वफ़ात हुई उस वक्त हज़रते अमीरे मुआविया رضی الله تعالی عنه की हुकूमत का ज़माना था और मरवान बिन हुकम मदीने का हाकिम था। इसी ने इन की नमाज़े जनाजा पढ़ाई और कुछ दूर तक इन के जनाज़े को भी उठाया फिर हज़रते अबू हुरैरा رضی الله تعالی عنه क़ब्र तक जनाज़े को कांधा दिये चलते रहे। इन के दो भाई हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर और हज़रते आसिम बिन उमर رضی الله تعالی عنهما और इन के तीन भतीजे हज़रते सालिम बिन अब्दुल्लाह व हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्दुल्लाह व हज़रते हम्ज़ा बिन अब्दुल्लाह رضی الله تعالی عنهم ने इन को क़ब्र में उतारा और येह जन्नतुल बक़ीअ में दूसरी अवाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن के पहलू में मदफून हुई। ब वक्ते वफ़ात इन की उम्र साठ या तिरसठ बरस की थी।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 663 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 472* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها :-* इन का नाम हिन्द है और कुन्यत "उम्मे सलमह" है मगर येह अपनी कुन्यत के साथ ही ज़ियादा मशहूर हैं। इन के बाप का नाम "हुज़ैफ़ा" और बाज मुर्रिखीन के नज़दीक़ सहल है मगर इस पर तमाम मुअर्रिखीन का इत्तिफाक है कि इन की वालिदा “आतिका बिन्ते आमिर" हैं। इन का निकाह पहले हज़रते अबू सलमह अब्दुल्लाह बिन अब्दुल असद رضی الله تعالی عنه से हुवा था जो हुज़ूर ﷺ के रज़ाई भाई थे। येह दोनों मियां बीवी ए'लाने नुबुव्वत के बाद जल्द ही दामने इस्लाम में आ गए थे और सब से पहले इन दोनों ने हबशा की जानिब हिजरत की फिर येह दोनों हबशा से मक्कए मुकर्रमा आ गए और मदीनए मुनव्वरह की तरफ़ हिजरत का इरादा किया। 

࿐   चुनान्चे हज़रते अबू सलमह رضی الله تعالی عنه ने ऊंट पर कजावा बांधा और हज़रते बीबी उम्मे सलमह और अपने फ़रज़नद सलमह को कजावे में सुवार कर दिया मगर जब ऊंट की नकील पकड़ कर हज़रते अबू सलमह रवाना हुए तो हज़रते उम्मे सलमह के मैके वाले बनू मुगीरा दौड़ पड़े और उन लोगों ने यह कहा कि हम अपने खानदान की इस लड़की को हरगिज़ हरगिज़ मदीने नहीं जाने देंगे और जबर दस्ती उन को ऊंट से उतार लिया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 664 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 473* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها :-* येह देख कर हज़रते अबू सलमह رضی الله تعالی عنه के खानदानी लोगों को भी तैश आ गया और उन लोगों ने ग़ज़ब नाक हो कर कहा कि तुम लोग उम्मे सलमह को महज़ इस बिना पर रोकते हो कि येह तुम्हारे खानदान की लड़की है तो हम इस के बच्चे "सलमह" को हरगिज़ हरगिज़ तुम्हारे पास नहीं रहने देंगे इस लिये कि येह बच्चा हमारे खानदान का एक फ़र्द है। येह कह कर उन लोगों ने बच्चे को उस की मां की गोद से छीन लिया मगर हज़रते अबू' सलमह رضی الله تعالی عنه ने हिजरत का इरादा तर्क नहीं किया बल्कि बीवी और बच्चे दोनों को छोड़ कर तन्हा मदीनए मुनव्वरह चले गए।

࿐  हज़रते बीबी उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها अपने शोहर और बच्चे की जुदाई पर सुबह से शाम तक मक्का की पथरीली ज़मीन में किसी चट्टान पर बैठी हुई तक़रीबन सात दिनों तक जारो कितार रोती रहीं इन का यह हाल देख कर इन के एक चचाज़ाद भाई को इन पर रहम आ गया और उस ने बनू मुगीरा को समझा बुझा कर येह कहा कि आखिर इस मिस्कीना को तुम लोगों ने इस के शोहर और बच्चे से क्यूं जुदा कर रखा है? तुम लोग क्यूं नहीं इस को इजाज़त दे देते कि वोह अपने बच्चे को साथ ले कर अपने शोहर के पास चली जाए। बिल आखिर बनू मुगीरा इस पर रिज़ा मन्द हो गए कि येह मदीने चली जाए।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 665 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 474* ༺                            
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࿐  *हज़रते उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها :-* फिर हज़रते अबू सलमह के खानदान वाले बनू अब्दुल असद ने भी बच्चे को हज़रते उम्मे सलमह के सिपुर्द कर दिया और हज़रते उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها बच्चे को गोद में ले कर ऊंट पर सुवार हो गई और अकेली मदीने को चल पड़ीं मगर जब मकामे "तईम" में पहुंचीं तो उसमान बिन तल्हा से मुलाकात हो गई जो मक्का का माना हुवा एक निहायत ही शरीफ़ इन्सान था उस ने पूछा कि ऐ उम्मे सलमह ! कहां का इरादा है? इन्हों ने कहा कि मैं अपने शोहर के पास मदीने जा रही हूं। उस ने कहा कि क्या तुम्हारे साथ कोई दूसरा नहीं है ? हज़रते उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها ने दर्द भरी आवाज़ में जवाब दिया कि नहीं मेरे साथ अल्लाह और मेरे इस बच्चे के सिवा कोई नहीं है। येह सुन कर उसमान बिन तल्हा की रगे शराफ़त फड़क उठी और उस ने कहा कि खुदा की कसम ! मेरे लिये येह जैब नहीं देता कि तुम्हारी जैसी एक शरीफ़ ज़ादी और एक शरीफ़ इन्सान की बीवी को तन्हा छोड़ दूं। 

࿐   येह कह कर उस ने ऊंट की मुहार अपने हाथ में ले ली और पैदल चलने लगा हज़रते उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها का बयान है कि खुदा की कसम ! मैं ने उसमान बिन तल्हा से ज़ियादा शरीफ़ किसी अरब को नहीं पाया। जब हम किसी मन्जिल पर उतरते तो वोह अलग किसी दरख्त के नीचे लेट जाता और मैं अपने ऊंट के पास सो रहती। फिर रवानगी के वक़्त जब मैं अपने बच्चे को गोद में ले कर ऊंट पर सवार हो जाती तो वोह ऊंट की मुहार पकड़ कर चलने लगता। इसी तरह उस ने मुझे कुबा तक पहुंचा दिया और वहां से वोह येह कह कर मक्का चला गया कि अब तुम चली जाओ तुम्हारा शोहर इसी गाऊं में है। चुनान्चे हज़रते उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها इस तरह ब खैरिय्यत मदीनए मुनव्वरह पहुंच गई।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 666 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 475* ༺                            
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࿐  *हज़रते उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها :-* येह दोनों मियां बीवी आफिय्यत के साथ मदीनए मुनव्वरह में रहने लगे मगर 4 हिजरी में जब इन के शोहर हज़रते अबू सलमह رضی الله تعالی عنه का इनतिकाल हो गया तो बा वुजूदे कि इन के चन्द बच्चे थे मगर हुज़ूर ﷺ ने इन से निकाह फ़रमा लिया और येह अपने बच्चों के साथ काशानए नुबुव्वत में रहने लगीं और उम्मुल मोमिनीन के मुअज़्ज़ज़ लकब से सरफ़राज़ हो गई।

࿐   हज़रते बीबी उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها हुस्नो जमाल के साथ साथ अक्लो फ़हम के कमाल का भी एक बे मिसाल नमूना थीं। इमामुल हरमैन का बयान है कि मैं हज़रते उम्मे सलमह के सिवा किसी औरत को नहीं जानता कि उस की राय हमेशा दुरुस्त साबित हुई हो।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 666 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 476* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها :-* सुल्हे हुदैबिया के दिन जब रसूलुल्लाह ﷺ ने लोगों को हुक्म दिया कि अपनी अपनी कुरबानियां कर के सब लोग एहराम खोल दें और बिगैर उमरह अदा किये सब लोग मदीने वापस चले जाएं क्यूं कि इसी शर्त पर सुल्हे हुदैबिया हुई है। तो लोग इस क़दर रन्जो गम में थे कि एक शख़्स भी कुरबानी के लिये तय्यार नहीं था। हुज़ूरे अक्दस ﷺ को सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم के इस तर्जे अमल से रूहानी कोफ़्त हुई और आप ने मुआमले का हज़रते बीबी उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها से तज़किरा किया तो उन्हों ने येह राय दी कि या रसूलल्लाह ﷺ आप किसी से कुछ भी न फरमाएं और खुद अपनी कुरबानी जबह कर के अपना एहराम उतार दें। 

࿐  चुनान्चे हुज़ूर ﷺ ने ऐसा ही किया यह देख कर कि हुज़ूर ﷺ ने एहराम खोल दिया है। सब सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم मायूस हो गए कि अब हुज़ूर ﷺ सुल्हे हुदैबिया के मुआहदे को हरगिज़ हरगिज़ न बदलेंगे इस लिये सब सहाबा ने भी अपनी अपनी कुरबानियां कर के एहराम उतार दिया और सब लोग मदीनए मुनव्वरह वापस चले गए।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 666 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 477* ༺                            
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࿐  *हज़रते उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها :-*  हुस्न जमाल और अक्ल व राय के साथ साथ फिक्ह व हदीस में भी इनकी महारत खुसूसी तौर पर मुमताज़ थी। तीन सो अठत्तर हदीसें इन्हों रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत की हैं और बहुत से सहाबा व ताबिईन हदीस में इन के शागिर्द हैं और इन के शागिर्दों में हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास और हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنهم भी शामिल हैं। मदीनए मुनव्वरह में चोरासी बरस की उम्र पा कर वफात पाई और इन की वफात का साल सि. 53 हि. है। 

࿐  हज़रते अबू हुरैरा رضی الله تعالی عنه ने इन की नमाज़े जनाजा पढ़ाई और येह जन्नतुल बकीअ में अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن के कब्रिस्तान में मदफून हुईं। बा'ज़ मुअर्रिखीन का क़ौल है कि इन के विसाल का साल सि. 59 हि. है और इब्राहीम हर्बी ने फरमाया कि सि. 62 • हि. में इन का इनतिकाल हुवा और बाज़ कहते हैं कि सि. 63 हि. के बाद इन की वफ़ात हुई है। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 667 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 478* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها :-* इन का असली नाम "रमला" है। येह सरदारे मक्का अबू सुफ्यान बिन हर्ब की साहिब ज़ादी हैं और इन की वालिदा का नाम सफ़िय्या बिन्ते अबुल आस है जो अमीरुल मोमिनीन हज़रते उसमान رضی الله تعالی عنه की फूफी हैं।

࿐  येह पहले उबैदुल्लाह बिन जहश के निकाह में थीं और मियां बीवी दोनों ने इस्लाम कबूल किया और दोनों हिजरत कर के हबशा चले गए थे। लेकिन हबशा पहुंच कर इन के शोहर उबैदुल्लाह बिन जहश पर ऐसी बद नसीबी सुवार हो गई कि वोह इस्लाम से मुर्तद हो कर नसरानी हो गया और शराब पीते पीते नसरानियत ही पर वोह मर गया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 668 📚*

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࿐  *हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها :-* इब्ने सा'द ने हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها से येह रिवायत की है कि उन्हों ने हबशा में एक रात में ख़्वाब देखा कि उन के शोहर उबैदुल्लाह बिन जहश की सूरत अचानक बहुत ही बदनुमा और बद शक्ल हो गई वोह इस ख़्वाब से बहुत ज़ियादा घबरा गई। जब सुबह हुई तो उन्हों ने अचानक येह देखा कि उन के शोहर उबैदुल्लाह बिन जहश ने इस्लाम से मुर्तद हो कर नसरानी दीन क़बूल कर लिया, हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها ने अपने शोहर को अपना ख़्वाब सुना कर डराया और इस्लाम की तरफ़ बुलाया मगर उस बद नसीब ने इस पर कान नहीं धरा और मुर्तद होने ही की हालत में मर गया मगर हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها अपने इस्लाम पर इस्तिकामत के साथ साबित क़दम रहीं। 

࿐  जब हुज़ूर ﷺ को इन की हालत मालूम हुई तो कल्बे नाजुक पर बेहद सदमा गुज़रा और आप ﷺ ने इन की दिलजूई के लिये हज़रते अम्र बिन उमय्या जमरी رضی الله تعالی عنه को नज्जाशी बादशाहे हबशा के पास भेजा और ख़त लिखा कि तुम मेरे वकील बन कर हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها के साथ मेरा निकाह कर दो। नज्जाशी को जब येह फ़रमाने नुबुव्वत पहुंचा तो उस ने अपनी एक खास लौंडी को जिस का नाम "अबरहा" था हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها के पास भेजा और रसूलुल्लाह ﷺ के पैग़ाम की ख़बर दी।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 668 📚*

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࿐  *हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها :-* हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها इस खुश ख़बरी को सुन कर इस क़दर खुश हुई कि अपने कुछ जेवरात इस बिशारत के इन्आम में अबरहा लौंडी को इन्आम के तौर पर दे दिये और हज़रते खालिद बिन सईद बिन अबिल आस رضی الله تعالی عنه को जो उन के मामूं के लड़के थे अपने निकाह का वकील बना कर नज्जाशी के पास भेज दिया। नज्जाशी ने अपने शाही महल में निकाह की मजलिस मुअकिद की और हज़रते जाफर बिन अबी तालिब और दूसरे सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم को जो उस वक्त हबशा में मौजूद थे इस मजलिस में बुलाया और खुद ही खुत्बा पढ़ कर सब के सामने रसूलुल्लाह ﷺ का हज़रते बीबी उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها के साथ निकाह कर दिया और चार सो दीनार अपने पास से महर अदा किया जो उसी वक्त हज़रते खालिद बिन सईद رضی الله تعالی عنه के सिपुर्द कर दिया गया।

࿐  जब सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم इस निकाह की मजलिस से उठने लगे तो नज्जाशी बादशाह ने कहा कि आप लोग बैठे रहिये अम्बिया  عَلَیْھِمُ الصَّلٰوةُ وَالسَّلَام का येह तरीका रहा है कि निकाह के वक्त खाना खिलाया जाता है। येह कह कर नज्जाशी ने खाना मंगाया और तमाम सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم शिकम सैर खाना खा कर अपने अपने घरों को रवाना हुए फिर नज्जाशी ने हज़रते शुरहबील बिन हसना رضی الله تعالی عنه के साथ हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها को मदीनए मुनव्वरह हुज़ूरे अकदस ﷺ की खिदमत में भेज दिया और हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها ने हरमे नबवी में दाखिल हो कर उम्मुल मोमिनीन का मुअज्ज़ज़ लकब पा लिया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 669 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 481* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها :-* हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها बहुत पाकीज़ा जात व हमीदा सिफ़ात की जामेअ और निहायत ही बुलन्द हिम्मत और सखी तबीअत की मालिक थीं और बहुत ही कविय्युल ईमान थीं। इन के वालिद अबू सुफ्यान जब कुफ्र की हालत में थे और सुल्हे हुदैबिया की तजदीद के लिये मदीना आए तो बे तकल्लुफ़ उन के मकान में जा कर बिस्तरे नुबुव्वत पर बैठ गए। हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها ने अपने बाप की ज़रा भी परवा नहीं की और येह कह कर अपने बाप को बिस्तर से उठा दिया कि येह बिस्तरे नुबुव्वत है। मैं कभी येह गवारा नहीं कर सकती कि एक नापाक मुशरिक इस पाक बिस्तर पर बैठे।

࿐  हज़रते उम्मे हबीबा رضی الله تعالی عنها ने पैंसठ हदीसें रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत की हैं जिन में से दो हदीसें बुखारी व मुस्लिम दोनों किताबों में मौजूद हैं और एक हदीस वोह है जिस को तन्हा मुस्लिम ने रिवायत किया है। बाक़ी हदीसें हदीस की दूसरी किताबों में मौजूद हैं। इन के शागिर्दों में इन के भाई हज़रते अमीरे मुआविया और इन की साहिब ज़ादी हज़रते हबीबा और इन के भान्जे अबू सुफ्यान बिन सईद رضی الله تعالی عنهم बहुत मश्हूर हैं।

࿐  सि. 44 हि. में मदीनए मुनव्वरह के अन्दर इन की वफ़ात हुई और जन्नतुल बक़ीअ में अवाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن के हज़ीरे में मदफ़ून हुईं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 670 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 482* ༺                            
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࿐  *हज़रते जैनब बिन्ते जहश رضی الله تعالی عنها :-*  येह रसूलुल्लाह ﷺ की फूफी हज़रते उमैमा बिन्ते अब्दुल मुत्तलिब की साहिब जादी हैं। हुज़ूर ﷺ ने अपने आज़ाद कर्दा गुलाम हज़रते जैद बिन हारिसा رضی الله تعالی عنه से इनका निकाह कर दिया था मगर चूंकि हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها खानदाने कुरैश की एक बहुत ही शानदार खातून थीं और हुस्नो जमाल में भी येह खानदाने कुरैश की बेमिसाल औरत थीं और हज़रते जैद رضی الله تعالی عنه को गो कि रसूलुल्लाह ﷺ ने आज़ाद कर के अपना मुतबन्ना (मुंह बोला बेटा) बना लिया था मगर फिर भी चूंकि वोह पहले गुलाम थे इस लिये हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها इन से खुश नहीं थीं और अकसर मियां बीवी में अनबन रहा करती थी यहां तक कि हज़रते जैद رضی الله تعالی عنه तलाक़ दे दी। इस वाक़िए से फ़ित्री तौर पर हुज़ूर ﷺ के कल्बे नाजुक पर सदमा गुज़रा।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 671 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 483* ༺                            
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࿐  *हज़रते जैनब बिन्ते जहश رضی الله تعالی عنها :-* चुनान्चे जब इन की इद्दत गुज़र गई तो महज़ हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها की दिलजूई के लिये हुज़ूर ﷺ ने हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها के पास अपने निकाह का पैगाम भेजा। रिवायत है कि येह पैगामे बिशारत सुन कर हज़रते ज़ैनब ने दो रक्त नमाज़ अदा की और सज्दे में सर रख कर येह दुआ मांगी कि खुदा वन्दा ! तेरे रसूल ﷺ ने मुझे निकाह का पैगाम दिया है अगर मैं तेरे नज़दीक उनकी जौजिय्यत में दाखिल होने के लाइक औरत हूं तो या अल्लाह عزوجل ! तू उन के साथ मेरा निकाह फ़रमा दे इन की येह दुआ फ़ौरन ही क़बूल हो गई और येह आयत नाज़िल हो गई कि : जब ज़ैद ने उस से हाजत पूरी कर ली जज (ज़ैनब को तलाक़ दे दी और इद्दत गुज़र गई) तो हम ने उस (ज़ैनब) का आप के साथ निकाह कर दिया।
  
࿐  इस आयत के नुज़ूल के बाद हुज़ूर ﷺ ने मुस्कुराते हुए फ़रमाया कि कौन है जो ज़ैनब के पास जाए और उस को येह खुश ख़बरी सुनाए कि अल्लाह तआला ने मेरा निकाहु उस के साथ फ़रमा दिया है। येह सुन कर आप ﷺ की एक खादिमा दौड़ती हुई हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها के पास पहुंचीं और येह आयत सुना कर खुश ख़बरी दी। हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها इस बिशारत से इस क़दर खुश हुई कि अपना ज़ेवर उतार कर उस खादिमा को इन्आम में दे दिया और खुद सज्दे में गिर पड़ीं और इस नेमत के शुक्रिया में दो माह लगातार रोज़ादार रहीं।

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 484* ༺                            
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࿐  *हज़रते जैनब बिन्ते जहश رضی الله تعالی عنها :-*  रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ इस के बाद ना गहां हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها के मकान में तशरीफ़ ले गए उन्हों ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह (ﷺ) ! बिगैर खुत्बा और बिग़ैर गवाह के आप ने मेरे साथ निकाह फ़रमा लिया? इरशाद फ़रमाया कि तेरे साथ मेरा निकाह अल्लाह तआला ने कर दिया है और हज़रते जिब्रील अलैहिस्सलाम और दूसरे फ़िरिश्ते इस निकाह के गवाह हैं। हुज़ूर ﷺ ने इन के निकाह पर जितनी बड़ी दा'वते वलीमा फ़रमाई इतनी बड़ी दावते वलीमा अज्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن में से किसी के निकाह के मौक़अ पर भी नहीं फ़रमाई। आप ﷺ ने हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها के साथ निकाह की दा'वते वलीमा में तमाम सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم को नान व गोश्त खिलाया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 672 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 485* ༺                            
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࿐  *हज़रते जैनब बिन्ते जहश رضی الله تعالی عنها :-* इन के फ़ज़ाइल व मनाकिब में चन्द अहादीस भी मरवी हैं। चुनाचे रिवायत है कि एक दिन रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि मेरी वफ़ात के बा'द तुम अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن में से मेरी वोह बीवी सब से पहले वफ़ात पा कर मुझ से आन मिलेगी जिस का हाथ सब से ज़ियादा लम्बा है। यह सुन कर तमाम अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ने एक लकड़ी से अपना हाथ नापा तो हज़रते सौदह رضی الله تعالی عنها का हाथ सब से ज़ियादा लम्बा निकला लेकिन जब हुज़ूर ﷺ के बाद अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن में से सब से पहले हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها ने वफात पाई तो उस वक़्त लोगों को पता चला कि लम्बा होने से मुराद कसरत से सदका देना था। क्यूं कि हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها अपने हाथ से कुछ दस्त कारी का काम करती थीं और उस की आमदनी फुकरा व मसाकीन पर सदक़ा कर दिया करती थीं।

࿐   इन की वफ़ात की ख़बर जब हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها के पास पहुंची तो उन्हों ने कहा कि हाए एक क़ाबिले तारीफ़ औरत जो सब के लिये नफ्अ बख़्श थी और यतीमों और बूढ़ी औरतों का दिल खुश करने वाली थी आज दुन्या से चली गई, हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها का बयान है कि मैं ने भलाई और सच्चाई में और रिश्तेदारों के साथ मेहरबानी के मुआमले में हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها से बढ़ कर किसी औरत को नहीं देखा।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 673 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 486* ༺                            
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࿐  *हज़रते जैनब बिन्ते जहश رضی الله تعالی عنها :-* मन्कूल है कि हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن से अकसर येह कहा करती थीं कि मुझ को खुदा वन्दे तआला ने एक ऐसी फ़ज़ीलत अता फरमाई है जो अज़्वाजे मुतहहरात से किसी को भी नसीब नहीं हुई क्यूं कि तमाम अज़्वाजे मुतहहरात का निकाह तो उन के बाप दादाओं ने हुज़ूर ﷺ के साथ किया लेकिन हुज़ूर ﷺ के साथ मेरा निकाह अल्लाह तआला ने कर दिया।

࿐  इन्हों ने ग्यारह हदीसें हुज़ूर ﷺ से रिवायत की हैं जिन में से दो हदीसें बुखारी व मुस्लिम दोनों किताबों में मज़कूर हैं। बाकी नव हदीसें दूसरी कुतुबे अहादीस में लिखी हुई हैं।

࿐   मन्कूल है कि जब हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها की वफ़ात का हाल अमीरुल मोमिनीन हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه को मालूम हुवा तो आप ने हुक्म दे दिया कि मदीने के  हर कूचा व बाज़ार में येह ए'लान कर दिया जाए कि तमाम अहले मदीना अपनी मुक़द्दस मां की नमाज़े जनाज़ा के लिये हाज़िर हो जाएं। अमीरुल मोमिनीन رضی الله تعالی عنه ने खुद ही इन की नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और येह जन्नतुल बक़ीअ में दफ़्न की गई। सि. 20 हि. या सि. 21 हि. में 53 बरस की उम्र पा कर मदीनए मुनव्वरह में दुन्या से रुख़्सत हुईं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 673 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 487* ༺                            
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࿐  *हज़रते जैनब बिन्ते खुजैमा رضی الله تعالی عنها :-*  ज़मानए जाहिलियथयत में चूंकि येह गुरबा और मसाकीन को ब कसरत खाना खिलाया करती थीं इस लिये इन का लकब “उम्मुल मसाकीन" (मिस्कीनों की मां) है पहले इन का निकाह हज़रते अब्दुल्लाह बिन जहश رضی الله تعالی عنه से हुवा था मगर जब वोह जंगे उहुद में शहीद हो गए तो सि. 3 हि. में हुज़ूरे ﷺ अकरम ने इन से निकाह फ़रमा लिया और येह हुज़ूर ﷺ से निकाह के बा'द सिर्फ़ दो महीने या तीन महीने ज़िन्दा रहीं और रबीउल आख़िर सि. 4 हि. में तीस बरस की उम्र पा कर वफ़ात पा गई और जन्नतुल बक़ीअ के कब्रिस्तान में दूसरी अवाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن के साथ दफ़्न हुईं येह मां की जानिब से हज़रते उम्मुल मोमिनीन बीबी मैमूना رضی الله تعالی عنها की बहन हैं। 

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 488* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते मैमूना رضی الله تعالی عنها :-* इन के वालिद का नाम हारिस बिन हज़न है और इन की वालिदा हिन्द बिन्ते औफ़ हैं। हज़रते मैमूना رضی الله تعالی عنه का नाम पहले “बर्रह” था लेकिन हुज़ूर ﷺ ने इन का नाम बदल कर "मैमूना" (बरकत दिहन्दा) रख दिया।

࿐  येह पहले अबू रहम बिन अब्दुल उज्जा के निकाह में थीं मगर जब हुज़ूर ﷺ सि. 7 हि. में उम्रतुल क़ज़ा के लिये मक्कए मुकर्रमा तशरीफ़ ले गए तो येह बेवा हो चुकी थीं हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه ने इन के बारे में हुज़ूर ﷺ से गुफ़्तगू की और आप ने इन से निकाह फ़रमा लिया और उम्रतुल क़ज़ा से वापसी पर मक़ामे “सरफ़" में इन को अपनी सोहबत से सरफ़राज़ फ़रमाया। 

࿐  हज़रते मैमूना رضی الله تعالی عنها की सगी बहनें चार हैं जिन के नाम येह हैं : 

*(1) उम्मुल फ़ज़्ल लुबाबतिल कुब्रा :-* येह हुज़ूर ﷺ के चचा हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه की बीवी हैं और हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنه इन ही के शिकम से पैदा हुए।

*(2) लुबाबतिस्सुगरा :-* येह हज़रते खालिद बिन अल वलीद सैफुल्लाह رضی الله تعالی عنه की वालिदा हैं।

*(3) इस्मा :-*  येह उबय्य बिन खलफ से बियाही गई थीं। इन्हों ने इस्लाम क़बूल किया और सहाबिय्यात में इन का शुमार है।

*(4) इज्ज़ह :-*  येह भी सहाबिय्या हैं जो ज़ियाद बिन मालिक के घर में थीं। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 675 📚*

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࿐  *हज़रते मैमूना رضی الله تعالی عنها :-* हज़रते मैमूना की इन सगी बहनों के इलावा वोह बहनें जो सिर्फ़ मां की जानिब से हैं वोह भी चार हैं जिन के नाम येह हैं :

࿐  *(1) अस्मा बिन्ते उमैस :-* येह पहले हज़रते जाफ़र बिन अबी तालिब رضی الله تعالی عنه के घर में थीं इन से अब्दुल्लाह व औन व मुहम्मद رضی الله تعالی عنهم तीन फ़रज़न्द पैदा हुए फिर जब हज़रते जाफ़र رضی الله تعالی عنه जंगे "मौता" में शहीद हो गए तो इन से हज़रते अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنه ने निकाह कर लिया और इन से मुहम्मद बिन अबू बक्र رضی الله تعالی عنه पैदा हुए फिर हज़रते अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنه की वफ़ात के बाद हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने इन से अक़्द फ़रमा लिया और इन से भी एक फ़रज़न्द पैदा हुए जिन का नाम "यहया" था।

࿐  *(2) सलमा बिन्ते उमैस :-*  येह पहले सय्यिदुश्शुहदा हज़रते हम्ज़ा رضی الله تعالی عنه के निकाह में आई और इन से एक साहिब जादी पैदा हुई जिन का नाम "उम्मतुल्लाह" था हज़रते हम्ज़ा رضی الله تعالی عنه की शहादत के बाद इन से शद्दाद बिन अल्हाद رضی الله تعالی عنه ने निकाह कर लिया और इन से अब्दुल्लाह व अब्दुर्रहमान رضی الله تعالی عنهم दो फ़रज़न्द पैदा हुए।

࿐  *(3) सलमा बिन्ते उमैस :-* इन का निकाह अब्दुल्लाह बिन काब رضی الله تعالی عنه से हुवा था।

࿐  (4) उम्मुल मोमिनीन हज़रते ज़ैनब बिन्ते खुज़ैमा رضی الله تعالی عنها जो 'उम्मुल मसाकीन के लकब से मशहूर हैं जिन का ज़िक्रे खैर ऊपर गुज़र चुका है।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 676 📚*

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࿐  *हज़रते मैमूना رضی الله تعالی عنها :-* हज़रते मैमूना رضی الله تعالی عنها की वालिदा "हिन्द बिन्ते औफ़" के बारे में आम तौर पर येह कहा जाता था कि दामादों के ए'तिबार से रूए ज़मीन पर कोई बुढ़िया इन से जियादा खुश नसीब नहीं हुई क्यूं कि इन के दामादों की फेहरिस्त में मुन्दरिजए ज़ैल हस्तियां हैं:
(1) रसूलुल्लाह ﷺ
(2) हज़रते अबू बक्र, (3) हज़रते अली (4) हज़रते हम्ज़ा (5) हज़रते अब्बास (6) हज़रते शद्दाद बिन अल्हाद رضی الله تعالی عنهم येह सब के सब बुजुर्गवार "हिन्द बिन्ते औफ़" رضی الله تعالی عنها के दामाद हैं।

࿐  हज़रते बीबी मैमूना رضی الله تعالی عنها से कुल छिहत्तर हदीसें मरवी हैं जिन में से सात हदीसें ऐसी हैं जो बुखारी व मुस्लिम दोनों किताबों में मज़कूर हैं और एक हदीस सिर्फ बुखारी में है और एक ऐसी हदीस है जो सिर्फ़ मुस्लिम में है और बाक़ी हदीसें अहादीस की दूसरी किताबों में मज़कूर हैं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 676  📚*

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࿐  *हज़रते मैमूना رضی الله تعالی عنها :-*  येह हुज़ूर ﷺ की आखिरी जौजए मुबारका हैं इन के बाद हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने किसी दूसरी औरत से निकाह नहीं फ़रमाया इन के इनतिकाल के साल में मुअर्रिखीन का इख़्तिलाफ़ है। मगर कौले मश्हूर येह है कि इन्हों ने सि. 51 हि. में ब मक़ाम "सरफ़" वफात पाई जहां रसूलुल्लाह ﷺ ने इन से जिफ़ाफ़ फ़रमाया था। इब्ने साद ने वाक़िदी से नक्ल किया है कि इन्हों ने सि. 61 हि. में वफात पाई और इब्ने इस्हाक़ का क़ौल है कि सि. 63 हि. इन के इनतिकाल का साल है। 

࿐   इन की वफ़ात के वक्त इन के भान्जे हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنهما मौजूद थे और उन्हों ने ही आप رضی الله تعالی عنها की नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और इन को कब्र में उतारा, मुहद्दिस अता का बयान है कि हम लोग हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنهما के साथ हज़रते बीबी मैमूना رضی الله تعالی عنها के जनाज़े में शरीक थे। जब जनाज़ा उठाया गया तो हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنه आवाजे बुलन्द फ़रमाया कि ऐ लोगो ! येह रसूलुल्लाह ﷺ की बीवी हैं। तुम लोग इन के जनाज़े को बहुत आहिस्ता आहिस्ता ले कर चलो और इन की मुक़द्दस लाश न झंझोड़ो। हज़रते यज़ीद बिन असम رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि हम लोगों ने हज़रते बीबी मैमूना رضی الله تعالی عنها को मकामे सरफ में उसी छप्पर की जगह दफ्न किया जिस में रसूलुल्लाह ﷺ ने इन को पहली बार अपनी कुर्बत से सरफ़राज़ फ़रमाया था।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 677 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 492* ༺                            
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࿐  *हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها :-* येह क़बीलए बनी मुस्तलिक़ के सरदारे आज़म हारिस बिन अबू ज़रार की बेटी हैं “गज़्वए मुरैसीअ" में जो कुफ्फार मुसलमानों के हाथों में गरिफ्तार हो कर कैदी बनाए गए थे उन ही कैदियों में हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها भी थीं। जब कैदियों को लौंडी गुलाम बना कर मुजाहिदीन पर तक्सीम कर दिया गया तो हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها हज़रते साबित बिन कैस رضی الله تعالی عنه के हिस्से में आई। उन्हों ने मुकातबत कर ली यानी येह लिख कर दे दिया कि तुम इतनी इतनी रक़म मुझे दे दो तो मैं तुम को आजाद कर दूंगा, 

࿐  हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुई और अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह (ﷺ) ! मैं अपने क़बीले के सरदारे आज़म हारिस बिन अबू ज़रार की बेटी हूं और मुसलमान हो चुकी हूं। साबित बिन कैस ने मुझे मुकातबा बना दिया है मगर मेरे पास इतनी रक़म नहीं है कि मैं बदले किताबत अदा कर के आज़ाद हो जाऊं इस लिये आप इस वक़्त मेरी माली इमदाद फ़रमाएं क्यूं कि मेरा तमाम खानदान इस जंग में गरिफ्तार हो चुका है और हमारे तमाम माल व सामान मुसलमानों के हाथों में माले गनीमत बन चुके हैं और मैं इस वक्त बिल्कुल ही मुफ़्लिसी व बे कसी के आलम में हूं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 678 📚*

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࿐  *हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها :-* हुज़ूर रहमतुल्लिल आलमीन ﷺ को उन की फ़रयाद सुन कर उन पर रहम आ गया, आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि अगर मैं इस से बेहतर सुलूक तुम्हारे साथ करूं कर लोगी? तो क्या तुम इस को मंजूर कर लोगी? उन्हों ने पूछा कि या रसूलल्लाह (ﷺ) ! आप साथ इस से बेहतर सुलूक क्या फ़रमाएंगे ? आप ﷺ ने फरमाया कि मैं येह चाहता हूं कि तुम्हारे बदले किताबत की तमाम रक़म मैं खुद तुम्हारी तरफ से अदा कर दूं और फिर तुम को आज़ाद कर के मैं खुद तुम से निकाह कर लूं ताकि तुम्हारा खानदानी एजाज़ व वकार बरक़रार रह जाए। यह सुन कर हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها की शादमानी व मसर्रत की कोई इनतिहा न रही। उन्हों ने इस एजाज़ को खुशी खुशी' मंजूर कर लिया। चुनान्चे हुज़ूर ﷺ ने बदले किताबत की सारी रक़म अदा फ़रमा कर और इन को आज़ाद कर के अपनी अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن में शामिल फ़रमा लिया और येह उम्मुल मोमिनीन के एजाज़ से सरफ़राज़ हो गई।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 679 📚*

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࿐  *हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها :-* जब इस्लामी लश्कर में येह ख़बर फैली कि रसूलुल्लाह ﷺ ने हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها से निकाह फ़रमा लिया तो तमाम मुजाहिदीन एक ज़बान हो कर कहने लगे कि जिस ख़ानदान में रसूलुल्लाह ﷺ ने निकाह फ़रमा लिया उस ख़ानदान का कोई फ़र्द लौंडी गुलाम नहीं रह सकता। चुनान्चे उस खानदान के जितने लौंडी गुलाम मुजाहिदीने इस्लाम के क़ब्ज़े में थे फ़ौरन ही सब के सब आज़ाद कर दिये गए।

࿐  येही वजह है कि हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها येह फ़रमाया करती थीं कि दुन्या में किसी औरत का निकाह हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها के निकाह से बढ़ कर मुबारक नहीं साबित हुवा क्यूंकि इस निकाह की वजह से तमाम ख़ानदाने बनी मुस्तलिक़ को गुलामी से नजात हासिल हो गई। 

࿐  हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها का बयान है कि हुज़ूर ﷺ के मेरे क़बीले में तशरीफ़ लाने से तीन रात पहले मैं ने येह ख़्वाब देखा था कि मदीने की जानिब से एक चांद चलता हुवा आया और मेरी गोद में गिर पड़ा मैं ने किसी से इस ख़्वाब का तज़किरा नहीं किया लेकिन जब रसूलुल्लाह ﷺ ने मुझ से निकाह फ़रमा लिया तो मैं ने समझ लिया कि येही उस ख़्वाब की ता’बीर है। 

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 495* ༺                            
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࿐  *हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها :-* इन का अस्ली नाम "बर्रह" (नेकूकार) था लेकिन चूंकि इस नाम से बुजुर्गी और बड़ाई का इज़हार होता था इस लिये आप ﷺ ने इन का नाम बदल कर "जुवैरिया" (छोटी लड़की) रख दिया यह बहुत ही इबादत गुज़ार औरत थीं नमाज़े फज्र से नमाज़े चाश्त तक हमेशा अपने विर्दो वज़ाइफ़ में मश्गूल रहा करती थीं।

࿐  हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها के दो भाई अम्र बिन अल हारिस और अब्दुल्लाह बिन हारिस और इन की एक बहन अम्रह बिन्ते हारिस येह तीनों भी मुसलमान हो कर शरफे सहाबिय्यत से सर बुलन्द हुए।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 680 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 496* ༺                            
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࿐  *हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها :-* इन के भाई अब्दुल्लाह बिन हारिस के इस्लाम लाने का वाकआ बहुत ही तअज्जुब ख़ैज़ भी है और दिलचस्प भी, येह अपनी क़ौम के कैदियों को छुड़ाने के लिये दरबारे रिसालत में हाज़िर हुए इन के साथ चन्द ऊंटनियां और लौंडी थी। इन्हों ने उन सब को एक पहाड़ की घाटी में छुपा दिया और तन्हा बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुए और असीराने जंग की रिहाई के लिये दरख्वास्त पेश की।

࿐  हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि तुम कैदियों के फिदये के लिये क्या लाए हो ? इन्हों ने कहा कि मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। येह सुन कर आप ﷺ ने फ़रमाया कि 'तुम्हारी वोह ऊंटनियां क्या हुई ? और तुम्हारी वोह लौंडी किधर गई? जिसे तुम फुलां घाटी में छुपा कर आए हो। ज़बाने रिसालत से येह इल्मे ग़ैब की ख़बर सुन कर अब्दुल्लाह बिन हारिस हैरान रह गए कि आखिर हुज़ूर ﷺ को मेरी लौंडी और ऊंटनियों की ख़बर किस तरह हो गई एक दम इन के अंधेरे दिल में हुज़ूरे अकरम ﷺ की सदाक़त और आप की नुबुव्वत का नूर चमक उठा और वोह फ़ौरन ही कलिमा पढ़ कर मुशर्रफ़ ब इस्लाम हो गए। سبحان الله

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 497* ༺                            
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࿐  *हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها :-* हज़रते जुवैरिया رضی الله تعالی عنها ने सात हदीसें भी रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत की हैं जिन में से दो हदीसें बुखारी शरीफ़ में और दो हदीसें मुस्लिम शरीफ़ में हैं बाकी तीन हदीसें दूसरी किताबों में हैं और हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर, हज़रते उबैद बिन सबाक़ और इन के भतीजे हज़रते तुफैल رضی الله تعالی عنهم वग़ैरा ने इन से रिवायत की है।
 
࿐  सि. 50 हि. में पैंसठ बरस की उम्र पा कर इन्हों ने मदीनए तय्यिबा में वफात पाई और हाकिमे मदीना मरवान ने इन की नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और येह जन्नतुल बक़ीअ के कब्रिस्तान में मदफून हुईं। 

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 498* ༺                            
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࿐  *हज़रते सफ़िय्या رضی الله تعالی عنها :-* इन का अस्ली नाम ज़ैनब था। रसूलुल्लाह ने इन का नाम “सफ़िय्या” रख दिया। येह यहूदियों के क़बीले बनू नज़ीर के सरदारे आज़म हुयैय बिन अख़्तब की बेटी हैं और इन की मां का नाम ज़रह बिन्ते समूइल है। येह खानदाने बनी इस्राईल में से हज़रते मूसा علیہ السلام के भाई हज़रते हारून علیہ السلام की औलाद में से हैं और इन का शोहर किनाना बिन अबिल हुकै़क़भी बनू नज़ीर का रईसे आज़म था जो जंगे ख़ैबर में क़त्ल हो गया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 681 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

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*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते सफ़िय्या رضی الله تعالی عنها :-* मुहर्रम सि. 7 हि. में जब ख़ैबर को मुसलमानों ने फत्ह कर लिया और तमाम असीराने जंग गरिफ्तार कर के इकठ्ठा जम्अ किये गए तो उस वक़्त हज़रते दहिय्या बिन खलीफ़ कल्बी رضی الله تعالی عنه बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुए और एक लौंडी तलब की, आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि तुम अपनी पसन्द से इन कैदियों में से कोई लौंडी  ले लो। उन्हों ने हज़रते सफिय्या رضی الله تعالی عنها को ले लिया मगर एक सहाबी ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह (ﷺ) ! हज़रते सफ़िय्या बनू कुरैज़ा और बनू नज़ीर की शहजादी हैं। इनके खानदानी ए'ज़ाज़ का तकाजा है कि आप उन को अपनी अवाजे मुतहहरात में शामिल फ़रमा लें। 

࿐   चुनान्चे आप ﷺ ने उन को हज़रते दहिय्या कल्बी رضی الله تعالی عنه से ले लिया और उन के बदले में उन्हें एक दूसरी लौंडी अता फरमा दी फिर हज़रते सफ़िय्या को आज़ाद फ़रमा कर उन से निकाह फ़रमा लिया और जंगे ख़ैबर से वापसी में तीन दिनों तक मन्जिले सहबा में इन को अपने खैमे के अन्दर अपनी कुर्बत से सरफ़राज़ फ़रमाया और दावते वलीमा में खजूर, घी, पनीर का मालीदा सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم को खिलाया जिस का मुफ़स्सल तज़किरा जंगे ख़ैबर में गुज़र चुका। हुज़ूरे अकरम ﷺ हज़रते बीबी सफ़िय्या رضی الله تعالی عنها पर बहुत ही खुसूसी तवज्जोह और इनतिहाई करीमाना इनायत फ़रमाते थे और इस क़दर इन का ख़याल रखते थे कि हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها पर ग़ैरत सुवार हो जाया करती थी।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 682 📚*

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*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते सफ़िय्या رضی الله تعالی عنها :-*  मन्कूल है कि एक मरतबा हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها ने हज़रते बीबी सफ़िय्या رضی الله تعالی عنها के बारे में येह कह दिया कि “वोह तो पस्ता क़द है" तो हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने फ़रमाया कि ऐ आइशा ! तूने ऐसी बात कह दी कि अगर तेरे इस कलाम को दरिया में डाल दिया जाए तो दरिया मुतग़य्यर हो जाएगा। (या'नी येह ग़ीबत है जो बहुत ही गन्दी बात है) 

࿐  इसी तरह एक मरतबा एक सफ़र में हज़रते सफ़िय्या رضی الله تعالی عنها का ऊंट ज़ख्मी हो गया और हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها के पास एक फ़ाज़िल ऊंट था हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि ऐ ज़ैनब ! तुम अपना ऊंट सफ़िय्या को दे दो । हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها ने तैश में आ कर कह दिया कि मैं इस यहूदिया को अपनी कोई चीज़ नहीं दूंगी। येह सुन कर हुज़ूरे अकरम ﷺ हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها पर इस क़दर खफा हो गए कि दो तीन माह तक उन के बिस्तर पर आप ﷺ ने क़दम नहीं रखा। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 683 📚*

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*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते सफ़िय्या رضی الله تعالی عنها :-* तिरमिज़ी शरीफ़ की रिवायत है कि एक रोज़ नबी ﷺ ने देखा कि हज़रते सफ़िय्या رضی الله تعالی عنها रो रही हैं आप ने रोने का सबब पूछा तो उन्हों ने कहा : या रसूलल्लाह (ﷺ) ! हज़रते आइशा और हज़रते हफ़्सा ने येह कहा है कि हम दोनों दरबारे रिसालत में तुम से बहुत ज़ियादा इज़्ज़त दार हैं क्यूं कि हमारा खानदान हुज़ूर ﷺ से मिलता है। येह सुन कर हुज़ूर ने फ़रमाया कि ऐ सफ़िय्या ! तुम ने उन दोनों से येह क्यूं न कह दिया कि तुम दोनों मुझ से बेहतर क्यूं कर हो सकती हो। हज़रते हारून علیہ السلام मेरे बाप हैं और हज़रते मूसा علیہ السلام मेरे चचा है और हज़रते मुहम्मद (ﷺ) मेरे शोहर हैं। 

࿐  इन्हों ने दस हदीसें भी हुज़ूर ﷺ से रिवायत की हैं जिन में से एक हदीस बुखारी व मुस्लिम दोनों किताबों में है और बाकी नव हदीसें दूसरी किताबों में दर्ज हैं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 683 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 502* ༺                            
*❝ अज़वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ❞*
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࿐  *हज़रते सफ़िय्या رضی الله تعالی عنها :-* इन की वफ़ात के साल में इख़्तिलाफ़ है वाक़िदी का क़ौल है कि सि. 50 हि. में इन की वफ़ात हुई। और इब्ने साद ने लिखा है कि सि. 52 हि. में इन का इनतिकाल हुवा। ब वक्ते रिहलत इन की उम्र साठ बरस की थी येह भी मदीने के मशहूर क़ब्रिस्तान जन्नतुल बक़ीअ में सिपुर्दे खाक की गई।

࿐  येह शहनशाहे मदीना ﷺ की वोह ग्यारह अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن हैं जिन पर तमाम मुअर्रिखीन का इत्तिफ़ाक़ है। इन में से हज़रते ख़दीजा رضی الله تعالی عنها का तो हिजरत से पहले ही इनतिक़ाल हो चुका था और हज़रते ज़ैनब बिन्ते खुज़ैमा رضی الله تعالی عنها जिन का लकब “उम्मुल मसाकीन" है। हम पहले भी तहरीर कर चुके हैं कि निकाह के दो तीन माह बाद हुज़ूर ﷺ के सामने ही येह वफ़ात पा गई थीं। हुज़ूर ﷺ की रिहलत के वक़्त आप की नव बीवियां मौजूद थीं जिन में से आठ की आप बारियां मुक़र्रर फ़रमाते रहे क्यूं कि हज़रते सौदह رضی الله تعالی عنها ने अपनी बारी का दिन हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها को हिबा कर दिया था। इन नव मुक़द्दस अज़्वाज में से हुज़ूर ﷺ की रिहलत के बा'द सब से पहले हज़रते ज़ैनब बिन्ते जहश رضی الله تعالی عنها ने वफात पाई और सब के बा'द आख़िर में सि. 62 हि. में हज़रते बीबी उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها ने रिहलत फ़रमाई इन की वफ़ात के बाद दुन्या उम्महातुल मोमिनीन से खाली हो गई।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 684 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 503* ༺                            
              *❝  मुक़द्दस बांदियां  ❞*
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࿐  मज़कूरा बाला अज़्वाजे मुतहहरात के इलावा हुज़ूरे अक्दस ﷺ की चार बांदियां भी थीं जो आप के ज़ेरे तसर्रुफ़ थीं 'जिन के नाम हस्बे ज़ैल हैं :

࿐ *हज़रते मारिया किब्तिया رضی الله تعالی عنها:-* इन को मिस्र व सिकन्दरिया के बादशाह मकूक़स क़िब्ती ने बारगाहे अक़्दस ﷺ में चन्द हदाया और तहाइफ़ के साथ बतौरे हिबा के नज़्र किया था। इन की मां रूमी थीं और बाप मिसरी इस लिये येह बहुत ही हसीन व ख़ूब सूरत थीं। येह हुज़ूर ﷺ की उम्मे वलद हैं क्यूं कि आप के फ़रज़न्द हज़रते इब्राहीम इन ही के शिकमे मुबारक से पैदा हुए थे।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 685 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 504* ༺                            
              *❝  मुक़द्दस बांदियां  ❞*
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࿐  *हज़रते मारिया किब्तिया رضی الله تعالی عنها:-* कनीज़ होने के बा वुजूद हुज़ूरे अक्दस ﷺ इन को पर्दे में रखते थे और इन के लिये मदीनए तय्यबा के करीब मक़ामे आलिया में आप ने एक अलग घर बनवा दिया था जिस में येह रहा करती थीं और हुज़ूर ﷺ इन के पास तशरीफ़ ले जाया करते थे। वाक़िदी का बयान है कि हुज़ूर ﷺ के बाद हज़रते अमीरुल मोमिनीन अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه अपनी ज़िन्दगी भर इन के नान व नफ़के का इनतिज़ाम करते रहे और इन के बाद हज़रते अमीरुल मोमिनीन उमर फ़ारूक़ رضی الله تعالی عنه येह ख़िदमत अन्जाम देते रहे। यहां तक कि सि. 15 हि. या सि. 16 हि. में इन की वफ़ात हो गई और अमीरुल मोमिनीन हज़रते उमर फ़ारूके आज़म رضی الله تعالی عنه ने इन की नमाज़े जनाज़ा में शिर्कत के लिये ख़ास तौर पर लोगों को जम्अ फ़रमाया और खुद ही इन की नमाज़े जनाज़ा पढ़ा कर इन को जन्नतुल बक़ीअ में मदफून किया। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 685 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 505* ༺                            
              *❝  मुक़द्दस बांदियां  ❞*
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࿐  *हज़रते रैहाना رضی الله تعالی عنها :-* येह यहूद के खानदान बनू कुरैज़ा से थीं, गरिफ्तार हो कर रसूलुल्लाह ﷺ के पास आई मगर इन्हों ने कुछ दिनों तक इस्लाम क़बूल नहीं किया जिस से हुज़ूरे अक्दस ﷺ इन से नाराज़ रहा करते थे मगर ना गहां एक दिन एक सहाबी ने आ कर येह खुश खबरी सुनाई कि या रसूलल्लाह (ﷺ)! रैहाना ने इस्लाम क़बूल कर लिया। इस ख़बर से आप बेहद खुश हुए और आप ने उन से फ़रमाया कि ऐ रैहाना! अगर तुम चाहो तो मैं तुम को आज़ाद कर के तुम से निकाह कर लूं। मगर इन्हों ने येह गुज़ारिश की, कि या रसूलल्लाह (ﷺ) ! आप मुझे अपनी लौंडी ही बना कर रखें। येही मेरे और आप दोनों के हक में अच्छा और आसान रहेगा। येह हुज़ूर ﷺ के सामने ही जब आप हिज्जतुल वदाअ से वापस तशरीफ़ लाए सि. 10 हि. में वफ़ात पा कर जन्नतुल बकीअ में मदफून हुई। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 686 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 506* ༺                            
              *❝  मुक़द्दस बांदियां  ❞*
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࿐  *हज़रते नफीसा رضی الله تعالی عنها:-* येह पहले हज़रते ज़ैनब बिन्ते जहश رضی الله تعالی عنها की मम्लूका लौंडी थीं। उन्हों ने इन को हुज़ूर ﷺ की खिदमत में बतौरे हिबा के नज़्र कर दिया और येह हुज़ूर ﷺ के काशानए नुबुव्वत में बांदी की हैसिय्यत से रहने लगीं।

࿐  *चौथी बांदी साहिबा :-* मज़कूरा बाला बांदियों के इलावा हुज़ूर ﷺ की एक चौथी बांदी साहिबा भी थीं जिन के बारे में आम तौर पर मुअरिखीन ने लिखा है कि इन का नाम मालूम नहीं  येह भी किसी जिहाद में गरिफ्तार हो कर बारगाहे अक्दस में आई थीं और हुजूरे अक्दस ﷺ की बांदी बन कर आप की सोहबत से सरफ़राज़ होती रहीं।

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 507* ༺                            
              *❝  औलादे किराम  ❞*
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࿐  इस बात पर तमाम मुअर्रिखीन का इत्तिफाक है कि हुज़ूरे अक्दस ﷺ की औलादे किराम की तादाद छे है। दो फ़रज़न्द क़ासिम व हज़रते इब्राहीम और चार साहिब जादियां हज़रते ज़ैनब व हज़रते रुकय्या व हज़रते उम्मे कुलसूम व हज़रते फातिमा (رضی الله تعالی عنهم) लेकिन बाज़ मुअर्रिखीन ने येह बयान फ़रमाया है कि आप ﷺ के एक साहिब जादे अब्दुल्लाह भी हैं जिन का लकब तय्यब व ताहिर है। इस क़ौल की बिना पर हुज़ूर ﷺ की मुक़द्दस औलाद की तादाद सात है। तीन साहिब जादगान और चार साहिब जादियां, हज़रते शैख अब्दुल हक मुहद्दिस देहलवी رحمتہ اللہ علیہ ने इसी क़ौल को ज़ियादा सहीह बताया है। 

࿐   इस के इलावा हुज़ूर ﷺ की मुक़द्दस औलाद के बारे में दूसरे अक्वाल भी हैं जिन का तज़किरा तवालत से खाली नहीं। हुज़ूर ﷺ की इन सातों मुक़द्दस औलाद में से हज़रते इब्राहीम رضی الله تعالی عنه हज़रते मारिया किब्तिया رضی الله تعالی عنها के शिकम से तवल्लुद हुए थे बाकी तमाम औलादे किराम हज़रते खदीजतुल कुब्रा رضی الله تعالی عنها के बतने मुबारक से पैदा हुई। अब हम इन औलादे किराम के ज़िक्रे जमील पर क़दरे तफ्सील के साथ रौशनी डालते हैं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 687 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 508* ༺                            
              *❝  औलादे किराम  ❞*
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࿐  *हज़रते कासिम رضی الله تعالی عنه:-* येह सब से पहले फ़रज़न्द हैं जो हज़रते बीबी ख़दीजा رضی الله تعالی عنها की आगोशे मुबारक में ए'लाने नुबुव्वत से क़ब्ल हुए। हुज़ूरे अक्दस ﷺ की कुन्यत अबुल क़ासिम इन्हीं के नाम पर है। जमहूर उलमा का येही क़ौल है कि येह पाउं पर चलना सीख गए थे कि इन की वफ़ात हो गई और इब्ने सा'द का बयान है कि इन की उम्र शरीफ़ दो बरस की हुई मगर अल्लामा ग़लाबी कहते हैं कि येह फक्त सतरह माह ज़िन्दा रहे।

࿐  *हज़रते अब्दुल्लाह رضی الله تعالی عنه:-* इन ही का लकब तय्यिब व ताहिर है। ए'लाने नुबुव्वत से क़ब्ल 'मक्कए मुअज़्ज़मा में पैदा हुए और बचपन ही में वफ़ात पा गए।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 688 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 509* ༺                            
              *❝  औलादे किराम  ❞*
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࿐  *इब्राहीम رضی الله تعالی عنه :-*  येह हुज़ूरे अकरम ﷺ की औलादे मुबारका में सब से आख़िरी फ़रज़न्द हैं येह जुल हिज्जा सि. 8 हि. में मदीनए मुनव्वरह के करीब मक़ामे "आलिया" के अन्दर हज़रते मारिया किब्तिया رضی الله تعالی عنها के शिकमे मुबारक से पैदा हुए। इस लिये मकामे आलिया का दूसरा नाम "मश्रबए इब्राहीम" भी है। इन की विलादत की ख़बर हुज़ूरे अकरम ﷺ के आज़ाद कर्दा गुलाम हज़रते अबू राफ़ेअ رضی الله تعالی عنه ने मकामे आलिया से मदीने आ कर बारगाहे अक्दस में सुनाई। येह खुश खबरी सुन कर हुज़ूरे अकरम ﷺ ने इन्आम के तौर पर हज़रते अबू राफ़ेअ رضی الله تعالی عنه को एक गुलाम अता फ़रमाया। 

࿐  इस के बाद फ़ौरन ही हज़रते जिब्रईल علیہ السلام नाज़िल हुए और आप को (ऐ इब्राहीम के बाप) कह कर पुकारा, हुज़ूर ﷺ बेहद खुश हुए और इन के अकीके़ में दो मेंढे आप ने ज़ब्ह फ़रमाए और इन के सर के बाल के वज़न के बराबर चांदी खैरात फ़रमाई और इन के बालों को दफन करा दिया और "इब्राहीम " नाम रखा!

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 688 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 510* ༺                            
              *❝  औलादे किराम  ❞*
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࿐  फिर इन को दूध पिलाने के लिये हज़रते "उम्मे सैफ" के सिपुर्द फ़रमाया। इन के शोहर हज़रते अबू सैफ़ رضی الله تعالی عنه लुहारी का पेशा करते थे। आप ﷺ को हज़रते इब्राहीम رضی الله تعالی عنه से बहुत जियादा महब्बत थी और कभी कभी आप इन को देखने के लिये तशरीफ़ ले जाया करते थे। चुनान्चे हज़रते अनस ' رضی الله تعالی عنه का बयान है कि हम रसूलुल्लाह ﷺ के साथ हज़रते अबू सैफ رضی الله تعالی عنه के मकान पर गए तो येह वोह वक़्त था कि हज़रते इब्राहीम رضی الله تعالی عنه जान कनी के आलम में थे। येह मंज़र देख कर रहमते आलम की आंखों से आंसू जारी हो गए। उस वक्त अब्दुर्रहमान बिन औफ رضی الله تعالی عنه ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह (ﷺ) ! क्या आप भी रोते हैं? आप ने इरशाद फ़रमाया कि ऐ औफ के बेटे ! येह मेरा रोना एक शफ़्क़त का रोना है। इस के बाद फिर दोबारा जब चश्माने मुबारक से आंसू बहे तो आप की ज़बाने मुबारक पर येह कलिमात जारी हो गए कि : आंख आंसू बहाती है और दिल गमजदा है मगर हम वोही बात ज़बान से निकालते हैं जिस से हमारा रब खुश हो जाए और बिला शुबा ऐ इब्राहीम ! हम तुम्हारी जुदाई से बहुत ज़ियादा गमगीन हैं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 689 📚*

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࿐  जिस दिन हज़रते इब्राहीम رضی الله تعالی عنه का इनतिकाल हुवा इत्तिफ़ाक़ से उसी दिन सूरज में ग्रहन लगा अरबों के दिलों में ज़मानए जाहिलिय्यत का येह अकीदा जमा हुवा था कि किसी बड़े आदमी की मौत से चांद और सूरज में ग्रहन लगता है। चुनान्चे बाज़ लोगों ने येह ख़याल किया कि ग़ालिबन येह सूरज ग्रहन हज़रते इब्राहीम رضی الله تعالی عنه की वफ़ात की वजह से हुवा है। हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने इस मौक़अ पर एक खुत्बा दिया जिस में जाहिलिय्यत के इस अक़ीदे का रद फ़रमाते हुए इरशाद फ़रमाया कि : यक़ीनन चांद और सूरज अल्लाह तआला की निशानियों में से दो निशानियां हैं। किसी के मरने या जीने से इन दोनों में ग्रहन नहीं लगता जब तुम लोग ग्रहन देखो तो दुआएं मांगो और नमाज़े कुसूफ़ पढ़ो यहां तक कि ग्रहन ख़त्म हो जाए।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 690 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 512* ༺                            
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࿐  *इब्राहीम رضی الله تعالی عنه :-*  हुज़ूर ﷺ ने यह भी फ़रमाया कि मेरे फ़रज़न्द इब्राहीम ने दूध पीने की मुद्दत पूरी नहीं कि और दुन्या से चला गया। इसलिये अल्लाह तआला ने उस के लिये बिहिश्त में एक दूध पिलाने वाली को मुकर्रर फ़रमा दिया है जो मुद्दते रज़ाअत भर उस को दूध पिलाती रहेगी। 

࿐  रिवायत है कि हुज़ूर ﷺ ने हज़रते इब्राहीम رضی الله تعالی عنه को जन्नतुल बकीअ में हज़रते उसमान बिन मज़ऊन رضی الله تعالی عنه की कब्र के पास दफ़्न फ़रमाया और अपने दस्ते 'मुबारक से उन की कब्र पर पानी का छिड़काव किया।

ब वक्ते वफ़ात हज़रते इब्राहीम की उम्र शरीफ़ 17 या 18 माह की थी। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 690 📚*

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࿐  *हज़रते जैनब رضی الله تعالی عنها :-* येह हुज़ूरे अक्दस ﷺ की साहिब ज़ादियों में सब से बड़ी थीं। एलाने नुबुव्वत से दस साल क़ब्ल जब कि हुज़ूर ﷺ की उम्र शरीफ़ तीस साल की थी मक्कए मुकर्रमा में इनकी विलादत हुई। येह इब्तिदाए इस्लाम ही में मुसलमान हो गई थीं और जंगे बद्र के बाद हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने इन को 'मक्कए मुकर्रमा से मदीनए मुनव्वरह बुला लिया था और येह हिजरत कर के मक्कए मुकर्रमा से मदीनए मुनव्वरह तशरीफ़ ले गई ।

࿐  एलाने नुबुव्वत से क़ब्ल ही इन की शादी इन के खालाज़ाद भाई अबुल आस बिन रबी से हो गई थी। अबुल आस हज़रते बीबी ख़दीजा رضی الله تعالی عنها की बहन हज़रते हाला رضی الله تعالی عنها के बेटे थे। हुज़ूरे अकरम ﷺ ने हज़रते खदीजा رضی الله تعالی عنها की सिफ़ारिश से हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها का अबुल आस के साथ निकाह फ़रमा दिया था। हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها तो मुसलमान हो गई थीं मगर अबुल आ शिर्क व कुफ़्र पर अड़ा रहा। रमज़ान सि. 2 हि. में जब अबुल आस जंगे बद्र से गरिफ्तार हो कर मदीने आए उस वक्त तक हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها मुसलमान होते हुए मक्कए मुकर्रमा ही में मुकीम थीं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 691 📚*

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࿐  *हज़रते जैनब رضی الله تعالی عنها :-* चुनान्चे अबुल आस को क़ैद से छुड़ाने के लिये उन्हों ने मदीने में अपना वोह हार भेजा जो इन की मां हज़रते खदीजा رضی الله تعالی عنها ने इन को जहेज़ में दिया था। येह हार हुज़ूरे अक्दस ﷺ का इशारा पा कर सहाबए किराम ने हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها के पास वापस भेज दिया और हुज़ूर ﷺ ने अबुल आस से येह वादा ले कर उन को रिहा कर दिया कि वोह मक्का पहुंच कर हज़रते ज़ैनब को मदीनए मुनव्वरह भेज देंगे। चुनान्चे अबुल आस ने अपने वादे के मुताबिक हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها को अपने भाई किनाना की हिफ़ाज़त में "बतने याजज" तक भेज दिया। इधर हुज़ूर ﷺ ने हज़रते ज़ैद बिन हारिसा رضی الله تعالی عنه को एक अन्सारी के साथ पहले ही मकामे "बतने याजज" में भेज दिया था। चुनान्चे येह दोनों हज़रात "बतने याजज" से अपनी हिफ़ाज़त में हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها को मदीनए मुनव्वरह लाए।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 692 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 515* ༺                            
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࿐  *हज़रते जैनब رضی الله تعالی عنها :-* मन्कूल है कि जब हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها मक्कए मुकर्रमा से रवाना हुईं तो कुफ़्फ़ारे कुरैश ने इन का रास्ता रोका यहां तक कि एक बद नसीब जालिम "हिबार बिन अल अस्वद" ने इन को नेज़े से डरा कर ऊंट से गिरा दिया जिस के सदमे से इन का हम्ल साक़ित हो गया। मगर इन देवर किनाना ने अपने तरकश से तीरों को बाहर निकाल कर येह धमकी दी कि जो शख्स भी हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها के ऊंट का पीछा करेगा। वोह मेरे इन तीरों से बच कर न जाएगा येह सुन कर कुफ्फ़ारे कुरैश सहम गए फिर सरदारे मक्का अबू सुफ्यान ने दरमियान में पड़ कर हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها के लिये मदीनए मुनव्वरह की रवानगी के लिये रास्ता साफ़ करा दिया। 

࿐  हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها को हिजरत करने में यह दर्दनाक मुसीबत पेश आई इसी लिये हुज़ूर ﷺ ने इन के फ़ज़ाइल में येह इरशाद फ़रमाया कि या'नी येह मेरी बेटियों में इस एतिबार से बहुत ही ज़ियादा फ़ज़ीलत वाली हैं कि मेरी जानिब हिजरत करने में इतनी बड़ी मुसीबत उठाई। इस के बाद अबुल आस मुहर्रम सि. 7 हि. में मुसलमान हो कर मक्कए मुकर्रमा से मदीनए मुनव्वरह हिजरत कर के चले आए और हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها के साथ रहने लगे। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 692 📚*

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࿐  *हज़रते जैनब رضی الله تعالی عنها :-* सि. 8 हि. में हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها की वफात हो गई और हज़रते उम्मे ऐमन व हज़रते सौदह बिन्ते ज़मआ व हज़रते उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنهن ने इन को गुस्ल दिया और हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने इन के कफ़न के लिये अपना तहबन्द शरीफ़ अता फ़रमाया और अपने दस्ते मुबारक से इन को कब्र में उतारा।

࿐  हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها की औलाद में एक लड़का जिस का नाम “अली" और एक लड़की हज़रते "इमामह" थीं। "अली" के बारे में एक रिवायत है कि अपनी वालिदए माजिदा की हयात ही में बुलूग़ के क़रीब पहुंच कर वफ़ात पा गए लेकिन इब्ने असाकिर का बयान है कि नसब नामों के बयान करने वाले बाज़ उलमा ने येह ज़िक्र किया है कि येह जंगे यरमूक में शहादत से सरफ़राज़ हुए। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 693 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 517* ༺                            
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࿐  *हज़रते जैनब رضی الله تعالی عنها :-* हज़रते इमामह رضی الله تعالی عنها से हुज़ूर ﷺ को बड़ी महब्बत थी। आप इन को अपने दौशे मुबारक पर बिठा कर मस्जिदे नबवी में तशरीफ़ ले जाते थे।

࿐  रिवायत है कि एक मरतबा हबशा के बादशाह नज्जाशी ने आप ﷺ की खिदमत में बतौरे हदिय्या एक हुल्ला भेजा जिस के साथ सोने की एक अंगूठी भी थी जिस का नगीना हबशी था हुज़ूर ﷺ ने येह अंगूठी हज़रते इमामह رضی الله تعالی عنها को अता फरमाई!

࿐  इसी तरह एक मरतबा एक बहुत ही ख़ूब सूरत सोने का हार किसी ने हुजूरे अक्दस ﷺ को नज़्र किया जिसकी खूबसूरती को देख कर तमाम अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن हैरान रह गई। आप ﷺ ने अपनी मुक़द्दस बीवियों से फ़रमाया कि मैं येह हार उस को दूंगा जो मेरे घर वालों में मुझे सब से ज़ियादा महबूब है। तमाम अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ने येह ख़याल कर लिया कि यक़ीनन येह हार हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها को अता फरमाएंगे मगर हुज़ूर ﷺ ने हज़रते इमामह رضی الله تعالی عنها को क़रीब बुलाया और अपनी प्यारी नवासी के गले में अपने दस्ते मुबारक से येह हार डाल दिया। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 694 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 518* ༺                            
              *❝  औलादे किराम  ❞*
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࿐  *हज़रते रुक़य्या رضی الله تعالی عنها :-* येह एलाने नुबुव्वत से सात बरस पहले जब कि हुज़ूर ﷺ की उम्र शरीफ़ का तेंतीसवां साल था पैदा हुई और इब्तिदाए इस्लाम ही में मुशर्रफ़ ब इस्लाम हो गई। पहले इन का निकाह 'अबू लहब के बेटे “उतबा" से हुवा था लेकिन अभी इन की रुख़्सती नहीं हुई थी कि "सूरए तब्बत यदा" नाज़िल हो गई। अबू लहब कुरआन में अपनी इस दाइमी रुस्वाई का बयान सुन कर गुस्से में आग बगोला हो गया और अपने बेटे उतबा को मजबूर कर दिया कि वह हुज़ूर ﷺ की साहिब जादी हज़रते रुक़य्या رضی الله تعالی عنها को तलाक दे दे। चुनान्चे उतबा ने तलाक दे दी।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 694 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 519* ༺                            
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࿐  *हज़रते रुक़य्या رضی الله تعالی عنها :-* इस के बा'द हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने हज़रते रुकय्या رضی الله تعالی عنها का निकाह हज़रते उसमान बिन अफ्फान رضی الله تعالی عنه से कर दिया। निकाह के बाद हज़रते उसमान رضی الله تعالی عنه ने हज़रते रुक़य्या رضی الله تعالی عنها को साथ ले कर मक्का से हबशा की तरफ़ हिजरत की फिर हबशा से मक्का वापस आ कर मदीनए मुनव्वरह तरफ़ हिजरत की और येह मियां बीवी दोनों "साहिबुल हिजरतैन" (दो हिजरतों वाले) के मुअज्ज़ज़ लकब से सरफ़राज़ हो गए। 

࿐  जंगे बद्र के दिनों में हज़रते रुकय्या رضی الله تعالی عنها बहुत सख्त बीमार थीं चुनान्चे हुज़ूर ﷺ ने हज़रते उसमान को जंगे बद्र में शरीक होने से रोक दिया और येह हुक्म दिया कि वोह हज़रते बीबी रुकुय्या رضی الله تعالی عنها की तीमारदारी करें। हज़रते जैद बिन हारिसा رضی الله تعالی عنه जिस दिन जंगे बद्र में मुसलमानों की फत्हे मुबीन की खुश खबरी ले कर मदीने पहुंचे उसी दिन हज़रते बीबी रुक़य्या رضی الله تعالی عنها ने बीस साल की उम्र पा कर वफात पाई।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 695 📚*

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࿐  *हज़रते रुक़य्या رضی الله تعالی عنها :-* हुज़ूर ﷺ जंगे बद्र के सबब से इन के जनाज़े में शरीक न हो सके। हज़रते उसमाने ग़नी رضی الله تعالی عنه अगर्चे जंगे बद्र में शरीक न हुए लेकिन हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने इन को जंगे बद्र के मुजाहिदीन में शुमार फ़रमाया और जंगे बद्र के माले गनीमत में से इन को मुजाहिदीन के बराबर हिस्सा भी अता फरमाया और शुरकाए जंगे बद्र के बराबर अज्रे अज़ीम की बिशारत भी दी।

࿐  हज़रते बीबी रुक़य्या رضی الله تعالی عنها के शिकमे मुबारक से हज़रते उसमाने ग़नी رضی الله تعالی عنه के एक फ़रज़न्द भी पैदा हुए थे जिन का नाम “अब्दुल्लाह” था। येह अपनी मां के बा'द सि. 4 हि. में छे बरस की उम्र पा कर इनतिकाल कर गए।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 694 📚*

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࿐  *हज़रते उम्मे कुलसूम  رضی الله تعالی عنها :-*  येह पहले अबू लहब के बेटे “उतैबा " के निकाह में थीं लेकिन अबू लहब के मजबूर कर देने से बद नसीब उतैबा ने इन को रुख़्सती से कब्ल ही तलाक दे दी और इस ज़ालिम ने बारगाहे नुबुव्वत में इनतिहाई गुस्ताखी भी की। यहां तक कि बद ज़बानी करते हुए हुज़ूर रहमतुल्लल आलमीन (ﷺ) पर झपट पड़ा और आप के मुक़द्दस पैराहन को फाड़ डाला। इस गुस्ताख़ की बेअदबी से आप के कल्बे नाजुक पर इनतिहाई रन्ज व सदमा गुज़रा और जोशे गम में आप की ज़बाने मुबारक से येह अल्फ़ाज़ निकल पड़े कि "या अल्लाह ! अपने कुत्तों में से किसी कुत्ते को इस पर मुसल्लत फ़रमा दे।"

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 696 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 522* ༺                            
              *❝  औलादे किराम  ❞*
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࿐  *हज़रते उम्मे कुलसूम  رضی الله تعالی عنها :-*  इस दुआए नबवी का येह असर हुवा कि अबू लहब और उतैबा दोनों तिजारत के लिये एक क़ाफ़िले के साथ मुल्के शाम गए और मका "ज़रका" में एक राहिब के पास रात में ठहरे राहिब ने क़ाफ़िले वालों को बताया कि यहां दरिन्दे बहुत हैं। आप लोग ज़रा होशियार हो कर सोएं। येह सुन कर अबू लहब ने क़ाफ़िले वालों से कहा कि ऐ लोगो ! मुहम्मद (ﷺ) ने मेरे बेटे उतैबा के लिये हलाकत की दुआ कर दी है। लिहाजा तुम लोग तमाम तिजारती सामानों को इकठ्ठा कर के उस के ऊपर उतैबा का बिस्तर लगा दो और सब लोग उस के इर्द गिर्द चारों तरफ़ सो रहो ताकि मेरा बेटा दरिन्दों के हम्ले से महफूज़ रहे। 

࿐  चुनान्चे काफ़िले 'वालों ने उतैबा की हिफ़ाज़त का पूरा पूरा बन्दोबस्त किया लेकिन रात में बिल्कुल ना गहां एक शेर आया और सब को सूंघते हुए कूद कर उतैबा 'बिस्तर पर पहुंचा और उस के सर को चबा डाला। लोगों ने हर चन्द शेर को तलाश किया मगर कुछ भी पता नहीं चल सका कि येह शेर कहां से आया था? और किधर चला गया।  

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 696 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 523* ༺                            
              *❝  औलादे किराम  ❞*
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࿐  *हज़रते उम्मे कुलसूम  رضی الله تعالی عنها :-*  खुदा की शान देखिये कि अबू लहब के दोनों बेटों उतबा और उतैबा ने हुज़ूर (ﷺ) की दोनों शहज़ादियों को अपने बाप के मजबूर करने से तलाक़ दे दी मगर उतबा ने चूंकि बारगाहे नुबुव्वत में कोई गुस्ताखी और बेअदबी नहीं की थी। इस लिये वोह क़हरे इलाही में मुब्तला नहीं हुवा बल्कि फत्हे मक्का के दिन इस ने और इस के एक दूसरे भाई “मुअतब” दोनों ने इस्लाम कबूल कर लिया और दस्ते अक्दस पर बैअत कर के शरफे सहाबिय्यत से सरफ़राज़ हो गए। और "उतैबा" ने अपनी ख़बासत से चूंकि बारगाहे अक्दस में गुस्ताख़ी व बे अदबी की थी इस लिये वोह क़हरे क़हार व गज़बे जब्बार में गरिफ़्तार हो कर कुफ्र की हालत में एक खूंखार शेर के हम्ले का शिकार बन गया। 

࿐  हज़रते बीबी रुक़य्या رضی الله تعالی عنها की वफ़ात के बाद रबीउल अव्वल सि. 3 हि. में हुजूरे अक्दस ﷺ ने हज़रते बीबी उम्मे कुलसूम رضی الله تعالی عنها का हज़रते उसमाने ग़नी رضی الله تعالی عنه से निकाह कर दिया मगर इन के शिकमे मुबारक से कोई औलाद नहीं हुई। शाबान सि. 9 हि. में हज़रते उम्मे कुलसूम رضی الله تعالی عنها ने वफात पाई और हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने इन की नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और येह जन्नतुल बक़ीअ में मदफ़ून हुईं।   

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 697 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 524* ༺                            
              *❝  औलादे किराम  ❞*
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࿐  *हज़रते हज़रते फातिमा  رضی الله تعالی عنها :-* येह शहनशाहे कौनैन ﷺ की सब से छोटी मगर सब से ज़ियादा प्यारी और लाडली शहजादी हैं। इन का नाम “फातिमा” और लकब "ज़हरा" और "बतूल" है। इन की पैदाइश के साल में उलमाए मुअर्रिखीन का इख़िलाफ़ है। अबू उमर का क़ौल है कि एलाने नुबुव्वत के पहले साल जब कि हुज़ूर ﷺ की उम्र शरीफ़ इक्तालीस बरस की थी येह पैदा हुई और बा'ज़ ने लिखा है कि ए'लाने नुबुव्वत से एक साल क़ब्ल इन की विलादत हुई और अल्लामा इब्नुल जौज़ी ने येह तहरीर फ़रमाया कि ए'लाने नुबुव्वत से पांच साल क़ब्ल इन की पैदाइश हुई!  

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 697 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 525* ༺                            
              *❝  औलादे किराम  ❞*
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࿐  *हज़रते हज़रते फातिमा  رضی الله تعالی عنها :-* अल्लाहु अकबर ! इन के फ़ज़ाइल व मनाकिब का क्या कहना ? इन के मरातिब व दरजात के हालात से कुतुबे अहादीस के सफहात मालामाल हैं। जिन का तज़किरा हम ने अपनी किताब "हक्कानी तक़रीरें" में तहरीर कर दिया है। हुज़ूरे अक्दस ﷺ का इरशाद है कि येह सय्यदतुन्निसाइल आलमीन (तमाम जहान की औरतों की सरदार) और सय्यदतुन्निसाए अहलिल जन्नह (अहले जन्नत की तमाम औरतों की सरदार हैं। इन के हक़ में इरशादे नबवी है कि फ़ातिमा मेरी बेटी मेरे बदन की एक बोटी है जिसने फ़ातिमा को नाराज़ किया उस ने मुझे नाराज़ किया!

࿐  सि. 2 हि. में हज़रते अली शेरे खुदा رضی الله تعالی عنه से इनका निकाह हुवा और इन के शिकमे मुबारक से तीन साहिब जादगान हज़रते हसन, हज़रते हुसैन, हज़रते मोहसिन رضی الله تعالی عنهم और तीन साहिब ज़ादियों ज़ैनब व उम्मे कुलसूम व रुक्य्या رضی الله تعالی عنهن की विलादत हुई। हज़रते मोहसिन व रुकुय्या رضی الله تعالی عنهما तो बचपन ही में वफात पा गए। उम्मे कुलसूम رضی الله تعالی عنها का निकाह अमीरुल मोमिनीन हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه से हुवा। जिन के शिकमे मुबारक से आप के एक फ़रज़न्द हज़रते जैद और एक साहिब ज़ादी हज़रते रुकय्या رضی الله تعالی عنهما की पैदाइश हुई और हज़रते ज़ैनब رضی الله تعالی عنها की शादी हज़रते अब्दुल्लाह बिन जा'फ़र رضی الله تعالی عنه से हुई।  

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 526* ༺                            
              *❝  औलादे किराम  ❞*
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࿐  *हज़रते हज़रते फातिमा  رضی الله تعالی عنها :-* हुज़ूरे अक्दस ﷺ के विसाल शरीफ़ का हज़रते बीबी फातिमा के कल्बे मुबारक पर बहुत ही जांकाह सदमा गुज़रा। चुनान्चे विसाले अक्दस के बाद हज़रते फ़ातिमा رضی الله تعالی عنها कभी हंसती हुई नहीं देखी गई। यहां तक कि विसाले नबवी के छे माह बा'द 3 रमज़ान सि. 11 हि. मंगल की रात में आप ने दाइये अजल को लब्बैक कहा। हज़रते अली या हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنهما ने नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और सब से ज़ियादा सहीह और मुख़्तार क़ौल यही है कि जन्नतुल बक़ीअ में मदफून हुईं।   

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 699 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 527* ༺                            
               *❝ चचाओं की ता'दाद ❞*
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࿐  हुज़ूरे अक्दस ﷺ के चचाओं की तादाद में मुअर्रिखीन का इख़्तिलाफ़ है। बाज़ के नज़दीक इन की तादाद नव बा'ज़ ने कहा कि दस और बाज़ का क़ौल है कि ग्यारह मगर साहिबे मवाहिबे लदुन्निय्यह ने "ज़खाइरुल उक़्बा फी मनाकिबे ज़विल कुर्बा" से नकल करते हुए तहरीर फ़रमाया कि आप ﷺ के वालिदे माजिद हज़रते अब्दुल्लाह رضی الله تعالی عنه के इलावा अब्दुल मुत्तलिब के बारह बेटे थे जिन के नाम येह हैं :

(1) हारिस (2) अबू तालिब (3) जुबैर (4) हम्ज़ा (5) अब्बास (6) अबू लहब (7) गैदाक़ (8) मकूम (9) ज़रार (10) क़स्म (11) अब्दुल का'बा (12) जहल! 

࿐   इन में से सिर्फ़ हज़रते हम्ज़ा व हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنهما ने इस्लाम कबूल किया। हज़रते हम्ज़ा رضی الله تعالی عنه बहुत ही ताक़त वर और बहादुर थे। इन को हुजूरे अक्दस ﷺ ने असदुल्लाह व असदुर्रसूल (अल्लाह व रसूल का शेर) के मुअज्ज़ज़ व मुमताज़ लकब से सरफ़राज़ फ़रमाया। येह सि. 3 हि. में जंगे उहुद के अन्दर शहीद हो कर "सय्यिदुश्शुहदा" के लकब से मशहूर हुए और मदीनए मुनव्वरह से तीन मील दूर ख़ास जंगे उहुद के मैदान में आप का मज़ारे पुर अन्वार ज़ियारत गाहे आलमे इस्लाम है।

࿐  हज़रते अब्बास केرضی الله تعالی عنه फ़ज़ाइल में बहुत सी अहादीस वारिद हुई हैं। हुजूरे अक्दस ﷺ ने इन के और इन की औलाद के बारे में बहुत सी बिशारतें दीं और अच्छी अच्छी दुआएं भी फ़रमाई हैं। सि. 32 हि. या सि. 33 हि. में सत्तासी या अठ्ठासी बरस की पा कर वफ़ात पाई और जन्नतुल बक़ीअ में मदफ़ून हुए।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 700 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 528* ༺                            
              *❝ आप ﷺ की फूफियां ❞*
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࿐  आप ﷺ की फूफियों की तादाद छे है जिन के नाम येह हैं : (1) आतिका (2) उमैमा (3)उम्मे हकीम (4) बर्रह (5) सफ़िय्या (6) अरवी

࿐  इन में से तमाम मुअर्रिखीन का इत्तिफ़ाक़ है कि हज़रते सफ़िय्या رضی الله تعالی عنها ने इस्लाम कबूल किया। येह जुबैर बिन अल अव्वाम رضی الله تعالی عنه की वालिदा हैं। येह बहुत ही बहादुर और हौसला मन्द खातून थीं। गज्वए खन्दक़ में इन्हों ने एक मुसल्लह और हम्ला आवर यहूदी को तन्हा एक चौब से मार कर क़त्ल कर दिया था। जिस का तज़किरा गुज्वए खन्दक़ में गुज़र चुका और येह भी रिवायत है कि जंगे उहुद में भी जब मुसलमानों का लश्कर बिखर चुका था येह अकेली कुफ़्फ़ार पर नेज़ा चलाती रहीं। यहां तक कि हुज़ूर ﷺ को इन की ग़ैर मामूली शुजाअत पर इनतिहाई तअज्जुब हुवा और आप ने इन के फ़रज़न्द हज़रते जुबैर رضی الله تعالی عنه को मुखातब फ़रमा कर इरशाद फ़रमाया कि ज़रा इस औरत की बहादुरी और जां निसारी तो देखो। सि. 20 हि. में तिहत्तर बरस की उम्र पा कर मदीनए मुनव्वरह में वफ़ात पा कर जन्नतुल बक़ीअ मदफून हुई। 

࿐  हज़रते सफ़िय्या رضی الله تعالی عنها के इलावा अरवी व आतिका उमैमा के इस्लाम में मुअर्रिखीन का इख़्तिलाफ़ है। बाज़ों ने इन तीनों को मुसलमान तहरीर किया है और बाज़ों के नज़दीक इन का इस्लाम साबित नहीं।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 701 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 529* ༺                            
               *❝ खुद्दामे खास ❞*
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࿐  यूं तो तमाम ही सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم हुज़ूर शमए नुबुव्वत ﷺ के परवाने थे और इनतिहाई जां निसारी के साथ आप की खिदमत गुज़ारी के लिये सभी तन मन धन से हाज़िर रहते थे मगर फिर भी चन्द ऐसे खुश नसीब हैं जिन का शुमार हुज़ूर ताजदारे रिसालत ﷺ के खुसूसी खुद्दाम में है। इन खुश बख़्तों की मुक़द्दस फेहरिस्त में मुन्दरिजे जैल सहाबए किराम खास तौर पर काबिले ज़िक्र हैं :

࿐  *(1) हज़रते अनस बिन मालिक رضی الله تعالی عنه :-*  येह हुज़ूरे अक्दस ﷺ के सब से ज़ियादा मशहूर व मुमताज़ खादिम हैं। इन्हों ने दस बरस मुसल्सल हर सफ़र व हज़र में आप की वफादाराना ख़िदमत गुज़ारी का शरफ़ हासिल किया है । इन के लिये हुज़ूर ﷺ ने खास तौर पर येह दुआ फ़रमाई थी यानी ऐ अल्लाह ! इस के माल और अवलाद में कसरत अता फरमा और इस को जन्नत में दाखिल फ़रमा। 

࿐  हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه का बयान है कि आप ﷺ की इन तीन दुआओं में से दो दुआओं की मकबूलियत का जल्वा तो मैं ने देख लिया कि हर शख़्स का बाग़ साल में एक मरतबा फलता है और मेरा बाग़ साल में दो मरतबा फलता है। और फलों में मुश्क की खुश्बू आती है। और मेरी औलाद की तादाद एक सो छे है जिन में सत्तर लड़के और बाकी लड़कियां हैं। और मैं उम्मीद रखता हूं कि मैं तीसरी दुआ का जल्वा भी जरूर देखूंगा। यानी जन्नत में दाखिल हो जाऊंगा। इन्हों ने दो हज़ार दो सो छियासी हदीसें हुज़ूर ﷺ से रिवायत की हैं और हदीस में इन के शागिर्दों की तादाद बहुत ज़ियादा। इन की उम्र सो बरस से जाइद हुई। बसरा में सि. 91 हि. या सि. 92 हि. या सि. 93 हि. में वफात पाई। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 702 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 530* ༺                            
               *❝ खुद्दामे खास ❞*
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࿐  *(2) हज़रते रबीआ बिन का'ब अस्लमी رضی الله تعالی عنه :* येह हुज़ूर ﷺ के लिये वुज़ू कराने की खिदमत अन्जाम देते थे। या'नी पानी और मिस्वाक वग़ैरा का इनतिज़ाम करते थे। हुज़ूर ने इन को जन्नत की बिशारत दी थी। सि.63 हि. में वफात पाई। 

࿐  *(3) हज़रते ऐमन बिन उम्मे ऐमन رضی الله تعالی عنه :* हुज़ूर ﷺ की एक छोटी मशक जिस से आप इस्तिन्जा और वुज़ू फ़रमाया करते थे हमेशा आप ही की तहवील में रहा करती थी। येह जंगे हुनैन के दिन शहादत से सरफ़राज़ हुए। 

࿐  *(4) हज़रते अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद رضی الله تعالی عنه :* येह नालैने शरीफ़ैन और वुज़ू का बरतन और मस्नद व मिस्वाक अपने पास रखते थे। और सफ़र व हज़र में हमेशा येह ख़िदमत अन्जाम दिया करते थे। साठ बरस से ज़ियादा उम्र पा कर सि. 32 हि. या सि. 33 हि. में बाज़ का क़ौल है कि मदीने में और बा'ज़ के नज़दीक कूफ़ा में विसाल फ़रमाया।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 703📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 531* ༺                            
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࿐  *(5) हज़रते उक्बा बिन आमिर जुहनी رضی الله تعالی عنه :-* येह हुज़ूर ﷺ की सुवारी के खच्चर की लगाम थामे रहते थे। कुरआने मजीद और फ़राइज़ के उलूम में बहुत ही माहिर थे और आ'ला दरजे के फ़सीह खतीब और शो'ला बयान शाइर थे। हज़रते अमीरे मुआविया رضی الله تعالی عنه ने अपनी हुकूमत के दौर में इन को मिस्र का 'गवर्नर बना दिया था। सि. 58 हि. में मिस्र के अन्दर ही इन का विसाल हुवा।

࿐  *(6) हज़रते अस्लअ बिन शरीक رضی الله تعالی عنه :-*  येह हुज़ूरे अक्दस ﷺ के ऊंट पर कजावा बांधने की खिदमत अन्जाम दिया करते थे। 

࿐ *(7) हज़रते अबू जर गिफारी رضی الله تعالی عنه :-*  येह बहुत ही क़दीमुल इस्लाम सहाबी हैं इनतिहाई तारिकुद्दुन्या और आबिदो ज़ाहिद थे और 'दरबारे नुबुव्वत के बहुत ही खास खादिम थे। इन के फ़ज़ाइल में चन्द हदीसें भी वारिद हुई हैं। सि. 31 हि. में मदीनए मुनव्वरह से कुछ दूर "रबजा" नामी गाऊं में इन का विसाल हुवा और हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद رضی الله تعالی عنه ने इन की नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 703 📚*

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               *❝ खुद्दामे खास ❞*
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࿐  *(8) हज़रते मुहाजिर मौला उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنهما :-* येह उम्मुल मोमिनीन हज़रते उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها के आज़ाद कर्दा गुलाम थे शरफे सहाबिय्यत के साथ साथ पांच बरस तक हुज़ूरे अक्दस ﷺ की खिदमत का भी शरफ़ हासिल किया। बहुत ही बहादुर मुजाहिद थे। मिस्र को फतह करने वाली फ़ौज में शामिल थे। कुछ दिनों तक मिस्र में रहे। फिर "तहा" चले गए और वहां अपनी वफ़ात तक मुकीम रहे। 

࿐  *(9) हज़रते हुनैन मौला अब्बास رضی الله تعالی عنهما :-* येह पहले हुज़ूर ﷺ के गुलाम थे और दिन रात आप की खिदमत करते थे। फिर आप ﷺ ने इन्हें अपने चचा हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه को अता फरमा दिया और येह हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه के गुलाम हो गए। लेकिन चन्द ही दिनों के बाद हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه ने इन को इस लिये आज़ाद कर दिया ताकि येह दिन रात बारगाहे नुबुव्वत में हाज़िर रहें और ख़िदमत करते रहें। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 704 📚*

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*🌹✨  सीरते  मुस्तफा  صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم* 

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               *❝ खुद्दामे खास ❞*
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࿐  *(10) हज़रते नुऐम बिन रबीआ अस्लमी رضی الله تعالی عنه:-* येह भी खादिमाने बारगाहे रिसालत की फेहरिस्ते ख़ास में शुमार किये जाते हैं। 

࿐  *(11)  हज़रते अबुल हमरा رضی الله تعالی عنه:-* इन का नाम हिलाल बिन अल हारिस था। येह हुज़ूर ﷺ के आज़ाद कर्दा गुलाम और खाद खास हैं। वफाते नबवी के बा'द येह मदीने से "हिम्स" चले गए थे और वहीं इन की वफ़ात हुई!

࿐  *(12) हज़रते अबुस्सम्अ رضی الله تعالی عنه:-* हुज़ूरे अक्दस ﷺ के गुलाम थे फिर आप ने इन को आज़ाद फ़रमा दिया मगर येह दरबारे नुबुव्वत से जुदा नहीं हुए बल्कि हमेशा ख़िदमत गुज़ारी में मसरूफ़ रहे। हुज़ूर को अकसर येही गुस्ल कराया करते थे। इन का नाम “इयाद” था।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 705📚*

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              *❝  खुसूसी मुहाफिज़ीन  ❞*
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࿐  कुफ़्फ़ार चूंकि हुज़ूरे अक्दस ﷺ के जानी दुश्मन थे और हर वक़्त इस ताक में लगे रहते थे कि अगर इक ज़रा भी मौक़अ मिल जाए तो आप को शहीद कर डालें। बल्कि बारहा क़ातिलाना हम्ला भी कर चुके थे। इस लिये कुछ जां निसार सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم बारी बारी से रातों को आप की मुख्तलिफ़ ख़्वाब गाहों और क़ियाम गाहों का शमशीर बकफ़ हो कर पहरा दिया करते थे। येह सिल्सिला उस वक्त तक जारी रहा जब कि येह आयत नाज़िल हो गई कि : या'नी "अल्लाह तआला आप को लोगों से बचाएगा।" इस आयत के नुज़ूल के बाद आप ﷺ ने फ़रमाया कि अब पहरा देने की कोई ज़रूरत नहीं। अल्लाह तआला ने मुझ से वादा फ़रमा लिया है कि वोह मुझ को मेरे तमाम दुश्मनों से बचाएगा। 

࿐  इन जां निसार पहरा दारों में चन्द खुश नसीब सहाबए किराम खुसूसिय्यत के साथ क़ाबिले ज़िक्र हैं जिन के अस्माए गिरामी येह हैं : (1) हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ (2) हज़रते सा'द बिन मुआज़ अन्सारी (3) हज़रते मुहम्मद बिन मस्लमा (4) हज़रते जक़्वान बिन अब्दे कैस (5) हज़रते जुबैर बिन अल अव्वाम (6) हज़रते सा'द बिन अबी वक्कास (7) हज़रते अब्बाद बिन बिशर (8) हज़रते अबू अय्यूब अन्सारी (9) हज़रते बिलाल (10) हज़रते मुगीरा बिन शअबा! رضی الله تعالی عنهم اجمعين

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 706 📚*

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              *❝  कातिबीने वहय ❞*
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࿐  जो सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم कुरआन की नाज़िल होने वाली आयतों और दूसरी खास ख़ास तहरीरों को हुज़ूरे अक्दस ﷺ के हुक्म के मुताबिक़ लिखा करते थे उन मो'तमद कातिबों में ख़ास तौर पर मुन्दरिजए ज़ैल हज़रात काबिले ज़िक्र हैं : (1) हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ (2) हज़रते उमर फ़ारूक़ (3) हज़रते उसमाने गनी (4) हज़रते अली मुर्तज़ा (5) हज़रते तल्हा बिन उबैदुल्लाह (6) हज़रते सा'द बिन अबी वक्कास (7) हज़रते जुबैर बिन अल अव्वाम (8) हज़रते आमिर बिन फुहैरा (9) हज़रते साबित बिन कैस (10) हज़रते हन्ज़ला बिन रबीअ (11) हज़रते ज़ैद बिन साबित (12) हज़रते उबय्य बिन का'ब (13) हज़रते अमीरे मुआविया (14) हज़रते अबू सुफ़्यान। رضی الله تعالی عنهم اجمعين

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 706 📚*

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          *❝ दरबारे नुबुव्वत के शुअरा  ❞*
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࿐  यूं तो बहुत से सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم हुज़ूरे अक्दस ﷺ की मदहो सना में कसाइद लिखने की सआदत से सरफ़राज़ हुए मगर दरबारे नबवी के मख़्सूस शुअराए किराम तीन हैं जो ना'त गोई के साथ साथ कुफ़्फ़ार के शाइराना हम्लों का अपने कुसाइद के ज़रीए दन्दान शिकन जवाब भी दिया करते थे।

࿐  (1) हज़रते का'ब बिन मालिक अन्सारी सुलमी رضی الله تعالی عنه जो जंगे तबूक में शरीक न होने की वजह से मा'तूब हुए मगर फिर इन की तौबा की मक्बूलिय्यत कुरआने मजीद में नाज़िल हुई। इन का बयान है कि हम लोगों से हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि तुम लोग मुशरिकीन की हिजू करो क्यूं कि मोमिन अपनी जान और माल से जिहाद करता रहता है और तुम्हारे अश्आर गोया कुफ़्फ़ार के हक़ में तीरों की मार के बराबर हैं। हज़रते अली رضی الله تعالی عنه के दौरे खिलाफ़त या हज़रते अमीरे मुआविया رضی الله تعالی عنه की सल्तनत के दौर में इन की वफ़ात हुई। 

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 707 📚*

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                 ❘༻ *पोस्ट नम्बर :- 537* ༺                            
          *❝ दरबारे नुबुव्वत के शुअरा  ❞*
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࿐  (2) हज़रते अब्दुल्लाह बिन रवाहा अन्सारी खज़रजी رضی الله تعالی عنه इन के फ़ज़ाइल व मनाकिब में चन्द अहादीस भी हैं। हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने इन को "सय्यिदुश्शुअरा" का लकब अता फ़रमाया था। येह जंगे मौता में शहादत से सरफ़राज़ हुए। 

࿐  (3) हज़रते हस्सान बिन साबित बिन मुन्ज़िर बिन अम्र अन्सारी खज़रजी رضی الله تعالی عنه येह दरबारे रिसालत के शुअराए किराम में सब से ज़ियादा मशहूर हैं। हुज़ूर ﷺ ने इन के हक़ में दुआ फ़रमाई कि : यानी या अल्लाह ! हज़रते जिब्रील अलैहिस्सलाम के ज़रीए इन की मदद फ़रमा। और येह भी इरशाद फ़रमाया कि जब तक येह मेरी तरफ़ से कुफ़्फ़ारे मक्का को अपने अश्आर के ज़रीए जवाब देते रहते हैं उस वक्त तक हज़रते जिब्रील अलैहिस्सलाम इन के साथ रहा करते हैं। एक सो बीस बरस की उम्र पा कर सि. 54 हि. में वफात पाई। साठ बरस की उम्र ज़मानए जाहिलिय्यत में गुज़ारी और साठ बरस की उम्र ख़िदमते इस्लाम में सर्फ़ की। येह एक तारीख़ी लतीफ़ा है कि इन की और इन के वालिद “साबित” और इनके दादा "मुन्ज़िर" और नगर दादा "हिराम" सब की उर्में एक सो बीस बरस हुईं!

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 708 📚*

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              *❝  खुसूसी मुअज्ज़िनीन  ❞*
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࿐ हुज़ूरे अक्दस ﷺ के खुसूसी मुअज्जिनों की ता'दाद चार है :

(1) हज़रते बिलाल बिन रबाह رضی الله تعالی عنه

(2) हज़रते अब्दुल्लाह बिन उम्मे मक्तूम (नाबीना) رضی الله تعالی عنه 

येह दोनों मदीनए मुनव्वरह में मस्जिदे नबवी के मुअज्ज़िन हैं।

(3) हज़रते सा'द बिन आइज़ رضی الله تعالی عنه जो "सादे क़रज़" के लक़ब से मश्हूर हैं। येह मस्जिदे कुबा के मुअज्ज़िन हैं।

(4) हज़रते अबू महज़ूरा رضی الله تعالی عنه येह मक्कए मुकर्रमा की मस्जिदे हराम में अज़ान पढ़ा करते थे।

*📬 क़िताब :- सीरते मुस्तफा ﷺ सफ़ह- 708 📚*

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Aqaaid Course (Part-2)

 Aqaaid Course (Part-318) Milad E Mustafa ﷺ Aur Hamare Aqeede : Milad Kise Kahte Hain..? Milad Bana Hai Wiladat Se, Wiladat Kahte Hain Pai...