सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 277)
फ़त्ह मक्का #01 :
रमज़ान सि. 8 हि. मुताबिक़ जनवरी सि. 630 ई. : रमज़ान सि. 8 हि तारीखे नुबुव्वत का निहायत ही अज़ीमुश्शान उन्वान है और सीरते मुक़द्दसा का येह वोह सुनहरा बाब है कि जिस आबो ताब से हर मोमिन का क़ल्ब क़ियामत तक मुसर्रतों का आफ़ताब बना रहेगा क्यूं कि ताजदारे दो आलम ﷺ ने इस तारीख़ से आठ साल क़ब्ल इन्तिहाई रन्जीदगी के आलम में अपने यारे गार साथ ले कर रात की तारीकी में मक्का से हिजरत फ़रमा कर अपने वतने अजीज को खैरबाद कह दिया था और मक्का से निकलते वक़्त खुदा के मुक़द्दस घर खानए काबा पर एक हसरत भरी निगाह डाल कर येह फ़रमाते हुए मदीना रवाना हुए थे कि “ऐ मक्का ! खुदा की क़सम ! तू मेरी निगाहे महब्बत में तमाम दुन्या के शहरों से ज़ियादा प्यारा है अगर मेरी क़ौम मुझे न निकालती तो मैं हरगिज़ तुझे न छोड़ता।"
लेकिन आठ बरस के बाद येही वोह मुसर्रत खैज़ तारीख है कि आप ﷺ ने एक फ़ातेहे आज़म की शानो शौकत के साथ इसी शहरे मक्का में नुज़ूले इज्लाल फ़रमाया और काबतुल्लाह में दाखिल हो कर अपने सज्दों के जमाल व जलाल से खुदा के मुक़द्दस घर की अज़मत को सरफ़राज़ फ़रमाया।
लेकिन नाज़िरीन के ज़ेह्नों में येह सुवाल सर उठाता होगा कि जब कि हुदैबिया के सुल्ह नामा में येह तहरीर किया जा चुका था कि दस बरस तक फ़रीकैन के माबैन कोई जंग न होगी तो फिर आखिर वोह कौन सा ऐसा सबब नुमूदार हो गया कि सुल्ह नामा के फ़क़त दो साल ही बाद ताजदारे दो आलम ﷺ को अहले मक्का के सामने हथियार उठाने की ज़रूरत पेश आ गई और आप एक अज़ीम लश्कर के साथ फातेहाना हैषिय्यत से मक्का में दाखिल हुए। तो इस सुवाल का जवाब येह है कि इस का सबब कुफ्फ़ारे मक्का की “अहद शिकनी” और हुदैबिया के सुल्ह नामा से ग़द्दारी है।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 411*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 278)
फ़त्ह मक्का #02 :
कुफ्फारे कुरैश की अहद शिकनी : सुल्हे हुदैबिया के बयान में आप पढ़ चुके कि हुदैबिया के सुल्ह नामे में एक येह शर्त भी दर्ज थी कि क़बाइले अरब में से जो क़बीला कुरैश के साथ मुआहदा करना चाहे वोह कुरैश के साथ मुआहदा करे और जो हज़रत मुहम्मद ﷺ से मुआहदा करना चाहे वोह हज़रत मुहम्मद ﷺ के साथ मुआहदा करे। चुनान्चे इसी बिना पर क़बीलए बनी बक्र ने कुरैश से बाहमी इमदाद का मुआहदा कर लिया और क़बीलए बनी खज़ाआ ने रसूलुल्लाह ﷺ से इमदादे बाहमी का मुआहदा कर लिया। येह दोनों क़बीले मक्का के क़रीब ही में आबाद थे लेकिन इन दोनों में अर्सए दराज से सख्त अदावत और मुखालफत चली आ रही थी।
एक मुद्दत तो कुफ्फारे कुरैश और दूसरे क़बाइले अरब के कुफ्फार मुसलमानों से जंग करने में अपना सारा ज़ोर सर्फ कर रहे थे लेकिन सुल्हे हुदैबिया की ब दौलत जब मुसलमानों की जंग से कुफ्फ़ारे कुरैश और दूसरे क़बाइले कुफ्फार को इत्मीनान मिला तो क़बीलए बनी बक्र ने क़बीलए खजाआ से अपनी पुरानी अदावत का इन्तिकाम लेना चाहा और अपने हलीफ़ कुफ्फ़ारे कुरैश से मिल कर बिल्कुल अचानक तौर पर क़बीलए बनी खजाआ पर हम्ला कर दिया और इस हम्ले में कुफ्फ़ारे कुरैश के तमाम रूअसा या'नी इक्रमा बिन अबी जहल, सफ्वान बिन उमय्या व सुहैल बिन अम्र वगैरा बड़े बड़े सरदारों ने अलानिया बनी खजाआ को क़त्ल किया।
बेचारे बनी खजाआ इस ख़ौफ़नाक जालिमाना हम्ले की ताब न ला सके और अपनी जान बचाने के लिये हरमे काबा में पनाह लेने के लिये भागे। बनी बक्र के अवाम ने तो हरम में तलवार चलाने से हाथ रोक लिया और हरमे इलाही का एहतिराम किया। लेकिन बनी बक्र का सरदार "नौफ़िल" इस क़दर जोशे इन्तिकाम में आपे से बाहर हो चुका था कि वोह हरम में भी बनी ख़ज़ाओ को निहायत बेदर्दी के साथ कत्ल करता रहा और चिल्ला चिल्ला कर अपनी क़ौम को ललकारता रहा कि फिर येह मौक़अ कभी हाथ नहीं आ सकता। चुनान्चे उन दरिन्दा सिफत खूंखार इन्सानों ने हरमे इलाही के एहतिराम को भी ख़ाक में मिला दिया और हरमे काबा की हुदूद में निहायत ही ज़ालिमाना तौर पर बनी खजाआ का ख़ून बहाया और कुफ्फ़ारे कुरैश ने भी इस क़त्लो गरत और कश्तो वन में खुब खुब हिस्सा लिया।
जाहिर है कि कुरैश ने अपनी इस हरकत से हुदैबिया के मुआहदे को अमली तौर पर तोड़ डाला। क्यूं कि बनी ख़ज़ाआ़ रसूलुल्लाह ﷺ से मुआहदा कर के आप के हलीफ़ बन चुके थे, इस लिये बनी खजाआ पर हम्ला करना, येह रसूलुल्लाह ﷺ पर हम्ला करने के बराबर था। इस हम्ले में बनी खजाआ के तेईस (23) आदमी क़त्ल हो गए। इस हादिषे के बाद क़बीलए बनी खजाआ के सरदार अम्र बिन सालिम खज़ाई चालीस आदमियों का वफद ले कर फ़रियाद करने और इमदाद तलब करने के लिये मदीना बारगाहे रिसालत में पहुंचे और येही फ़त्ह मक्का की तम्हीद हुई।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 412*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 279)
*फ़त्ह मक्का #03 :*
ताजदारे दो आलम ﷺ से इस्तिआनत : हज़रते बीबी मैमूना رضي الله عنها का बयान है कि एक रात हुज़ूरे अकरम ﷺ काशानए नुबुव्वत में वुज़ू फ़रमा रहे थे कि एक दम बिल्कुल ना गहां आप ने बुलन्द आवाज़ से तीन मरतबा येह फ़रमाया कि लब्बैक। लब्बैक। लब्बैक। (मैं तुम्हारे लिये बार बार हाज़िर हूं।) फिर तीन मरतबा बुलन्द आवाज़ से आप ने येह इर्शाद फ़रमाया कि "तुम्हें मदद मिल गई" जब आप वुज़ू खाने से बाहर निकले तो मैं ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ आप तन्हाई में किस से गुफ्तगू फ़रमा रहे थे ? तो इर्शाद फ़रमाया कि ऐ मैमूना ! गज़ब हो गया। मेरे हलीफ़ बनी खजाआ पर बनी बक्र और कुफ्फ़ारे कुरैश ने हमला कर दिया है और इस मुसीबत व बे कसी के वक़्त में बनी खजाआ ने वहां से चिल्ला चिल्ला कर मुझे मदद के लिये पुकारा है और मुझ से मदद तलब की है और मैं ने उन की पुकार सुन कर उन की ढारस बंधाने के लिये उन को जवाब दिया है।
हज़रते बीबी मैमूना कहती हैं कि इस वाकिए के तीसरे दिन जब हुज़ूर ﷺ नमाज़े फज्र के लिये मस्जिद में तशरीफ़ ले गए और नमाज़ से फ़ारिग हुए तो दफ्अतन बनी खजाआ के मज़्लूमीन ने रज्ज के इन अश्आ़र को बुलन्द आवाज़ से पढ़ना शुरू कर दिया और हुज़ूरे अकरम ﷺ और असहाबे किराम ने उन की इस पुरदर्द और रिक्क़त अंगेज़ फ़रियाद को बगौर सुना। आप भी इस रज्ज़ के चन्द अशआर को मुलाहज़ा फ़रमाइये :
_ऐ खुदा ! मैं मुहम्मद को वोह मुआहदा याद दिलाता हूं जो हमारे और इन के बाप दादाओं के दरमियान क़दीम ज़माने से हो चुका है।_
_तो खुदा आप को सीधी राह पर चलाए। आप हमारी भरपूर मदद कीजिये और खुदा के बन्दों को बुलाइये। वोह सब इमदाद के लिये आएंगे।_
_उन मदद करने वालों में रसूलुल्लाह भी गज़ब की हालत में हों कि अगर उन्हें जिल्लत का दाग लगे तो उन का तेवर बदल जाएं।_
_उन लोगों (बनी बक्र व कुरैश) ने “मकामे वतीर" में हम सोते हुओं पर शबख़ून मारा और रुकूअ व सज्दे की हालत में भी हम लोगों को बे दर्दी के साथ क़त्ल कर डाला।_
_यक़ीनन कुरैश ने आप से वादा खिलाफी की है और आप से मजबूत मुआहदा कर के तोड़ डाला है।_
इन अशआर को सुन कर हुज़ूर ﷺ ने उन लोगों को तसल्ली दी और फ़रमाया कि मत घबराओ मैं तुम्हारी इमदाद के लिये तय्यार हूं।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 414*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 280)
फ़त्ह मक्का #04
हुज़ूर ﷺ की अम्न पसन्दी :
इस के बाद हुज़ूर ﷺ ने कुरैश के पास क़ासिद भेजा और तीन शर्तें पेश फ़रमाईं कि इन में से कोई एक शर्त कुरैश मंजूर कर लें : (1) बनी खजाआ के मक्तूलों का खून बहा दिया जाए। (2) कुरैश क़बीलए बनी बक्र की हिमायत से अलग हो जाएं। (3) एलान कर दिया जाए कि हुदैबिया का मुआहदा टूट गया।
जब हुज़ूर ﷺ के क़ासिद ने इन शर्तों को कुरैश के सामने रखा तो करता बिन अब्दे उमर ने कुरैश का नुमाइन्दा बन कर जवाब दिया कि "न हम मक्तूलों के खून का मुआवजा देंगे न अपने हलीफ कबीलए बनी बक्र की हिमायत छोडेंगे। हां तीसरी शर्त हमें मंजूर है और हम ए'लान करते हैं कि हुदैबिया का मुआहदा टूट गया।"
लेकिन क़ासिद के चले जाने के बाद कुरैश को अपने इस जवाब पर नदामत हुई। चुनान्चे चन्द रूअसाए कुरैश अबू सुफ्यान के पास गए और येह कहा कि अगर येह मुआमला न सुलझा तो फिर समझ लो कि यक़ीनन मुहम्मद (ﷺ) हम पर हम्ला कर देंगे। अबू सुफ्यान ने कहा कि मेरी बीवी हिन्द बिन्ते उत्बा ने एक ख़्वाब देखा है कि मक़ामे "हजून" से मकामे “खन्दमा” तक एक ख़ून की नहर बहती हुई आई है, फिर ना गहां वोह ख़ून गाइब हो गया। कुरैश ने इस ख़्वाब को बहुत ही मनहूस समझा और ख़ौफ़ व दहशत से सहम गए और अबू सुफ्यान पर बहुत ज़यादा दबाव डाला कि वोह फ़ौरन मदीने जा कर मुआहदए हुदैबिया की तजदीद करे।
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 281)
फ़त्ह मक्का #05 :
अबू सुफ्यान की कोशिश #01 :
इस के बाद बहुत तेज़ी के साथ अबू सुफ्यान मदीने गया और पहले अपनी लड़की हज़रते उम्मुल मुअमिनीन बीबी उम्मे हबीबा رضي الله عنها के मकान पर पहुंचा और बिस्तर पर बैठना ही चाहता था कि हज़रते बीबी उम्मे हबीबा ने जल्दी से बिस्तर उठा लिया और अबू सुफ्यान ने हैरान हो कर पूछा कि बेटी तुम ने बिस्तर क्यूं उठा लिया ? क्या बिस्तर को मेरे काबिल नहीं समझा या मुझ को बिस्तर के क़ाबिल नहीं समझा ? उम्मुल मुअमिनीन ने जवाब दिया कि ये रसूलुल्लाह ﷺ का बिस्तर है और तुम मुशरिक और नजिस हो। इस लिये मैं ने येह गवारा नहीं किया कि तुम रसूलुल्लाह ﷺ के बिस्तर पर बैठो। येह सुन कर अबू सुफ्यान के दिल पर चोट लगी और वोह रन्जीदा हो कर वहां से चला आया और रसूलुल्लाह ﷺ की खिदमत में हाज़िर हो कर अपना मक्सद बयान किया। आप ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर अबू सुफ्यान हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ व हज़रते उमर व हज़रते अली رضي الله عنه के पास गया। इन सब हज़रात ने जवाब दिया कि हम कुछ नहीं कर सकते।
हज़रते अली के पास जब अबू सुफ्यान पहुंचा तो वहां हज़रते बीबी फ़ातिमा और हज़रते इमामे हसन भी थे। अबू सुफ्यान ने बड़ी लजाजत से कहा कि ऐ अली ! तुम कौम में बहुत ही रहम दिल हो हम एक मक्सद ले कर यहां आए हैं क्या हम यूं ही नाकाम चले जाएं। हम सिर्फ़ येही चाहते हैं कि तुम मुहम्मद (ﷺ) से हमारी सिफारिश कर दो। हज़रते अली ने फ़रमाया कि ऐ अबू सुफ्यान ! हम लोगों की येह मजाल नहीं है कि हम हुज़ूर ﷺ के इरादे और उन की मरज़ी में कोई मुदाख़लत कर सकें।
हर तरफ़ से मायूस हो कर अबू सुफ्यान ने हज़रते फ़ातिमा ज़हरा से कहा कि ऐ फ़ातिमा ! येह तुम्हारा पांच बरस का बच्चा (इमामे हसन) एक मरतबा अपनी ज़बान से इतना कह दे कि मैं ने दोनों फरीक में सुल्ह करा दी तो आज से येह बच्चा अरब का सरदार कह कर पुकारा जाएगा। हज़रते बीबी फ़ातिमा ने जवाब दिया कि बच्चों को इन मुआमलात में क्या दख़्ल ? बिल आखिर अबू सुफ्यान ने कहा कि ऐ अली ! मुआमला बहुत कठिन नज़र आता है कोई तदबीर बताओ ? हज़रते अली ने फ़रमाया कि मैं इस सिल्सिले में तुम को कोई मुफीद राय तो नहीं दे सकता, लेकिन तुम बनी किनाना सरदार हो तुम खुद ही लोगों के सामने ए'लान कर दो कि मैं ने हुदैबिया के मुआहदे की तजदीद कर दी अबू सुफ्यान ने कहा कि क्या मेरा येह ए'लान कुछ मुफीद हो सकता है ? हज़रते अली ने फ़रमाया कि यक तरफ़ा एलान जाहिर है कि कुछ मुफ़ीद नहीं हो सकता। मगर अब तुम्हारे पास इस के सिवा और चारए कार ही क्या है ?
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 282)
फ़त्ह मक्का #06 :
अबू सुफ्यान की कोशिश #2
अबू सुफ्यान हज़रते अली رضي الله عنه के पास से मस्जिदे नबवी में आया और बुलन्द आवाज़ से मस्जिद में ए'लान कर दिया कि मैं ने मुआहदए हुदैबिया की तजदीद कर दी मगर मुसलमानों में से किसी ने भी कोई जवाब नहीं दिया। अबू सुफ्यान येह ए'लान कर के मक्का रवाना हो गया जब मक्का पहुंचा तो कुरैश ने पूछा कि मदीने में क्या हुवा ? अबू सुफ्यान ने सारी दास्तान बयान कर दी। तो कुरैश ने सुवाल किया कि जब तुम ने अपनी तरफ से मुआहदए हुदैबिया की तजदीद का एलान किया तो महम्मद (ﷺ) ने इस को कबुल कर लिया ? अबू सुफ्यान ने कहा कि "नहीं" येह सुन कर कुरैश ने कहा कि ये तो कुछ भी न हुवा। येह न तो सुल्ह है कि हम इत्मीनान से बैठें न येह जंग है कि लड़ाई का सामान किया जाए।
इस के बाद हुज़ूर ﷺ ने लोगों को जंग की तय्यारी का हुक्म दे दिया और हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها से भी फ़रमा दिया कि जंग के हथियार दुरुस्त करें और अपने हलीफ़ क़बाइल को भी जंगी तय्यारियों के लिये हुक्म नामा भेज दिया। मगर किसी को हुज़ूर ﷺ ने येह नहीं बताया कि किस से जंग का इरादा है ? यहां तक कि हज़रते अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنها से भी आप ने कुछ नहीं फ़रमाया।
चुनान्चे हज़रते अबू बक्र सिद्दीक हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها के पास आए और देखा कि वोह जंगी हथियारों को निकाल रही हैं तो आप ने दरयाफ्त किया कि क्या हुज़ूर ﷺ ने हुक्म दिया है ? अर्ज किया : “जी हां” फिर आप ने पूछा कि क्या तुम्हें कुछ मालूम है कि कहां का इरादा है ? हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها ने कहा कि “वल्लाह ! मुझे येह मा'लूम नहीं।" ग़रज़ इन्तिहाई ख़ामोशी और राज़दारी के साथ हुज़ूर ﷺ ने जंग की तय्यारी फ़रमाई और मक्सद येह था कि अहले मक्का को ख़बर न होने पाए और अचानक उन पर हमला कर दिया जाए।
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 283)
फ़त्ह मक्का #07
हज़रते हातिब बिन अबी बल्तआ का खत :
हज़रते हातिब बिन अबी बल्तआ رضي الله عنه जो एक मुअज़्ज़ज़ सहाबी थे उन्हों ने कुरैश को एक ख़त इस मज़मून का लिख दिया कि रसूलुल्लाह ﷺ जंग की तय्यारियां कर रहे हैं, लिहाज़ा तुम लोग होशियार हो जाओ। इस ख़त को उन्हों ने एक औरत के जरीए मक्का भेजा। अल्लाह तआला ने अपने हबीब ﷺ को इल्मे गैब अता फरमाया था। आप ने अपने इस इल्मे गैब की बदौलत से येह जान लिया कि हज़रते हातिब बिन अबी बल्तआ ने क्या कारवाई की है। चुनान्चे आप ने हज़रते अली व हज़रते जुबैर व हज़रते मिक्दाद رضي الله عنه को फ़ौरन रवाना फ़रमाया कि तुम लोग “रौज़ए खाख" में चले जाओ। वहां एक औरत है और उस के पास एक खत है। उस से वोह ख़त छीन कर मेरे पास लाओ।
चुनान्चे येह तीनो असहाबे किबार رضی الله تعالی عنهم तेज रफ्तार घोड़ों पर सुवार हो कर “रौज़ए खाख" में पहुंचे और औरत को पा लिया। जब उस से ख़त तलब किया तो उस ने कहा कि मेरे पास कोई ख़त नहीं है। हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने फ़रमाया कि खुदा की क़सम ! रसूलुल्लाह ﷺ कभी कोई झूटी बात नहीं कह सकते, न हम लोग झूटे हैं लिहाज़ा तू खत निकाल कर हमें दे दे वरना हम तुझ को नंगी कर के तलाशी लेंगे। जब औरत मजबूर हो गई तो उस ने अपने बालों के जूड़े में से वोह खत निकाल कर दे दिया।
जब येह लोग ख़त ले कर बारगाहे रिसालत में पहुंचे तो आप ने हज़रते हातिब बिन अबी बल्तआ को बुलाया और फ़रमाया कि ऐ हातिब ! यह तुम ने क्या किया ? उन्हों ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ ! आप मेरे बारे में जल्दी न फ़रमाएं न मैं ने अपना दीन बदला है न मुरतद हुवा हूं मेरे इस ख़त के लिखने की वजह सिर्फ येह है कि मक्का में मेरे बीवी बच्चे हैं। मगर मक्का में मेरा कोई रिश्तेदार नहीं है जो मेरे बीवी बच्चों की ख़बर गीरी व निगह दाश्त करे। मेरे सिवा दूसरे तमाम मुहाजिरीन के अज़ीज़ो अकारिब मक्का में मौजूद हैं जो इन के अहलो झ्याल की देखभाल करते रहते हैं। इस लिये मैं ने येह ख़त लिख कर कुरैश पर एक अपना एहसान रख दिया है ताकि मैं उन की हमदर्दी हासिल कर लूं और वोह मेरे अहलो इयाल के साथ कोई बुरा सुलूक न करें। या रसूलल्लाह ﷺ! मेरा ईमान है कि अल्लाह तआला ज़रूर उन काफ़िरों को शिकस्त देगा और मेरे इस ख़त से कुफ्फ़ार को हरगिज़ हरगिज़ कोई फ़ाएदा नहीं हो सकता।
हुज़ूर ﷺ ने हज़रते हातिब رضی الله تعالی عنه को सुन कर उन के उज़्र को क़बूल फ़रमा लिया मगर हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه इस ख़त को देख कर इस क़दर तैश में आ गए कि आपे से बाहर हो गए और अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! मुझे इजाज़त दीजिये कि मैं इस मुनाफ़िक की गरदन उड़ा दूं। दूसरे सहाबए किराम भी गैजो ग़ज़ब में भर गए। लेकिन रहमते आलम ﷺ की जबीने रहमत पर इक जरा शिकन भी नहीं आई और आप ने हज़रते उमर से इर्शाद फ़रमाया कि ऐ उमर ! हातिब अहले बद्र में से है और क्या तुम्हें ख़बर नहीं कि अल्लाह तआला ने अहले बद्र को मुखातब कर के फ़रमा दिया है कि "तुम जो चाहो करो तुम से कोई मुवाखज़ा नहीं" येह सुन कर हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه की आंखें नम हो गई और वोह येह कह कर बिल्कुल ख़ामोशी हो गए कि "अल्लाह और उस के रसूल को हम सब से ज़ियादा इल्म है" इसी मौक़अ पर क़ुरआन की येह आयत नाज़िल हुई कि : ऐ ईमान वालो ! मेरे और अपने दुश्मन काफिरों को दोस्त न बनाओ।
बहर हाल हुज़ूर ﷺ ने हज़रते हातिब बिन अबी बल्तआ को मुआफ फ़रमा दिया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 419*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 284)
फ़त्ह मक्का #08
मक्के पर हम्ला : गरज़ 10 रमज़ान सि. 8 हि. को रसूले अकरम ﷺ मदीने से दस हज़ार का लश्करे पुर अन्वार साथ ले कर मक्का की तरफ रवाना हुए। बा'ज़ रिवायतों में है कि फ़तहे मक्का में आप के साथ बारह हज़ार का लश्कर था इन दोनों रिवायतों में कोई तआरुज नहीं। हो सकता है कि मदीने से रवानगी के वक़्त दस हज़ार का लश्कर रहा। फिर रास्ते में बा'ज़ क़बाइल इस लश्कर में शामिल हो गए हों तो मक्का पहुंच कर इस लश्कर की तादाद बारह हज़ार हो गई हो।
बहर हाल मदीने से चलते वक़्त हुज़ूर ﷺ और तमाम सहाबए किबार رضی الله تعالی عنهم रोज़ादार थे जब आप "मकामे कदीद" में पहुंचे तो पानी मांगा और अपनी सुवारी पर बैठे हुए पूरे लश्कर को दिखा कर आप ने दिन में पानी नोश फ़रमाया और सब को रोज़ा छोड़ देने का हुक्म दिया। चुनान्चे आप ﷺ और आप के असहाब ने सफ़र और जिहाद में होने की वजह से रोज़ा रखना मौकूफ़ कर दिया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 421*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 285)
फ़त्ह मक्का #09
हज़रते अब्बास वगैरा से मुलाकात : जब हुज़ूर ﷺ मकामे "जुहफा" में पहुंचे तो वहां हुज़ूर ﷺ के चचा हज़रते अब्बास رضی الله تعالیٰ عنه अपने अहलो इयाल के साथ ख़िदमते अक्दस में हाज़िर हुए। येह मुसलमान हो कर आए थे बल्कि इस से बहुत पहले मुसलमान हो चुके थे और हुज़ूर ﷺ की मरज़ी से मक्के में मुक़ीम थे और हुज्जाज को ज़मज़म पिलाने के मुअज़्ज़ज़ ओहदे पर फ़ाइज़ थे और आप के साथ में हुज़ूर ﷺ के चचा हारिष बिन अब्दुल मुत्तलिब के फ़रज़न्द जिन का नाम अबू सुफ्यान था और हुज़ूर ﷺ के फूफीज़ाद भाई अब्दुल्लाह बिन अबी उमय्या जो उम्मुल मुअमिनीन हज़रते बीबी उम्मे सलमह के सोतेले भाई भी थे बारगाहे अक्दस में हाज़िर हुए इन दोनों साहिबों की हाज़िरी का हाल जब हुज़ूर ﷺ को मालूम हुवा तो आप ने उन दोनों साहिबों की मुलाकात से इन्कार फ़रमा दिया। क्यूं कि इन दोनों ने हुज़ूर ﷺ को बहुत ज़ियादा ईज़ाएं पहुंचाई थीं।
खुसूसन अबू सुफ्यान बिन अल हारिष आप के चचाज़ाद भाई जो एलाने नुबुव्वत से पहले आप के इन्तिहाई जां निषारों में से थे मगर एलाने नुबुव्वत के बाद इन्हों ने अपने क़सीदों में इतनी शर्मनाक और बेहूदा हिजू हुज़ूर ﷺ की कर डाली थी कि आप का दिल जख्मी हो गया था। इस लिये आप इन दोनों से इन्तिहाई नाराज़ व बेज़ार थे मगर हज़रते बीबी उम्मे सलमह ने इन दोनों का कुसूर मुआफ़ करने के लिये बहुत ही पुरज़ोर सिफारिश की और अबू सुफ्यान बिन अल हारिष ने येह कह दिया कि अगर रसूलुल्लाह ﷺ ने मेरा कुसूर न मुआफ़ फ़रमाया तो मैं अपने छोटे छोटे बच्चों को ले कर अरब के रेगिस्तान में चला जाऊंगा ताकि वहां बिगैर दाना पानी के भूक प्यास से तड़प तड़प कर मैं और मेरे सब बच्चे मर कर फ़ना हो जाएं।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 422*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 286)
फ़त्ह मक्का #09
हज़रते अब्बास वगैरा से मुलाकात : हज़रते उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها ने बारगाहे रिसालत में आबदीदा हो कर अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ ! क्या आप के चचा का बेटा और आप की फूफी का बेटा तमाम इन्सानों से ज़ियादा बद नसीब रहेगा ? क्या इन दोनों को आप की रहमत से कोई हिस्सा नहीं मिलेगा ? जान छिड़कने वाली बीवी के इन दर्द अंगेज़ कलिमात से रहमतुल्लिल आलमीन के रहमत भरे दिल में रहमो करम और अफ्वो दर गुज़र के समुन्दर मोजें मारने लगे। फिर हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने इन दोनों को येह मश्वरा दिया कि तुम दोनों अचानक बारगाहे रिसालत में सामने जा कर खड़े हो जाओ और जिस तरह हज़रते यूसुफ़ भाइयों ने कहा था वोही तुम दोनों भी कहो कि : कि यक़ीनन आप को अल्लाह तआला ने हम पर फजीलत दी है और हम बिला शुबा खतावार हैं।
चुनान्चे उन दोनों साहिबों ने दरबारे रिसालत में ना गहां हाज़िर हो कर येही कहा। एक दम रहमते आलम ﷺ की जबीने रहमत पर रहमो करम के हज़ारों सितारे चमकने लगे और आप ने उन के जवाब बि ऐनिही वोही जुम्ला अपनी ज़बाने रहमत निशान से इर्शाद फ़रमाया जो हज़रते यूसुफ ने अपने भाइयों के जवाब में फ़रमाया था कि :_आज तुम से कोई मुवाख़ज़ा नहीं है अल्लाह तुम्हें बख्श दे। वोह अर-हमर्राहिमीन है।_
जब कुसूर मुआफ़ हो गया तो अबू सुफ्यान बिन अल हारिष ने ताजदारे आलम ﷺ की मद्ह में अशआर लिखे और ज़मानए जाहिलिय्यत के दौर में जो कुछ आप की हिजू में लिखा था उस की मा'ज़िरत की और इस के बाद उम्र भर निहायत सच्चे और षाबित क़दम मुसलमान रहे मगर हया की वजह से रसूलुल्लाह ﷺ के सामने कभी सर नहीं उठाते थे और हुज़ूर ﷺ भी इन के साथ बहुत ज़ियादा महब्बत रखते थे और फ़रमाया करते थे कि मुझे उम्मीद है कि अबू सुफ्यान बिन अल हारिष मेरे चचा हज़रते हम्ज़ा رضی الله تعالی عنه के काइम मकाम षाबित होंगे।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 423*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 287)
फ़त्ह मक्का #10
*मीलों तक आग ही आग :-* मक्के से एक मन्ज़िल के फ़ासिले पर "मुर्रुज्ज़हरान" में पहुंच कर इस्लामी लश्कर ने पड़ाव डाला और हुज़ूर ﷺ ने फ़ौज को हुक्म दिया कि हर मुजाहिद अपना अलग अलग चूल्हा जलाए। दस हज़ार मुजाहिदीन ने जो अलग अलग चूल्हे जलाए तो "मुरुज्ज़हरान" के पूरे मैदान में मीलों तक आग ही आग नज़र आने लगी।
*कुरैश के जासूस :* गो कुरैश को मालूम ही हो चुका था कि मदीने से फ़ौजें आ रही हैं। मगर सूरते हाल की तहक़ीक़ के लिये कुरैश ने अबू सुफ्यान बिन हर्ब, हकीम बिन हिज़ाम व बदील बिन वरका को अपना जासूस बना कर भेजा। हज़रते अब्बास رضی اللہ تعالیٰ عنہ बेहद फ़िक्र मन्द हो कर कुरैश के अन्जाम पर अफ़सोस कर रहे थे। वोह येह सोचते थे कि अगर रसूलुल्लाह ﷺ इतने अज़ीम लश्कर के साथ मक्का में फ़ातेहाना दाखिल हुए तो आज कुरैश का ख़ातिमा हो जाएगा। चुनान्चे वोह रात के वक्त रसूलुल्लाह ﷺ के सफेद खच्चर पर सुवार हो कर इस इरादे से मक्का चले कि कुरैश को इस खतरे से आगाह कर के उन्हें आमादा करें कि चल कर हुज़ूर ﷺ से मुआफ़ी मांग कर सुल्ह कर ले वरना तुम्हारी खैर नहीं।
मगर बुखारी की रिवायत में है कि कुरैश को येह ख़बर तो मिल गई थी कि रसूलुल्लाह ﷺ मदीने से रवाना हो गए हैं मगर उन्हें येह पता न था कि आप का लश्कर "मुर्रुज्ज़हरान" तक आ गया है इस लिये अबू सुफ्यान बिन हर्ब और हकीम बिन हिज़ाम व बदल बिन वराका इस तलाश व जुस्तजू में निकले थे कि रसूलुल्लाह ﷺ का लश्कर कहां है ? जब येह तीनों "मुर्रुज्ज़हरान” के करीब पहुंचे तो देखा कि मीलों तक आग ही आग जल रही है येह मन्ज़र देख कर येह तीनों हैरान रह गए और अबू सुफ्यान बिन हर्ब ने कहा कि मैं ने तो ज़िन्दगी में कभी इतनी दूर तक फैली हुई आग इस मैदान में जलते हुए नहीं देखी। आखिर येह कौन सा क़बीला है ? बदील बिन वरका ने कहा कि बनी अम्र मालूम होते हैं। अबू सुफ्यान ने कहा कि नहीं, बनी अम्र इतनी कषीर तादाद में कहां हैं जो उन की आग से "मुर्रुज्ज़हरान" का पूरा मैदान भर जाएगा।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 423*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 288)
फ़त्ह मक्का #11
*अबू सुफ्यान का इस्लाम :* अबू सुफ्यान बिन हर्ब की इस्लाम दुश्मनी कोई ढकी छुपी चीज़ नहीं थी। मक्के में रसूले करीम ﷺ को सख्त से सख्त ईज़ाएं देनी, मदीने पर बार बार हम्ला करना, क़बाइले अरब को इश्तिआल दिला कर हुज़ूर ﷺ के क़त्ल की बारहा साज़िशें, यहूदियों और तमाम कुफ्फ़ारे अरब से साज़बाज़ कर के इस्लाम और बानिये इस्लाम के ख़ातिमे की कोशिशें येह वोह ना क़ाबिले मुआफ़ी जराइम थे जो पुकार पुकार कर कह रहे थे कि अबू सुफ्यान का क़त्ल बिल्कुल दुरुस्त व जाइज़ और बर महल है, लेकिन रसूले करीम ﷺ जिन को क़ुरआन ने “रऊफ़ व रहीम" के लक़ब से याद किया है। उन की रहमत चुम्कार चुम्कार कर अबू सुफ्यान के कान में कह रही थी कि ऐ मुजरिम ! मत डर। येह दुन्या के सलातीन का दरबार नहीं है बल्कि येह रहमतुल्लिल आलमीन ﷺ की बारगाहे रहमत है।
बुखारी शरीफ़ की रिवायत तो येही है कि अबू सुफ्यान बारगाहे अक्दस में हाज़िर हुए तो फ़ौरन ही इस्लाम क़बूल कर लिया। इस लिये जान बच गई। मगर एक रिवायत येह भी है कि हकीम बिन हिज़ाम और बदल बिन वरका ने तो फ़ौरन रात ही में इस्लाम क़बूल कर लिया मगर अबू सफ्यान ने सुब्ह को कलिमा पढा। और बा'ज़ रिवायात में येह भी आया है कि अबू सुफ्यान और हुज़ूर ﷺ के दरमियान एक मुकालमा हुवा उस के बाद अबू सुफ्यान ने अपने इस्लाम का एलान किया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 426*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 289)
फ़त्ह मक्का #12
*अबू सुफ्यान का इस्लाम :#2* वोह मुकालमा येह है : रसूले अकरम ﷺ: क्यूं ऐ अबू सुफ्यान ! क्या अब भी तुम्हें यकीन न आया कि खुदा एक है? अबू सुफ़यान : क्यूं नहीं कोई और खुदा होता तो आज हमारे काम आता।
रसूले अकरम ﷺ: क्या इस में तुम्हें कोई शक है कि मैं अल्लाह का रसूल हूं?
अबू सुफ़यान : हां ! इस में तो अभी मुझे कुछ शुबा है।
मगर फिर इस के बाद उन्हों ने कलिमा पढ़ लिया और उस वक्त गो उन का ईमान मुतल्ज़िल था लेकिन बाद में बिल आखिर वोह सच्चे मुसलमान बन गए। चुनान्चे गज़्वए ताइफ में मुसलमानों की फ़ौज में शामिल हो कर इन्हों ने कुफ्फ़ार से जंग की और इसी में इन की एक आंख जख्मी हो गई।
* फिर येह जंगे यरमूक में भी जिहाद के लिये गए।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 427*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 290)
फ़त्ह मक्का #13
*लश्करे इस्लाम का जाहो जलाल :* मुजाहिदीने इस्लाम का लश्कर जब मक्का की तरफ बढ़ा तो हुज़ूर ﷺ ने हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه से फ़रमाया कि आप अबू सुफ्यान को किसी ऐसे मक़ाम पर खड़ा कर दें कि येह अफ़वाजे इलाही का जलाल अपनी आंखों से देख ले। चुनान्चे जहां रास्ता कुछ तंग था एक बुलन्द जगह पर हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه ने अबू सुफ्यान को खड़ा कर दिया। थोड़ी देर के बाद इस्लामी लश्कर समुन्दर की मौजों की तरह उमंडता हुवा रवाना हुवा और क़बाइले अरब की फौजें हथियार सज सज कर यके बाद दी - गरे अबू सुफ्यान के सामने से गुज़रने लगीं। सब से पहले क़बीलए गिफ़ार का बा वक़ार परचम नज़र आया। अबू सुफ्यान ने सहम कर पूछा कि येह कौन लोग हैं? हज़रते अब्बास ने कहा कि येह क़बीलए गिफ़ार के शह सुवार हैं। अबू सुफ्यान ने कहा कि मुझे क़बीलए गिफार से क्या मतलब है ? फिर जुहैना फिर सा'द बिन हुजैम, फिर सुलैम के क़बाइल की फौजें जर्क बर्क हथियारों में डूबे हुए परचम लहराते और तक्बीर के नारे मारते हुए सामने से निकल गए। अबू सुफ्यान हर फ़ौज का जलाल देख कर मरऊब हो जाते थे और हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه से हर फ़ौज के बारे में पूछ जाते थे कि येह कौन हैं? येह किन लोगों का लश्कर है?
इस के बाद अन्सार का लश्करे पुर अन्वार इतनी अजीब शान और ऐसी निराली आन बान से चला कि देखने वालों के दिल दहल गए। अबू सुफ्यान ने इस फ़ौज की शानो शौकत से हैरान हो कर कहा कि ऐ अब्बास ! येह कौन लोग हैं ? आपने फ़रमाया कि येह "अन्सार" हैं ना गहां अन्सार के अलम बरदार हज़रते सा'द बिन उबादा झन्डा लिये हुए अबू सुफ्यान के क़रीब से गुज़रे और जब अबू सुफ्यान को देखा तो बुलन्द आवाज़ से कहा कि ऐ अबू सुफ्यान ! आज घुमासान की जंग का दिन है। आज काबे में खुरेज़ी हलाल कर दी जाएगी। अबू सुफ्यान येह सुन कर घबरा गए और हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه से कहा कि ऐ अब्बास ! सुन लो ! आज कुरैश की हलाकत तुम्हें मुबारक हो। फिर अबू सुफ्यान को चैन नहीं आया तो पूछा कि बहुत देर हो गई। अभी तक मैं ने मुहम्मद (ﷺ) को नहीं देखा कि वोह कौन से लश्कर में हैं ! इतने में हुज़ूर ताजदारे दो आलम ﷺ परचमे नुबुव्वत के साए में अपने नूरानी लश्कर के हमराह पैग़म्बराना जाहो जलाल के साथ नमूदार हुए।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 428-429*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 291)
फ़त्ह मक्का #14
*लश्करे इस्लाम का जाहो जलाल :*
अबू सुफ्यान ने जब शहनशाहे कौनैन को देखा तो चिल्ला कर कहा कि ऐ हुज़ूर ﷺ ! क्या आप ने सुना कि सा'द बिन उबादा क्या कहते हुए गए हैं ? इर्शाद फ़रमाया कि उन्हों ने क्या कहा है ? अबू सुफ्यान बोले कि उन्हों ने यह कहा है कि आज काबा हलाल कर दिया जाएगा। आप ने इर्शाद फ़रमाया कि सा'द बिन उबादा ने गलत कहा, आज तो काबे की अजमत का दिन है। आज तो काबे को लिबास पहनाने का दिन है और हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि सा'द बिन उबादा ने इतनी ग़लत बात क्यूं कह दी। आप ने उन के हाथ से झन्डा के हाथ से झंडा ले कर उन के बेटे कैस बिन साद के हाथ में दे दिया। और एक रिवायत में येह है कि जब अबू सुफ्यान ने बारगाहे रसूल में येह शिकायत की, कि या रसूलल्लाह अभी अभी सा'द बिन उबादा येह कहते हुए गए हैं कि आज घुमसान की लड़ाई का दिन है। तो हुज़ूर (ﷺ) ने ख़फगी का इज़हार फ़रमाते हुए इर्शाद फ़रमाया कि सा'द बिन उबादा ने ग़लत कहा, बल्कि ऐ अबू सुफ्यान ! आज का दिन तो रहमत का दिन है।
फिर फ़ातेहाना शानो शौकत के साथ बानिये काबा के जा नशीन हुज़ूर रहमतुल्लिल आलमीन ﷺ ने मक्का की सर ज़मीन में नुज़ूले इज्लाल फ़रमाया और हुक्म दिया कि मेरा झन्डा मक़ामे "हुजून" के पास गाड़ा जाए और हज़रते ख़ालिद बिन वलीद के नाम फरमान जारी फ़रमाया कि वोह फ़ौजों के साथ मक्का के बालाई हिस्से या'नी “कदा" की तरफ से मक्का में दाखिल हों।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 430*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 292)
फ़त्ह मक्का #15
फातेहे मक्का का पहला फ़रमान :
ताजदारे दो आलम ﷺ ने मक्का की सर जमीन में क़दम रखते ही जो पहला फरमान ज़ारी फ़रमाया वो ये एलान था कि जिस के लफ्ज़ में रहमतों के दरिया मोज़े मार रहे है : "जो शख़्स हथियार डाल देगा उस के लिये अमान है। जो शख़्स अपना दरवाज़ा बन्द कर लेगा उस के लिये अमान है। जो काबे में दाखिल हो जाएगा उस के लिये अमान।" इस मौक़अ पर हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! अबू सुफ्यान एक फख्र पसन्द आदमी है इस के लिये कोई ऐसी इम्तियाज़ी बात फ़रमा दीजिये कि इस का सर फख्र से ऊंचा हो जाए। तो आप ने फ़रमा दिया कि "जो अबू सुफ्यान के घर में दाखिल हो जाए उस के लिये अमान है। इस के बाद अबू सुफ्यान मक्का में बुलन्द आवाज़ से पुकार पुकार कर ए'लान करने लगा कि ऐ कुरैश ! मुहम्मद (ﷺ) इतना बड़ा लश्कर ले कर आ गए हैं कि इस का मुक़ाबला करने की किसी में भी ताक़त नहीं है जो अबू सुफ्यान के घर में दाखिल हो जाए उस का लिये अमान है।
अबू सुफ्यान की ज़बान से येह कम हिम्मती की बात सुन कर उस की बीवी हिन्द बिन्ते उत्बा जल भुन कर कबाब हो गई और तैश में आ कर अबू सुफ्यान की मूंछ पकड़ ली और चिल्ला कर कहने लगी कि ऐ बनी किनाना ! इस कम बख़्त को क़त्ल कर दो येह कैसी बुजदिली और कम हिम्मती की बात बक रहा है। हिन्द की इस चीखो पुकार की आवाज़ सुन कर तमाम बनू किनाना का ख़ानदान अबू सुफ्यान के मकान में जमा हो गया और अबू सुफ्यान ने साफ़ साफ़ कह दिया कि इस वक्त गुस्सा और तैश की बातों से कुछ काम नहीं चल सकता। मैं पूरे इस्लामी लश्कर को अपनी आंख से देख कर आया हूं और मैं तुम लोगों को यक़ीन दिलाता हूं कि अब हम लोगों से मुहम्मद (ﷺ) का मुक़ाबला नहीं हो सकता। येह खैरिय्यत है कि उन्हों ने ए'लान कर दिया है कि जो अबू सुफ्यान के मकान में चला जाए उस के लिये अमान है। लिहाज़ा ज़ियादा से ज़ियादा लोग मेरे मकान में आ कर पनाह ले लें। अबू सुफ्यान के ख़ानदान वालों ने कहा कि तेरे मकान में भला कितने इन्सान आ सकेंगे ? अबू सुफ्यान ने बताया कि मुहम्मद (ﷺ) ने उन लोगों को भी अमान दे दी है जो अपने दरवाज़े बन्द कर लें या मस्जिदे हराम में दाखिल हो में जाएं या हथियार डाल दें। अबू सूफ्यान का येह बयान सुन कर कोई अबू सुफ़्यान के मकान में चला गया। कोई मस्जिदे हराम की तरफ़ भागा। कोई अपना हथियार ज़मीन पर रख कर खड़ा हो गया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 431*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 293)
फ़त्ह मक्का #16
फातेहे मक्का का पहला फ़रमान #2 : हुज़ूर ﷺ के इस एलाने रहमत निशान यानी मुकम्मल अम्नो अमान का फरमान जारी कर देने के बाद एक क़तरा खून बहने का कोई इम्कान ही नहीं था। लेकिन इकरमा बिन अबू जहल व सफ्वान बिन उमय्या व सुहैल बिन अम्र और जमाश बिन कैस ने मक़ामे “ख़न्दमा" में मुख़्तलिफ़ क़बाइल के औबाश को जम्अ किया था। इन लोगों ने हज़रते खालिद बिन अल वलीद رضی الله تعالی عنه की फ़ौज में से दो आदमियों हज़रते करज़ बिन जाबिर फ़हरी और हुबैश बिन अश्अर رضی الله تعالی عنه को शहीद कर दिया और इस्लामी लश्कर पर तीर बरसाना शुरू कर दिया। बुखारी की रिवायत में इन्ही दो हज़रात की शहादत का ज़िक्र है मगर जुरकानी वगैरा किताबों से पता चलता है कि तीन सहाबए किराम को कुफ्फ़ारे कुरैश ने क़त्ल कर दिया। दो वोह जो ऊपर ज़िक्र किये गए और एक हज़रते मुस्लिमा बिन अल मीलाअ رضی الله تعالی عنه और बारह या तेरह कुफ़्फ़ार भी मारे गए और बाक़ी मैदान छोड़ कर भाग निकले।
हुज़ूर ﷺ ने जब देखा कि तलवारें चमक रही हैं तो आपने दरयाफ्त फ़रमाया कि मैं ने तो खालिद बिन अल वलीद को जंग करने से मन्अ कर दिया था। फिर येह तलवारें कैसी चल रही हैं ? लोगों ने अर्ज़ किया कि पहल कुफ्फ़ार की तरफ़ से हुई है। इस लिये लड़ने के सिवा हज़रते खालिद बिन अल वलीद की फ़ौज के लिये कोई चारए कार ही नहीं रह गया था। येह सुन कर इर्शाद फरमाया कि कज़ाए इलाही येही थी और खुदा ने जो चाहा वोही बेहतर है।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 432*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 294)
फ़त्ह मक्का #17
ताजदारे दो आलम ﷺ का मक्का में दाखिला : हुज़ूर ﷺ जब फातेहाना हैषिय्यत से मक्का में दाखिल होने लगे तो आप अपनी ऊंटनी "कस्वा" पर सुवार थे। एक सियाह रंग का इमामा बांधे हुए थे और बुखारी में है कि आप के सर पर “मिग़फ़र” था। आप के एक जानिब हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ और दूसरी जानिब उसैद बिन हुजैर رضی الله تعالی عنهما थे और आप के चारों तरफ़ जोश में भरा हुवा और हथियारों में डूबा हुवा लश्कर था जिस के दरमियान को कुब्बए नबवी था।
इस शानो शौकत को देख कर अबू सुफ्यान ने हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنهما से कहा कि ऐ अब्बास ! तुम्हारा भतीजा तो बादशाह हो गया। हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه ने जवाब दिया कि तेरा बुरा हो ऐ अबू सुफ्यान ! येह बादशाहत नहीं है बल्कि येह "नुबुव्वत” है। इस शाहाना जुलूस के जाहो जलाल के बा वुजूद शहनशाहे रिसालत ﷺ की शाने तवाजोअ का येह आलम था कि आप सूरए फत्ह की तिलावत फ़रमाते हुए इस तरह सर झुकाए हुए ऊंटनी पर बैठे हुए थे कि आप का सर ऊंटनी के पालान से लग लग जाता था। आप ﷺ की येह कैफ़िय्यते तवाज़ोअ खुदा वन्दे कुद्दूस का शुक्र अदा करने और उस की बारगाहे अजमत में अपने इज्ज़ व नियाज़ मन्दी का इज़्हार करने के लिये थी।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 433*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 295)
फ़त्ह मक्का #18
मक्का में हुज़ूर ﷺ की कियाम गाह : बुखारी की रिवायत है कि हुज़ूर ﷺ फ़त्ह मक्का के दिन हज़रते अली رضی الله تعالی عنه की बहन हज़रते उम्मे हानी बिन्ते अबी तालिब के मकान पर तशरीफ़ ले गए और वहां गुस्ल फ़रमाया फिर आठ रक्अत नमाज़े चाश्त पढ़ी। येह नमाज़ बहुत ही मुख़्तसर तौर पर अदा फ़रमाई लेकिन रुकूअ सज्दा मुकम्मल तौर पर अदा फ़रमाते रहे।
एक रिवायत में येह भी आया है कि आप ﷺ ने हज़रते बीबी उम्मे हानी कि क्या घर में कुछ खाना भी है ? उन्हों ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! खुश्क रोटी के चन्द टुकड़े हैं। मुझे बड़ी शर्म दामन गीर होती है कि उस को आप के सामने पेश कर दूं। इर्शाद फ़रमाया कि "लाओ" फिर आप ﷺ ने अपने दस्ते मुबारक से उन खुश्क रोटियों को तोड़ा और पानी में भिगो कर नर्म किया और हज़रते उम्मे हानी ने उन रोटियों के सालन के लिये नमक पेश किया तो आप ﷺ ने फ़रमाया कि क्या कोई सालन घर में नहीं है ? उन्हों ने अर्ज़ किया कि मेरे घर में "सिर्का" के सिवा कुछ भी नहीं है। आप ने इर्शाद फ़रमाया कि "सिर्का" लाओ। आप ने सिर्का को रोटी पर डाला और तनावुल फ़रमा कर खुदा का शुक्र बजा लाए।
फिर फ़रमाया कि "सिर्का बेहतरीन सालन है और जिस घर में सिर्का होगा उस घर वाले मोहताज न होंगे।" फिर हज़रते उम्मे हानीने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! मैं ने हारिष बिन हश्शाम (अबू जहल के भाई) और ज़हीर बिन उमय्या को अमान दे दी है। लेकिन मेरे भाई हज़रते अली رضی الله تعالی عنه चाहते हैं कि इन दोनों को इस जुर्म में क़त्ल करना चाहते है कि इन दोनों ने हज़रते खालिद बिन अल वलीद رضی الله تعالی عنه की फ़ौज से जंग की है तो हुज़ूर ﷺ ने फरमाया ऐ उम्मे हानी ! رضی الله تعالی عنه जिस को तुम ने अमान दे दी उस के लिये हमारी तरफ़ से भी अमान है।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 435*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 296)
फ़त्ह मक्का #19
बैतुल्लाह में दाखिला : हुज़ूर ﷺ का झन्डा "हजून" में जिस को आज कल जन्नतुल मअला कहते हैं "मस्जिदुल फ़त्ह" के करीब में गाड़ा गया फिर आप अपनी ऊंटनी पर सुवार हो कर और हज़रते उसामा बिन जैद رضی الله تعالی عنه को ऊंटनी पर अपने पीछे बिठा कर मस्जिदे हराम की तरफ रवाना हुए और हजरते बिलाल رضی الله تعالی عنه और काबा के कलीद बरदार उषमान बिन तल्हा भी आप के साथ थे। आप ने मस्जिदे हराम में अपनी ऊंटनी को बिठाया और का'बे का तवाफ़ किया और हज़रे अस्वद को बोसा दिया।
येह इन्क़िलाबे ज़माना की एक हैरत अंगेज़ मिषाल है कि हज़रते इब्राहीम खलीलुल्लाह عليه السلام जिन का लकब "बुत शिकन" है उन की यादगार ख़ानए काबा के अन्दरूने हिसार तीन सो साठ बुतों की कितार थी। फातेहे मक्का ﷺ का हज़रते खलील का जा नशीने जलील होने की हैषिय्यत से फ़र्ज़े अव्वलीन था कि यादगारे ख़लील को बुतों की नजिस और गन्दी आलाइशों से पाक करें। चुनान्चे आप ﷺ खुद ब नफ्से नफीस एक छड़ी ले कर खड़े हुए और इन बुतों को छड़ी की नोक से ठोंके मार मार कर गिराते जाते थे और ये आयत तिलावत फ़रमाते जाते थे, : हक़ आ गया और बातिल मिट गया और बातिल मिटने ही की चीज़ थी।
फिर उन बुतों को जो ऐन काबे के अन्दर थे। हुज़ूर ﷺ ने हुक्म दिया कि वोह सब निकाले जाएं। चुनान्चे वोह सब बुत निकाल बाहर किये गए। उन्ही बुतों में हज़रते इब्राहीम व हज़रते इस्माईल के मुजस्समे भी थे जिन के हाथों में फाल खोलने के तीर थे। आपने उन को देख कर फ़रमाया कि अल्लाह तआला इन काफ़िरों को मार डाले। इन काफ़िरों को ख़ूब मालूम है कि इन दोनों पैगम्बरों ने कभी भी फ़ाल नहीं खोला।
जब तक एक एक बुत काबे के अन्दर से न निकल गया, आप ﷺ ने का'बे के अन्दर क़दम नहीं रखा जब तमाम बुतों से काबा पाक हो गया तो आप अपने साथ हज़रते उसामा बिन तल्हा हजबी को ले कर खानए काबा के अंदर तशरीफ़ ले गए और बैतुल्लाह शरीफ के तमाम गोशों में तकबीर पढ़ी और दो रकअत नमाज़ भी अदा फ़रमाई इस के बाद बाहर तशरीफ़ लाए। काबए मुक़द्दसा के अन्दर से जब आप बाहर निकले तो उषमान बिन तल्हा को बुला कर काबे की कुन्जी उन के हाथ अता फ़रमाई और इर्शाद फ़रमाया कि लो येह कुन्जी हमेशा हमेशा के लिये तुम लोगों में रहेगी येह कुन्जी तुम से वोही छीनेगा जो जालिम होगा।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 437*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 297)
फ़त्ह मक्का #20
शहनशाहे रिसालत ﷺ का दरबारे आम : ताजदारे दो आलम ﷺ ने शहनशाहे इस्लाम की हैषिय्यत से हरमे इलाही में सब से पहला दरबारे आम मुन्अकिद फ़रमाया जिस में अफ़वाजे इस्लाम के इलावा हज़ारों कुफ्फार व मुशरिकीन के खुवास व अवाम का एक ज़बर दस्त इदिहाम था। इस शहनशाही खुत्बे में आप ने सिर्फ अहले मक्का ही से नहीं बल्कि तमाम अक्वामे आलम से खिताबे आम फरमाते हुए येह इर्शाद फ़रमाया कि
“एक खुदा के सिवा कोई माबूद नहीं। उस का कोई शरीक नहीं। उस ने अपना वादा सच कर दिखाया। उस ने अपने बन्दे (हुज़ूर ﷺ) की मदद की और कुफ्फ़ार के तमाम लश्करों को तन्हा शिकस्त दे दी, तमाम फख्र की बातें, तमाम पुराने ख़ूनों का बदला, तमाम पुराने खून बहा, और जाहिलिय्यत की रस्में सब मेरे पैरों के नीचे हैं। सिर्फ काबा की तौलियत और हुज्जाज को पानी पिलाना, येह दो एजाज़ इस से मुस्तषना हैं। ऐ क़ौमे कुरैश ! अब जाहिलिय्यत का गुरूर और ख़ानदानों का इफ्तिख़ार खुदा ने मिटा दिया। तमाम लोग हज़रते आदम عليه السلام की नस्ल से हैं और हज़रते आदम عليه السلام मिट्टी से बनाए गए हैं।
इस के बाद हुज़ूर ﷺ ने क़ुरआने मजीद की येह आयत तिलावत फ़रमाई जिस का तर्जमा येह है : ऐ लोगों ! हम ने तुम को एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हारे लिये क़बीले और ख़ानदान बना दिये ताकि तुम आपस में एक दूसरे की पहचान रखो लेकिन खुदा के नज़दीक सब से ज़ियादा शरीफ़ वोह है जो सब से ज़ियादा परहेज़ गार है। यक़ीनन अल्लाह तआला बड़ा जानने वाला और ख़बर रखने वाला है। (पा.26)
बेशक अल्लाह ने शराब की खरीद व फरोख्त को हराम फरमा दिया है।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 438*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 298)
फ़त्ह मक्का #21
कुफ्फारे मक्का से खिताब #01 : इस के बा'द शहनशाहे कौनैन ﷺ ने उस हज़ारों के मज्मअ में एक गहरी निगाह डाली तो देखा कि सर झुकाए, निगाहे नीची किये हुए लरज़ां व तरसां अश्राफ़े कुरैश खड़े हुए हैं। उन ज़ालिमों और जफ़ाकारों में वोह लोग भी थे जिन्हों ने आप ﷺ के रास्तों में कांटे बिछाए थे। वोह लोग भी थे जो बारहा आप पर पथ्थरों की बारिश कर चुके थे। वोह खूंखार भी थे जिन्हों ने बार बार आप ﷺ पर क़ातिलाना हम्ले किये थे। वोह बे रहम व बे दर्द भी थे जिन्हों ने आप के दन्दाने मुबारक को शहीद और आप के चेहरए अन्वर को लहू लुहान कर डाला था। वोह औबाश भी थे जो बरसहा बरस तक अपनी बोहतान तराशियों और शर्मनाक गालियों से आप के कल्बे मुबारक को ज़ख़्मी कर चुके थे। वोह सफ्फाक व दरिन्दा सिफ़त भी थे जो आप के गले में चादर का फन्दा डाल कर आप का गला घोंट चुके थे। वोह जुल्मो सितम के मुजस्समे और पाप के पुतले भी थे जिन्हों ने आप की साहिब जादी हज़रते जैनब को नेज़ा मार कर ऊंट से गिरा दिया था और उन का हम्ल साक़ित हो गया था। वोह आप के खून के प्यासे भी थे जिन की तिश्ना लबी और प्यास ख़ूने नुबुव्वत के सिवा किसी चीज़ से नहीं बुझ सकती थी।
वोह जफ़ाकार व खूंखार भी थे जिन के जारिहाना हम्लों और ज़ालिमाना यलगार से बार बार मदीनए मुनव्वरा के दरो दीवार दहल चुके थे। हुज़ूर ﷺ के प्यारे चचा हज़रते हम्ज़ा के क़ातिल और उन की नाक, कान, काटने वाले, उन की आंखें फोड़ने वाले, उन का जिगर चबाने वाले भी उस मज्मअ में मौजूद थे वोह सितम गार जिन्हों ने शम्ए नुबुव्वत के जां निषार परवानों हज़रते बिलाल, हज़रते सुहैब, हज़रते अम्मार, हज़रते खब्बाब, हज़रते खुबैब, हज़रते जैद बिन दषिना رضی الله تعالی عنهم वगैरा को रस्सियों से बांध बांध कर कोड़े मार मार जलती हुई रैतों पर लिटाया था, किसी को आग के दहक्ते हुए कोएलों पर सुलाया था, किसी को चटाइयों में लपेट लपेट कर नाकों में धूएं दिये थे, सेंकड़ों बार गला घोंटा था येह तमाम जोरो जफा और जुल्म व सितम गारी के पैकर, जिन के जिस्म के रोंगटे रोंगटे और बदन के बाल बाल जुल्म व उदवान और सरकशी व तुग्यान के वबाल से ख़ौफ़नाक जुर्मों और शर्मनाक मज़ालिम के पहाड़ बन चुके थे।
आज येह सब के सब दस बारह हज़ार मुहाजिरीन व अन्सार के लश्कर की हिरासत में मुजरिम बने हुए खड़े कांप रहे थे और अपने दिलों में येह सोच रहे थे कि शायद आज हमारी लाशों को कुत्तों से नुचवा कर हमारी बोटियां चीलों और कव्वों को खिला दी जाएंगी और अन्सार व मुहाजिरीन की ग़ज़ब नाक फ़ौजें हमारे बच्चे बच्चे को ख़ाक व खून में मिला कर हमारी नस्लों को नेस्तो नाबूद कर डालेंगी और हमारी बस्तियों को ताख़त व ताराज कर के तहस नहस कर डालेंगी उन मुजरिमों के सीनों में ख़ौफ़ व हिरास का तूफ़ान उठ रहा था। दहशत और डर से उन के बदनों की बोटी बोटी फड़क रही थी, दिल धड़क रहे थे, कलेजे मुंह में आ गए थे और आलमे यास में उन्हें ज़मीन से आस्मान तक धूएं ही धूएं के ख़ौफ़नाक बादल नज़र आ रहे थे।
इसी मायूसी और ना उम्मीदी की ख़तरनाक फ़ज़ा में एक दम शहनशाहे रिसालत ﷺ की निगाहे रहमत उन पापियों की तरफ़ मुतवज्जेह हुई। और उन मुजरिमों से आप ने पूछा...
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 440*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 299)
फ़त्ह मक्का #22
कुफ्फारे मक्का से खिताब #02 : इसी मायूसी और ना उम्मीदी की खतरनाक फ़ज़ा में एक दम शहनशाहे रिसालत ﷺ की निगाहे रहमत उन पापियों की तरफ़ मुतवज्जेह हुई। और उन मुजरिमों से आप ने पूछा कि “बोलो ! तुम को कुछ मालूम है ? कि आज मैं तुम से क्या मुआमला करने वाला हूं।" इस दहशत अंगेज़ और ख़ौफ़नाक सुवाल से मुजरिमीन हवास बाख़्ता हो कर कांप उठे लेकिन जबीने रहमत के पैग़म्बराना तेवर को देख कर उम्मीदो बीम के महशर में लरजते हुए सब यक ज़बान हो कर बोले आप करम वाले भाई और करम वाले बाप के बेटे हैं। सब की ललचाई हुई नज़रें जमाले नुबुव्वत का मुंह तक रही थीं। और सब के कान शहनशाहे नुबुव्वत का फैसला कुन जवाब सुनने के मुन्तज़िर थे कि इक दम दफ्तन फातेहे मक्का ने अपने करीमाना लहजे में इर्शाद फ़रमाया कि : आज तुम पर कोई इल्ज़ाम नहीं, जाओ तुम सब आज़ाद हो।
बिल्कुल गैर मुतवक्केअ तौर पर एक दम अचानक येह फ़रमाने रिसालत सुन कर सब मुजरिमों की आंखें फ़र्ते नदामत अश्कबार हो गई और उन के दिलों की गहराइयों से जज्बाते शुक्रिया के आषार आंसूओं की धार बन कर उन के रुख़्सारों पर मचलने लगे और कुफ्फार की ज़बानों पर "ला-इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह" के नारों से हरमे काबा के दरो दीवार पर हर तरफ़ अन्वार की बारिश होने लगी। ना गहां बिल्कुल ही अचानक और दफ़अतन एक अजीब इन्क़िलाब बरपा हो गया कि समां ही बदल गया, फ़ज़ा ही पलट गई और एक दम ऐसा महसूस होने लगा कि
*जहां तारीक था, बे नूर था और सख़्त काला था*
*कोई पर्दे से क्या निकला की घर घर में उजाला था*
कुफ़्फ़ार ने मुहाजिरीन की जाएदादों, मकानों, दुकानों पर ग़ासिबाना कब्ज़ा जमा लिया था। अब वक्त था कि मुहाजिरीन को उन के हुकूक दिलाए जाते और उन सब जाएदादों, मकानों, दुकानों और सामानों को मक्का के गासिबों के क़ब्ज़ों से वा गुज़ार कर के मुहाजिरीन के सिपुर्द किये जाते। लेकिन शहनशाहे रिसालत ने मुहाजिरीन को हुक्म दे दिया कि वोह अपनी कुल जाएदादें खुशी खुशी मक्का वालों को हिबा कर दें।
अल्लाहु अक्बर ! ऐ अक्वामे आलम की तारीखी दास्तानो ! बताओ क्या दुन्या के किसी फातेह की किताबे ज़िन्दगी में कोई ऐसा हसीन व ज़रीं वरक़ है ? ऐ धरती ! खुदा के लिये बता ? ऐ आस्मान ! लिल्लाह बोल। क्या तुम्हारे दरमियान कोई ऐसा फ़ातेह गुज़रा है ? जिस ने अपने दुश्मनों के साथ ऐसा हुस्ने सुलूक किया हो ? ऐ चांद और सूरज की चमक्ती और दूरबीन निगाहो ! क्या तुम ने लाखों बरस की गदिश लैलो नहार में कोई ऐसा ताजदार देखा है ? तुम इस के सिवा और क्या कहोगे ? कि येह नबी जमाल व जलाल का वोह बे मिषाल शाहकार है कि शाहाने आलम के लिये इस का तसव्वुर भी मुहाल है। इस लिये हम तमाम दुन्या को चेलेन्ज के साथ दा'वते नज़ारा देते हैं कि
*चश्मे अक्वामे येह नज़ारा अबद तक देखे*
*रिफ्अते शाने رَفَعْنَا لَکَ ذِکْرَکَ देखे*
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 442*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 300)
फ़त्ह मक्का #23
दूसरा खुत्बा : फ़तहे मक्का के दूसरे दिन भी आपने एक खुत्बा दिया जिस में हरमे काबा के अह्काम व आदाब की तालीम दी कि हरम में किसी का खून बहाना, जानवरों का मारना, शिकार करना, दरख़्त काटना, इज्ख़िर के सिवा कोई घास काटना हराम है और अल्लाह ने घड़ी भर के लिये अपने रसूल को हरम में जंग करने की इजाज़त दी फिर क़ियामत तक के लिये किसी को हरम में जंग की इजाजत नहीं है। अल्लाह ने इस को हरम बना दिया है। न मुझ से पहले किसी के लिये इस शहर में खूंरेज़ी हलाल की गई न मेरे बाद क़ियामत तक किसी के लिये हलाल की जाएगी।
*❝ अन्सार को फिराके रसूल ﷺ का डर ❞ :* अन्सार ने कुरैश के साथ जब रसूलुल्लाह ﷺ के इस करीमाना हुस्ने सुलूक को देखा और हुज़ूर ﷺ कुछ दिनों तक मक्का में ठहर गए तो अन्सार को येह ख़तरा लाहिक हो गया कि शायद रसूलुल्लाह ﷺ पर अपनी क़ौम और वतन की महब्बत ग़ालिब आ गई है कहीं ऐसा न हो कि आप मक्का में इक़ामत फ़रमा लें और हम लोग आप ﷺ से दूर हो जाएं। जब हुज़ूर ﷺ को अन्सार के इस ख़याल की इत्तिलाअ हुई तो आप ने फ़रमाया معاذ اللہ ए अन्सार अब तो हमारी ज़िन्दगी और वफ़ात तुम्हारे ही साथ है।
येह सुन कर फ़र्ते मुसर्रत से अन्सार की आंखों से आंसू जारी हो गए और सब ने कहा कि या रसूलल्लाह ﷺ हम लोगों ने जो कुछ दिल में खयाल किया या ज़बान से कहा इस का सबब आप की जाते मुक़द्दसा के साथ हमारा जज्बए इश्क़ है। क्यूं कि आप की जुदाई का तसव्वुर हमारे लिये ना क़ाबिले बरदाश्त हो रहा था।
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 302)
फ़त्ह मक्का #25
बैअते इस्लाम #01 : इस के बाद हुज़ूर ﷺ कोहे सफा की पहाड़ी के नीचे एक बुलन्द मक़ाम पर बैठे और लोग जूक दर जूक आ कर आप के दस्ते हक़ परस्त पर इस्लाम की बैअत करने लगे। मर्दों की बैअत ख़त्म हो चुकी तो औरतों की बारी आई। हुज़ूर ﷺ हर बैअत करने वाली औरत से जब वोह तमाम शराइत का इक्रार कर लेती तो आप उस से फ़रमा देते थे कि “मैं ने तुझ से बैअत ले ली। हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها का बयान है कि खुदा की क़सम ! आप के हाथ ने बैअत के वक्त किसी औरत के हाथ को नहीं छुवा। सिर्फ कलाम ही से बैअत फ़रमा लेते थे।
इन्ही औरतों में निक़ाब ओढ़ कर हिन्द बिन्ते उत्वा बिन रबीआ भी बैअत के लिये आई जो हज़रते अबू सुफ्यान رضی الله تعالی عنه की बीवी की वालिदा हैं। येह वोही हिन्द जिन्हों ने जंगे उहद में हजरते हम्ज़ा رضی الله تعالی عنه का शिकम चाक कर के उनके जिगर को निकाल कर चबा डाला था और उन के कान, नाक को काट कर और आंख को निकाल कर एक धागे में पिरो कर गले का हार बनाया था। जब येह बैअत के लिये आई तो हुज़ूर ﷺ से निहायत दिलेरी के साथ गुफ्तगू की। उन का मुकालमा हस्बे ज़ैल है।
रसूलुल्लाह ﷺ : तुम खुदा के साथ किसी को शरीक मत करना।
हिन्द बिन्ते उत्बा : येह इक्रार आप ने मर्दों से तो नहीं लिया लेकिन बहर हाल हम को मंजूर है।
रसूलुल्लाह ﷺ : चोरी मत करना।
हिन्द बिन्ते उत्बा : मैं अपने शोहर (अबू सुफ्यान) के माल में से कुछ ले लिया करती हूं। मालूम नहीं येह भी जाइज़ है या नहीं ?
रसूलुल्लाह ﷺ : अपनी औलाद को क़त्ल न करना।
हिन्द बिन्ते उत्बा : हम ने तो बच्चों को पाला था और जब वोह बड़े हो गए तो आप ने जंगे बद्र में उन को मार डाला। अब आप जानें और वोह जानें।
बहर हाल हज़रते अबू सुफ्यान और उन की बीवी हिन्द बिन्ते उत्बा (رضی الله تعالی عنهما) दोनों मुसलमान हो गए लिहाज़ा इन दोनों के बारे में बद गुमानी या इन दोनों की शान में बद ज़बानी रवाफ़िज़ का मज़हब है। अहले सुन्नत के नज़दीक इन दोनों का शुमार सहाबा और सहाबिय्यात رضی الله تعالی عنهم اجمعین की फेहरिस्त में है।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 445*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 303)
फ़त्ह मक्का #26
बैअते इस्लाम #02 :
इब्तिदा में गो अबू सुफ़यान और उनकी बीवी हिन्द बीनते उत्बा दोनों के ईमान में कुछ तज़ब्जुब रहा हो मगर बाद में येह दोनों सादिकुल ईमान मुसलमान हो गए और ईमान ही पर इन दोनों का ख़ातिमा हुवा। (رضی الله تعالی عنهما)
हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها का बयान है कि हिन्द बिन्ते उत्बा बारगाहे नुबुव्वत में आई और येह अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! रूए ज़मीन पर आप के घर वालों से ज़ियादा किसी घर वाले का ज़लील होना मुझे महबूब न था। मगर अब मेरा येह हाल है कि रूए ज़मीन पर आप के घर वालों से जियादा किसी घर वाले है का इज़्ज़त दार होना मुझे पसन्द नहीं।
इसी तरह हज़रते अबू सुफ्यान رضی الله تعالی عنه के बारे में मुहद्दिष इब्ने असाकिर की एक रिवायत है कि येह मस्जिदे हराम में बैठे हुए थे और हुज़ूर ﷺ सामने से निकले तो इन्हों ने अपने दिल में येह कहा कि कौन सी ताक़त इन के पास ऐसी है कि येह हम पर ग़ालिब रहते हैं तो हुज़ूर ﷺ ने इन के दिल में छुपे हुए ख़याल को जान लिया और क़रीब आ कर आप ने उन के सीने पर हाथ मारा और फ़रमाया कि हम खुदा की ताक़त से ग़ालिब आ जाते हैं। यह सुन कर इन्हों ने बुलंद आवाज़ से कहा कि "मैं शहादत देता हूं कि बेशक आप अल्लाह के रसूल हैं।"
और मुहद्दिष हाकिम और इन के शागिर्द इमाम बैहक़ी ने हज़रते इब्ने अब्बास رضی الله تعالی عنہما से येह रिवायत की है कि हज़रते अबू सुफ्यान رضی الله تعالی عنه ने हुज़ूर ﷺ को देख कर अपने दिल में कहा कि “काश ! मैं एक फ़ौज जम्अ कर के दोबारा इन से जंग करता" इधर इन के दिल में येह ख़याल आया ही था कि हुज़ूर ﷺ ने आगे बढ़ कर इन के सीने पर हाथ मारा और फ़रमाया कि "अगर तू ऐसा करेगा तो अल्लाह तआला तुझे ज़लीलो ख़्वार कर देगा।" येह सुन कर हज़रते अबू सुफ्यान तौबा व इस्तिग़्फार करने लगे और अर्ज़ किया कि मुझे इस वक़्त आप की नुबुव्वत का यकीन हो गया क्यूं कि आप ने मेरे दिल में छुपे हुए ख़याल को जान लिया।
येह भी रिवायत है कि जब सब से पहले हुज़ूर ﷺ ने इन पर इस्लाम पेश फ़रमाया था तो इन्हों ने कहा था कि मैं अपने माबूद उज़्ज़ा को क्या करूंगा ? तो हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه ने बर जस्ता फ़रमाया था कि “तुम उज़्ज़ा पर पाखाना फिर देना" चुनान्चे हुज़ूर ﷺ ने जब उज़्ज़ा को तोड़ने के लिये हज़रते खालिद बिन अल वलीद رضی الله تعالی عنه को रवाना फ़रमाया तो साथ में हज़रते अबू सुफ्यान رضی الله تعالی عنه को भी भेजा और इन्हों ने अपने हाथ से अपने माबूद उज़्ज़ा को तोड़ डाला। येह मुहम्मद बिन इस्हाक़ की रिवायत है और इब्ने हश्शाम की रिवायत यह है कि उज़्ज़ा को हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने तोड़ा था।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 446*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 304)
फ़त्ह मक्का #27
बुत परस्ती का खातिमा : गुज़श्ता अवराक़ में हम तहरीर कर चुके कि खानए का'बा के तमाम बुतों और दीवारों की तसावीर को तोड़ फोड़ कर और मिटा कर मक्का को तो हुज़ूर ﷺ ने बुत परस्ती की ला'नत से पाक कर ही दिया था लेकिन मक्का के अतराफ़ में भी बुत परस्ती के चन्द मराकिज़ थे या'नी लात, मनात, सवाअ, उज़्ज़ा येह चन्द बड़े बड़े बुत थे जो मुख़्तलिफ़ क़बाइल के मा'बूद थे। हुज़ूर ﷺ ने सहाबए किराम के लश्करों को भेज कर इन सब बुतों को तोड़ फोड़ कर बुत परस्ती के सारे तिलिस्म को तहस नहस कर दिया और मक्का नीज़ इस के अतराफ़ व जवानिब के तमाम बुतों को नेसतो नाबूद कर दिया।
इसी तरह बानिये का'बा हज़रते खलीलुल्लाह عليه السلام के जा नशीन हुज़ूर रहूमतुल्लिल आलमीन ने अपने मूरिषे आ'ला के मिशन को मुकम्मल फ़रमा दिया और दर हक़ीक़त फ़त्ह मक्का का सब से बड़ा येही मक्सद था कि शिर्क व बुतपरस्ती का खातिमा और तौहीदे खुदा वन्दी का बोलबाला हो जाए। चुनान्चे येह अज़ीम मक्सद बि हम्दिही तआला ब दरजए अतम हासिल हो गया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 448*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 305)
फ़त्ह मक्का #28
चन्द ना काबिले मुआफ़ी मुजरिमीन : जब मक्का फतह हो गया तो हुज़ूर ﷺ ने आम मुआफ़ी का एलान फ़रमा दिया। मगर चन्द ऐसे मुजरिमीन थे जिन के बारे में ताजदारे दो आलम ने येह फरमान जारी फ़रमा दिया कि येह लोग अगर इस्लाम न क़बूल करें तो येह लोग जहां भी मिलें क़त्ल कर दिये जाएं ख़्वाह वोह गिलाफ़े काबा ही में क्यूं न छुपे हों। इन मुजरिमों में से बा'ज़ ने तो इस्लाम क़बूल कर लिया और बा'ज़ क़त्ल हो गए उन में से चन्द का मुख़्तसर तज़किरा तहरीर किया जाता है :
(1) "अब्दुल उज़्ज़ा बिन ख़तल" येह मुसलमान हो गया था इस को हुज़ूर ﷺ ने ज़कात के जानवर वसूल करने के लिये भेजा और साथ में एक दूसरे मुसलमान को भी भेज दिया किसी बात पर दोनों में तकरार हो गई तो इस ने मुसलमान को कत्ल कर दिया और क़िसास के डर से तमाम जानवरों को ले कर मक्का भाग निकला और मुरतद हो गया। फ़तहे मक्का के दिन येह भी एक नेज़ा ले कर मुसलमानों से लड़ने के लिये घर से निकला था। लेकिन मुस्लिम अफ़वाज का जलाल देख कर कांप उठा और नेज़ा फेंक कर भागा और काबे के पर्दों में छुप गया। हज़रते सईद बिन हरीष मख़्ज़ूमी और अबू बरज़ा अस्लमी رضی الله تعالی عنه ने मिल कर इस को क़त्ल कर दिया।
(2) "हुवैरष बिन नक़ीद" येह शाइर था और हुज़ूर ﷺ की हिजू लिखा करता था और खूनी मुजरिम भी था। हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने इस को क़त्ल किया।
(3) "मुक़ीस बिन सबाबा" इस को नमीला बिन अब्दुल्लाह ने क़त्ल किया। येह भी खूनी था।
(4) "हारिष बिन तलातला" येह भी बड़ा ही मूजी था। हज़रते अली ने इस को क़त्ल किया।
(5) "कुरैबा" येह इब्ने ख़तल की लौंडी थी। रसूलुल्लाह ﷺ की हिजू गाया करती थी। येह भी क़त्ल की गई।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 449*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 306)
फ़त्ह मक्का #29
मक्का से फिरार हो जाने वाले #01 चार अश्खास मक्का से भाग निकले थे उन लोगों का मुख़्तसर तज़करा येह है :
(1) "इक्रमा बिन अबी जहल" येह अबू जहल के बेटे हैं। इस लिये इन की इस्लाम दुश्मनी का क्या कहना ? येह भाग कर यमन चले गए लेकिन इन की बीवी "उम्मे हकीम" जो अबू जहल की भतीजी थीं इन्हों ने इस्लाम क़बूल कर लिया और अपने शोहर इक्रमा के लिये बारगाहे रिसालत में मुआफ़ी की दरख्वास्त पेश की। हुज़ूर ﷺ ने मुआफ़ फ़रमा दिया। उम्मे हकीम खुद यमन गई और मुआफ़ी का हाल बयान किया। इक्रमा हैरान रह गए और इन्तिहाई तअज्जुब के साथ कहा कि क्या मुझ को मुहम्मद (ﷺ) ने मुआफ़ कर दिया ! बहर हाल अपनी बीवी के साथ बारगाहे रिसालत में मुसलमान हो कर हाज़िर हुए हुज़ूर ﷺ ने जब इन को देखा तो बेहद खुश हुए और इस तेज़ी से इन की तरफ़ बढ़े कि जिस्मे अतहर से चादर गिर पड़ी। फिर हज़रते इक्रमा ने खुशी खुशी हुज़ूर ﷺ के दस्ते हक़ परस्त पर बैअते इस्लाम की।
(2) "सफ्वान बिन उमय्या" येह उमय्या बिन खलफ़ के फ़रज़न्द हैं। अपने बाप उमय्या ही की तरह येह भी इस्लाम के बहुत बड़े दुश्मन थे। फ़त्ह मक्का के दिन भाग कर जद्दा चले गए। हज़रते उमैर बिन वहब ने दरबारे रिसालत में इन की सिफारिश पेश की और अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ! कुरैश का एक रईस सफ्वान मक्का से जिला वतन हुवा चाहता है। हुज़ूर ﷺ ने उन को भी मुआफ़ी अता फरमा दी और अमान के निशान के तौर पर हज़रते उमैर को अपना इमामा इनायत फ़रमाया। चुनान्चे वोह मुक़द्दस इमामा ले कर "जद्दा" गए और सफ्वान को मक्का ले कर आए सफ्वान जंगे हुनैन तक मुसलमान नहीं हुए। लेकिन इस के बाद इस्लाम क़बूल कर लिया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 450*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 307)
फ़त्ह मक्का #30
मक्का से फिरार हो जाने वाले #02 : (3) "काब बिन ज़हीर" ये सि. 9 ही. में अपने भाई के साथ मदीना आ कर मुशर्रफ ब इस्लाम हुए और हुज़ूर ﷺ की मदह में अपना मशहूर क़सीदा "बि अन्त सआद" पढ़। हुज़ूर ﷺ ने खुश हो कर इन को अपनी चादरें मुबारक इनायत फ़रमाई। हुज़ूर ﷺ की येह चादरे मुबारक हज़रते काब बिन ज़हीर رضی الله تعالی عنه के पास थी। हज़रते अमीरे मुआविया رضی الله تعالی عنه ने अपने दौरे सल्तनत में इन को दस हज़ार दिरहम पेश किया कि येह मुक़द्दस चादर हमें दे दो। मगर इन्हों ने साफ़ इन्कार कर दिया और फ़रमाया कि मैं रसूलुल्लाह ﷺ की येह चादरे मुबारक हरगिज़ हरगिज़ किसी को नहीं दे सकता। लेकिन आखिर हज़रते अमीरे मुआविया رضی الله تعالی عنه ने हज़रते का'ब बिन ज़हीर رضی الله تعالی عنه की वफ़ात के बाद इन के वारिसों को बीस हज़ार दिरहम दे कर वोह चादर ले ली और अर्सए दराज़ तक वोह चादर सलातीने इस्लाम के पास एक मुक़द्दस तबर्रुक बन कर बाक़ी रही।
(4) "वहशी" येही वोह वहशी हैं जिन्हों ने जंगे उहुद में हुज़ूर ﷺ के चचा हज़रते हम्ज़ा رضی الله تعالی عنه को शहीद कर दिया था। येह भी फ़तहे मक्का के दिन भाग कर ताइफ़ चले गए थे मगर फिर ताइफ के एक वफद के हमराह बारगाहे रिसालत में हाज़िर हो कर मुसलमान हो गए। हुज़ूर ﷺ ने इन की जुबान से अपने चचा के क़त्ल की खूनी दास्तान सुनी और रन्जो ग़म में डूब गए मगर इन को भी आप ने मुआफ़ फ़रमा दिया। लेकिन येह फ़रमाया कि वहशी ! तुम मेरे सामने न आया करो। हज़रते वहशी رضی الله تعالی عنه को इस का बेहद मलाल रहता था। फिर जब हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه की ख़िलाफ़त के ज़माने में मुसैलमतुल कज्ज़ाब ने नुबुव्वत का दावा किया और लश्करे इस्लाम ने इस मलऊन से जिहाद किया तो हज़रते वहशी رضی الله تعالی عنه भी अपना नेज़ा ले कर जिहाद में शामिल हुए और मुसैलमतुल कज्ज़ाब को क़त्ल कर दिया। हज़रते वहशी अपनी ज़िन्दगी में कहा करते थे कि "मैं ने दौरे जाहिलिय्यत में बेहतरीन इन्सान (हज़रते हम्ज़ा) رضی الله تعالی عنه को कत्ल किया और अपने दौरे इस्लाम में बद तरीन आदमी (मुसैलमतुल कज्जाब) को क़त्ल किया। इन्हों ने दरबारे अक्दस में अपने जराइम का एतिराफ़ कर के अर्ज़ किया कि क्या खुदा मुझ जैसे मुजरिम को भी बख़्श देगा ? तो येह आयत नाज़िल हुई कि :
ऐ हबीब आप फ़रमा दीजिये कि ऐ मेरे बन्दो ! जिन्हों ने अपनी जानों पर हद से ज़ियादा गुनाह कर लिया है अल्लाह की रहमत से ना उम्मीद मत हो जाओ। अल्लाह तमाम गुनाहों को बख़्श देगा। वोह यक़ीनन बड़ा बख़्शने वाला और बहुत मेहरबान है।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 451*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 308)
फ़त्ह मक्का #31
मक्का का इन्तिजाम : हुज़ूर ﷺ ने मक्का का नज़्मो नस्क और इन्तिज़ाम चलाने के लिये हज़रते इताब बिन उसैद رضی الله تعالی عنه को मक्का का हाकिम मुक़र्रर फ़रमा दिया और हज़रते मुआज़ बिन जबल رضی الله تعالی عنه को इस ख़िदमत पर मा'मूर फ़रमाया कि वोह नौ मुस्लिमों को मसाइल व अहकामे इस्लाम की तालीम देते रहें।
इस में इख़्तिलाफ़ है कि फ़तह के बाद कितने दिनों तक हुज़ूरे अक़्दस ﷺ ने मक्का में कियाम फ़रमाया। अबू दावूद की रिवायत है कि सत्तरह दिन तक आप मक्का में मुक़ीम रहे। और तिरमिजी की रिवायत से पता चलता है कि अठ्ठारह दिन आप का क़ियाम रहा। लेकिन इमाम बुखारी ने हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत की है कि उन्नीस दिन आप मक्का में ठहरे।
इन तीनों रिवायतों में इस तरह तत्बीक़ दी जा सकती है कि अबू दावूद की रिवायत में मक्का में दाखिल होने और मक्का से रवानगी के दोनों दिनों को शुमार नहीं किया है इस लिये सत्तरह दिन मुद्दते इक़ामत बताई है और तिरमिज़ी की रिवायत में मक्का में आने के दिन को तो शुमार कर लिया। क्यूं कि आप सुब्ह को मक्का में दाखिल हुए थे और मक्का से रवानगी के दिन को शुमार नहीं किया। क्यूं कि आप सुब्ह सवेरे ही मक्का से हुनैन के लिये रवाना हो गए थे और इमाम बुखारी की रिवायत में आने और जाने के दोनों दिनों को भी शुमार कर लिया गया है। इस लिये उन्नीस दिन आप मक्का में मुक़ीम रहे।
इसी तरह इस में बड़ा इख़्तिलाफ़ है कि मक्का कौन सी तारीख में फतह हुवा ? और आप किस तारीख को मक्का में फ़ातेहाना दाखिल हुए ? इमाम बैहक़ी ने 13 रमज़ान, इमाम मुस्लिम ने 10 रमज़ान, इमाम अहमद ने 18 रमज़ान बताया और बा'ज़ रिवायात में 17 रमज़ान और 18 रमज़ान भी मरवी है। मगर मुहम्मद बिन इस्हाक़ ने अपने मशाइख़ की एक जमाअत से रिवायत करते हुए फ़रमाया कि 20 रमज़ान सि. 8 हि को मक्का फत्ह हुवा।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 452*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 309)
जंगे हुनैन #01 :
“हुनैन" मक्का और ताइफ के दरमियान एक मक़ाम का नाम है। तारीखे इस्लाम में इस जंग का दूसरा नाम “गज़्वए हवाजु़न” भी है। इस लिये कि इस लड़ाई में "बनी हवाजु़न" से मुक़ाबला था। फ़त्ह मक्का के बा'द आम तौर से तमाम अरब के लोग इस्लाम के हल्का बगोश हो गए क्यूं कि इन में अकषर वोह लोग थे जो इस्लाम की हक्कानिय्यत का पूरा पूरा यक़ीन रखने के बा वुजूद कुरैश के डर से मुसलमान होने में तवक्कुफ़ कर रहे थे और फत्हे मक्का का इन्तिज़ार कर रहे थे। फिर चूंकि अरब के दिलों में का'बे का बेहद एहतिराम था और इन का एतिकाद था कि का'बे पर किसी बातिल परस्त का कब्ज़ा नहीं हो सकता। इस लिये हुज़ूर ﷺ ने जब मक्का को फ़त्ह कर लिया तो अरब के बच्चे बच्चे को इस्लाम की हक्कानिय्यत का पूरा पूरा यक़ीन हो गया और वोह सब के सब जूक दर जूक़ बल्कि फ़ौज दर फ़ौज इस्लाम में दाखिल होने लगे। बाकी मांदा अरब की भी हिम्मत न रही कि अब इस्लाम के मुकाबले में हथियार उठा सकें।
लेकिन मक़ामे हुनैन में “हवाजु़न" और "षकीफ़" नाम के दो क़बीले आबाद थे जो बहुत ही जंगजू और फुनूने जंग से वाक़िफ़ थे। इन लोगों पर फ़तहे मक्का का उलटा अषर पड़ा। उन लोगों पर गैरत सवार हो गई और उन लोगों ने येह ख़याल काइम कर लिया कि फत्हे मक्का के बाद हमारी बारी है इस लिये उन लोगों ने येह तै कर लिया कि मुसलमानों पर जो इस वक्त मक्का में जम्अ हैं एक ज़बर दस्त हम्ला कर दिया जाए। चुनान्चे हुज़ूर ﷺ ने हजरते अब्दुल्लाह बिन अबी हदरद رضی الله تعالی عنه को तहक़ीकात के लिये भेजा। जब उन्हों ने वहां से वापस आ कर उन क़बाइल की जंगी तय्यारियों का हाल बयान किया और बताया कि क़बीलए हवाजु़न और षकीफ़ ने अपने तमाम क़बाइल को जम्अ कर लिया है और क़बीलए हवाजु़न का रईसे आज़म मालिक बिन औफ़ इन तमाम अफ़वाज का सिपहसालार है और सो बरस से जाइद उम्र का बूढ़ा। "दुरैद बिन अल सुम्मह" जो अरब का मशहूर शाइर और माना हुवा बहादुर था बतौरे मुशीर के मैदाने जंग में लाया गया है और यह लोग अपनी औरतों बच्चों बल्कि जानवरों तक को मैदाने जंग में लाए हैं ताकि कोई सिपाही मैदान से भागने का ख़याल भी न कर सके।
हुज़ूर ﷺ ने भी शव्वाल सि. 8 हि. में बारह हज़ार का लश्कर जम्अ फ़रमाया। दस हज़ार तो मुहाजिरीन व अन्सार वगैरा का वोह लश्कर था जो मदीने से आप के साथ आया था और दो हजार नौ मुस्लिम थे जो फ़तहे मक्का में मुसलमान हुए थे। आप ﷺ ने उस लश्कर को साथ ले कर इस शानो शौकत के साथ हुनैन का रुख किया कि इस्लामी अफ़वाज की कषरत और इस के जाहो जलाल को देख कर बे इख्तियार बाज़ सहाबा की ज़बान से ये लफ्ज़ निकल गया कि "आज भला हम पर कौन ग़ालिब आ सकता है।"
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 452*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 310)
जंगे हुनैन # 02 :
इस्लामी अफ़वाज की कषरत और इस के जाहो जलाल को देख कर बे इख्तियार बाज़ सहाबा की ज़बान से ये लफ्ज़ निकल गया कि "आज भला हम पर कौन ग़ालिब आ सकता है।" लेकिन खुदा वन्दे आलम को सहाबए किराम का अपनी फ़ौजों की कषरत पर नाज़ करना पसन्द नहीं आया। चुनान्चे इस फख्रो नाज़िश का येह अन्जाम हुवा कि पहले ही हम्ले में क़बीलए हवाजु़न व षक़ीफ़ के तीर अन्दाज़ों ने जो तीरों की बारिश की और हज़ारों की तादाद में तलवारें ले कर मुसलमानों पर टूट पड़े तो वोह दो हज़ार नौ मुस्लिम और कुफ्फ़ारे मक्का जो लश्करे इस्लाम में शामिल हो कर मक्का से आए थे एक दम सर पर पैर रख कर भाग निकले। उन लोगों की भगदड़ देख कर अन्सार व मुहाजिरीन के भी पाउं उखड़ गए।
हुज़ूर ताजदारे दो आलम ﷺ ने जो नज़र उठा कर देखा तो गिनती के चन्द जां निषारों के सिवा सब फ़िरार हो चुके थे। तीरों की बारिश हो रही थी। बारह हज़ार का लश्कर फ़िरार हो चुका था मगर खुदा के रसूल ﷺ के पाए इस्तिकामत में बाल बराबर भी लग्ज़िश नहीं हुई। बल्कि आप अकेले एक लश्कर बल्कि एक आलमे काएनात का मज्मूआ बने हुए न सिर्फ पहाड़ की तरह डटे रहे बल्कि अपने सफ़ेद खच्चर पर सुवार बराबर आगे ही बढ़ते रहे और आप ﷺ की जुबाने मुबारक पर येह अल्फ़ाज़ जारी थे कि "मैं नबी हूं येह झूट नहीं है मैं अब्दुल मुत्तलिब का बेटा हूं।" इसी हालत में आप ﷺ ने दाहिनी तरफ़ देख कर बुलन्द आवाज़ से पुकारा कि "या म-अशरा-ल-अन्सार" फ़ौरन आवाज़ आई कि “हम हाज़िर हैं, या रसूलल्लाह ﷺ" फिर बाई जानिब रुख़ कर के फ़रमाया कि "या लल-मुहजीरिन" फ़ौरन आवाज़ आई कि "हम हाज़िर हैं, या रसूलल्लाह ﷺ"
हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه चूंकि बहुत ही बुलन्द आवाज़ थे। आप ने उन को हुक्म दिया कि अन्सार व मुहाजिरीन को पुकारो। उन्हों ने नारा मारा तो एक दम तमाम फ़ौजें पलट पड़ीं और लोग इस क़दर तेज़ी के साथ दौड़ पड़े कि जिन लोगों के घोड़े इज़दिहाम की वजह से न मुड़ सके उन्हों ने हलका होने के लिये अपनी जिरहें फेंक दीं और घोड़ों से कूद कूद कर दौड़े और कुफ्फ़ार के लश्कर पर झपट पड़े और इस तरह जां बाज़ी के साथ लड़ने लगे कि दम ज़दन में जंग का पांसा पलट गया। कुफ्फ़ार भाग निकले कुछ क़त्ल हो गए जो रह गए गरिफ्तार हो गए। क़बीलए षक़ीफ़ की फ़ौजें बड़ी बहादुरी के साथ जम कर मुसलमानों से लड़ती रहीं। यहां तक कि उन के सत्तर बहादुर कट गए। लेकिन जब उन के अलम बरदार उषमान बिन अब्दुल्लाह क़त्ल हो गया तो उन के पाउं भी उखड़ गए। और फतेह मुबीन ने हुज़ूर रहूमतुल्लिल आलमीन के कदमों का बोसा लिया और कषीर तादाद व मिक्दार में माले गनीमत हाथ आया।
येही वोह मज़मून है जिस को कु़रआने हकीम ने निहायत मुअष्षिर अन्दाज़ में बयान फ़रमाया कि : और हुनैन का दिन याद करो जब तुम अपनी कषरत पर नाज़ां थे तो वोह तुम्हारे कुछ काम न आई और ज़मीन इतनी वसीअ होने के बा वुजूद तुम पर तंग हो गई। फिर तुम पीठ फैर कर भाग निकले फिर अल्लाह ने अपनी तस्कीन उतारी अपने रसूल और मुसलमानों पर और ऐसे लश्करों को उतार दिया जो तुम्हें नज़र नहीं आए और काफिरों को अज़ाब दिया और काफ़िरों की येही सज़ा है।_ (पा. 10, सु. तौबा)
हुनैन में शिकस्त खा कर कुफ्फार की फ़ौजें भाग कर कुछ तो "औतास" में जमा हो गई और कुछ "ताइफ़" के किले में जा कर पनाह गाज़ी हो गई। इस लिये कुफ्फार की फौज़ो को मुकम्मल तौर पे शिकस्त देने के लिये "औतास" और "ताइफ़" पर भी हमला करना ज़रूरी हो गया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 454*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 311)
जंगे औतास #01 :
हुज़ूर ﷺ ने हज़रते अबू आमिर अश्अरी رضی الله تعالی عنه की मा तहती में थोड़ी सी फ़ौज "औतास" की तरफ़ भेज दी। दुरैद बिन अस्सुम्मह कई हज़ार की फ़ौज ले कर निकला। दुरैद बिन अस्सुम्मह के बेटे ने हज़रते अबू आमिर अश्अरी के जानू पर एक तीर मारा हज़रते अबू आमिर अश्अरी हज़रते अबू मूसा अश्अरी के चचा थे। अपने चचा को ज़ख़्मी देख कर हज़रते अबू मूसा दौड़ कर अपने चचा के पास आए और पूछा कि चचाजान ! आप को किस ने तीर मारा है ? तो हज़रते अबू आमिर ने इशारे से बताया कि वोह शख़्स मेरा क़ातिल है। हज़रते अबू मूसा رضی الله تعالی عنه जोश में भरे हुए उस काफ़िर को क़त्ल करने के लिये दौड़े तो वोह भाग निकला। मगर हज़रते अबू मूसा ने उस का पीछा किया और येह कह कर कि ऐ ओ भागने वाले ! क्या तुझ को शर्म और गैरत नहीं आती ?
जब उस काफ़िर ने येह गर्मा गर्म ताना सुना तो ठहर गया फिर दोनों में तलवार के दो दो हाथ हुए और हज़रते अबू मूसा رضی الله تعالی عنه ने आखिर उस को क़त्ल कर के दम लिया। फिर अपने चचा के पास आए और खुश खबरी सुनाई कि चचाजान ! खुदा ने आप के क़ातिल का काम तमाम कर दिया। फिर हज़रते अबू मूसा ने अपने चचा के जानू से वोह तीर खींच कर निकाला तो चूंकि ज़हर में बुझाया हुवा था इस लिये ज़ख्म से बजाए खून के पानी बहने लगा। हज़रते अबू आमिर ने अपनी जगह हज़रते अबू मूसा को फ़ौज का सिपह सालार बनाया और येह वसिय्यत की, कि रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में मेरा सलाम अर्ज़ कर देना और मेरे लिये दुआ की दरख्वास्त करना। येह वसिय्यत की और उन की रूह परवाज़ कर गई।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 457*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 312)
जंगे औतास #02 :
हज़रते अबू आमिर رضی الله تعالی عنه ने अपनी जगह हज़रते अबू मूसा رضی الله تعالی عنه को फ़ौज का सिपह सालार बनाया और येह वसिय्यत की, कि रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में मेरा सलाम अर्ज़ कर देना और मेरे लिये दुआ की दरख्वास्त करना। येह वसिय्यत की और उन की रूह परवाज़ कर गई।
हज़रते अबू मूसा अश्अरी رضی الله تعالی عنه का बयान है कि जब इस जंग से फ़ारिग हो कर मैं बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुवा और अपने चचा का सलाम और पैग़ाम पहुंचाया तो उस वक्त ताजदारे दो आलम ﷺ एक बान की चारपाई पर तशरीफ़ फ़रमा थे और आप की पुश्ते मुबारक और पहलूए अक्दस में बान के निशान पड़े हुए थे। आप ने पानी मंगा कर वुज़ू फ़रमाया। फिर अपने दोनों हाथों को इतना ऊंचा उठाया कि मैं ने आप की दोनों बगलों की सफ़ेदी देख ली और इस तरह आप ने दुआ मांगी कि "या अल्लाह ! तू अबू आमिर को कियामत के दिन बहुत से इन्सानों से ज़ियादा बुलन्द मर्तबा बना दे।" येह करम देख कर हज़रते अबू मूसा رضی الله تعالی عنه ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! मेरे लिये भी दुआ फ़रमा दीजिये। तो येह दुआ फ़रमाई कि "या अल्लाह ! अब्दुल्लाह बिन कैस के गुनाहों को बख़्श दे और इस को क़ियामत के दिन इज्ज़त वाली जगह में दाखिल फ़रमा। "अब्दुल्लाह बिन कैस हज़रते अबू मूसा अशअरी का नाम है।
बहर कैफ़ हज़रते अबू मूसा अश्अरी رضی الله تعالی عنه ने दुरैद बिन अस्सुम्मह के बेटे को क़त्ल कर दिया और इस्लामी अलम को अपने हाथ में ले लिया। दुरैद बिन अस्सुम्मह बुढ़ापे की वजह से एक हौदज पर सुवार था। इस को हज़रते रबीआ बिन रफीअ رضی الله تعالی عنه ने खुद उसी की तलवार से क़त्ल कर दिया। इस के बाद कुफ्फ़ार की फ़ौजों ने हथियार डाल दिया और सब गरिफ्तार हो गए। इन कैदियों में हुज़ूर ﷺ की रज़ाई बहन हज़रते "शीमा" भी थीं। येह हज़रते बीबी हलीमा सादिया رضی الله تعالی عنه की साहिबजादी थीं। जब लोगों ने इन को गरिफ्तार किया तो इन्हों ने कहा कि मैं तुम्हारे नबी की बहन हूं। मुसलमान इन को शनाख्त के लिये बारगाहे नुबुव्वत में लाए तो हुज़ूर ﷺ ने इन को पहचान लिया और जोशे महब्बत में आप की आंखें नम हो गई और आप ने अपनी चादरे मुबारक ज़मीन पर बिछा कर उन को बिठाया और कुछ ऊंट कुछ बकरियां इन को दे कर फ़रमाया कि तुम आज़ाद हो। अगर तुम्हारा जी चाहे तो मेरे घर पर चल कर रहो और अगर अपने घर जाना चाहो तो मैं तुम को वहां पहुंचा दूं। उन्हों ने अपने घर जाने की ख्वाहिश जाहिर की तो निहायत ही इज़्ज़तो एहतिराम के साथ वोह उन के क़बीले में पहुंचा दी गई।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 459*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 313)
ताइफ का मुहासरा :
येह तहरीर किया जा चुका है कि हुनैन से भागने वाली कुफ्फार की फ़ौजें कुछ तो औतास में जा कर ठहरी थीं और कुछ ताइफ़ कल्ए में जा कर पनाह गुज़ीं हो गई थीं। औतास की फ़ौजें तो आप पढ़ चुके कि वोह शिकस्त खा कर हथियार डाल देने पर मजबूर हो गई और सब गरिफ्तार हो गईं। लेकिन ताइफ़ में पनाह लेने वालों से भी जंग ज़रूरी थी। इस लिये हुज़ूर ﷺ ने हुनैन और औतास के अम्वाले गनीमत और कैदियों को "मकामे जिईर्राना" में जम्अ कर के ताइफ़ का रुख फ़रमाया।
ताइफ खुद एक बहुत ही महफूज शहर था जिस के चारों तरफ शहर पनाह की दीवार बनी हुई थी और यहां एक बहुत ही मज़बूत कल्आ भी था। यहां का रईसे आज़म उर्वह बिन मसऊद षकफ़ी था जो अबू सुफ्यान का दामाद था। यहां षकीफ़ का जो खानदान आबाद था वोह इज्ज़त व शराफ़त में कुरैश का हम पल्ला शुमार किया जाता था। कुफ्फार की तमाम फ़ौजें साल भर का राशन ले कर ताइफ़ के कलए में पनाह गुज़ी हो गई थीं।
इस्लामी अफ़वाज ने ताइफ़ पहुंच कर शहर का मुहासरा कर लिया मगर कलए के अन्दर से कुफ्फ़ार ने इस ज़ोरो शोर के साथ तीरों की बारिश शुरू कर दी कि लश्करे इस्लाम इस की ताब न ला सका और मजबूरन इस को पसे पा होना पड़ा। अठ्ठारह दिनों तक शहर का मुहासरा जारी रहा मगर ताइफ़ फ़त्ह नहीं हो सका। हुज़ूर ﷺ ने जब जंग के माहिरों से मश्वरा फ़रमाया तो हज़रते नौफ़िल बिन मुआविया رضی الله تعالی عنه ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ लौमड़ी अपने भट में घुस गई है। अगर कोशिश जारी रही तो पकड़ ली जाएगी लेकिन अगर छोड़ दी जाए तो भी इस से कोई अन्देशा नहीं। येह सुन कर हुज़ूर ﷺ ने मुहासरा उठा लेने का हुक्म दे दिया।
ताइफ़ के मुहासरे में बहुत से मुसलमान जख्मी हुए और कुल बारह असहाब शहीद हुए सात कुरैश, चार अन्सार और एक शख्स बनी लैष के। जुख्मियों में हज़रते अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنه के साहिब जादे अब्दुल्लाह बिन अबू बक्र رضی الله تعالی عنهما भी थे येह एक तीर से जख्मी हो गए थे। फिर अच्छे भी हो गए, लेकिन एक मुद्दत के बाद फिर इन का ज़ख़्म फट गया और अपने वालिदे माजिद हज़रते अबू बक्र सिद्दीक के दौरे ख़िलाफ़त में इसी जख्म से इन की वफ़ात हो गई।
ताइफ की मस्जिद : येह मस्जिद जिस को हज़रते अम्र बिन उमय्या رضی الله تعالی عنه ने ता'मीर किया था एक तारीख़ी मस्जिद है। इस जंगे ताइफ में अज़वाजे मुतह्हरात में से दो अज़्वाज साथ थीं हज़रते उम्मे सलमह और हज़रते जैनब رضی الله تعالی عنهما इन दोनों के लिये हुज़ूर ﷺ ने दो खैमे गाड़े थे और जब तक ताइफ़ का मुहासरा रहा आप इन दोनों खैमों के दरमियान में नमाजे़ं पढ़ते रहे। जब बाद में क़बीलए षक़ीफ़ के लोगों ने इस्लाम क़बूल कर लिया तो इन लोगों ने इसी जगह पर मस्जिद बना ली।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 460*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 314)
जंगे ताइफ में बुत शिकनी :
जब हुज़ूर ﷺ ने ताइफ का इरादा फ़रमाया तो हज़रते तुफैल बिन अम्र दौसी رضی الله تعالی عنه को एक लश्कर के साथ भेजा कि वोह “जुल कफ़ैन" के बुत खाने को बरबाद कर दें। यहां उमर बिन हममा दौसी का बुत था जो लकड़ी का बना हुवा था। चुनान्चे हज़रते तुफ़ैल बिन अम्र दौसी رضی الله تعالی عنه ने वहां जा कर बुत खाने को मुन्हदिम कर दिया और बुत को जला दिया। बुत को जलाते वक्त वोह इन अशआर को पढ़ते जाते थे :
ऐ जल कफ़ैन ! मैं तेरा बन्दा नहीं हूं
मेरी पैदाइश तेरी पैदाइश से बड़ी है
में ने तेरे दिल मे आग लगा दी है
हज़रते तुफ़ैल बिन अम्र दौसी رضی الله تعالی عنه चार दिन में इस मुहिम से फ़ारिग हो कर हुज़ूर ﷺ के पास ताइफ में पहुंच गए। येह “जल कफ़ैन" से कल्आ तोड़ने के आलात मिन्जनीक वगैरा भी लाए थे। चुनान्चे इस्लाम में सब से पहली येही मिन्जनीक है जो ताइफ़ का कल्आ तोड़ने के लिये लगाई गई। मगर कुफ्फ़ार की फ़ौजों ने तीर अन्दाजी के साथ साथ गर्म गर्म लोहे की सलाखें फेंकनी शुरू कर दीं इस वजह से कल्आ तोड़ने में काम्याबी न हो सकी।
इसी तरह हुज़ूर ﷺ ने हज़रते अली رضی الله تعالی عنه को भेजा कि ताइफ के अतराफ़ में जो जा बजा षक़ीफ़ के बुत खाने हैं उन सब को मुन्हदिम कर दें। चुनान्चे आप उन सब बुतों और बुत ख़ानों को तोड़ फोड़ कर मिस्मार व बरबाद कर दिया। और जब लौट कर ख़िदमते अक्दस में हाज़िर हुए तो हुज़ूर ﷺ इन को देख कर बेहद खुश हुए और बहुत देर तक इन से तन्हाई में गुफ़्तगू फ़रमाते रहे, जिस से लोगों को बहुत तअज्जुब हुवा।
ताइफ़ से रवानगी के वक्त सहाबए किराम ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! आप क़बीलए षकीफ़ के कुफ़्फ़ार के लिये हलाकत की दुआ फ़रमा दीजिये। तो आप ने दुआ मांगी कि “या अल्लाह ! षकीफ़ को हिदायत दे और इन को मेरे पास पहुंचा दे।" चुनान्चे आपकी येह दुआ मक़बूल हुई की क़बीलए षकीफ़ का वफ़द मदीने पहुंचा और पूरा क़बीला मुशर्रफ़ ब इस्लाम हो गया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 462*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 315)
अन्सारियों से खिताब :
जिन लोगों को आप ﷺ ने बड़े बड़े इन्आमात से नवाजा वोह उमूमन मक्का वाले नौ मुस्लिम थे। इस पर बा'ज़ नौ जवान अन्सारियों ने कहा कि : "रसूलुल्लाह ﷺ कुरैश को इस क़दर अता फ़रमा रहे हैं और हम लोगों का कुछ भी ख़याल नहीं फ़रमा रहे हैं। हालां कि हमारी तलवारों से ख़ून टपक रहा है।" और अन्सार के कुछ नौ जवानों ने आपस में येह भी कहा और अपनी दिल शिकनी का इज़हार किया कि जब शदीद जंग का मौक़ा होता है तो हम अन्सारियों को पुकारा जाता है और ग़नीमत दूसरे लोगों को दी जा रही है। आप ﷺ ने जब येह चर्चा सुना तो तमाम अन्सारियों को एक खैमे में जम्अ फ़रमाया और उन से इर्शाद फ़रमाया कि ऐ अन्सार ! क्या तुम लोगों ने ऐसा ऐसा कहा है ? लोगों ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! हमारे सरदारों में से किसी ने भी कुछ नहीं कहा है। हां चन्द नई उम्र के लड़कों ने ज़रूर कुछ कह दिया है।
हुज़ूर ﷺ ने अन्सार को मुखातब फ़रमा कर इर्शाद फ़रमाया कि : क्या येह सच नहीं है कि तुम पहले गुमराह थे मेरे जरीए से खुदा ने तुम को हिदायत दी, तुम मुतफ़र्रिक और परा गन्दा थे, खुदा ने मेरे जरीए तुम में इत्तिफ़ाक़ व इत्तिहाद पैदा फ़रमाया, तुम मुफ्लिस थे, खुदा ने मेरे जरीए से तुम को ग़नी बना दिया। हुज़ूर ﷺ येह फ़रमाते जाते थे और अन्सार आप के हर जुम्ले को सुन कर येह कहते जाते थे कि "अल्लाह और रसूल का हम पर बहुत बड़ा एहसान है।"
आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया कि ऐ अन्सार ! तुम लोग यूं मत कहो, बल्कि मुझ को येह जवाब दो कि या रसूलल्लाह ﷺ जब लोगों ने आप को झुटलाया तो हम लोगों ने आप की तस्दीक की। जब लोगों ने आप को छोड़ दिया तो हम लोगों ने आप को ठिकाना दिया। जब आप बे सरो सामानी की हालत में आए तो हम ने हर तरह से आप की ख़िदमत की। लेकिन ऐ अन्सारियो ! मैं तुम से एक सुवाल करता हूं तुम मुझे इस का जवाब दो। सुवाल येह है कि क्या तुम लोगों को येह पसन्द नहीं कि सब लोग यहां से माल व दौलत ले कर अपने घर जाएं और तुम लोग अल्लाह के नबी को ले कर अपने घर जाओ। खुदा की क़सम ! तुम लोग जिस चीज़ को ले कर अपने घर जाओगे वोह उस माल व दौलत से बहुत बढ़ कर है जिस को वोह लोग ले कर अपने घर जाएंगे।
येह सुन कर अन्सार बे इख़्तियार चीख पड़े कि या रसूलल्लाह ﷺ हम इस पर राज़ी हैं। हम को सिर्फ अल्लाह का रसूल चाहिये और अकषर अन्सार का तो येह हाल हो गया कि वोह रोते रोते बे करार हो गए और आंसूओं से उन की दाढ़ियां तर हो गई। फिर आप ﷺ ने अन्सार को समझाया कि मक्का के लोग बिल्कुल ही नौ मुस्लिम हैं। मैं ने इन लोगों को जो कुछ दिया है येह उन के इस्तिहकाक की बिना पर नहीं है बल्कि सिर्फ उन के दिलों में इस्लाम की उल्फ़त पैदा करने की गरज से दिया है, फिर इर्शाद फरमाया कि अगर हिजरत न होती तो मैं अन्सार में से होता और अगर तमाम लोग किसी वादी और घाटी में चलें और अन्सार किसी दूसरी वादी और घाटी में चलें तो मैं अन्सार की वादी और घाटी में चलूंगा।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 464*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 316)
कैदियों की रिहाई #01 :
आप जब अम्वाले गनीमत की तक्सीम से फ़ारिग हो चुके तो क़बीलए बनी सा'द के रईस ज़हीर अबू सर्द चन्द मुअज्ज़िज़ीन के साथ बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुए और असीराने जंग की रिहाई के बारे में दरख्वास्त पेश की। इस मौक़अ पर ज़हीर अबू सर्द ने एक बहुत मुअष्षिर तकरीर की, जिस का खुलासा यह है कि
ऐ मुहम्मद ! आप ने हमारे खानदान की एक औरत हलीमा का दूध पिया है। आप ने जिन औरतों को इन छपरों में क़ैद कर रखा है उन में से बहुत सी आप की (रज़ाई) फूफियां और बहुत सी आप की खालाएं हैं। खुदा की क़सम ! अगर अरब के बादशाहों में से किसी बादशाह ने हमारे खानदान की किसी औरत का दूध पिया होता तो हम को उस से बहुत ज़ियादा उम्मीदें होतीं और आप से तो और भी जियादा हमारी तवक्कुआत वाबस्ता हैं। लिहाज़ा आप इन सब कैदियों को रिहा कर दीजिये।
ज़हीर की तकरीर सुन कर हुज़ूर ﷺ बहुत ज़ियादा मुतअष्षिर हुए और आप ने फ़रमाया कि मैं ने आप लोगों का बहुत ज़ियादा इन्तिज़ार किया मगर आप लोगों ने आने में बहुत ज़ियादा देर लगा दी। बहर कैफ़ मेरे ख़ानदान वालों के हिस्से में जिस कदर लौंडी गुलाम आए हैं। मैं ने उन सब को आज़ाद कर दिया। लेकिन अब आम रिहाई की तदबीर येह है कि नमाज़ के वक्त जब मज़्मअ हो तो आप लोग अपनी दरख्वास्त सब के सामने पेश करें। चुनान्चे नमाज़े ज़ोहर के वक्त उन लोगों ने येह दरख्वास्त मज्मअ के सामने पेश की और हुज़ूर ﷺ ने मज्मअ के सामने येह इर्शाद फ़रमाया कि मुझ को सिर्फ अपने ख़ानदान वालों पर इख़्तियार है लेकिन मैं तमाम मुसलमानों से सिफारिश करता हूं कि कैदियों को रिहा कर दिया जाए येह सुन कर तमाम अन्सार व मुहाजिरीन और दूसरे तमाम मुजाहिदीन ने भी अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ! हमारा हिस्सा भी हाज़िर है। आप इन लोगों को भी आज़ाद फ़रमा दें। इस तरह दफ्तन छे हज़ार असीराने जंग की रिहाई हो गई।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 466*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 317)
कैदियों की रिहाई #02 :
बुख़ारी शरीफ़ की रिवायत यह है कि हुज़ूर ﷺ दस दिनों तक "हवाजुन" के वफ़द का इन्तिज़ार फ़रमाते रहे। जब वोह लोग न आए तो आप ने माले गनीमत और कैदियों को मुजाहिदीन के दरमियान तक़्सीम फ़रमा दिया। इस के बाद जब "हवाजुन" का वफ्द आया और उन्हों ने अपने इस्लाम का एलान कर के येह दरख्वास्त पेश की, कि हमारे माल और कैदियों को वापस कर दिया जाए तो हुजू़र ﷺ ने फ़रमाया कि मुझे सच्ची बात ही पसन्द है। लिहाज़ा सुन लो ! कि माल और कैदी दोनों को तो मैं वापस नहीं कर सकता। हां इन दोनों में से एक को तुम इख़्तियार कर लो या माल ले लो या कैदी। येह सुन कर वफ़द ने कैदियों को वापस लेना मंजूर किया। इस के बा'द आप ने फौज के सामने एक खुत्बा पढ़ा और हम्दो षना के बाद इर्शाद फ़रमाया कि :
ऐ मुसलमानों ! येह तुम्हारे भाई ताइब हो कर आ गए हैं और मेरी येह राय है कि मैं इन कैदियों को वापस कर दूं तो तुम में से जो खुशी खुशी इस को मंजूर करे वोह अपने हिस्से के कैदियों को वापस कर दे और जो येह चाहे कि इन कैदियों के बदले में दूसरे कैदियों को ले कर इन को वापस करे तो मैं येह वादा करता हूं कि सब से पहले अल्लाह तआला मुझे जो गनीमत अता फरमाएगा मैं उस में उस का हिस्सा दूंगा। यह सुन कर सारी फ़ौज ने कह दिया कि या रसूलल्लाह ﷺ! हम सब ने खुशी खुशी सब कैदियों को वापस कर दिया। आप ने इर्शाद फ़रमाया कि इस तरह पता नहीं चलता कि किस ने इजाज़त दी और किस ने नहीं दी ? लिहाज़ा तुम लोग अपने अपने चौधरियों के जरीए मुझे खबर दो। चुनान्चे हर क़बीले के चौधरियों ने दरबारे रिसालत में आ कर अर्ज कर दिया कि हमारे क़बीले वालों ने खुश दिली के साथ अपने हिस्से के कैदियों को वापस कर दिया है।
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 318)
गैब दां रसूल :
रसूलुल्लाह ﷺ ने हवाजुन के वफ़द से दरयाफ्त फ़रमाया कि मालिक बिन औफ़ कहां है ? उन्हों ने बताया कि वोह "षक़ीफ़" के साथ ताइफ़ में है। आप ने फ़रमाया कि तुम लोग मालिक बिन औफ़ को ख़बर कर दो कि अगर वोह मुसलमान हो कर मेरे पास आ जाए तो मैं उस का सारा माल उस को वापस दे दूंगा। इस इलावा उस को एक सो ऊंट और भी दूंगा। मालिक बिन औफ़ को जब येह ख़बर मिली तो वोह रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में मुसलमान हो कर हाज़िर हो गए और हुज़ूर ﷺ ने उन का कुल माल उन के सिपुर्द फ़रमा दिया और वादे के मुताबिक़ एक सो ऊंट इस के इलावा भी इनायत फ़रमाए। मालिक बिन औफ़ आप ﷺ के इस खुल्के अजीम से बेहद मुतअष्षिर हुए और आप की मद्ह में एक क़सीदा पढ़ा जिस के दो शे'र येह हैं : तमाम इन्सानों में हज़रत मुहम्मद ﷺ का मिष्ल न मैं ने देखा न सुना जो सब से जियादा वादे को पूरा करने वाले और सब से ज़ियादा माले कषीर अता फरमाने वाले हैं। और जब तुम चाहो उन से पूछ लो वोह कल आयन्दा की ख़बर तुम को बता देंगे।
रिवायत है कि ना'त के येह अश्आर सुन कर हुज़ूर ﷺ इन से खुश हो गए और इन के लिये कलिमाते खैर फ़रमाते हुए इन्हें बतौरे इन्आम एक हुल्ला भी इनायत फ़रमाया।
उम्रए जिइर्राना : इस के बाद नबिय्ये करीम ﷺ ने जिइराना ही से उमरे का इरादा फ़रमाया और एहराम बांध कर मक्का तशरीफ ले गए और उमरह अदा करने के बाद फिर मदीने वापस तशरीफ ले गए और जुल का'दह सि. 8 हि. को मदीने में दाखिल हुए।
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 319)
सि. 8 हि. के मुतफ़र्रिक वाकिआत :
(1) इसी साल रसूलुल्लाह ﷺ के फ़रज़न्द हज़रते इब्राहीम رضی الله تعالی عنه हज़रते मारिया क़िब्तिया رضی الله تعالی عنها के शिकम से पैदा हुए। हुज़ूर ﷺ को इन से बेपनाह महब्बत थी। तकरीबन डेढ़ साल की उम्र में इन की वफ़ात हो गई। इत्तिफ़ाक़ से जिस दिन इन की वफ़ात हुई सूरज ग्रहन हुवा चूंकि अरबों का अक़ीदा था कि किसी अज़ीमुश्शान इन्सान की मौत पर सूरज ग्रहन लगता है। इस लिये लोगों ने येह ख़याल कर लिया कि येह सूरज ग्रहन हज़रते इब्राहीम की वफ़ात का नतीजा है। जाहिलिय्यत के इस अक़ीदे को दूर फ़रमाने के लिये हुज़ूर ﷺ ने एक खुत्बा दिया जिस में आप ने इर्शाद फ़रमाया कि चांद और सूरज में किसी की मौत व हयात की वजह से ग्रहन नहीं लगता बल्कि अल्लाह तआला इस के जरीए अपने बन्दों को ख़ौफ़ दिलाता है। इस के बाद आप ﷺ ने नमाज़े कुसूफ़ जमाअत के साथ पढ़ी।
(2) इसी साल हुज़ूर ﷺ की साहिब ज़ादी हज़रते जैनब رضی الله تعالی عنها ने वफात पाई। ये साहिब ज़ादी साहिबा हज़रते अबुल आस बिन रबीअ رضی الله تعالی عنه की मन्कूहा थीं। इन्हों ने एक फ़रज़न्द जिस का नाम "अली" था और एक लड़की जिन का नाम “इमामा” था, अपने बाद छोड़ा। हज़रते बीबी फ़ातिमा ज़हरा رضی الله تعالی عنها ने हज़रते अली मुर्तजा رضی الله تعالی عنه को वसिय्यत की थी कि मेरी वफ़ात के बाद आप हज़रते इमामा से निकाह कर लें। चुनान्चे हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने हज़रते सय्यिदा फ़ातिमा رضی الله تعالی عنها की वसिय्यत पर अमल किया।
(3) इसी साल मदीने में गल्ले की गिरानी बहुत ज़ियादा बढ़ गई तो सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم ने दरख्वास्त की, कि या रसूलल्लाह ﷺ आप गल्ले का भाव मुक़र्रर फरमा दे तो हुज़ूर ﷺ ने गल्ले की क़ीमत पर कन्ट्रोल फ़रमाने से इन्कार फ़रमा दिया और इर्शाद फ़रमाया कि अल्लाह ही भाव मुक़र्रर फ़रमाने वाला है वोही रोज़ी को तंग करने वाला, कुशादा करने वाला, रोज़ी रसां है।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 470*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 320)
सि. 8 हि. के मुतफ़र्रिक वाकिआत :
(4) बा'ज़ मुअर्रिखीन के बक़ौल इसी साल मस्जिदे नबवी में मिम्बर शरीफ़ रखा गया। इस से क़ब्ल हुज़ूर ﷺ एक सुतून से टेक लगा कर खुत्बा पढ़ा करते थे और बा'ज़ मुअर्रिख़ीन का कौल है कि मिम्बर सि. 7 हि. में रखा गया। येह मिम्बर लकड़ी का बना हुवा था जो एक अन्सारी औरत ने बनवा कर मस्जिद में रखवाया था। हज़रते अमीरे मुआविया رضی الله تعالی عنه ने चाहा कि मैं इस मिम्बर को तबर्रुकन मुल्के शाम ले जाऊं मगर उन्हों ने जब इस को इस की जगह से हटाया तो अचानक सारे शहर में ऐसा अंधेरा छा गया कि दिन में तारे नज़र आने लगे। येह मन्ज़र देख कर हज़रते अमीरे मुआविया رضی الله تعالی عنه बहुत शरमिन्दा हुए और सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم से मा'ज़िरत ख़्वाह हुए और उन्हों ने इस मिम्बर के नीचे तीन सीढ़ियों का इज़ाफ़ा कर दिया। जिस से मिम्बर की तीनों पुरानी सीढ़ियां ऊपर हो गई ताकि हुज़ूर ﷺ और खुलफ़ाए राशिदीन जिन सीढ़ियों पर खड़े हो कर खुत्बा पढ़ते थे अब दूसरा कोई खतीब उन पर क़दम न रखे। जब येह मिम्बर बहुत ज़ियादा पुराना हो कर इन्तिहाई कमज़ोर हो गया तो खुलफ़ाए अब्बासिया ने भी इस की मरम्मत कराई।
(5) इसी साल क़बीलए अब्दिल कैस का वफ़द हाज़िरे ख़िदमत हुवा। हुज़ूर ﷺ ने उन लोगों को खुश आमदीद कहा और उन लोगों के हक़ में यूं दुआ फ़रमाई कि “ऐ अल्लाह ! तू अब्दिल कैस को बख़्श दे" जब येह लोग बारगाहे रिसालत में पहुंचे तो अपनी सुवारियों से कूद कर दौड़ पड़े और हुज़ूर ﷺ के मुक़द्दस कदम को चूमने लगे और आप ﷺ ने उन लोगों को मन्अ नहीं फ़रमाया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 470*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 321)
सि. 9 हि. : सि. 9 हि. बहुत से वाकिआते अजीबा से लबरेज़ है। लेकिन चन्द वाकआत बहुत ही अहम हैं जिन को मुअर्रिख़ीन ने बहुत ही बस्तो तफ्सील के साथ ज़िक्र किया है।
आयते तख़्यीर व ईलाअ #01 : "तख़्यीर" और "ईला" येह शरीअत के दो इस्तिलाही अल्फ़ाज़ हैं। शोहर अपनी बीवी को अपनी तरफ से येह इख़्तियार दे दे कि वोह चाहे तो तलाक़ ले ले और चाहे तो अपने शोहर ही के निकाह में रह जाए इस को “तख़्यीर" कहते हैं। और “ईला" येह है कि शोहर येह कसम खा ले कि मैं अपनी बीवी से सोहबत नहीं करूंगा। हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने एक मरतबा अपनी अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن से नाराज़ हो कर एक महीने का “ईलाअ" फ़रमाया या'नी आप ﷺ ने येह कसम खा ली कि मैं एक माह तक अपनी अज़्वाजे मुक़द्दसा से सोहबत नहीं करूंगा। फिर इस के बाद आप ﷺ ने अपनी तमाम मुक़द्दस बीवियों को तलाक़ हासिल करने का इख़्तियार भी सोंप दिया मगर किसी ने भी तलाक़ लेना पसन्द नहीं किया।
हुज़ूर ﷺ की ना राज़ी और इताब का सबब क्या था और आपने "तख़्यीर व ईलाअ" क्यूं फ़रमाया ? इस का वाक़िआ येह है कि हुज़ूरे अदस ﷺ की मुक़द्दस बीवियां तकरीबन सब मालदार और बड़े घरानों की लड़कियां थीं। “हज़रते उम्मे हबीबा" رضی الله تعالی عنها रईसे मक्का हज़रते अबू सुफ्यानकी साहिब जादी थीं। “हज़रते जुवैरिया" رضی الله تعالی عنها कबीलए बनी अल मुस्तलक के सरदारे आज़म हारिष बिन ज़रार की बेटी थीं। "हज़रते सफिय्या" رضی الله تعالی عنها बनू नज़ीर और खैबर के रईसे आज़म हुयैय बिन अख़्तब की नूरे नज़र थीं। "हज़रते आइशा" رضی الله تعالی عنها हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه की प्यारी बेटी थीं। "हज़रते हफ्सा" رضی الله تعالی عنها हज़रते उमर फारूक رضی الله تعالی عنه की चहीती साहिब जादी थीं। "हजरते जैनब बिन्ते जहश" और “हज़रते उम्मे सलमह" رضی الله تعالی عنهما भी खानदाने कुरैश के ऊंचे ऊंचे घरों की नाज़ो ने'मत में पली हुई लड़कियां थीं। जाहिर है कि येह अमीर ज़ादियां बचपन से अमीराना ज़िन्दगी और रईसाना माहोल की आदी थीं और इन का रहन सहन, खुर्दो नोश, लिबास व पोशाक सब कुछ अमीर जादियों की रईसाना ज़िन्दगी का आईना दार था,
और ताजदारे दो आलम ﷺ की मुक़द्दस ज़िन्दगी बिल्कुल ही जाहिदाना और दुन्यवी तकल्लुफ़ात से यक्सर बेगाना थी। दो दो महीने काशानए नुबुव्वत में चूल्हा नहीं जलता था। सिर्फ खजूर और पानी पर पुरे घराने की ज़िन्दगी बसर होती थी। लिबास व पोशाक में भी पैग़म्बराना ज़िन्दगी की झलक थी मकान और घर के साजो सामान में भी नुबुव्वत की सा-दगी नुमायां थी। हुज़ूर ﷺ अपने सरमाए का अकशरो बेशतर हिस्सा अपनी उम्मत के गुरबा व फुकुरा पर सर्फ फरमा देते थे। और अपनी अज़्वाजे मुतहहरात को ब क़दरे ज़रूरत ही खर्च अता फरमाते थे जो इन रईस ज़ादियों के हस्बे ख़्वाह जैबो जीनत और आराइश व जैबाइश के लिये काफ़ी नहीं होता था। इस लिये कभी कभी इन उम्मत की माओं का पैमानए सब्रो कनाअत लबरेज़ हो कर छलक जाता था और वोह हुज़ूर ﷺ से मज़ीद रक़मों का मुतालबा और तक़ाज़ा करने लगती थीं। चुनान्चे एक मरतबा अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن ने मुत्तफ़िका तौर पर आप से मुतालबा किया कि आप हमारे अख़राजात में इजाफा फरमाएं। अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن की येह अदाएं महरे नुबुव्वत के कल्बे नाज़ पर बार गुज़रीं और आप के सुकूने खातिर में इस कदर ख़लल अन्दाज़ हुई कि आप ने बरहम हो कर येह क़सम खा ली कि एक महीने तक अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن से न मिलेंगे। इस तरह एक माह का आपने "ईला" फ़रमा लिया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 472*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 322)
आयते तख्यीर व ईलाअ #02 :
आप ﷺ ने एक माह का "इलाअ" फ़रमा लिया। अजीब इत्तिफ़ाक़ कि इन्ही अय्याम में आप ﷺ घोड़े से गिर पड़े जिस से आप की मुबारक पिंडली में मोच आ गई। इस तक्लीफ़ की वजह से आप ने बालाखाने पर गोशा नशीनी इख़्तियार फ़रमा ली और सब से मिलना जुलना छोड़ दिया। सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم ने वाकिआत के क़रीनों से ये कियास आराई कर ली कि आप ﷺ ने अपनी तमाम मुक़द्दस बीवियों को तलाक़ दे दी और येह ख़बर जो बिल्कुल ही ग़लत थी बिजली की तरह फैल गई। और तमाम सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم रन्जो गम से परेशान हाल और इस समए जांकाह से निढाल होने लगे। इस के बाद जो वाकआत पेश आए वोह बुख़ारी शरीफ़ की मुतअद्दद रिवायात में मुफ़स्सल तौर पर मजकूर हैं। इन वाकआत का बयान हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه की ज़बान से सुनिये।
हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه का बयान है कि मैं और मेरा एक पड़ोसी जो अन्सारी था हम दोनों ने आपस में येह तै कर लिया था कि हम दोनों एक एक दिन बारी बारी से बारगाहे रिसालत में हाज़िरी दिया करेंगे और दिन भर के वाकिआत से एक दूसरे को मुत्तलअ करते रहेंगे। एक दिन कुछ रात गुज़रने के बाद मेरा पड़ोसी अन्सारी आया और ज़ोर ज़ोर से मेरा दरवाज़ा पीटने और चिल्ला चिल्ला कर मुझे पुकारने लगा। मैं ने घबरा कर दरवाज़ा खोला तो उस ने कहा कि आज गज़ब हो गया। मैंने उस से पूछा कि क्या गस्सानियों ने मदीने पर हम्ला कर दिया ? (उन दिनों शाम के गस्सानी मदीने पर हम्ले की तय्यारियां कर रहे थे।) अन्सारी ने जवाब दिया कि अजी इस से भी बढ़ कर हादिषा रूनुमा हो गया। वोह येह कि हुज़ूर ﷺ ने अपनी तमाम बीवियों को तलाक़ दे दी। हज़रते उमर कहते हैं कि मैं इस ख़बर से बेहद मुतवह्हीश हो गया और अलस्सबाह मैं ने मदीने पहुंच कर मस्जिदे मैं नबवी में नमाज़े फज्र अदा की। हुज़ूर ﷺ नमाज़ से जे फ़ारिग होते ही बालाखाने पर जा कर तन्हा तशरीफ़ फ़रमा हो गए और किसी से कोई गुफ्तगू नहीं फ़रमाई।
मैं मस्जिद से निकल कर अपनी बेटी हफ्सा के घर गया तो देखा कि वोह बैठी रो रही है। मैं ने उस से कहा कि मैं ने पहले ही तुम को समझा दिया था कि तुम रसूलुल्लाह ﷺ को तंग मत किया करो और तुम्हारे अख़राजात में जो कमी करे वोह मुझ से मांग लिया करो मगर तुम ने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया। फिर मैं ने पूछा कि क्या रसूलुल्लाह ﷺ ने सभों को तलाक़ दे दी है ? हफ्सा ने कहा मैं कुछ नहीं जानती। रसूलुल्लाह ﷺ बालाखाने पर हैं आप उन से दरयाफ्त करें। मैं वहां से उठ कर मस्जिद में आया तो सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم को भी देखा कि वोह मिम्बर के पास बैठे रो रहे हैं। मैं उन के पास थोड़ी देर बैठा लेकिन मेरी तबीअत में सुकून व क़रार नहीं था। इस लिये मैं उठ कर बालाखाने के पास आया और पहरेदार गुलाम "रबाह" से कहा कि तुम मेरे लिये अन्दर आने की इजाजत तलब करो। रबाह ने लौट कर जवाब दिया कि मैं ने अर्ज़ कर दिया लेकिन आप ﷺ ने कोई जवाब नहीं दिया। मेरी उलझन और बेताबी और ज़ियादा बढ़ गई और मैं ने दरबान से दोबारा इजाज़त तलब करने की दरख्वास्त की फिर भी कोई जवाब नहीं मिला। तो मैं ने बुलन्द आवाज़ से कहा कि ऐ रबाह ! तुम मेरा नाम ले कर इजाज़त तलब करो। शायद रसूलुल्लाह ﷺ को येह ख़याल हो कि मैं अपनी बेटी हफ्सा के लिये कोई सिफ़ारिश ले कर आया हूं। तुम अर्ज़ कर दो कि खुदा की क़सम ! अगर रसूलुल्लाह ﷺ मुझ हुक्म फ़रमाएं तो मैं अभी अभी अपनी तलवार से अपनी बेटी हफ्सा की गरदन उड़ा दूं।
इस के बाद मुझ को इजाज़त मिल गई जब मैं बारगाहे रिसालत में बारयाब हुवा तो मेरी आंखों ने येह मन्ज़र देखा कि आप ﷺ एक खरीबान की चारपाई पर लैटे हुए हैं और आप के जिस्मे नाजुक पर बान के निशान पड़े हुए हैं फिर मैं ने नज़र उठा कर इधर उधर देखा तो एक तरफ़ थोड़े से "जव" रखे हुए थे और एक तरफ़ एक खाल खूंटी पर लटक रही थी। ताजदारे दो आलम के खजाने की येह काएनात देख कर मेरा दिल भर आया और मेरी आंखों में आंसू आ गए। हुज़ूर ﷺ ने मेरे रोने का सबब पूछा तो मैं ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ! इस से बढ़ कर रोने का और कौन सा मौक़अ होगा ? कि कैसर व किस्रा खुदा के दुश्मन तो नेमतों में डूबे हुए ऐशो इशरत की ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं और आप खुदा के रसूले मुअज्ज़म होते हुए भी इस हालत में हैं। आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया कि ऐ उमर ! क्या तुम इस पर राज़ी नहीं हो कि कैसर व किस्रा दुन्या लें और हम आखिरत!
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 323)
आयते तख्यीर व ईलाअ #03 :
इस के बाद मैं ने हुज़ूर ﷺ को मानूस करने के लिये कुछ और भी गुफ्तगू की यहां तक कि मेरी बात सुन कर हुज़ूर ﷺ के लबे अन्वर पर तबस्सुम के आषार नुमायां हो गए। उस वक्त मैं ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ क्या आप ने अपनी अज़्वाजे मुतहहरात को तलाक़ दे दी है ? आप ﷺ ने फ़रमाया कि “नहीं”। मुझे इस क़दर खुशी हुई कि फ़र्ते मुसर्रत से मैं ने तक्बीर का नारा मारा। फिर मैं ने येह गुज़ारिश की या रसूलल्लाह ﷺ सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم मस्जिद में ग़म के मारे बैठे रो रहे हैं अगर इजाज़त हो तो मैं जा कर उन लोगों को मुत्तलअ कर दूं कि तलाक़ की खबर सरासर गलत है। चुनान्चे मुझे इस की इजाज़त मिल गई और मैं ने जब आ कर सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم को इस की ख़बर दी तो सब लोग खुश हो कर हश्शाश बश्शाश हो गए और सब को सुकून व इत्मीनान हासिल हो गया।
जब एक महीना गुज़र गया और हुज़ूर ﷺ की क़सम पूरी हो गई तो आप बालाखाने से उतर आए इस के बाद ही आयते तख़्यीर नाज़िल हुई जो येह है : _ऐ नबी ! अपनी बीवियों से फ़रमा दीजिये कि अगर तुम दुन्या की ज़िन्दगी और इस की आराइश चाहती हो तो आओ मैं तुम्हें कुछ माल दूं और अच्छी तरह छोड़ दूं और अगर तुम अल्लाह और उस के रसूल और आख़िरत का घर चाहती हो तो बेशक अल्लाह ने तुम्हारी नेकी वालियों के लिये बहुत बड़ा अज्र तय्यार कर रखा है।_
इन आयाते बय्यिनात का मा हसल और खुलासए मतलब यह है कि रसूले खुदा ﷺ को खुदा वन्दे कुद्दूस ने येह हुक्म दिया कि आप अपनी मुक़द्दस बीवियों को मुत्तलअ फ़रमा दें कि दो चीजें तुम्हारे सामने हैं। एक दुन्या की जीनत व आराइश दूसरी आख़िरत की नेमत। अगर तुम दुन्या की जैबो जीनत चाहती हो तो पैगम्बर की ज़िन्दगी चूंकि बिल्कुल ही जाहिदाना ज़िन्दगी है इस लिये पैग़म्बर के घर में तुम्हें येह दुन्यवी जीनत व आराइश तुम्हारी मरजी के मुताबिक नहीं मिल सकती, लिहाज़ा तुम सब मुझ से जुदाई हासिल कर लो। मैं तुम्हें रुख़सती का जोड़ा पहना कर और कुछ माल दे कर रुख़सत कर दूंगा। और अगर तुम खुदा व रसूल और आख़िरत की नेमतों की तलब गार हो तो फिर रसूले खुदा के दामने रहमत से चिमटी रहो। खुदा ने तुम नेकूकारों के लिये बहुत ही बड़ा अज्रो षवाब तय्यार कर रखा है जो तुम को आखि़रत में मिलेगा।
इस आयत के नुज़ूल के बाद सब से पहले हुज़ूर ﷺ हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها के पास तशरीफ़ ले गए और फ़रमाया कि ऐ आइशा ! मैं तुम्हारे सामने एक बात रखता हूं मगर तुम इस के जवाब में जल्दी मत करना और अपने वालिदैन से मश्वरा कर के मुझे जवाब देना। इस के बाद आप ने आयत तिलावत फ़रमा कर उन को सुनाई तो उन्हों ने बर जस्ता अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ इस मुआमले में भला मैं क्या अपने वालिदैन से मश्वरा करूं मैं अल्लाह और उस के रसूल और आखिरत के घर को चाहती हूं।, फिर आप ﷺ ने यके बाद दीगरे तमाम अज़्वाजे मुतहहरात को अलग अलग आयते तख़्यीर सुना सुना कर सब को इख़्तियार दिया और सब ने वोही जवाब दिया जो हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها ने जवाब दिया था।
अल्लाहु अक्बर ! येह वाकिआ इस बात की आफ्ताब से ज़ियादा रोशन दलील है कि अज़्वाजे मुतहहरात को हुज़ूर ﷺ की जात से किस क़दर आशिकाना शैफ्तगी और वालिहाना महब्बत थी कि कई कई सोकनों की मौजूदगी और ख़ानए नुबुव्वत की सादा और जाहिदाना तर्ज़े मुआशरत और तंगी तुर्शी की ज़िन्दगी के बा वुजूद येह रईस ज़ादियां एक लम्हे के लिये भी रसूल के दामने रहमत से जुदाई गवारा नहीं कर सकती थीं।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 478*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 324)
एक गलत फहमी का इज़ाला :
अहादीष की रिवायतों और तफ्सीरों में "ईलाअ" आयते "तख्यीर" और हज़रते आइशा व हफ्सा رضی الله تعالی عنهما का "मुज़ाहरा" इन वाकिआत को आम तौर पर अलग अलग इस तरह बयान किया गया है कि गोया येह मुख़्तलिफ़ ज़मानों के मुख़्तलिफ़ वाकआत हैं। इस से एक कम इल्म व कम फ़हम और ज़ाहिर बीन इन्सान को येह धोका हो सकता है कि शायद रसूले खुदा ﷺ और आप की अज़्वाजे मुतहहरात के तअल्लुक़ात खुश गवार न थे और कभी "ईलाअ" कभी "तख़्यीर” कभी "मुज़ाहरा" हमेशा एक न एक झगड़ा ही रहता था लेकिन अहले इल्म पर मख़्फ़ी नहीं कि येह तीनों वाकिआत एक ही सिल्सिले की कड़ियां हैं।
चुनान्चे बुख़ारी शरीफ़ की चन्द रिवायात खुसूसन बुख़ारी किताबुन्निकाह बाब मौई-ज़तुर्रजुल इब्नतुह लि हालि जौजुहा में हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنهما की जो मुफ़स्सल रिवायत है, उस में साफ़ तौर पर येह तसरीह है कि हुज़ूर ﷺ का इलाअ करना और अज़्वाजे मुतहरात से अलग हो कर बालाखाने पर तन्हा नशीनी कर लेना, हज़रते आइशा व हज़रते हफ्सा رضی الله تعالی عنهما का मुज़ा-हरा करना, आयते तख़्यीर का नाज़िल होना, येह सब वाकिआत एक दूसरे से मुन्सलिक और जुड़े हुए हैं और एक ही वक्त में यह सब वाक़ेअ हुए हैं। वरना हुज़ूर ﷺ और आप की आज़्वाजे मुतहहरात के खुश गवार तअल्लुकात जिस क़दर आशिकाना उल्फ़त व महब्बत के आईना दार रहे हैं क़ियामत तक इस की मिषाल नहीं मिल सकती और नुबुव्वत की मुक़द्दस ज़िन्दगी के बे शुमार वाकआत इस उल्फ़त व महब्बत के तअल्लुकात पर गवाह हैं। जो अहादीष व सीरत की किताबों में आस्मान के सितारों की तरह चमकने और दास्ताने इश्क़ो महब्बत के च-मनिस्तानों में मौसिमे बहार के फूलों की तरह महकते हैं।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 480*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 325)
आमिलों का तक़र्रुर :
हुज़ूर ﷺ ने सि. 9 हि. मुहर्रम के महीने में ज़कात व सदक़ात की वसूली के लिये आमिलों और मुहस्सिलों को मुख़्तलिफ़ क़बाइल में रवाना फ़रमाया। इन उमरा व आमिलीन की फेहरिस्त में मुन्दरिजए जैल हज़रात खुसूसिय्यत के साथ काबिले ज़िक्र हैं जिन को इब्ने सा'द ने ज़िक्र फ़रमाया है।
(1) हज़रते उयैना बिन हसन رضی الله تعالی عنه को बनी तमीम की तरफ,
(2) हज़रते यज़ीद बिन हुसैन رضی الله تعالی عنه को अस्लम व गिफार की तरफ,
(3) हज़रते उबाद बिन बिशर رضی الله تعالی عنه को सुलैम व मुज़ैना की तरफ,
(4) हज़रते राफेअ बिन मकीष رضی الله تعالی عنه को जुहैना की तरफ,
(5) हज़रते अम्र बिन अल आस رضی الله تعالی عنه को बनी फ़ज़ारा की तरफ,
(6) हज़रते जहाक बिन सुफ्यान رضی الله تعالی عنه को बनी किलाब की तरफ़,
(7) हजरते बिश्र बिन सुफ्यान رضی الله تعالی عنه को बनी काब की तरफ,
(8) हज़रते इब्नुल्लिबतिया को رضی الله تعالی عنه बनी ज़बयान की तरफ,
(9) हज़रते मुहाजिर बिन अलीय्या رضی الله تعالی عنه को सनआअ की तरफ़,
(10) हज़रते ज़ियाद बिन लुबैद अन्सारी رضی الله تعالی عنه को हजर मोत की तरफ,
(11) हज़रते अदी बिन हातिम رضی الله تعالی عنه को क़बीलए तय व बनी अस्अद की तरफ,
(12) हज़रते मालिक बिन नुवैरह رضی الله تعالی عنه को बनी हन्जला की तरफ,
(13) हज़रते जबरकान رضی الله تعالی عنه को बनी साद के निस्फ़ हिस्से की तरफ,
(14) हज़रते कैस बिन आसिम رضی الله تعالی عنه को बनी साद के निस्फ़ हिस्से की तरफ,
(15) हज़रते अलाअ बिन अल हज़रमी رضی الله تعالی عنه को बहरीन की तरफ,
(16) हज़रते अली رضی الله تعالی عنه को नजरान की तरफ
येह हुज़ूर शहनशाहे रिसालत ﷺ के उमरा और आमिलीन हैं जिन को आपने ज़कात व सदक़ा व जिज़या वसूल करने के लिये मुक़र्रर फ़रमाया था।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 481*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 326)
बनी तमीम का वफ्द :
मुहर्रम सि. 9 हि. में हुज़ूर ﷺ ने बिशर बिन सुफ्यान को बनी खजाआ के सदक़ात वसूल करने के लिये भेजा। उन्हों ने सदक़ात वसूल कर के जम्अ किये ना गहां इन पर बनी तमीम ने हम्ला कर दिया वोह अपनी जान बचा कर किसी तरह मदीना आ गए और सारा माजरा बयान किया। हुज़ूर ﷺ ने बनी तमीम की सरकूबी के लिये हज़रते उयैना बिन हसन फ़ज़ारी को पचास सुवारों के साथ भेजा। उन्हों ने बनी तमीम पर उन के सहरा में हम्ला कर के उन के ग्यारह मर्दों, इक्कीस औरतों और तीस लड़कों को गरिफ्तार कर लिया और उन सब कैदियों को मदीना लाए। इस के बाद बनी तमीम का एक वफ़द मदीना आया जिस में इस क़बीले के बड़े बड़े सरदार थे और इन का रईसे आ'जम अक़रअ बिन हाबिस और ईन का खतीब "अतारद" और शाईर "जबरकान बिन बद्र" भी इस वफ़द में साथ आए थे। येह लोग दन दनाते हुए काशानए नुबुव्वत के पास पहुंच गए और चिल्लाने लगे कि आप ने हमारी औरतों और बच्चों को किस जुर्म में गरिफ्तार कर रखा है।
उस वक्त हुज़ूर ﷺ हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها के हुजरए मुबारका में कैलूला फ़रमा रहे थे। हर चन्द हज़रते बिलाल और दूसरे सहाबा رضی الله تعالی عنهم ने उन लोगों को मन्अ किया कि तुम लोग काशानए नबवी के पास शोर न मचाओ। नमाज़े जोहर के लिये खुद हुज़ूर ﷺ मस्जिद में तशरीफ़ लाने वाले हैं। मगर येह लोग एक न माने शोर मचाते ही रहे जब आप ﷺ बाहर तशरीफ़ ला कर मस्जिदे नबवी में रौनक अफ़रोज़ हुए तो बनी तमीम का रईसे आज़म अक्रअ बिन हाबिस बोला कि ऐ मुहम्मद ! (ﷺ) हमें इज़ाज़त दीजिये कि हम गुफ्तगू करें क्यूं कि हम वोह लोग हैं कि जिस की मदह कर दें वोह मुज्य्यन हो जाता है और हम लोग जिस की मज़म्मत कर दें वोह ऐब से दाग़दार हो जाता है। हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि तुम लोग गलत कहते हो। येह खुदा वन्दे तआला ही की शान है कि उस की मद्ह जीनत और उस की मज़म्मत दाग है तुम लोग यह कहो कि तुम्हारा मक्सद क्या है ? येह सुन कर बनी तमीम कहने लगे कि हम अपने खतीब और अपने शाइर को ले कर यहां आए हैं ताकि हम अपने क़ाबिले फ़ख्र कारनामों को बयान करें और आप अपने मफ़ाख़िर को पेश करें।
आप ﷺ ने फ़रमाया कि न मैं शेरो शाईरी के लिये भेजा गया हूं न इस तरह की मुफ़ाख़रत का मुझे खुदा की तरफ से हुक्म मिला है। मैं तो खुदा का रसूल हूं इस के बावजूद अगर तुम येही करना चाहते हो तो मैं तय्यार हूं। येह सुनते ही अक़रअ बिन हाबिस ने अपने खतीब अतारद की तरफ़ इशारा किया। इस ने खड़े हो कर अपने मफ़ाख़िर और अपने आबाओ अजदाद के मनाकिब पर बड़ी फसाहत व बलागत के साथ एक धुआंधार खुत्बा पढ़ा। आप ﷺ ने अन्सार के खतीब हज़रते षाबित رضی الله تعالی عنه को जवाब देने का हुक्म फ़रमाया। उन्हों ने उठ कर बर जस्ता ऐसा फ़सीहो बलीग और मुअष्षिर खुतबा दिया कि बनी तमीम उन के ज़ोरे कलाम और मफ़ाख़िर की अजमत सुन कर दंग रह गए। और उन का खतीब अतारद भी हक्का बक्का हो कर शरमिन्दा हो गया फिर बनी तमीम का शाइर "ज़बरकान बिन बद्र" उठा और उस ने एक क़सीदा पढ़ा। आप ﷺ ने हज़रते हस्सान बिन षाबित رضی الله تعالی عنه को इशारा फ़रमाया तो उन्हों ने फ़िल बदीह एक ऐसा मुरस्सअ और फ़साहत व बलागत से मामूर क़सीदा पढ़ दिया कि बनी तमीम का शाइर उल्लू बन गया। बिल आखिर अक्रअ बिन हाबिस कहने लगा कि खुदा की क़सम ! मुहम्मद को गैब से ऐसा ताईद व नुसरत हासिल हो गई है कि हर फ़ज़्लो कमाल इन पर ख़त्म है। बिला शुबा इन का खतीब हमारे खतीब से जियादा फ़सीहो बलीग है और इन का शाइर हमारे शाइर से बहुत बढ़ चढ़ कर है। इस लिये इन्साफ़ का तक़ाज़ा येह है कि हम इन के सामने सरे तस्लीम ख़म करते हैं।
चुनान्चे येह लोग हुज़ूरे अक्दस ﷺ के मुतीओ फ़रमां बरदार हो गए और कलिमा पढ़ कर मुसलमान हो गए। फिर इन लोगों की दरख्वास्त पर हुज़ूर ﷺ ने इन के कैदियों को रिहा फ़रमा दिया और येह लोग अपने क़बीले में वापस चले गए। इन्ही लोगों के बारे में क़ुरआने मजीद की येह आयत नाज़िल हुई कि : _बेशक वोह जो आप को हुजरों के बाहर से पुकारते हैं। उन में अकषर बे अकल हैं और अगर वोह सब्र करते यहां तक कि आप उन के पास तशरीफ़ लाते तो येह उन के लिये बेहतर था और अल्लाह बख्शने वाला मेहरबान है।_
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 483*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 327)
हातिम ताई की बेटी और बेटा मुसलमान :
रबीउल आख़िर सि. 9 हि. में हुज़ूर ﷺ ने हज़रते अली رضی الله تعالی عنه की मा तहती में एक सो पचास सुवारों को इस लिये भेजा कि वोह क़बीलए "तय" के बुतखाने को गिरा दें। इन लोगों ने शहर फ़लस में पहुंच कर बुतखाने को मुन्हदिम कर डाला और कुछ ऊंटों और बकरियों को पकड़ कर और चन्द औरतों को गरिफ्तार कर के येह लोग मदीना लाए। इन कैदियों में मशहूर सखी हातिम ताई की बेटी भी थी। हातिम ताई का बेटा अदी बिन हातिम भाग कर मुल्के शाम चला गया। हातिम ताई की लड़की जब बारगाहे रिसालत में पेश की गई तो उस ने कहा कि या रसूलल्लाह मैं "हातिम ताई" की लड़की हूं। मेरे बाप का इन्तिकाल हो गया और मेरा भाई "अदी बिन हातिम" मुझे छोड़ कर भाग गया। मैं ज़ईफा हूं आप मुझ पर एहसान कीजिये खुदा आप पर एहसान करेगा। हुज़ूर ﷺ ने उन को छोड़ दिया और सफ़र के लिये एक ऊंट भी इनायत फ़रमाया। येह मुसलमान हो कर अपने भाई अदी बिन हातिम के पास पहुंची और उस को हुज़ूर ﷺ के अख़्लाक़े नुबुव्वत से आगाह किया और रसूलुल्लाह ﷺ की बहुत ज़ियादा तारीफ़ की।
अदी बिन हातिम अपनी बहन की जुबानी हुज़ूर ﷺ के खुल्के अज़ीम और आदाते करीमा के हालात सुन कर बेहद मुतअष्षिर हुए और बिगैर कोई अमान तलब किये हुए मदीना हाज़िर हो गए। लोगों ने बारगाहे नुबुव्वत में येह ख़बर दी कि अदी बिन हातिम आ गया है। हुज़ूर रहमतुल्लिल आ-लमीन ने इन्तिहाई करीमाना अन्दाज़ से अदी बिन हातिम के हाथ को अपने दस्ते रहमत में ले लिया और फ़रमाया कि ऐ अदी ! तुम किस चीज़ से भागे ? क्या "ला-इलाहा इल्लल्लाह" कहने से तुम भागे ? क्या खुदा के सिवा कोई और माबूद भी है ? अदी बिन हातिम ने कहा कि “नहीं” फिर कलिमा पढ़ लिया और मुसलमान हो गए इन के इस्लाम क़बूल करने से हुज़ूर ﷺ को इस कदर खुशी हुई कि फ़र्ते मुसर्रत से आप का चेहरए अन्वर चमकने लगा और आप ने इन को खुसूसी इनायात से नवाजा।
हज़रते अदी बिन हातिम رضی الله تعالی عنه भी अपने बाप हातिम की तरह बहुत ही सखी थे। हज़रते इमाम अहमद नाक़िल हैं कि किसी ने इन से एक सो दिरहम का सुवाल किया तो येह ख़फ़ा हो गए और कहा कि तुम ने फ़क़त एक सो दिरहम ही मुझ से मांगा तुम नहीं जानते कि मैं हातिम का बेटा हूं खुदा की क़सम ! तुम को इतनी हक़ीर रक़म नहीं दूंगा। येह बहुत ही शानदार सहाबी हैं, खिलाफ़ते सिद्दीके अक्बर मे जब बहुत से क़बाइल ने अपनी ज़कात रोक दी और बहुत से मुर्तद हो गए येह उस दौर में भी पहाड़ की तरह इस्लाम पर षाबित क़दम रहे और अपनी क़ौम की ज़कात ला कर बारगाहे ख़िलाफ़त में पेश की और इराक़ की फुतूहात और दूसरे इस्लामी जिहादों में मुजाहिद की हैषिय्यत से शरीक हुए और सि. 68 हि. में एक सो बीस बरस की उम्र पा कर विसाल फ़रमाया और सिहाह सित्ता की हर किताब में आप رضی الله تعالی عنه की रिवायत कर्दा हदीषें मज़्क़ुर हैं।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 485*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 328)
गज्वए तबूक #01 :
"तबूक" मदीना और शाम के दरमियान एक मक़ाम का नाम है जो मदीने से चौदह मन्ज़िल दूर है। बा'ज़ मुअर्रिख़ीन का क़ौल है कि "तबूक" एक कलए का नाम है और बा'ज़ का क़ौल है कि "तबूक" एक चश्मे का नाम है। मुमकिन है येह सब बातें मौजूद हों ! येह गज़्वा सख़्त कहत के दिनों में हुवा। तवील सफ़र, हवा गर्म, सुवारी कम, खाने पीने की तक्लीफ़, लश्कर की तादाद बहुत ज़ियादा, इस लिये इस ग़ज़्वे में मुसलमानों को बड़ी तंगी और तंग दस्ती का सामना करना पड़ा। येही वजह है कि इस गज़्वे को "जैशुल उसरह" (तंग दस्ती का लश्कर) भी कहते हैं और चूंकि मुनाफ़िकों को इस ग़ज़्वे में बड़ी शरमिन्दगी और शर्मसारी उठानी पड़ी थी। इस वजह से इसका एक नाम "ग़ज़्वए फ़ाज़िहा" (रुस्वा करने वाला गज़्वा) भी है। इस पर तमाम मुअर्रिखीन का इत्तिफ़ाक़ है कि इस गज्वे के लिये हुज़ूर ﷺ माहे रजब सि. 9 हि. जुमा'रात के दिन रवाना हुए।
*गज़्वए तबूक का सबब :* अरब का ग़स्सानी खानदान जो कैसरे रूम के ज़ेरे अषर मुल्के शाम पर हुकूमत करता था चूंकि वोह ईसाई था इस लिये कैसरे रूम ने इस को अपना आलए कार बना कर मदीने पर फ़ौज कशी का अज़्म कर लिया। चुनान्चे मुल्के शाम के जो सौदागर रोगने जैतून बेचने मदीने आया करते थे। उन्हों ने ख़बर दी कि कैसरे रूम की हुकूमत ने मुल्के शाम में बहुत बड़ी फ़ौज जम्अ कर दी है। और उस फ़ौज में रूमियों के इलावा क़बाइले लख्म व जुज़ाम व ग़स्सान के तमाम अरब भी शामिल हैं। इन ख़बरों का तमाम अरब में हर तरफ चर्चा था और रूमियों की इस्लाम दुश्मनी कोई ढकी छुपी चीज़ नहीं थी इस लिये इन खबरों को ग़लत समझ कर नज़र अन्दाज़ कर देने की भी कोई वजह नहीं थी। इस लिये हुज़ूरे अकरम ﷺ ने भी फ़ौज की तय्यारी का हुक्म दे दिया। लेकिन जैसा कि हम तहरीर कर चुके हैं कि उस वक्त हिजाज़े मुक़द्दस में शदीद कहत था और बे पनाह शिद्दत की गर्मी पड़ रही थी इन वुजूहात से लोगों को घर से निकलना शाक़ गुज़र रहा था। मदीने के मुनाफ़िक़ीन जिन के निफ़ाक़ का भांडा फूट चुका था वोह खुद भी फ़ौज में शामिल होने से जी चुराते थे और दूसरों को भी मन्अ करते थे। लेकिन इस के बा वुजूद तीस हज़ार का लश्कर जम्अ हो गया। मगर इन तमाम मुजाहिदीन के लिये सुवारियों और सामाने जंग का इन्तज़ाम करना एक बड़ा ही कठिन मरहला था क्यूं कि लोग कहत की वजह से इन्तहाई मफ्लूकुल हाल और परेशान थे। इस लिये हुज़ूर ﷺ ने तमाम क़बाइले अरब से फौजे और माली इमदाद तलब फ़रमाई। इस तरह इस्लाम मे किसी कारे खैर के लिये चंदा करने की सुन्नत क़ाइम हुई।
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 329)
गज़्वए तबूक #02 :
*फेहरिस्ते चन्दा दिहन्दगान :-* हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه ने अपना सारा माल और घर का तमाम अषाषा यहां तक कि बदन के कपड़े भी ला कर बारगाहे नुबुव्वत में पेश कर दिये। और हज़रते उमर फारूक رضی الله تعالی عنه ने अपना आधा माल इस चन्दे में दे दिया। मन्कूल है कि हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه जब अपना निस्फ़ माल ले कर बारगाहे अक्दस में चले तो अपने दिल में येह ख़याल कर के चले थे कि आज मैं हज़रते अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنه से सब्कत ले जाऊंगा क्यूं कि उस दिन काशानए फ़ारूक में इत्तिफ़ाक़ से बहुत ज़ियादा माल था। हुज़ूर ﷺ ने हज़रते उमर फारूक رضی الله تعالی عنه से दरयाफ्त फ़रमाया कि ऐ उमर ! कितना माल यहां लाए और किस क़दर घर पर छोड़ा ? अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ ! आधा माल हाज़िरे ख़िदमत है और आधा माल अहलो इयाल के लिये घर में छोड़ दिया है और जब येही सुवाल अपने यारे गार हज़रते सिद्दीक़े अक्बर رضی الله تعالی عنه से किया तो उन्हों ने अर्ज़ किया कि मैं ने अल्लाह और उस के रसूल को अपने घर का जखीरा बना दिया है। आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया कि तुम दोनों में इतना ही फ़र्क़ है जितना तुम दोनों के कलामों में फर्क है।
हज़रते उषमाने गनी رضی الله تعالی عنه एक हज़ार ऊंट और सत्तर घोड़े की मुजाहिदीन की सुवारी के लिये और एक हज़ार अश्रफी फ़ौज के अख़ाजात की मद में अपनी आस्तीन में भर कर लाए और हुज़ूर ﷺ की आगोशे मुबारक में बिखैर दिया। आप ने उन को क़बूल फ़रमा कर येह दुआ फ़रमाई कि : ऐ अल्लाह तू उषमान से राजी हो जा, क्यूं कि मैं इस से खुश हो गया हूं।
हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ رضی الله تعالی عنه ने चालीस हज़ार दिरहम दिया और अर्ज़ किया कि या रसलल्लाह ﷺ मेरे घर में इस वक़्त अस्सी हज़ार दिरहम थे। आधा बारगाहे अकदस में लाया हूं और आधा घर पर बाल बच्चों के लिये छोड़ आया हूं। इर्शाद फ़रमाया कि अल्लाह तआला इस में भी बरकत दे जो तुम लाए और उस में भी बरकत अता फरमाए जो तुम ने घर पर रखा। इस दुआए नबवी का येह अषर हुवा कि हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ़ رضی الله تعالی عنه बहुत जियादा मालदार हो गए।
इसी तरह तमाम अन्सार व मुहाजिरीन ने हस्बे तौफ़ीक़ इस चन्दे में हिस्सा लिया। औरतों ने अपने ज़ेवरात उतार उतार कर बारगाहे नुबुव्वत में पेश करने की सआदत हासिल की।
हज़रते आसिम बिन अदी अन्सारी ने खजूरें दीं। और हज़रते अबू अकील अन्सारी जो बहुत ही मुफ्लिस थे फ़क़त एक साअ खजूर ले कर हाज़िरे ख़िदमत हुए और गुज़ारिश की, कि या रसूलल्लाह ﷺ! मैं ने दिन भर पानी भर भर कर मज़दूरी की तो दो साअ खजूरें मुझे मज़दूरी में मिली हैं। एक साअ अहलो इयाल को दे दी है और येह एक साअ हाज़िरे ख़िदमत है। हुज़ूर रहमतुल्लिल आलमीन का क़ल्बे नाजुक अपने एक मुफ्लिस जां निषार के इस नज़रानए खुलूस से बेहद मुतअस्सीरि हुवा और आपने उस खजूर को तमाम मालों के ऊपर रख दिया! سبحان اللہ
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 489*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 330)
गज़्वए तबूक #03 :
फ़ौज की तय्यारी : रसूलुल्लाह ﷺ का अब तक येह तरीका था कि गज़वात के मुआमले में बहुत ज़ियादा राज़दारी के साथ तैयारी फ़रमाते थे। यहां तक कि असाकिरे इस्लामिया को ऐन वक़्त तक यह भी न मा'लूम होता था कि कहां और किस तरफ़ जाना है ? मगर जंगे तबूक के मौकअ पर सब कुछ इन्तिजाम अलानिया तौर पर किया और यह भी बता दिया कि तबूक चलना है और कैसरे रूम की फ़ौजों से जिहाद करना है ताकि लोग ज़ियादा से ज़्यादा तय्यारी कर लें।
हज़राते सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم ने जैसा कि लिखा जा चुका दिल खोल कर चन्दा दिया मगर फिर भी पूरी फ़ौज के लिये सुवारियों का इन्तिज़ाम न हो सका। चुनान्चे बहुत से जांबाज़ मुसलमान इसी बिना पर इस जिहाद में शरीक न हो सके कि उन के पास सफ़र का सामान नहीं था येह लोग दरबारे रिसालत में सुवारी तलब करने के लिये हाज़िर हुए मगर जब रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि मेरे पास सुवारी नहीं है तो येह लोग अपनी बे सरो सामानी पर इस तरह बिलबिला कर रोए कि हुज़ूर रहमते आलम ﷺ को उनकी आहो ज़ारी और बे करारी पर रहम आ गया। चुनान्चे क़ुरआने मजीद गवाह है कि : और न उन लोगों पर कुछ हरज है कि वोह जब (ऐ रसूल) आप के पास आए कि हम को सुवारी दीजिये और आप ने कहा कि मेरे पास कोई चीज़ नहीं जिस पर तुम्हें सुवार करूं तो वोह वापस गए और उन की आंखों से आंसू जारी थे कि अफ्सोस हमारे पास खर्च नहीं है।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 490*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 331)
गज़्वए तबूक #04 :
*तबूक को रवानगी :-* बहर हाल हुज़ूर ﷺ तीस हज़ार का लश्कर साथ ले कर तबूक के लिये रवाना हुए और मदीने का नज़्मो नस्क चलाने के लिये हज़रते अली رضی الله تعالی عنه को अपना ख़लीफ़ा बनाया। जब हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने निहायत ही हसरत व अफ्सोस के साथ अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ क्या आप मुझे औरतों और बच्चों में छोड़ कर खुद जिहाद के लिये तशरीफ़ लिये जा रहे हैं तो इर्शाद फ़रमाया कि "क्या तुम इस पर राजी नहीं हो कि तुम को मुझ से वोह निस्बत है जो हज़रते हारून علیہ السّلام को हज़रते मूसा علیہ السّلام के साथ थी मगर येह कि मेरे बाद कोई नबी नहीं है।" यानी जिस तरह हज़रते मूसा علیہ السّلام कोहे तूर पर जाते वक्त हज़रते हारून علیہ السّلام को अपनी उम्मत बनी इस्राईल की देखभाल के लिये अपना ख़लीफ़ा बना कर गए थे इसी तरह मैं तुम को अपनी उम्मत सोंप कर जिहाद के लिये जा रहा हूं।
मदीने से चल कर मकामे “सनिय्यतिल वदाअ" में आप ﷺ ने क़ियाम फ़रमाया। फिर फ़ौज का जाएजा लिया और फ़ौज का मुक़द्दमा, मैमना, मैसरा वगैरा मुरत्तब फ़रमाया। फिर वहां से कूच किया। मुनाफ़िक़ीन किस्म किस्म के झूटे उज़्र और बहाने बना कर रह गए और मुख़्लिस मुसलमानों में से भी चन्द हज़रात रह गए उन में येह हज़रात थे : का'ब बिन मालिक, हिलाल बिन उमय्या, मुरारह बिन रबीअ, अबू खैषमा, अबू जर गिफारी رضی الله تعالی عنهم। इन में से अबू खैषमा और अबू जर गिफारी رضی الله تعالی عنهم तो बाद में जा कर शरीके जिहाद हो गए लेकिन तीन अव्वलुज़्जिक्र नहीं गए।
हज़रते अबू जर गिफ़ारी رضی الله تعالی عنه के पीछे रह जाने का सबब येह हुवा कि उन का ऊंट बहुत ही कमज़ोर और थका हुवा था। इन्हों ने उस को चन्द दिन चारा खिलाया ताकि वोह चंगा हो जाए। जब रवाना हुए तो वोह फिर रास्ते में थक गया। मजबूरन वोह अपना सामान अपनी पीठ पर लाद कर चल पड़े और इस्लामी लश्कर में शामिल हो गए। हज़रते अबू खैषमा رضی الله تعالی عنه जाने का इरादा नहीं रखते थे मगर वोह एक दिन शदीद गर्मी में कहीं बाहर से आए तो उन की बीवी ने छप्पर में छिड़काव कर रखा था। थोड़ी देर उस सायादार और ठन्डी जगह में बैठे फिर ना गहां उन के दिल में हुज़ूर ﷺ का ख्याल आ गया। अपनी बीवी से कहा कि येह कहां का इन्साफ़ है कि मैं तो अपनी छप्पर में ठन्डक और साए में आराम व चैन से बैठा रहूं और खुदा के मुक़द्दस रसूल इस धूप की तमाज़त और शदीद लू के थपेड़ों में सफ़र करते हुए जिहाद के लिये तशरीफ़ ले जा रहे हों एक दम उन पर ऐसी ईमानी गैरत सुवार हो गई कि तोशे के लिये खजूर ले कर एक ऊंट पर सुवार हो गए और तेज़ी के साथ सफ़र करते हुए रवाना हो गए। लश्कर वालों ने दूर से एक शुतर सुवार को देखा तो हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि अबू खैषमा رضی الله تعالی عنه होंगे इस तरह येह भी लश्करे इस्लाम में पहुंच गए।
रास्ते में क़ौमे आद व षमूद की वोह बस्तियां मिलीं जो कहरे इलाही के अज़ाबों से उलट पलट कर दी गई थीं। आप ﷺ ने हुक्म दिया कि येह वोह जगहें हैं जहां खुदा का अज़ाब नाज़िल हो चुका है इस लिये कोई शख़्स यहां क़ियाम न करे बल्कि निहायत तेज़ी के साथ सब लोग यहां से सफ़र कर के इन अज़ाब की वादियों से जल्द बाहर निकल जाएं और कोई यहां का पानी न पिये और न किसी काम में लाए। इस ग़ज्वे में पानी की किल्लत, शदीद गर्मी, सुवारियों की कमी से मुजाहिदीन ने बेहद तक्लीफ़ उठाई मगर मन्ज़िले मक्सूद पर पहुंच कर ही दम लिया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 492*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 332)
गज़्वए तबूक #05 :
*रास्ते के चन्द मोजिज़ात :* #01 हुजूर ﷺ ने हज़रते अबू जर गिफारी رضی الله تعالی عنه को देखा कि वोह सब से अलग अलग चल रहे हैं। तो इर्शाद फरमाया कि येह सब से अलग ही चलेंगे और अलग ही ज़िन्दगी गुज़ारेंगे और अलग ही वफ़ात पाएंगे। चुनान्चे ठीक ऐसा ही हुवा कि हज़रते उषमान رضی الله تعالی عنه अपने दौरे ख़िलाफ़त में इन को हुक्म दे दिया कि आप "रबज़ा" में रहें आप रबजा में अपनी बीवी और गुलाम के साथ रहने लगे। जब वफ़ात का वक्त आया तो आप رضی الله تعالی عنه ने फ़रमाया कि तुम दोनों मुझ को गुस्ल दे कर और कफ़न पहना कर रास्ते में रख देना। जब शुतर सुवारों का पहला गुरौह मेरे जनाज़े के पास से गुज़रे तो तुम लोग उस से कहना कि येह अबू जर गिफारी का जनाज़ा है इन पर नमाज़ पढ़ कर इन को दफ्न करने में हमारी मदद करो। खुदा की शान कि सब से पहला जो काफिला गुज़रा उस में हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद सहाबी رضی الله تعالی عنه थे। आपने जब येह सुना कि येह हज़रते अबू जर गिफ़ारी رضی الله تعالی عنه का जनाज़ा है तो उन्हों ने "اِنَّا لِلّٰهِ وَ اِنَّاۤ اِلَیْهِ رٰجِعُوْنَ" पढ़ा और काफ़िले को रोक कर उतर पड़े और कहा कि बिल्कुल सच्चा फ़रमाया था रसूलुल्लाह ﷺ ने कि “ऐ अबू जर ! तू तन्हा चलेगा, तन्हा मरेगा, तन्हा क़ब्र से उठेगा।" फिर हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद رضی الله تعالی عنه और क़ाफ़िले वालों ने उन को पूरे ए'ज़ाज़ के साथ दफ्न किया।
बा'ज़ रिवायतों में येह भी आया है कि उन की बीवी के पास कफ़न के लिये कपड़ा नहीं था तो आने वाले लोगों में से एक अन्सारी ने कफ़न के लिये कपड़ा दिया और नमाज़े जनाज़ा पढ़ कर दफ्न किया।
*हवा उड़ा ले गई :-* जब इस्लामी लश्कर मक़ामे "हजर" में पहुंचा तो हुज़ूर ﷺ ने हुक्म दिया कि कोई शख़्स अकेला लश्कर से बाहर कहीं दूर न चला जाए पूरे लश्कर ने इस हुक्मे नबवी की इताअत की मगर क़बीलए बनू साइदा के दो आदमियों ने आप ﷺ के हुक्म को नहीं माना। एक शख़्स अकेला ही रफ़ए हाजत के लिये लश्कर से दूर चला गया वोह बैठा ही था कि दफ्अतन किसी ने उस का गला घोंट दिया और वोह उसी जगह मर गया और दूसरा शख्स अपना ऊंट पकड़ने के लिये अकेला ही लश्कर से कुछ दूर चला गया तो ना गहां एक हवा का झोंका आया और उस को उड़ा कर क़बीलए "तय" के दोनों पहाड़ों के दरमियान फेंक दिया और वोह हलाक हो गया आप ﷺ ने उन दोनों का अन्जाम सुन कर फ़रमाया कि क्या मैं ने तुम लोगों को मन्अ नहीं कर दिया था?
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 495*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 333)
गज़्वए तबूक #06 :
*रास्ते के चन्द मोजिज़ात :* #02 गुमशुदा ऊंटनी कहा है? एक मन्जिल पर हुज़ूर ﷺ की ऊंटनी कहीं चली गई और लोग उस की तलाश में सरगर्दी फिरने लगे तो एक मुनाफ़िक़ जिस का नाम “जैद बिन लसीत" था कहने लगा कि मुहम्मद (ﷺ) कहते हैं कि मैं अल्लाह का नबी हूं और मेरे पास आस्मान की खबरे आती हैं मगर इन को येह पता ही नहीं है कि इन की ऊंटनी कहां है ? हुज़ूर ﷺ ने अपने असहाब से फ़रमाया कि एक शख़्स ऐसा ऐसा कहता है हालां कि खुदा की क़सम ! अल्लाह तआला के बता देने से मैं ख़ूब जानता हूं कि मेरी ऊंटनी कहां है ? वोह फुलां घाटी में है और एक दरख़्त में उस की मुहार की रस्सी उलझ गई है। तुम लोग जाओ और उस ऊंटनी को मेरे पास ले कर आ जाओ। जब लोग उस जगह गए तो ठीक ऐसा ही देखा कि उसी घाटी में वोह ऊंटनी खड़ी है और उस की मुहार एक दरख़्त की शाख़ में उलझी हुई है।
*तबूक का चश्मा :* जब हुज़ूर ﷺ तबूक के करीब में पहुंचे तो इर्शाद फ़रमाया कि ان شاء اللہ कल तुम लोग तबूक के चश्मे पर पहुंचोगे और सूरज बुलन्द होने के बाद पहुंचोगे लेकिन कोई शख़्स वहां पहुंचे तो पानी को हाथ न लगाए। रसूलुल्लाह ﷺ जब वहां पहुंचे तो जूते के तस्मे के बराबर उस में एक पानी की धार बह रही थी। आप ﷺ ने उस में से थोड़ा सा पानी मंगा कर हाथ मुंह धोया और उस पानी में कल्ली फरमाई। फिर हुक्म दिया कि इस पानी को चश्मे में उंडेल दो। लोगों ने जब उस पानी को चश्मे में डाला तो चश्मे से ज़ोरदार पानी की मोटी धार बहने लगी और तीस हज़ार का लश्कर और तमाम जानवर उस चश्मे के पानी से सैराब हो गए।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 496*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 334)
गज़्वए तबूक #07 :
*रूमी लश्कर डर गया :-* हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने तबूक में पहुंच कर लश्कर को पड़ाव का हुक्म दिया। मगर दूर दूर तक रूमी लश्करों का कोई पता नहीं चला। वाक़िआ येह हुवा कि जब रूमियों के जासूसों ने कैंसर को खबर दी कि रसूलुल्लाह (ﷺ) तीस हज़ार का लश्कर ले कर तबूक में आ रहे हैं तो रूमियों के दिलों पर इस क़दर हैबत छा गई कि वोह जंग से हिम्मत हार गए और अपने घरों से बाहर न निकल सके। रसूलुल्लाह ﷺ ने बीस दिन तबूक में क़ियाम फ़रमाया और अतराफ़ व जवानिब में अफ़वाजे इलाही का जलाल दिखा कर और कुफ़्फ़ार के दिलों पर इस्लाम का रो'ब बिठा कर मदीना वापस तशरीफ़ लाए और तबूक में कोई जंग नहीं हुई।
इसी सफ़र में “ऐलह" का सरदार जिस का नाम “यखनह" था बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुवा और जिज़या देना क़बूल कर लिया और एक सफ़ेद खच्चर भी दरबारे रिसालत में नज़्र किया जिस के सिले में ताजदारे दो आलम ﷺ ने उस को अपनी चादरे मुबारक इनायत फ़रमाई और उस को एक दस्तावेज़ तहरीर फ़रमा कर अता फरमाई कि वोह अपने गिर्दो पेश के समुन्दर से हर किस्म के फ़वाइद हासिल करता रहे। इसी तरह "जरबाअ" और "अज़रह" के ईसाइयों ने भी हाज़िरे ख़िदमत हो कर जिज़या देने पर रिज़ा मन्दी जाहिर की।
इस के बाद हुज़ूर ﷺ ने हज़रते खालिद बिन वलीद رضی الله تعالی عنه को एक सो बीस सवारों के साथ "दू-मतिल जन्दल" के बादशाह "अक़ीदर बिन अब्दुल मलिक" की तरफ रवाना फ़रमाया और इरशाद फ़रमाया की वो रात में नीलगाय का शिकार कर रहा होगा तुम उस के पास पहुंचो तो उस को क़त्ल मत करना बल्कि उस को ज़िन्दा गरिफ्तार कर के मेरे पास लाना। चुनान्चे हज़रते खालिद बिन वलीद رضی الله تعالی عنه ने चांदनी रात में अकीदर और उस के भाई हस्सान को शिकार करते हुए पा लिया। हस्सान ने चूंकि हज़रते खालिद बिन वलीद से जंग शुरू कर दी। इस लिये आपने उस को तो क़त्ल कर दिया मगर अकीदर को गरिफ्तार कर लिया और इस शर्त पर उस को रिहा किया कि वोह मदीना बारगाहे अक्दस में हाज़िर हो कर सुल्ह करे। चुनान्चे वोह मदीने आया और हुज़ूर ﷺ ने उस को अमान दी।
इस ग़ज्वे में जो लोग गैर हाज़िर रहे उन में अकषर मुनाफिकीन थे। जब हुज़ूर ﷺ तबूक से मदीने वापस आए और मस्जिदे नबवी में नुज़ूले इज्लाल फ़रमाया तो मुनाफ़िक़ीन क़समें खा खा कर अपना अपना उज़्र बयान करने लगे। हुज़ूर ﷺ ने किसी से कोई मुवाखज़ा नहीं फ़रमाया लेकिन तीन मुख्लिस सहाबियों हज़रते का'ब बिन मालिक व हिलाल बिन उमय्या व मुरारह बिन रबीआ رضی الله تعالی عنهم का पचास दिनों तक आप ने बायकॉट फ़रमा दिया। फिर इन तीनों की तौबा क़बूल हुई और इन लोगों के बारे में क़ुरआन की आयत नाज़िल हुई।
जब हुज़ूर ﷺ मदीने के करीब पहुंचे और उहुद पहाड़ को देखा तो फ़रमाया कि येह उहुद है। येह ऐसा पहाड़ है कि येह हम से महब्बत करता है और हम इस से महब्बत करते हैं। जब आप ने मदीने की सर ज़मीन में क़दम रखा तो औरतें, बच्चे और लौंडी गुलाम सब इस्तिक्बाल के लिये निकल पड़े और इस्तिक्बालिया नज़में पढ़ते हुए आप के साथ मस्जिदे नबवी तक आए। जब आप ﷺ मस्जिदे नबवी में दो रकअत नमाज़ पढ़ कर तशरीफ़ फ़रमा हो गए तो हुज़ूर ﷺ के चचा हज़रते अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब رضی الله تعالی عنه ने आप की मद्ह में एक क़सीदा पढ़ा और अहले मदीना ने बखैरो आफ़िय्यत इस दुश्वार गुज़ार सफ़र से आपकी तशरीफ़ आवरी पर इन्तिहाई मुसर्रत व शादमानी का इज़हार किया और उन मुनाफ़िक़ीन के बारे में जो झूटे बहाने बना कर इस जिहाद में शरीक नहीं हुए थे और बारगाहे नुबुव्वत में क़समें खा खा कर उज़्र पेश कर रहे थे, क़ह्रो ग़ज़ब में भरी हुई क़ुरआने मजीद की आयतें नाज़िल हुई और उन मुनाफ़िकों के निफ़ाक़ का पर्दा चाक हो गया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 497*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 335)
गज़्वए तबूक #08 :
*जुल बिजादैन رضی الله تعالی عنه की कब्र :* गज़्वए तबूक में बजुज़ एक हज़रते जुल बिजादैन رضی الله تعالی عنه के न किसी सहाबी की शहादत हुई न वफ़ात। हज़रते जुल बिजादैन رضی الله تعالی عنه कौन थे ? और इन की वफ़ात और दफ्न का कैसा मन्ज़र था ? येह एक बहुत ही ज़ौक़ आफरीं और लज़ीज़ हिकायत है। येह क़बीलए मुज़ैना के एक यतीम थे और अपने चचा की परवरिश में थे। जब येह सिने शुऊर को पहुंचे और इस्लाम का चरचा सुना तो इन के दिल में बुत परस्ती से नफरत और इस्लाम क़बूल करने का जज़्बा पैदा हुवा। मगर इन का चचा बहुत ही कट्टर काफ़िर था। उस के ख़ौफ़ से येह इस्लाम क़बूल नहीं कर सकते थे। लेकिन फतहे मक्का के बाद जब लोग फ़ौज दर फ़ौज इस्लाम में दाखिल होने लगे तो इन्हों ने अपने चचा को तरगीब दी कि तुम भी दामने इस्लाम में आ जाओ क्यूं कि मैं क़बूले इस्लाम के लिये बहुत ही बे क़रार हूं। येह सुन कर इन के चचा ने इन को बरहना कर के घर से निकाल दिया। इन्हों ने अपनी वालिदा से एक कम्बल मांग कर उस को दो टुकड़े कर के आधे को तहबन्द और आधे को चादर बना लिया और इसी लिबास में हिजरत कर के मदीने पहुंच गए। रात भर मस्जिदे नबवी में ठहरे रहे। नमाज़े फज्र के वक्त जब जमाले मुहम्मदी के अन्वार से इन की आंखें मुनव्वर हुई तो कलिमा पढ़ कर मुशर्रफ़ ब इस्लाम हो गए। हुज़ूर ﷺ ने इन का नाम दरयाफ्त फ़रमाया तो इन्हों ने अपना नाम अब्दुल उज्ज़ा बता दिया। आप ﷺ ने फ़रमाया कि आज से तुम्हारा नाम अब्दुल्लाह और लकब जुल बिजादैन (दो कम्बलों वाला) है। हुज़ूर ﷺ इन पर बहुत करम फ़रमाते थे और येह मस्जिदे नबवी में असहाबे सुफ्फ़ा की जमाअत के साथ रहने लगे और निहायत बुलन्द आवाज़ से जौको शौक के साथ कु़रआने मजीद पढ़ा करते थे। जब हुज़ूर ﷺ जंगे तबूक के लिये रवाना हुए तो भी मुजाहिदीन में शामिल हो कर चल पड़े और बड़े ही जौको शौक आर इनतिहाई इश्तियाक़ के साथ दरख्वास्त की, कि या रसूलल्लाह ﷺ दुआ फ़रमाइये कि मुझे खुदा की राह में शहादत नसीब हो जाए। आप ने फ़रमाया कि तुम किसी दरख़्त की छाल लाओ। वोह थोड़ी सी बबूल की छाल लाए। आप ﷺ ने उन के बाज़ू पर वोह छाल बांध दी और दुआ की, कि ऐ अल्लाह ! मैं ने इस के खून को कुफ्फ़ार पर हराम कर दिया। इन्हों ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ मेरा मक्सद तो शहादत ही है। इर्शाद फ़रमाया कि जब तुम जिहाद के लिये निकले हो तो अगर बुखार में भी मरोगे जब भी तुम शहीद ही होगे। खुदा की शान कि जब हज़रते जुल बिजादैन رضی الله تعالی عنه तबूक में पहुंचे तो बुखार में मुब्तला हो गए और उसी बुखार में इन की वफ़ात हो गई।
हज़रते बिलाल बिन हारिष मुज़नी رضی الله تعالی عنه का बयान है कि इन के दफ्न का अजीब मन्ज़र था कि हज़रते बिलाल मुअज्ज़िन رضی الله تعالی عنه हाथ में चराग़ लिये इन की क़ब्र के पास खड़े थे और खुद ब नफ्से नफ़ीस हुज़ूरे अकरम ﷺ इन की क़ब्र में उतरे और हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ व हज़रते उमर फारूक رضی الله تعالی عنهما को हुक्म दिया कि तुम दोनों अपने इस्लामी भाई की लाश को उठाओ। फिर आप ﷺ उन को अपने दस्ते मुबारक से लहद में सुलाया और खुद ही क़ब्र को कच्ची ईंटों से बन्द फ़रमाया और फिर येह दुआ मांगी कि या अल्लाह ! मैं जुल बिजादैन से राज़ी हूं तू भी इस से राज़ी हो जा।
हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद رضی الله تعالی عنه ने हज़रते जुल बीजादैन رضی الله تعالی عنه के दफ्न का मन्ज़र देखा तो बे इख़्तियार उन के मुंह से निकला कि काश ! जुल बिजादैन की जगह येह मेरी मय्यित होती। سبحان اللہ 💚
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 500*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 336)
गज़्वए तबूक #09 :
*मस्जिदे ज़रार :-* मुनाफ़िक़ों ने इस्लाम की बेख़कुनी और मुसलमानों में फूट डालने के लिये मस्जिदे कुबा के मुकाबले में एक मस्जिद ता'मीर की थी जो दर हक़ीक़त मुनाफ़िक़ीन की साज़िशों और इन की दसीसा कारियों का एक ज़बर दस्त अड्डा था। अबू आमिर राहिब जो अन्सार में से ईसाई हो गया था जिस् का नाम हुज़ूर ﷺ ने अबू आमिर फ़ासिक़ रखा था उस ने मुनाफ़िक़ीन से कहा कि तुम लोग खुफ़या तरीक़े पर जंग की तय्यारियां करते रहो। मैं कैसरे रूम के पास जा कर वहां से फ़ौजें लाता हूं ताकि इस मुल्क से इस्लाम का नामो निशान मिटा दूं। चुनान्चे इसी मस्जिद में बैठ बैठ कर इस्लाम के ख़िलाफ़ मुनाफ़िक़ीन कमेटियां करते थे और इस्लाम व बानिये इस्लाम का ख़ातिमा कर देने की तदबीरें सोचा करते थे।
जब हुज़ूर ﷺ जंगे तबूक के लिये रवाना होने लगे तो मक्कार मुनाफ़िकों का एक गुरौह आया और महज़ मुसलमानों को धोका देने के लिये बारगाहे अक्दस में येह दरख्वास्त पेश की, कि या रसूलल्लाह ﷺ हम ने बीमारों और माजूरों के लिये एक मस्जिद बनाई है। आप चल कर एक मरतबा इस मस्जिद में नमाज़ पढा दें ताकि हमारी येह मस्जिद खुदा की बारगाह में मक़बूल हो जाए। आप ﷺ ने जवाब दिया कि इस वक्त तो मैं जिहाद के लिये घर से निकल चुका हूं लिहाज़ा इस वक्त तो मुझे इतना मौक़अ नहीं है। मुनाफ़िक़ीन ने काफ़ी इसरार किया मगर आप ﷺ ने उन की इस मस्जिद में कदम नहीं रखा। जब आप ﷺ जंगे तबूक से वापस तशरीफ़ लाए तो मुनाफ़िक़ीन की चाल बाजियों और इन की मक्कारियों दगा बाजियों के बारे में "सुरए तौबह" की बहुत सी आयात नाज़िल हो गई और मुनाफ़िक़ीन के निफ़ाक़ और इन की इस्लाम दुश्मनी के तमाम रुमूज़ व असरार बे निकाब हो कर नज़रों के सामने आ गए। और उन की इस मस्जिद के बारे में खुसूसिय्यत के साथ येह आयतें नाज़िल हुई कि : _और वोह लोग जिन्हों ने एक मस्जिद ज़रर पहुंचाने और कुफ्र करने और मुसलमानों में फूट डालने की ग़रज़ से बनाई और इस मक्सद से कि जो लोग पहले ही से खुदा और उस के रसूल से जंग कर रहे हैं उन के लिये एक कमीन गाह हाथ आ जाए और वोह ज़रूर क़समें खाएंगे कि हम ने तो भलाई ही का इरादा किया है और खुदा गवाही देता है कि बेशक येह लोग झूटे हैं आप कभी भी इस मस्जिद में न खड़े हो वोह मस्जिद (मस्जिदे कुबा) जिस की बुन्याद पहले ही दिन से परहेज़ गारी पर रखी हुई है वोह इस बात की जियादा हक़दार है कि आप इस में खड़े हों इस में ऐसे लोग हैं जो पाकी को पसन्द करते हैं और खुदा पाकी रखने वालों को दोस्त रखता है।_
इस आयत के नाज़िल हो जाने के बाद हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने हज़रते मालिक बिन दख़शम व हज़रते मअन बिन अदी رضی الله تعالی عنهما को हुक्म दिया कि उस मस्जिद को मुन्हदिम कर के उस में आग लगा दें।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 501*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 337)
*सिद्दीक़े अक्बर رضی الله تعالی عنه अमीरुल हज :* गज़्वए तबूक से वापसी के बाद हुज़ूर ﷺ ने जुल कादह सि. 9 हि. में तीन सो मुसलमानों का एक काफ़िला मदीनए मुनव्वरह से हज के लिये मक्कए मुकर्रमा भेजा और हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه को “अमीरुल हज" और हज़रते अली मुर्तजा رضی الله تعالی عنه को "नक़ीबे इस्लाम" और हज़रते साद बिन अबी वक़्क़ास व हज़रते जाबिर बिन अब्दुल्लाह व हज़रते अबू हुरैरा رضی الله تعالی عنهما को मुअल्लिम बना दिया और अपनी तरफ़ से क़ुरबानी के लिये बीस ऊंट भी भेजे।
हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه ने हरमे काबा और अरफ़ात व मिना में खुत्बा पढ़ा इस के बाद हज़रते अली رضی الله تعالی عنه खड़े हुए और "सूरए बराअत" की चालीस आयतें पढ़ कर सुनाई और ए'लान कर दिया कि अब कोई मुशरिक खानए काबा में दाखिल न हो सकेगा न कोई बरहना बदन और नंगा हो कर तवाफ़ कर सकेगा और चार महीने के बा'द कुफ़्फ़ार व मुशरिकीन के लिये अमान ख़त्म कर दी जाएगी।
हज़रते अबू हुरैरा رضی الله تعالی عنه और दूसरे सहाबए किराम जोग ने इस ए'लान की इस क़दर ज़ोर ज़ोर से मुनादी की, कि इन लोगों का गला बैठ गया। इस ए'लान के बाद कुफ्फ़ार व मुशरिकीन फ़ौज की फ़ौज आ कर मुसलमान होने लगे।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 503*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 338)
*सि. 9 हि. के वाकिआते मुतफ़र्रिका :*
इस साल पूरे मुल्क में हर तरफ़ अम्नो अमान की फ़ज़ा पैदा हो गई और ज़कात का हुक्म नाज़िल हुवा और ज़कात की वसूली के लिये आमिलीन और मुहस्सिलों का तक़र्रुर हुवा।
जो गैर मुस्लिम कौमें इस्लामी सल्तनत के ज़ेरे साया रहीं उन के लिये जिज़या का हुक्म नाज़िल हुवा और क़ुरआन की ये आयत उतरी की वोह छोटे बन कर "जिज़या" अदा करें! (पा.10)
सूद की हुरमत नाज़िल हुई और इस के एक साल बाद सि. 10 हि. में “हिज्जतुल वदाअ” के मौक़अ पर अपने खुत्बों में हुज़ूर ﷺ ने इस का ख़ूब खूब एलान फ़रमाया।
हबशा का बादशाह जिन का नाम हज़रते अस्हमा رضی الله تعالی عنه था। जिन के ज़ेरे साया मुसलमान मुहाजिरीन ने चन्द साल हबशा में पनाह ली थी उन की वफ़ात हो गई। हुज़ूर ﷺ ने मदीने में उनकी गाइबाना नमाज़े जनाज़ा पढ़ी और उन के लिये मगफिरत की दुआ मांगी।
इसी साल मुनाफ़िकों का सरदार अब्दुल्लाह बिन उबय्य मर गया। इस के बेटे हज़रते अब्दुल्लाह رضی الله تعالی عنه की दरख्वास्त पर उन क दिलजूई के वासिते हुज़ूर ﷺ ने उस मुनाफ़िक के कफ़न के लिये अपना पैरहन अता फरमाया और उस की लाश अपने जानूए अक्दस पर रख कर उस के कफ़न में अपना लुआबे दहन डाला और हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه के बार बार मन्अ करने के बा वुजूद चूंकि अभी तक मुमानअत नाज़िल नहीं हुई थी इस लिये हुज़ूर ﷺ ने उस के जनाज़े की नमाज़ पढ़ाई लेकिन इस के बाद ही येह आयत नाज़िल हो गई कि : _(ऐ रसूल) इन (मुनाफ़िकों) में से जो मरें कभी आप उन पर नमाज़े जनाजा न पढ़िये और उन की क़ब्र के पास आप खड़े भी न हों यक़ीनन उन लोगों ने अल्लाह और उस के रसूल के साथ कुफ्र किया है और कुफ्र की हालत में येह लोग मरे हैं।_
इस आयत के नुज़ूल के बाद फिर कभी आप ﷺ ने किसी मुनाफ़िक की नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ाई न उस की क़ब्र के पास खड़े हुए।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 504*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 339)
*वुफूदुल अरब :*
हुज़रे अक्दस ﷺ तब्लीगे इस्लाम के लिये तमाम अतराफ़ व अक्नाफ़ में मुबल्लिगीने इस्लाम और आमिलीन व मुजाहिदीन को भेजा करते थे। उन में से बा'ज़ क़बाइल तो मुबल्लिगीन के सामने ही दा'वते इस्लाम क़ुबूल कर के मुसलमान हो जाते थे मगर थे बा'ज़ क़बाइल इस बात के ख़्वाहिश मन्द होते थे कि बराहे रास्त खुद बारगाहे नुबुव्वत में हाज़िर हो कर अपने इस्लाम का एलान करें। चुनान्चे कुछ लोग अपने अपने क़बीलों के नुमाइन्दा बन कर मदीनए मुनव्वर आते थे और खुद बानिये इस्लाम की जबाने फ़ैज़ तर्जुमान से दा'वते इस्लाम का पैगाम सुन कर अपने इस्लाम का एलान करते थे और फिर अपने अपने क़बीलों में वापस जा कर पूरे क़बीले वालों को मुशर्रफ ब इस्लाम करते थे। इन्ही क़बाइल के नुमाइन्दों को हम "वुफूदुल अरब" के उन्वान से बयान करते हैं।
इस किस्म के वुफूद और नुमाइन्दगान कबाइल मुख़्तलिफ़ ज़मानों में मदीनए मुनव्वरह आते रहे मगर फ़त्ह मक्का के बा'द ना गहां सारे अरब के ख़यालात में एक अज़ीम तगय्युर वाकेअ हो गया और सब लोग इस्लाम की तरफ़ माइल होने लगे क्यूं कि इस्लाम की हक्कानिय्यत वाजेह और ज़ाहिर हो जाने के बा वुजूद बहुत से क़बाइल महज़ कुरैश के दबाव से और अहले मक्का के डर से इस्लाम क़बूल नहीं कर सकते थे। फ़त्ह मक्का ने इस रुकावट को भी दूर कर दिया और अब दावते इस्लाम और क़ुरआन के मुक़द्दस पैग़ाम ने घर घर पहुंच कर अपनी हक्कानिय्यत और ए'जाज़ी तसर्रुफात से सब के क़ुलूब पर सिक्का बिठा दिया। जिस का नतीजा येह हुवा कि वोही लोग जो एक लम्हे के लिये इस्लाम का नाम सुनना और मुसलमानों की सूरत देखना गवारा नहीं कर सकते थे आज परवानों की तरह शमए नुबुव्वत पर निषार होने लगे और जूक दर जूक बल्कि फ़ौज दर फ़ौज हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत में दूर दराज़ के सफर तै करते हुए वुफूद की शक्ल में आने लगे और ब रिजा व रग़्बत इस्लाम के हल्का बगोश बनने लगे चूंकि इस किस्म के वुफूद अकषरो बेशतर फ़तहे मक्का के बा'द सि. 9 हि. में मदीनए मुनव्वरह आए इस लिये सि. 9 हि. को लोग “स-नतिल वुफूद" (नुमाइन्दा का साल) कहने लगे।
इस किस्म के वुफूद की तादाद में मुसन्निफ़ीने सीरत का बहुत ज़ियादा इख़्तिलाफ़ है। हज़रते शैख अब्दुल हक़ मुहूद्दिष देहलवी ने इन वुफ़ूद की तादाद साठ से ज़ियादा बताई है। और अल्लामा कस्तलानी व हाफ़िज़ इब्ने कय्यिम ने इस क़िस्म के चौदह वफ़दों का तज़किरा किया है हम भी अपनी इस मुख़्तसर किताब में चन्द वुफूद का तकिरा करते हैं।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 506*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 340)
*इस्तिक़्बाले वुफूद :*
हुज़ूर सय्यिदे आलम ﷺ क़बाइल से आने वाले वफ़दों के इस्तिक़्बाल, और उन की मुलाकात का ख़ास तौर पर एहतिमाम फ़रमाते थे। चुनान्चे हर वफ़द के आने पर आप ﷺ निहायत ही उम्दा पोशाक जैबे तन फ़रमा कर काशानए अकदस से निकलते और अपने खुसूसी असहाब को भी हुक्म देते थे कि बेहतरीन लिबास पहन कर आएं फिर उन मेहमानों को अच्छे से अच्छे मकानों में ठहराते और उन लोगों की मेहमान नवाज़ी और खातिर मदारात का खास तौर पर ख़याल फ़रमाते थे और उन मेहमानों से मुलाकात के लिये मस्जिदे न-बवी में एक सुतून से टेक लगा कर निशस्त फ़रमाते फिर हर एक वफ्द से निहायत ही खुशरूई और खन्दा पेशानी के साथ गुफ़्तगू फ़रमाते और उन की हाजतों और हालतों को पूरी तवज्जोह के साथ सुनते और फिर उन को ज़रूरी अक़ाइद व अहकामे इस्लाम की ता'लीम व तल्क़ीन भी फ़रमाते और हर वफ़द को उन के दरजात व मरातिब के लिहाज़ से कुछ न कुछ नकद या सामान भी तहाइफ़ और इन्आमात के तौर पर अता फरमाते।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 507*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 341)
*वफ्दे सकीफ :*
जब हुज़ूर ﷺ जंगे हुनैन के बाद ताइफ़ से वापस तशरीफ़ लाए और "जिइर्राना" से उमरह अदा करने के बा'द मदीने तशरीफ़ ले जा रहे थे तो रास्ते ही में क़बीलए सक़ीफ़ के सरदारे आज़म "उर्वह बिन मसऊद स-कफी" बारगाहे रिसालत में हाज़िर हो कर ब रिज़ा व रग़बत दामने इस्लाम में आ गए। येह बहुत ही शानदार और बा वफ़ा आदमी थे और इन का कुछ तज़करा सुल्हे हुदैबिया के मौक़अ पर हम तहरीर कर चुके हैं। इन्हों ने मुसलमान होने के बाद अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ आप मुझे इजाज़त अता फरमाएं कि मैं अब अपनी क़ौम में जा कर इस्लाम की तब्लीग करूं। आपने इजाज़त दे दी और येह वहीं से लौट कर अपने क़बीले में गए और अपने मकान की छत पर चढ़ कर अपने मुसलमान होने का एलान किया और अपने क़बीले वालों को इस्लाम की दावत दी। इस अलानिया दावते इस्लाम सुन कर क़बीलए सक़ीफ़ लोग गैज़ो ग़ज़ब में भर कर इस क़दर तैश में आ गए कि चारों तरफ से उन पर तीरों की बारिश करने लगे यहां तक कि इन को एक तीर लगा और येह शहीद हो गए।
क़बीलए सक़ीफ़ के लोगों ने इन को क़त्ल तो कर दिया लेकिन फिर येह सोचा कि तमाम क़बाइले अरब इस्लाम क़बूल कर चुके हैं। अब हम भला इस्लाम के ख़िलाफ़ कब तक और कितने लोगों से लड़ते रहेंगे ? फिर मुसलमानों के इन्तिक़ाम और एक लम्बी जंग के अन्जाम को सोच कर दिन में तारे नज़र आने लगे। इस लिये इन लोगों ने अपने एक मुअज्ज़ज् रईस अब्दे यालील बिन अम्र को चन्द मुमताज़ सरदारों के साथ मदीनए मुनव्वरह भेजा। इस वफ़द ने मदीने पहुंच कर बारगाहे अक्दस में अर्ज़ किया कि हम इस शर्त पर इस्लाम क़बूल करते हैं कि तीन साल तक हमारे बुत “लात" को तोड़ा न जाए। आप ﷺ ने इस शर्त को क़बूल फ़रमाने से साफ़ इन्कार फ़रमा दिया और इर्शाद फ़रमाया कि इस्लाम किसी हाल में भी बुत परस्ती को एक लम्हे के लिये भी बरदाश्त नहीं कर सकता। लिहाज़ा बुत तो ज़रूर तोड़ा जाएगा येह और बात है कि तुम लोग उस को अपने हाथ से न तोड़ो बल्कि मैं हज़रते अबू सुफ्यान और हज़रते मुग़ीरा बिन शअबा رضی الله تعالی عنهما को भेज दूंगा वोह उस बुत को तोड़ डालेंगे। चुनान्चे येह लोग मुसलमान हो गए और हज़रते अबू सुफ्यान और हज़रते मुग़ीरा बिन शअबा رضی الله تعالی عنهما को ताइफ़ भेजा और इन दोनों हज़रात ने उन के बुत "लात" को तोड़ फोड़ कर रेज़ा रेज़ा कर डाला।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 508*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 342)
वफ्दे कन्दा :
येह लोग यमन के अतराफ़ में रहते थे। इस क़बीले के सत्तर या अस्सी सुवार बड़े ठाठ बाट के साथ मदीने आए। खूब बालों में कंघी किये हुए और रेशमी गोंट के जुब्बे पहने हुए, हथियारों से सजे हुए मदीने की आबादी में दाखिल हुए। जब येह लोग दरबारे रिसालत में बारयाब हुए तो आप ﷺ ने उन लोगों से दरयाफ्त फ़रमाया कि क्या तुम लोगों ने इस्लाम क़बूल कर लिया है ? सब ने अर्ज़ किया कि "जी हां" आप ने फ़रमाया कि फिर तुम लोगों ने येह रेशमी लिबास क्यूं पहन रखा है ? येह सुनते ही उन लोगों ने अपने जुब्बों को बदन से उतार दिया और रेशमी गोंटों को फाड़ फाड़ कर जुब्बों से अलग कर दिया।
*वफ्दे बनी अश्अर* येह लोग यमन के बाशिन्दे और "क़बीलए अश्अर" के मुअज्ज़ज़ और नामवर हज़रात थे। जब येह लोग मदीने में दाखिल होने लगे तो जोशे महब्बत और फ़र्ते अकीदत से रज्ज़ का येह शे'र आवाज़ मिला कर पढ़ते हुए शहर में दाखिल हुए की
*कल हम लोग अपने महबूबो से यानी हज़रत मुहम्मद ﷺ और आप के सहाबा से मुलाकात करेंगे।*
हज़रते अबू हुरैरा رضی الله تعالی عنه का बयान है कि मैं ने रसूले खुदा ﷺ को येह इर्शाद फ़रमाते हुए सुना कि यमन वाले आ गए। ये लोग बहुत ही नर्म दिल हैं ईमान तो यमनियों का ईमान है और हिक्मत भी यमनियों में है। बकरी पालने वालों में सुकून व वकार है और ऊंट पालने वालों में फख्र और घमन्ड है। चुनान्चे इस इर्शादे नबवी की बरकत से अहले यमन ईल्म व सफ़ाइये क़ल्ब और हिक्मत व मारिफ्ते इलाही की दौलतों से हमेशा मालामाल रहे। खास कर हज़रते अबू मूसा अशअरी رضی الله تعالی عنه कि येह निहायत ही खुश आवाज़ थे और क़ुरआन शरीफ़ ऐसी खुश इल्हानी के साथ पढ़ते थे कि सहाबए किराम में इन का कोई हम मिषल न था। इल्मे अक़ाइद में अहले सुन्नत के इमाम शेख अबुल हसन अशअरी رضی الله تعالی عنه इन्ही हज़रते अबू मूसा अशअरी رضی الله تعالی عنه की औलाद में से है।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 509*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 343)
वफ्दे बनी असद :
इस क़बीले के चन्द अश्खास बारगाहे अक्दस में हाज़िर हुए और निहायत ही खुश दिली के साथ मुसलमान हुए। लेकिन फिर एहसान जताने के तौर पर कहने लगे कि या रसूलल्लाह ﷺ इतने सख़्त कहत के ज़माने में हम लोग बहुत ही दूर दराज से मसाफ़त तै कर के यहां आए हैं। रास्ते में हम लोगों को कहीं शिकम सैर हो कर खाना भी नसीब नहीं हुवा और बिगैर इस के कि आप का लश्कर हम पर हम्ला आवर हुवा हो हम लोगों ने ब रिज़ा व रग्बत इस्लाम क़बूल कर लिया है। इन लोगों के इस एहसान जताने पर खुदा वन्दे कुद्दूस यह आयत नाज़िल फ़रमाई कि ऐ महबूब ! येह तुम पर एहसान जताते हैं कि हम मुसलमान हो गए। आप फ़रमा दीजिये कि अपने इस्लाम का एहसान मुझ पर न रखो बल्कि अल्लाह तुम पर एहसान रखता है कि उसने तुम्हें इस्लाम की हिदायत की अगर तुम सच्चे हो।
*वफ्दे फ़ज़ारा :* येह लोग उयैना बिन हसन फ़ज़ारी की क़ौम के लोग थे। बीस आदमी दरबारे अक्दस में हाज़िर हुए और अपने इस्लाम का एलान किया और बताया कि या रसूलल्लाह ﷺ हमारे दियार में इतना सख़्त कहत और काल पड़ गया है कि अब फ़क्रो फाका की मुसीबत हमारे लिये ना क़ाबिले बरदाश्त हो चुकी है। लिहाज़ा आप बारिश के लिये दुआ फ़रमाइये। हुज़ूर ﷺ ने जुमुआ दिन मिम्बर पर दुआ फ़रमा दी और फ़ौरन ही बारिश होने लगी और लगातार एक हफ्ते तक मसला धार बारिश का सिल्सिला जारी रहा फिर दूसरे जुमुआ को जब कि आप मिम्बर पर खुत्बा पढ़ रहे थे एक आ'राबी ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ चौपाए हलाक होने लगे और बाल बच्चे भूक से बिलकने लगे और तमाम रास्ते मुन्कतेअ हो गए लिहाज़ा दुआ फ़रमा दीजिये कि येह बारिश पहाड़ों पर बरसे और खेतों बस्तियों पर न बरसे। चुनान्चे आप ने दुआ फ़रमा दी तो बादल शहरे मदीना और इस के अतराफ़ से कट गया और आठ दिन के बाद मदीने में सूरज नज़र आया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 510*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 344)
*❝ वफ्दे बनी मुर्रह ❞*
इस वफ़द में बनी मुर्रह के तेरह आदमी मदीने आए थे। इन का सरदार हारिष बिन औफ़ भी इस वफ़द में शामिल था। इन सब लोगों ने बारगाहे अकदस में इस्लाम क़बूल किया और कहत की शिकायत और बा रहमत की दुआ के लिये दरख्वास्त पेश की। हुज़ूर ﷺ ने इन लफ्ज़ों के साथ दुआ मांगी कि (ऐ अल्लाह ! इन लोगों को बारिश से सैराब फ़रमा दे) फिर आप ﷺ ने हज़रते बिलाल رضی الله تعالی عنه को हुक्म दिया कि इन में से हर शख़्स को दस दस ऊक़िया चांदी और चार चार सो दिरहम इन्आम तोहफ़े के तौर पर अता करें। और आप ﷺ ने उन के सरदार हज़रते हारिष बिन औफ رضی الله تعالی عنه को बारह ऊकिया चांदी का शाहाना अतिय्या मर्हमत फ़रमाया।
जब येह लोग मदीने से अपने वतन पहुंचे तो पता चला कि ठीक उसी वक्त उन के शहरों में बारिश हुई थी जिस वक्त सरकारे दो आलम ﷺ ने उन लोगों की दरख्वास्त पर मदीने में बारिश के लिये दुआ मांगी थी।
*वफ्दे बनी अल बुकाअ :* इस वफ़द के साथ हज़रते मुआविया बिन षौर बिन उबाद رضی الله تعالی عنه भी आए थे जो एक सो बरस की उम्र के बूढ़े थे। इन सब हजरात ने बारगाहे अक्दस में हाज़िर हो कर अपने इस्लाम का एलान किया फिर हज़रते मुआविया बिन षौर बिन उबाद رضی الله تعالی عنه ने अपने फरज़न्द हज़रते बशीर رضی الله تعالی عنه को पेश किया और येह गुज़ारिश की, कि यारसूलल्लाह ﷺ आप मेरे इस बच्चे के सर पर अपना दस्ते मुबारक फिरा दें। उन की दरख्वास्त पर हुज़ूरे अकरम ﷺ ने उन के फ़रज़न्द के सर पर अपना मुक़द्दस हाथ फिरा दिया। और उन को चन्द बकरियां भी अता फ़रमाई। और वफ़द वालों के लिये खैरो बरकत की दुआ फ़रमा दी इस दुआए नबवी का येह असर हुवा कि उन लोगों के दियार में जब भी कहत और फ़क्रो फाका की बला आई तो उस क़ौम के घर हमेशा कहत और भुक मरी की मुसीबतों से महफूज़ रहे।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 512*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 345)
वफ्दे बनी किनाना :
इस वफ़द के अमीरे कारवां हज़रते वाषिला बिन अस्कअ رضی الله تعالی عنه थे। येह सब लोग दरबारे रसूल में निहायत ही अकीदत मन्दी के साथ हाज़िर हो कर मुसलमान हो गए और हज़रते वाषिला बिन अस्कअ رضی الله تعالی عنه बैअते इस्लाम कर के जब अपने वतन में पहुंचे तो उन के बाप ने इन से नाराज़ व बेज़ार हो कर कह दिया कि मैं खुदा की क़सम ! तुझ से कभी कोई बात न करूंगा। लेकिन इन की बहन ने सिद्के दिल से इस्लाम क़बूल कर लिया। येह अपने बाप की हरकत से रन्जीदा और दिल शिकस्ता हो कर फिर मदीनए मुनव्वरह चले आए और जंगे तबूक में शरीक हुए और फिर असहाबे सुफ्फ़ा की जमाअत में शामिल हो कर हुज़ूरे अकरम ﷺ की खिदमत करने लगे। हुज़ूर ﷺ के बाद येह बसरा चले गए । फिर आखिर उम्र में शाम गए और सि. 85 हि. में शहर दिमश्क के अन्दर वफ़ात पाई।
*वफ्दे बनी हिलाल :* इस वफ़द के लोगों ने भी दरबारे नुबुव्वत में हाज़िर हो कर इस्लाम क़बूल कर लिया। इस वफ़द में हज़रते ज़ियाद बिन अब्दुल्लाह رضی الله تعالی عنه भी थे येह मुसलमान हो कर दन्दनाते हुए हज़रते उम्मुल मुअमिनीन बीबी मैमूना رضی الله تعالی عنها के घर में दाखिल हो गए क्यूं कि वोह इन की ख़ाला थीं।
येह इत्मीनान के साथ अपनी खाला के पास बैठे हुए गुफ्तगू में मसरूफ़ थे जब रसूले खुदा ﷺ मकान में तशरीफ़ लाए और येह पता चला कि हज़रते जियाद رضی الله تعالی عنه उम्मुल मुअमिनीन के भान्जे हैं तो आप ﷺ ने अज़ राहे शक्कत उन के सर और चेहरे पर अपना नूरानी हाथ फैर दिया। इस दस्ते मुबारक की नूरानिय्यत से हज़रते ज़ियाद का चेहरा رضی الله تعالی عنه इस क़दर पुरनूर हो गया कि क़बीलए बनी हिलाल के लोगों का बयान है कि इस के बाद हम लोग हज़रते ज़ियाद बिन अब्दुल्लाह رضی الله تعالی عنه के चेहरे पर हमेशा एक नूर और बरकत का अषर देखते रहे।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 514*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 346)
वफ्दे ज़माम बिन सालबा :
येह क़बीलए सा'द बिन बक्र के नुमाइन्दा बन कर बारगाहे रिसालत में आए। येह बहुत ही खूब सूरत सुर्ख व सफेद रंग के गेसू दराज़ आदमी थे। मस्जिदे नबवी में पहुंच कर अपने ऊंट को बिठा कर बांध दिया फिर लोगों से पूछा कि मुहम्मद ﷺ कौन हैं? लोगों ने दूर से इशारा कर के बताया कि वोह गोरे रंग के खूबसूरत आदमी जो तकिया लगा कर बैठे हुए हैं वोही हज़रत मुहम्मद ﷺ हैं। हज़रते ज़माम बिन सालबा رضی الله تعالی عنه सामने आए और कहा कि ऐ अब्दुल मुत्तलिब के फ़रज़न्द ! मैं आप से चन्द चीजों के बारे में सुवाल करूंगा और मैं अपने सुवाल में बहुत ज़्यादा मुबालगा और सख्ती बरतूंगा। आप इस से मुझ पर ख़फ़ा न हों। आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया कि तुम जो चाहों पूछ लो। फिर हस्बे जैल मुकालमा हुवा।
जमाम बिन सालबा : मैं आप को उस ख़ुदा की क़सम दे कर जो आप का और तमाम इन्सानों का परवर दगार है येह पूछता हूं कि क्या अल्लाह ने आप को हमारी तरफ़ अपना रसूल बना कर भेजा है ?
नबी ﷺ : "हां"
ज़माम बिन सालबा : मैं आप को खुदा की कसम दे कर येह सुवाल करता हूं कि क्या नमाज़ व रोज़ा और हज व ज़कात को अल्लाह ने हम लोगों पर फ़र्ज़ किया है ? नबी ﷺ : "हां"
ज़माम बिन सालबा : आप ने जो कुछ फ़रमाया मैं उस पर ईमान लाया और मैं ज़माम बिन सालबा हूं। मेरी क़ौम ने मुझे इस लिये आप के पास भेजा है कि मैं आप के दीन को अच्छी तरह समझ कर अपनी क़ौम बनी सा'द बिन बक्र तक इस्लाम का पैग़ाम पहुंचा दूं।
हज़रते ज़माम बिन सालबा मुसलमान हो कर अपने वतन में पहुंचे और सारी क़ौम को जम्अ कर के सब से पहले अपनी क़ौम के तमाम बुतों या'नी "लात व उज्ज़ा" और "मनात व हबल” को बुरा भला कहने लगे और खूब खूब इन बुतों की तौहीन करने लगे। इन की क़ौम ने जो अपने बुतों की तौहीन सुनी तो एक दम सब चौंक पड़े और कहने लगे कि ऐ सालबा के बेटे ! तू क्या कह रहा है ? ख़ामोश हो जा वरना हम को येह डर है कि हमारे येह देवता तुझ को बरस और कोढ़ और जुनून में मुब्तला कर देंगे। आप येह सुन कर तैश में आ गए और तड़प कर फ़रमाया कि ऐ बे अक्ल इन्सानो ! येह पथ्थर के बुत भला हम को क्या नफ्अ व नुक्सान पहुंचा सकते हैं ? सुनो ! अल्लाह तआला जो हर नफ्अ व नुक्सान का मालिक है उस ने अपना एक रसूल भेजा है और एक किताब नाज़िल फ़रमाई है ताकि तुम इन्सानों को इस गुमराही और जहालत से नजात अता फ़रमाए। मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई मा'बूद नहीं है और हज़रत मुहम्मद ﷺ अल्लाह के रसूल हैं। मैं अल्लाह के उस की बारगाह में हाजिर हो कर इस्लाम का पैग़ाम तुम लोगों के पास लाया हूं, फिर उन्हों ने आमाले इस्लाम या'नी नमाज़ व रोज़ा और हज व ज़कात को उन लोगों के सामने पेश किया और इस्लाम की हक्कानिय्यत पर ऐसी पुरजोश और मुअशशीर तक़रीर फ़रमाई कि रात भर में क़बीले के तमाम मर्द व औरत मुसलमान हो गए और उन लोगों ने अपने बुतों को तोड़ फोड़ कर पाश पाश कर डाला और अपने क़बीले में एक मस्जिद बना ली और नमाज़ व रोज़ा और हज व ज़कात के पाबन्द हो कर सादिकुल ईमान मुसलमान बन गए। سبحان اللہ
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह 515- 516*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 347)
वफ्दे बल्ली :
येह लोग जब मदीनए मुनव्वरह पहुंचे तो हज़रते अबू रुवैफअ رضی الله تعالی عنه जो पहले ही से मुसलमान हो कर ख़िदमते अक़दस में मौजूद थे। उन्हों ने इस वफ़द का तआरुफ़ कराते हुए अर्ज़ किया कि रसूलल्लाह ﷺ येह लोग मेरी क़ौम के अफराद हैं। आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया कि मैं तुम को और तुम्हारी क़ौम को "खुश आमदीद" कहता हूं। फिर हज़रते अबू रुवैफअ رضی الله تعالی عنه ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ येह सब लोग इस्लाम का इक्रार करते हैं और अपनी पूरी क़ौम के मुसलमान होने की ज़िम्मादारी लेते हैं। आप ने इर्शाद फ़रमाया कि अल्लाह तआला जिस के साथ भलाई का इरादा फ़रमाता है उस को इस्लाम की हिदायत देता है।
इस वफ़द में एक बहुत ही बूढ़ा आदमी भी था। जिस का नाम "अबुज़्ज़ैफ़" था उस ने सुवाल किया कि या रसूलल्लाह ﷺ मैं एक ऐसा आदमी हूं कि मुझे मेहमानों की मेहमान नवाज़ी का बहुत ज़्यादा शौक है तो क्या इस मेहमान नवाज़ी का मुझे कुछ सवाब भी मिलेगा ? आपने इर्शाद फ़रमाया कि मुसलमान होने के बाद जिस मेहमान की भी मेहमान नवाजी करोगे ख्वाह वो अमीर हो या गरीब तुम सवाब के हक़दार ठहरोगे। फिर उसने ये पूछा कि या रसूलल्लाह ﷺ मेहमान कितने दिनों तक मेहमान नवाज़ी का हकदार है ? आप ﷺ ने फरमाया की तीन दिन तक, इस के बाद वो जो खाएगा वो सदक़ा होगा।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 517*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 348)
वफ़्दे तुजीब :
येह तेरह आदमियों का एक वफ़्द था जो मालों और मवेशियों की ज़कात ले कर बारगाहे अक्दस में हाज़िर हुवा था। हुज़ूर ﷺ ने मरहबा और खुश आमदीद कह कर उन लोगों का इस्तिक़्बाल फरमाया। और येह इरशाद फरमाया कि तुम लोग अपने इस माले ज़कात को अपने वतन में ले जाओ और वहां के फुकरा व मसाकीन को येह सारा माल दे दो। उन लोगों ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह (ﷺ)! हम अपने वत़न के फुकरा व मसाकीन को इस कदर माल दे चुके हैं कि येह माल उन की हाजतों से ज़ियादा हमारे पास बच रहा है। येह सुन कर हुज़ूर ﷺ ने उन लोगों की इस ज़कात को क़बूल फ़रमा लिया और उन लोगों पर बहुत ज़ियादा करम फ़रमाते हुए उन खुश नसीबों की खूब खूब मेहमान नवाजी फरमाई और ब वक्ते रुख़्सत उन लोगों को इक्राम व इन्आम से भी नवाजा। फिर दरयाफ़्त फरमाया कि क्या तुम्हारी कौम में कोई ऐसा शख्स बाकी रह गया है? जिस ने मेरा दीदार नहीं किया है। उन लोगों ने कहा कि जी हां। एक नौ जवान को हम अपने वतन में छोड़ आए हैं जो हमारे घरों की हिफाजत कर रहा है। हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि तुम लोग उस नौ जवान को मेरे पास भेज दो।
चुनान्चे उन लोगों ने अपने वतन पहुंच कर उस नौ जवान को मदीनए त़य्यिबा रवाना कर दिया। जब वोह नौ जवान बारगाहे आली में बारयाब हुवा तो उस ने येह गुज़ारिश की, कि या रसूलल्लाह (ﷺ)! आप ने मेरी क़ौम की हाजतों को तो पूरी फ़रमा कर उन्हें वतन में भेज दिया अब मैं भी एक हाजत ले कर आप ﷺ की बारगाहे अक्दस में हाज़िर हो गया हूं और उम्मीद वार हूं कि आप मेरी हाजत भी पूरी फ़रमा देंगे। हुज़ूर ﷺ ने दरयाफ़्त फरमाया कि तुम्हारी क्या हाजत है? उस ने कहा कि या रसूलल्लाह (ﷺ)! मैं अपने घर से येह मक्सद ले कर नहीं हाज़िर हुवा हूं कि आप मुझे कुछ माल अता फरमाएं बल्कि मेरी फ़क़त इतनी हाजत और दिली तमन्ना है जिस को दिल में ले कर आप ﷺ की बारगाह में हाज़िर हुवा हूं कि अल्लाह तआला मुझे बख्श दे और मुझ पर अपना रहम फरमाए और मेरे दिल में बे नियाज़ी और इस्तिग़ना की दौलत पैदा फरमा दे। नौ जवान की इस दिली मुराद और तमन्ना को सुन कर महबूबे खुदा ﷺ बहुत खुश हुए और उस के हक़ में इन लफ़्ज़ों के साथ दुआ फरमाई कि :
اَللّٰهُمَّ اغْفِرْلَهٗ وَارْحَمْهُ وَاجْعَلْ غِنَاهُ فِیْ قَلْبِهٖ
इस को बख्श दे और इस पर रहम फ़रमा और इस के दिल में बे नियाज़ी डाल दे।
फिर आप ﷺ ने उस नौ जवान को उस की कौम का अमीर मुकर्रर फ़रमा दिया और येही नौ जवान अपने क़बीले की मस्जिद का इमाम हो गया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह 518-519*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 349)
वफ्दे मुजैना :
इस वफ्द के सर बराह हज़रते नो'मान बिन मुक़र्रिन رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि हमारे क़बीले के चार सो आदमी हुज़ूर ﷺ की खिदमते अक्दस में हाज़िर हुए और जब हम लोग अपने घरों को वापस होने लगे तो आप ﷺ ने फ़रमाया कि ऐ उ़मर! तुम इन लोगों को कुछ तोहफा इनायत करो। हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह (ﷺ) ! मेरे घर में बहुत ही थोड़ी सी खजूरें हैं। येह लोग इतने क़लील तोहफे से शायद खुश न होंगे। आप ﷺ ने फिर येही इरशाद फरमाया कि ऐ उमर ! जाओ इन लोगों को ज़रूर कुछ तोहफा अता करो।
इरशादे नबवी सुन कर हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه उन चार सो आदमियों को हमराह ले कर मकान पर पहुंचे तो येह देख कर हैरान रह गए कि मकान में खजूरों का एक बहुत ही बड़ा तौदा पड़ा हुवा है आप رضی الله تعالی عنه ने वफ़द के लोगों से फरमाया कि तुम लोग जितनी और जिस कदर चाहो इन खजूरों में से ले लो। उन लोगों ने अपनी हाजत और मरज़ी के मुताबिक खजूरें ले लीं। हज़रते नो'मान बिन मकरन رضى الله تعالى عنه का बयान है कि सब से आखिर में जब मैं खजूरें लेने के लिये मकान में दाखिल हुवा तो मुझे ऐसा नज़र आया कि गोया इस ढेर में से एक खजूर भी कम नहीं हुई है।
येह वोही हज़रते नो'मान बिन मकरन رضى الله تعالى عنه हैं, जो फ़त्हे मक्का के दिन क़बीलए मुजैना के अलम बरदार थे येह अपने सात भाइयों के साथ हिजरत कर के मदीना आए थे। हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद رضی الله تعالی عنه फ़रमाया करते थे कि कुछ घर तो ईमान के हैं और कुछ घर निफ़ाक़ के हैं और आले मक़रन का घर ईमान का घर है।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 520*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 350)
वफ़्दे दौस :
इस वफ़्द के काइद हज़रते तुफैल बिन अम्र दौसी رضی الله تعالی عنه थे येह हिजरत से कब्ल ही इस्लाम क़बूल कर चुके थे। इन के इस्लाम लाने का वाकिआ भी बड़ा ही अजीब है येह एक बड़े होश मन्द और शो'ला बयान शाइर थे। येह किसी ज़रूरत से मक्का आए तो कुफ्फ़ारे कुरैश ने इन से कह दिया कि खबरदार तुम मुहम्मद (ﷺ) से न मिलना और हरगिज़ हरगिज़ उन की बात न सुनना। उन के कलाम में ऐसा जादू है कि जो सुन लेता है वोह अपना दीन व मज़हब छोड़ बैठता है और अज़ीज़ो अकारिब से उस का रिश्ता कट जाता है। येह कुफ्फ़ारे मक्का के फरेब में आ गए और अपने कानों में इन्हों ने रूई भर ली कि कहीं क़ुरआन की आवाज़ कानों में न पड़ जाए। लेकिन एक दिन सुब्ह को येह हरमे का'बा में गए तो रसूलुल्लाह ﷺ फज्र की नमाज़ में क़िराअत फरमा रहे थे एक दम क़ुरआन की आवाज़ जो इन के कान में पड़ी तो येह क़ुरआन की फ़साहत व बलागत पर हैरान रह गए और किताबे इलाही की अज़मत और इस की तासीरे रब्बानी ने इन के दिल को मोह लिया। जब हुज़ूरे अकरम ﷺ काशानए नुबुव्वत को चले तो येह बे ताबाना आप ﷺ के पीछे पीछे चल पड़े और मकान में आ कर आप के सामने मुअद्दबाना बैठ गए और अपना और कुरैश की बद गोइयों का सारा हाल सुना कर अर्ज़ किया कि खुदा की क़सम ! मैं ने क़ुरआन से बढ़ कर फ़सीहो बलीग आज तक कोई कलाम नहीं सुना। लिल्लाह ! मुझे बताइये कि इस्लाम क्या है? हुज़ूर ﷺ इस्लाम के चन्द अहक़ाम उन के सामने बयान फ़रमा कर उन को इस्लाम की दा'वत दी तो वोह फौरन ही कलिमा पढ़ कर मुसलमान हो गए।
फिर इन्हों ने दरख्वास्त की या रसूलल्लाह ﷺ ! मुझे कोई ऐसी अलामत व करामत अता फरमाइये कि जिस को देख कर लोग मेरी बातों की तस्दीक करें ताकि मैं अपनी कौम में यहां से जा कर इस्लाम की तब्लीग करूं। आप ﷺ ने दुआ फरमा दी कि इलाही ! तू इन को एक खास किस्म का नूर अता फरमा दे। चुनान्चे इस दुआए नबवी की बदौलत इन को येह करामत अता हुई कि इन की दोनों आंखों के दरमियान चराग़ के मानिन्द एक नूर चमकने लगा। मगर इन्हों ने येह ख़्वाहिश जाहिर की, कि येह नूर मेरे सर में मुन्तकिल हो जाए। चुनान्चे उन का सर किन्दील की तरह चमकने लगा।
जब येह अपने क़बीले में पहुंचे और इस्लाम की दा'वत देने लगे तो इन के मां बाप और बीवी ने तो इस्लाम क़बूल कर लिया मगर इन की क़ौम मुसलमान नहीं हुई बल्कि इस्लाम की मुखालफत पर तुल गई। येह अपनी कौम के इस्लाम से मायूस होने पर फिर हुज़ूर ﷺ की खिदमत में चले गए और अपनी कौम की सरकशी और सरताबी का सारा हाल बयान किया तो आप ﷺ ने इरशाद फरमाया कि तुम फिर अपनी कौम में चले जाओ और नर्मी के साथ उन को खुदा की तरफ बुलाते रहो। चुनान्चे येह फिर अपनी कौम में आ गए और लगातार इस्लाम की दा'वत देते रहे यहां तक कि सत्तर या अस्सी घरानों में इस्लाम की रौशनी फैल गई और येह इन सब लोगों को साथ ले कर खैबर में ताजदारे दो आलम ﷺ की बारगाह में हाज़िर हो गए और आप ﷺ ने खुश हो कर ख़ैबर के माले ग़नीमत में से इन सब लोगों को हिस्सा अता फरमाया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 520*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 351)
वफ़्दे बनी अबस : क़बीलए बनी अबस के वफ्द ने दरबारे अक्दस में जब हाज़िरी दी तो येह अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह (ﷺ)! हमारे मुबल्लिगीन ने हम को खबर दी है कि जो हिजरत न करे उस का इस्लाम मक़्बूल ही नहीं है तो या रसूलल्लाह (ﷺ) ! अगर आप हुक्म दें तो हम अपने सारे माल व मता और मवेशियों को बेच कर हिजरत कर के मदीना चले आएं। येह सुन कर हुज़ूर ﷺ ने फरमाया कि तुम लोगों के लिये हिजरत ज़रूरी नहीं। हां! येह ज़रूरी है कि तुम जहां भी रहो खुदा से डरते रहो और ज़ोहदो तक़्वा के साथ ज़िन्दगी बसर करते रहो।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 522*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 352)
वफ़्दे दारम
येह वफ़्द दस आदमियों का एक गुरौह था जिन का तअल्लुक़ क़बीलए "लख्म" से था और उन के सर बराह और पेश्वा का नाम "हानी बिन हबीब" था। येह लोग हुज़ूर ﷺ के लिये तोहफे में चन्द घोड़े और एक रेशमी जुब्बा और एक मशक शराब अपने वतन से ले कर आए। हुज़ूर ﷺ ने घोड़ों और जुब्बे के तहाइफ को तो क़बूल फरमा लिया लेकिन शराब को येह कह कर ठुकरा दिया कि अल्लाह तआला ने शराब को हराम फरमा दिया है। हानी बिन हबीब رضی الله تعالی عنه ने अर्ज़ की या रसूलल्लाह ﷺ अगर इजाज़त हो तो मैं इस शराब को बेच डालूं। आप ﷺ ने फरमाया कि जिस खुदा ने शराब के पीने को हराम फरमाया है उसी ने इस की खरीदो फरोख्त को भी हराम ठहराया है। लिहाज़ा तुम शराब की इस मशक को ले कर कहीं ज़मीन पर इस शराब को बहा दो।
रेशमी जुब्बा आप ﷺ ने अपने चचा हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه को अता फरमाया तो उन्हों ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह (ﷺ)! मैं इस को ले कर क्या करूंगा? जब कि मर्दों के लिये इस का पहनना ही हराम है। आप ﷺ ने फरमाया कि इस में जिस कदर सोना है आप उस को इस में से जुदा कर लीजिये और अपनी बीवियों के लिये जेवरात बनवा लीजिये और रेशमी कपड़े को फरोख्त कर के इस की कीमत को अपने इस्ति'माल में लाइये। चुनान्चे हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه ने उस जुब्बे को आठ हजार दिरहम में बेचा। येह वफ़्द भी बारगाहे रिसालत में हाज़िर हो कर निहायत खुश दिली के साथ मुसलमान हो गया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 523*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 353)
वफ़्दे ग़ामद
येह दस आदमियों की जमाअत थी जो सि. 10 हि. में मदीना आए और अपनी मन्ज़िल में सामानों की हिफ़ाज़त के लिये एक जवान लड़के को छोड़ दिया। वोह सो गया इतने में एक चोर आया और एक बेग चुरा कर ले भागा। येह लोग हुज़ूर ﷺ की खिदमते अक्दस में हाज़िर थे कि ना गहां आप ﷺ ने फरमाया कि तुम लोगों का एक बेग चोर ले गया मगर फिर तुम्हारे जवान ने इस बेग को पा लिया। जब येह लोग बारगाहे अक्दस से उठ कर अपनी मन्जिल पर पहुंचे तो उन के जवान ने बताया कि मैं सो रहा था कि एक चोर बेग ले कर भागा मगर मैं बेदार होने के बा'द जब उस की तलाश में निकला तो एक शख्स को देखा वोह मुझ को देखते ही फ़िरार हो गया और मैं ने देखा कि वहां की ज़मीन खोदी हुई है जब मैं ने मिट्टी हटा कर देखा तो बेग वहां दफ्न था मैं उस को निकाल कर ले आया। येह सुन कर सब बोल पड़े कि बिला शुबा येह रसूले बरहक हैं और हम को इन्हों ने इसी लिये इस वाक़िए की खबर दे दी ताकि हम लोग इन की तस्दीक कर लें। उन सब लोगों ने इस्लाम कबूल कर लिया और उस जवान ने भी दरबारे रसूल में हाज़िर हो कर कलिमा पढ़ा और इस्लाम के दामन में आ गया। हुज़ूर ﷺ ने हज़रते उबय्य बिन का'ब رضی الله تعالی عنه को हुक्म दिया कि जितने दिनों इन लोगों का मदीने में क़ियाम रहे तुम इन लोगों को क़ुरआन पढ़ना सिखा दो।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 524*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 354)
वफ़्दे नजरान :
येह नजरान के नसारा का वफ़्द था। इस में साठ सुवार थे। चौबीस इन के शुरफ़ा और मुअज़्ज़िज़ीन थे और तीन अश्खास इस दरजे के थे कि उन्हीं के हाथों में नजरान के नसारा का मज़हबी और क़ौमी सारा निज़ाम था। एक आकिब जिस का नाम "अब्दुल मसीह" था दूसरा शख़्स सय्यिद जिस का नाम "ऐहम" था तीसरा शख्स "अबू हारिसा बिन अल्कमा" था। इन लोगों ने रसूलुल्लाह ﷺ से बहुत से सुवालात किये और हुज़ूर ﷺ ने उस के जवाबात दिये यहां तक कि हज़रते ईसा عَلَيْهِ السَّلام के मुआमले पर गुफ्तगू छिड़ गई। इन लोगों ने येह मानने से इन्कार कर दिया कि हज़रते ईसा عَلَيْهِ السَّلام कंवारी मरयम के शिकम से बिगैर बाप के पैदा हुए इस मौक़ पर येह आयत नाज़िल हुई कि जिस को "आयते मुबाहला" कहते हैं कि :
तर्जमा : बेशक हज़रते ईसा (عَلَيْهِ السَّلام) की मिसाल अल्लाह के नजदीक आदम (عَلَيْهِ السَّلام) की तरह है उन को मिट्टी से बनाया फिर फ़रमाया "हो जा" वोह फौरन हो जाता है (ऐ सुनने वाले) येह तेरे रब की तरफ से हक़ है तुम शक वालों में से न होना फिर (ऐ महबूब) जो तुम से हज़रते ईसा के बारे में हुज्जत करें बा'द इस के कि तुम्हें इल्म आ चुका तो उन से फरमा दो आओ हम बुलाएं अपने बेटों को और तुम्हारे बेटों को और अपनी औरतों को और तुम्हारी औरतों को और अपनी जानों को और तुम्हारी जानों को फिर हम गिड़गिड़ा कर दुआ मांगें और झूटों पर अल्लाह की ला'नत डालें।
हुज़ूर ﷺ ने जब उन लोगों को इस मुबाहले की दावत दी तो उन नसरानियों ने रात भर की मोहलत मांगी सुब्ह को हुज़ूर ﷺ हज़रते हसन, हज़ते हुसैन, हज़रते अली, हज़रते फातिमा رضی اللہ تعالیٰ عنہم को साथ ले कर मुबाहले के लिये काशानए नुबुव्वत से निकल पड़े मगर नजरान के नसरानियों ने मुबाहले से इन्कार कर दिया और जिज़या देने का इक़रार कर के हुज़ूर ﷺ से सुलह कर ली।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 525*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 355)
हिजरत का दसवां साल सि. 10 हि.
हिज्जतुल वदाअ #01 : इस साल के तमाम वाकिआत में सब से जियादा शानदार और अहम तरीन वाक़िआ "हिज्जतुल वदाअ" है। येह आप ﷺ का आखिरी हज था और हिजरत के बाद येही आप का पहला हज था। जू क़ादह सि. 10 हि. में आप ﷺ ने हज के लिये रवानगी का एलान फ़रमाया। येह ख़बर बिजली की तरह सारे अरब में हर तरफ फैल गई और तमाम अरब शरफ़े हम-रिकाबी के लिये उमंड पड़ा।
हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने आखिर ज़ू क़ादह में जुमा'रात के दिन मदीने में गुस्ल फ़रमा कर तहबन्द और चादर ज़ैबे तन फ़रमाया और नमाज़े ज़ोहर मस्जिदे नबवी में अदा फ़रमा कर मदीनए मुनव्वरह से रवाना हुए और अपनी तमाम अज़्वाजे मुतहहरात को भी साथ चलने का हुक्म दिया। मदीनए मुनव्वरह से छे मील दूर अहले मदीना की मीक़ात “जुल हलीफ़ा" पर पहुंच कर रात भर क़ियाम फ़रमाया फिर एहराम के लिये गुस्ल फ़रमाया और हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها ने अपने हाथ से जिस्मे अत्हर पर खुश्बू लगाई फिर आप ने दो रक्अत नमाज़ अदा फ़रमाई और अपनी ऊंटनी "कस्वा" पर सुवार हो कर एहराम बांधा और बुलन्द आवाज़ से "लब्बैक" पढ़ा और रवाना हो गए।
हज़रते जाबिर رضی الله تعالی عنه का बयान है कि मैं ने नज़र उठा कर देखा तो आगे पीछे दाएं बाएं हद्दे निगाह तक आदमियों का जंगल नज़र आता था। बैहक़ी की रिवायत है कि एक लाख चौदह हज़ार और दूसरी रिवायतों में है एक लाख चौबीस हज़ार मुसलमान हिज्जतुल वदाअ में आप के साथ थे।
चौथी जुल हिज्जा को आप ﷺ मक्कए मुकर्रमा में दाखिल हुए। आप के ख़ानदान बनी हाशिम के लड़कों ने तशरीफ़ आवरी की खबर सुनी तो खुशी से दौड़ पड़े और आप ने निहायत ही महब्बत व प्यार के साथ किसी को आगे किसी को पीछे अपनी ऊंटनी पर बिठा लिया।
फज्र की नमाज़ आपने मकामे “ज़ी तुवा” में अदा फ़रमाई और गुस्ल फ़रमाया फिर आप मक्कए मुकर्रमा में दाखिल हुए और चाश्त के वक्त यानी जब आफ्ताब बुलन्द हो चुका था तो आप मस्जिदे हराम में दाखिल हुए। जब का'बए मुअज़्ज़मा पर निगाहे महरे नुबुव्वत पड़ी तो आप ने येह दुआ पढ़ी कि : ऐ अल्लाह ! तू सलामती देने वाला है और तेरी तरफ से सलामती है। ऐ रब ! हमें सलामती के साथ ज़िन्दा रख। ऐ अल्लाह ! इस घर की अज़मत व शरफ़ और इज़्ज़त व हैबत को ज़ियादा कर और जो इस घर का हज और उमरह करे तू उस की बुजुर्गी और शरफ़ व अज़मत को ज़ियादा कर।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 526*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 356)
हिज्जतुल वदाअ #02 :
जब हजरे अस्वद के सामने आप ﷺ तशरीफ़ ले गए तो हजरे अस्वद पर हाथ रख कर उस को बोसा दिया फिर ख़ानए काबा का तवाफ़ फ़रमाया। शुरूअ के तीन फेरों में आप ﷺ ने "रमल" किया और बाक़ी चार चक्करों में मामूली चाल से चले हर चक्कर में जब हजरे अस्वद के सामने पहुंचते तो अपनी छड़ी से हजरे अस्वद की तरफ़ इशारा कर के छड़ी को चूम लेते थे। हजरे स्वद का इस्तिलाम कभी आपने छड़ी के जरीए से किया कभी हाथ से छू कर हाथ को चूम लिया कभी लब मुबारक को हजरे अस्वद पर रख कर बोसा दिया और येह भी षाबित है कि कभी रुक्ने यमानी का भी आप ने इस्तिलाम किया।
जब तवाफ से फारिग हुए तो मकामे इब्राहीम के पास तशरीफ लाए और वहां दो रक्अत नमाज़ अदा की। नमाज़ से फ़ारिग हो कर फिर हजरे अस्वद का इस्तिलाम फ़रमाया और सामने के दरवाज़े से सफ़ा की जानिब रवाना हुए। करीब पहुंचे तो इस आयत की तिलावत फ़रमाई कि : _बेशक सफ़ा और मर्वह अल्लाह के दीन के निशानों में से हैं।_
फिर सफा और मर्वह की सअय फ़रमाई और चूंकि आप ﷺ के साथ कुरबानी के जानवर थे इस इस लिये उमरह अदा करने के बाद आप ने एहराम नहीं उतारा।
आठवीं जुल हिज्जा जुमारात के दिन आप ﷺ मिना तशरीफ़ ले गए और पांच नमाज़े, जोहर, अस्र, मगरिब, इशा, फज्र, मिना में अदा फ़रमा कर नवीं जुल हिज्जा के दिन आप अरफ़ात तशरीफ़ ले गए।
ज़मानए जाहिलिय्यत में चूंकि कुरैश अपने को सारे अरब में अफ़ज़लो आ'ला शुमार करते थे इस लिये वोह अरफ़ात की बजाए "मुज्दलिफ़ा" में क़ियाम करते थे और दूसरे तमाम अरब "अरफ़ात" में ठहरते थे लेकिन इस्लामी मुसावात ने कुरैश के लिये इस तख़्सीस को गवारा नहीं किया और अल्लाह ने येह हुक्म दिया कि : (ऐ कुरैश) तुम भी वहीं (अरफ़ात) से पलट कर आओ जहां से सब लोग पलट कर आते हैं।
हुज़ूर ﷺ ने अरफ़ात पहुंच कर एक कम्बल के खैमे में क़ियाम फ़रमाया। जब सूरज ढल गया तो आप ने अपनी ऊंटनी "कस्वा" पर सुवार हो कर खुत्बा पढ़ा।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 527*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 357)
हिज्जतुल वदाअ/03 :
हुज़ूर ﷺ ने अरफ़ात पहुंच कर एक कम्बल के खैमे में क़ियाम फ़रमाया। जब सूरज ढल गया तो आप ने अपनी ऊंटनी "कस्वा" पर सुवार हो कर खुत्बा पढ़ा। इस खुत्बे में आप ने बहुत से ज़रूरी अहकामे इस्लाम का एलान फ़रमाया और जमाना जाहिलियत की तमाम बराइयों और बेहुदा रस्सों को आप ने मिटाते हुए एलान फ़रमाया की सुन लो ! जाहिलिय्यत के तमाम दस्तूर मेरे दोनों क़दमों के नीचे पामाल है।
इसी तरह जमानए जाहिलिय्यत के खानदानी तफ़ाखुर और रंग व नस्ल की बर तरी और क़ौमिय्यत में नीच ऊंच वगैरा तसव्वुराते जाहिलिय्यत के बुतों को पाश पाश करते हुए और मुसावाते इस्लाम का अलम बुलन्द फ़रमाते हुए ताजदारे दो आलम ﷺ ने अपने इस तारीख़ी खुत्बे में इर्शाद फ़रमाया कि : ऐ लोगो ! बेशक तुम्हारा रब एक है और बेशक तुम्हारा बाप (आदम) एक है। सुन लो ! किसी अरबी को किसी अजमी पर और किसी अजमी को किसी अरबी पर, किसी सुर्ख को किसी काले पर और किसी काले को किसी सुर्ख पर कोई फजीलत नहीं मगर तक्वा के सबब से।
इसी तरह तमाम दुन्या में अम्नो अमान काइम फ़रमाने के लिये अम्नो सलामती के शहनशाह ताजदारे दो आलम ﷺ ने येह खुदाई फ़रमान जारी फ़रमाया कि तुम्हारा खून और तुम्हारा माल तुम पर ता क़ियामत इसी तरह हराम है जिस तरह तुम्हारा येह दिन, तुम्हारा येह महीना, तुम्हारा येह शहर मोहतरम है।
अपना खुत्बा ख़त्म फ़रमाते हुए आप ﷺ ने सामिईन से फ़रमाया कि तुम से खुदा के यहां मेरी निस्बत पूछा जाएगा तो तुम लोग क्या जवाब दोगे ?
तमाम सामिईन ने कहा कि हम लोग खुदा से कह देंगे कि आप ने खुदा का पैग़ाम पहुंचा दिया और रिसालत का हक़ अदा कर दिया। येह सुन कर आप ﷺ ने आस्मान की तरफ उंगली उठाई और तीन बार फ़रमाया की ऐ अल्लाह ! तू गवाह रहना
ऐन इसी हालत में जब कि खुत्बे में आप ﷺ अपना फ़र्ज़े रिसालत अदा फ़रमा रहे थे येह आयत नाज़िल हुई कि : _आज मैं ने तुम्हारे लिये तुम्हारे दीन को मुकम्मल कर दिया और अपनी नेमत तमाम कर दी और तुम्हारे लिये दीने इस्लाम को पसन्द कर लिया।_
*शहनशाहे कौनैन का तख्ते शाही* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 530*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 358)
*शहनशाहे कौनैन का तख्ते शाही :* येह हैरत अंगेज़ व इब्रत खैज़ वाकिआ भी याद रखने के क़ाबिल है कि जिस वक्त शहनशाहे कौनैन, खुदा के नाइबे अकरम और ख़लीफ़ए आ'ज़म होने की हैषिय्यत से फ़रमाने रब्बानी का ए'लान फ़रमा रहे थे आप ﷺ का तख़्ते शहनशाही यानी ऊंटनी का कजावा और अरक़ गीर शायद दस रुपै से जियादा कीमत का न था न उस ऊंटनी पर कोई शानदार कजावा था न कोई हौदज न कोई महमिल न कोई चित्र न कोई ताज।
क्या तारीखे आलम में किसी और बादशाह ने भी ऐसी सादगी का नुमूना पेश किया है ? इस का जवाब येही और फ़क़त यही है कि “नहीं।” येह वोह ज़ाहिदाना शहनशाही है जो सिर्फ शहनशाहे दो आलम ﷺ की शहन्शाहिय्यत का तुर्रए इम्तियाज़ है!
खुत्बे के बाद आप ने जोहर व अस्र एक अज़ान और दो इक़ामतों से अदा फ़रमाई फिर "मौक़िफ़” में तशरीफ़ ले गए और जबले रहमत के नीचे गुरूबे आफ्ताब तक दुआओं में मसरूफ़ रहे। गुरूबे आफ्ताब के बाद अरफ़ात से एक लाख से ज़ाइद हुज्जाज के इज़दिहाम में “मुज़्दलिफ़ा" पहुंचे। यहां पहले मग़रिब फिर इशा एक अज़ान और दो इक़ामतों से अदा फ़रमाई। मुश्इरे हराम के पास रात भर उम्मत के लिये दुआएं मांगते रहे और सूरज निकलने से पहले मुज्दलिफ़ा से मिना के लिये रवाना हो गए और वादिये मुहस्सर के रास्ते से मिना में आप ﷺ "जमरह" के पास तशरीफ़ लाए और कंकरियां मारीं फिर आप ने ब आवाज़े बुलन्द फ़रमाया कि हज के मसाइल सीख लो ! मैं नहीं जानता कि शायद इस के बाद मैं दूसरा हज न करूंगा।
मिना में भी आप ने एक तवील खुत्बा दिया जिस में अरफ़ात के खुत्बे की तरह बहुत से मसाइल व अहकाम का एलान फ़रमाया। फिर कुरबान गाह में तशरीफ़ ले गए। आप के साथ कुरबानी के एक सो ऊंट थे। कुछ को तो आप ने अपने दस्ते मुबारक से जब्ह फ़रमाया और बाकी हज़रते अली رضی الله تعالی عنه को सोंप दिया और गोश्त, पोस्त, झोल, नकील सब को खैरात कर देने का हुक्म दिया और फ़रमाया कि क़स्साब की मज़दूरी भी इस में से न अदा की जाए बल्कि अलग से दी जाए।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 531*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 359)
*मुए मुबारक :* कुरबानी के बाद हज़रते मुअम्मर बिन अब्दुल्लाह رضی الله تعالی عنه से आप ﷺ ने सर के बाल उतरवाए और कुछ हिस्सा हज़रते अबू तल्हा अन्सारी رضی الله تعالی عنه को अता फ़रमाया और बाक़ी मूए मुबारक को मुसलमानों में तकसीम कर देने का हुक्म सादिर फ़रमाया।
इस के बाद आप ﷺ मक्का तशरीफ़ लाए और तवाफ़े जियारत फ़रमाया।
*साकिये कौषर चाहे ज़मज़म पर :* फिर चाहे ज़मज़म के पास तशरीफ़ लाए। खानदाने अब्दुल मुत्तलिब के लोग हाजियों को ज़मज़म पिला रहे थे। आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया कि मुझे येह ख़ौफ़ न होता कि मुझ को ऐसा करते देख कर दूसरे लोग भी तुम्हारे हाथ से डोल छीन कर खुद अपने हाथ से पानी भर कर पीने लगेंगे तो मैं खुद अपने हाथ से पानी भर कर पीता।
हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه ने ज़मज़म शरीफ़ पेश किया और आप ﷺ ने किब्ला रुख खड़े खड़े ज़मज़म शरीफ़ नोश फ़रमाया। फिर मिना वापस तशरीफ़ ले गए और बारह जुल हिज्जा तक मिना में मुक़ीम रहे और हर रोज़ सूरज ढलने के बाद जमरों को कंकरी मारते रहे। तेरह जुल हिज्जा मंगल के दिन आप ﷺ ने सूरज ढलने के बाद मिना से रवाना हो कर "मुहस्सब" में रात भर कियाम फ़रमाया और सुबह को नमाज़े फज्र काबे की मस्जिद में अदा फ़रमाई और तवाफ़े वदाअ कर के अन्सार व मुहाजिरीन के साथ मदीनए मुनव्वरह के लिये रवाना हो गए।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 533*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 360)
*ग़दीर ख़म का खुत्बा :* रास्ते में मक़ामे "ग़दीर खम" पर जो एक तालाब है यहां तमाम हमराहियों को जम्अ फ़रमा कर एक मुख़्तसर खुत्बा इर्शाद फ़रमाया जिस का तर्जमा येह है : हम्दो षना के बा'द : ऐ लोगों ! मैं भी एक आदमी हूं। मुमकिन है कि खुदा का फिरिश्ता (मलकुल मौत) जल्द आ जाए और मुझे उस का पैग़ाम क़बूल करना पड़े मैं तुम्हारे दरमियान दो भारी चीजें छोड़ता हूं। एक खुदा की किताब जिस में हिदायत और रोशनी है और दूसरी चीज़ मेरे अहले बैत हैं। मैं अपने अहले बैत के बारे में तुम्हें खुदा की याद दिलाता हूं।
इस खुत्बे में आपने येह भी इर्शाद फ़रमाया कि जिस का मैं मौला हूं अली भी उस के मौला। खुदा वन्दा عزوجل! जो अली से महब्बत रखे उस से तू भी महब्बत रख और जो अली से अदावत रखे उस से तू भी अदावत रख।
ग़दीर ख़म के खुत्बे में हज़रते अली رضی الله تعالی عنه के फ़ज़ाइल व मनाक़िब बयान करने की क्या जरूरत थी इस की कोई तसरीह कही हदीषों में नहीं मिलती। हां, अलबत्ता बुखारी की एक रिवायत से पता चलता है कि हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने अपने इख़्तियार से कोई ऐसा काम कर डाला था जिस को उन के यमन से आने वाले हमराहियों ने पसन्द नहीं किया यहां तक कि उन में से एक ने बारगाहे रिसालत में इस की शिकायत भी कर दी जिस का हुज़ूर ﷺ ने येह जवाब दिया कि अली को इस से ज़ियादा हक है। मुमकिन है इसी क़िस्म के शुबुहात व शुकूक को मुसलमान यमनियों के दिलों से दूर करने के लिये इस मौक़अ पर हुज़ूर ﷺ ने हज़रते अली और अहले बैत رضی الله تعالی عنهم के फ़ज़ाइल भी बयान कर दिये हों।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 534*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 361)
हिजरत का 11वा साल, जैशे उसामा :
इस लश्कर का दूसरा नाम "सरिय्यए उसामा" भी है। येह सब से आखिरी फ़ौज है जिस के रवाना करने का रसूलुल्लाह ﷺ ने हुक्म दिया। 26 सफर सि. 11 हि. दो शम्बा के दिन हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने रूमियों से जंग की तय्यारी का हुक्म दिया और दूसरे दिन हज़रते उसामा बिन जैद رضی الله تعالی عنه को बुला कर फ़रमाया कि मैं ने तुम को इस फ़ौज का अमीरे लश्कर मुक़र्रर किया तुम अपने बाप की शहादत गाह मक़ामे "उबना" में जाओ और निहायत तेजी के साथ सफ़र कर के उन कुफ्फ़ार पर अचानक हम्ला कर दो ताकि वोह लोग जंग की तय्यारी न कर सकें। बा वुजूदे कि मिज़ाजे अक्दस नासाज थाम इसी हालत में आप ﷺ ने खुद अपने दस्ते मुबारक से झन्डा बांधा और येह निशाने इस्लाम हज़रते उसामा رضی الله تعالی عنه के हाथ में दे कर इर्शाद फ़रमाया : "अल्लाह के नाम से और अल्लाह की राह में जिहाद करो और काफ़िरों के साथ जंग करो।"
हज़रते उसामा ने हज़रते बरीदा बिन अल हुसैब رضی الله تعالی عنه को अलम बरदार बनाया और मदीने से निकल कर एक कोस दूर मक़ामे "जरफ़” में पड़ाव किया ताकि वहां पूरा लश्कर जम्अ हो जाए। हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने अन्सार व मुहाजिरीन के तमाम मुअज्ज़िज़ीन को भी इस लश्कर में शामिल हो जाने का हुक्म दे दिया। बा'ज़ लोगों पर येह शाक़ गुज़रा कि ऐसा लश्कर जिस में अन्सार व मुहाजिरीन के अकाबिर व अमाइद मौजूद हैं एक नौ उम्र लड़का जिस की उम्र बीस बरस से ज़ाइद नहीं किस तरह अमीरे लश्कर बना दिया गया ? जब हुज़ूर ﷺ को इस एतिराज़ की खबर मिली तो आप के क़ल्बे नाजुक पर सदमा गुज़रा और आप ने अलालत के बावजूद सर में पट्टी बांधे हुए एक चादर ओढ़ कर मिम्बर पर एक खुत्बा दिया जिस में इर्शाद फ़रमाया कि अगर तुम लोगों ने उसामा की सिपहसालारी पर ताना जनी की है तो तुम लोगों ने इस से क़ब्ल इस के बाप के सिपह सालार होने पर भी ताना जनी की थी हालां कि खुदा की क़सम ! इस का बाप (जैद बिन हारिषा) सिपहसालार होने के लाइक़ था और उस के बाद उस का बेटा (उसामा बिन जैद) भी सिपह सालार होने के क़ाबिल है और येह मेरे नज़दीक मेरे महबूब तरीन सहाबा में से है जैसा कि इस का बाप मेरे महबूब तरीन असहाब में से था लिहाज़ा उसामा के बारे में तुम लोग मेरी नेक वसिय्यत को क़बूल करो कि वोह तुम्हारे बेहतरीन लोगों में से है।
हुज़ूर ﷺ येह खुत्बा दे कर मकान में तशरीफ़ ले गए और आप की अलालत में कुछ और भी इज़ाफ़ा हो गया।
हज़रते उसामा رضی الله تعالی عنه हुक्मे नबवी की तक्मील करते हुए मक़ामे जरफ़ में पहुंच गए थे और वहां लश्करे इस्लाम का इजतिमाअ होता रहा यहां तक कि एक अज़ीम लश्कर तय्यार हो गया। 10 रबीउल अव्वल सि. 11 हि. को जिहाद में जाने वाले खवास हुज़ूर ﷺ से रुख़सत होने के लिये आए और रुख़सत हो कर मक़ामे जरफ़ में पहुंच गए। इस के दूसरे दिन हुज़ूर ﷺ की अलालत ने और जियादा शिद्दत इख़्तियार कर ली। हज़रते उसामा رضی الله تعالی عنه भी आप ﷺ की मिज़ाज पुर्सी और रुख़सत होने के लिये ख़िदमते अक्दस में हाज़िर हुए। आप ﷺ ने हजरते उसामा رضی الله تعالی عنه को देखा मगर जोफ़ की वजह से कुछ बोल न सके, बार बार दस्ते मुबारक को आस्मान की तरफ़ उठाते थे और उन के बदन पर अपना मुक़द्दस हाथ फैरते थे। हज़रते उसामा رضی الله تعالی عنه का बयान है कि इस से मैं ने येह समझा कि हुज़ूर ﷺ दुआ फ़रमा रहे हैं। इस के बाद हज़रते उसामा رضی الله تعالی عنه रुख्सत हो कर अपनी फ़ौज में तशरीफ़ ले गए और 12 रबीउल अव्वल सि. 11 हि. को कूच करने का एलान भी फ़रमा दिया। अब सुवार होने के लिये तय्यारी कर रहे थे कि उन की वालिदा हज़रते उम्मे ऐमन رضی الله تعالی عنها का फ़रिस्तादा आदमी पहुंचा कि हुज़ूर ﷺ नज़्अ की हालत में हैं। येह होशरुबा ख़बर सुन कर हज़रते उसामा व हज़रते उमर व हज़रते अबू उबैदा رضی الله تعالی عنهم वगैरा फ़ौरन ही मदीना आए तो येह देखा कि आप ﷺ सकरात के आलम में हैं और उसी में दिन दो पहर को या सह पहर के वक्त आप का विसाल हो गया।
येह ख़बर सुन कर हज़रते उसामा رضی الله تعالی عنه का लश्कर मदीना वापस चला आया मगर जब हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ मस्नदे ख़िलाफ़त पर रौनक अफरोज़ हो गए तो आप ने बाज़ लोगों की मुखा-लफ़त के बा वुजूद रबीउल आखिर की आखिरी तारीखों में उस लश्कर को रवाना फ़रमाया और हज़रते उसामा رضی الله تعالی عنه मकामे "उबना" में तशरीफ़ ले गए और वहां बहुत ही ख़ूरैज़ जंग के बाद लश्करे इस्लाम फतह याब हुवा और आप ने अपने बाप के क़ातिल और दूसरे कुफ्फ़ार को कत्ल किया और बे शुमार माले गनीमत ले कर चालीस दिन के बाद मदीने वापस तशरीफ़ लाए।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 535*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 362)
वफ़ाते अक्दस :
हुज़ूर रहमतुल्लिल आलमीन का इस आलम में तशरीफ़ लाना सिर्फ इस लिये था कि आप ﷺ खुदा के आखिरी और क़तई पैग़ाम या'नी दीने इस्लाम के अह्काम उस के बन्दों तक पहुंचा दें और खुदा की हुज्जत तमाम फ़रमा दें। इस काम को आप ﷺ ने क्यूंकर अन्जाम दिया ? और इस में आप को कितनी काम्याबी हासिल हुई ? इस का इज्माली जवाब येह है कि जब से येह दुन्या आलमे वजूद में आई हज़ारों अम्बिया व रुसुल علیہم السلام इस अजीमुश्शान काम को अन्जाम देने के लिये इस आलम में तशरीफ़ लाए मगर तमाम अम्बिया व मुर्सलीन के तब्लीगी कारनामों को अगर जम्अ कर लिया जाए तो वोह हुज़ूर ﷺ के तब्लीगी शाहकारों के मुकाबले में ऐसे ही नज़र आएंगे जैसे आफ्ताबे आलमे ताब के मुकाबले में एक चराग या एक सहरा के मुकाबले में एक जर्रा या एक समन्दर के मुकाबले में एक कतरा। आप ﷺ की तब्लीग ने आलम में ऐसा इन्किलाब पैदा कर दिया कि काएनाते हस्ती की हर पस्ती को मेराजे कमाल की सर बुलन्दी अता फरमा कर ज़िल्लत की ज़मीन को इज्ज़त का आस्मान बना दिया और दीने हनीफ़ के इस मुक़द्दस और नूरानी महल को जिस की तामीर के लिये हज़रते आदम عليه السلام से ले कर हज़रते ईसा عليه السلام तक तमाम अम्बिया व रुसुल मे'मार बना कर भेजे जाते रहे आप ﷺ ने ख़ा-तमुन्नबिय्यीन की शान से इस कस्रे हिदायत को इस तरह मुकम्मल फ़रमा दिया कि हज़रते हक़ جَلَّ جَلَالُهٗ ने इस पर الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ (आज मैं ने तुम्हारे लिये तुम्हारा दीन कामिल कर दिया) की मोहर लगा दी।
जब दीने इस्लाम मुकम्मल हो चुका और दुन्या में आप ﷺ के तशरीफ़ लाने का मक्सद पूरा हो चुका तो अल्लाह तआला के वादए मोहकम "إِنَّكَ مَيِّتٌ وَإِنَّهُمْ مَّيِّتُونَ" (बेशक तुम्हे इन्तिक़ाल फरमाना है और उनको भी मरना है") के पूरा होने का वक़्त आ गया।
*हुज़ूर को अपनी वफ़ात का इल्म* की तफ्सील अगली पोस्ट में..أن شاء الله
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 539*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 363)
हुज़ूर ﷺ को अपनी वफ़ात का इल्म :
हुज़ूर ﷺ को बहुत पहले से अपनी वफ़ात का इल्म हासिल हो गया था और आपने मुख़्तलिफ़ मवाक़ेअ पर लोगों को इस की खबर भी दे दी थी। चुनान्चे हिज्जतुल वदाअ के मौक़अ पर आप ने लोगों को येह फ़रमा कर रुख़्सत फ़रमाया था : "शायद इस के बाद मैं तुम्हारे साथ हज न कर सकूंगा।"
इसी तरह "ग़दीर खम" के खुत्बे में इसी अन्दाज़ से कुछ इसी क़िस्म के अल्फ़ाज़ आप की जबाने अक्दस से अदा हुए थे अगर्चे इन दोनों खुत्बात में लफ्ज़ लअल्ल (शायद) फ़रमा कर ज़रा पर्दा डालते हुए अपनी वफ़ात की ख़बर दी मगर हिज्जतुल वदाअ से वापस आ कर आप ﷺ ने जो खुत्बात इर्शाद फ़रमाए उस में लअल्ल (शायद) का लफ्ज़ आप ने नहीं फ़रमाया बल्कि साफ़ साफ़ और यक़ीन के साथ अपनी वफ़ात की खबर से लोगों को आगाह फ़रमा दिया।
चुनान्चे बुखारी शरीफ़ में हज़रते उक्बा बिन आमिर رضی الله تعالی عنه से रिवायत है कि एक दिन हुज़ूर ﷺ घर से बाहर तशरीफ़ ले गए और शुहदाए उहुद की क़ब्रों पर इस तरह नमाज़ पढ़ी जैसे मय्यित पर नमाज़ पढ़ी जाती है फिर पलट कर मिम्बर पर रौनक अफरोज हुए और इर्शाद फ़रमाया कि मैं तुम्हारा पेश रू (तुम से पहले वफ़ात पाने वाला) हूं और तुम्हारा गवाह हूं और मैं खुदा की क़सम ! अपने हौज़ को इस वक्त देख रहा हूं।
इस हदीष मे اِنِّیْ فَرَطٌ لَّکُمْ फ़रमाया यानी "मैं अब तुम लोगों से पहले ही वफ़ात पा कर जा रहा हूं ताकि वहां जा कर तुम लोगों के लिये हौज़े कौषर का इन्तिज़ाम करूं।
येह क़िस्सा मरजे वफ़ात शुरू होने से पहले का है लेकिन इस क़िस्से को बयान फ़रमाने के वक्त आप ﷺ को इस का यक़ीनी इल्म हासिल हो चुका था कि मैं कब और किस वक्त दुन्या से जाने वाला हूं और मरज़े वफ़ात शुरू होने के बाद तो अपनी साहिब जादी हज़रते बीबी फातिमा رضی الله تعالی عنها को साफ़ साफ़ लफ्ज़ों में बिगैर "शायद" का लफ्ज़ फ़रमाते हुए अपनी वफात की ख़बर दे दी।
चुनान्चे बुखारी शरीफ़ की रिवायत है कि अपने मरज़े वफ़ात में आप ﷺ ने हज़रते फ़ातिमा رضی الله تعالی عنها को बुलाया और चुपके चुपके उन से कुछ फ़रमाया तो वोह रो पड़ीं। फिर बुलाया और चुपके चुपके कुछ फ़रमाया तो वोह हंस पड़ीं जब अज़्वाजे मुतहहरात ने इस के बारे में हज़रते बीबी फातिमा رضی الله تعالی عنها से दरयाफ्त किया तो उन्हों ने कहा कि हुज़ूर ﷺ ने आहिस्ता आहिस्ता मुझ से ये फ़रमाया की मैं इसी बीमारी में वफ़ात पा जाऊंगा तो मैं रो पड़ी। फिर चुपके चुपके मुझ से फ़रमाया कि मेरे बाद मेरे घर वालों में से सब से पहले तुम वफ़ात पा कर मेरे पीछे आओगी तो में हंस पड़ी।
बहर हाल हुज़ूर ﷺ को अपनी वफ़ात से पहले अपनी वफ़ात के वक्त का इल्म हासिल हो चुका था। क्यूं न हो कि जब दूसरे लोगों की के अवकात से हुज़ूर ﷺ को अल्लाह ने आगाह फ़रमा दिया था तो अगर खुदा वन्दे अल्लामुल गुयूब के बता देने से हुज़ूर ﷺ को अपनी वफ़ात के वक्त का कब्ल अज़ वक्त इल्म हो गया तो इस में कौन सा इस्तिबआद है ?
अल्लाह तआला ने तो आप ﷺ को इल्मे मा का-न व मा यकून अता फरमाया। या'नी जो कुछ हो चुका और जो कुछ हो रहा है और जो कुछ होने वाला है सब का इल्म अता फ़रमा कर आप को दुन्या से उठाया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 540*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 364)
अलालत की इब्तिदा :
मरज़ की इब्तिदा कब हुई और हुज़ूर ﷺ कितने दिनों तक अलील रहे ? इस में मुअर्रिख़ीन का इख़्तिलाफ़ है। बहर हाल 20 या 22 सफ़र सि. 11 हि. को हुज़ूर ﷺ जन्नतुल बक़ीअ में जो आम मुसलमानों का क़ब्रिस्तान है आधी रात में तशरीफ़ ले गए वहां से वापस तशरीफ़ लाए तो मिज़ाजे अक्दस नासाज़ हो गया येह हज़रते मैमूना की बारी का दिन था।
दो शम्बा के दिन आप ﷺ की अलालत बहुत शदीद हो गई। आप की ख़्वाहिश पर तमाम अज़्वाजे मुतहहरात ने इजाजत दे दी कि आप हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها के यहां क़ियाम फरमाएं। चुनान्चे हज़रते अब्बास व हज़रते अली رضی الله تعالی عنهم ने सहारा दे कर आप को हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها के हुजरए मुबारका में पहुंचा दिया। जब तक ताक़त रही आप खुद मस्जिदे नबवी में नमाजे़ं पढ़ाते रहे। जब कमज़ोरी बहुत ज़ियादा बढ़ गई तो आप ने हुक्म दिया कि हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه मेरे मुसल्ले पर इमामत करें। चुनांचे सत्तरह नमाज़ें आप رضی الله تعالی عنه ने पढ़ाई।
एक दिन जोहर की नमाज़ के वक़्त मरज़ में कुछ इफ़ाका महसूस हुवा तो आप ﷺ ने हुक्म दिया कि सात पानी की मश्कें मेरे ऊपर डाली जाएं। जब आप ﷺ गुस्ल फ़रमा चुके तो हज़रते अब्बास और हज़रते अली رضی الله تعالی عنهم आप का मुक़द्दस बाजू थाम कर आप को मस्जिद में लाए। हज़रते अबू बक्र رضی الله تعالی عنه नमाज़ पढ़ा रहे थे। आहट पा कर पीछे हटने लगे मगर आप ﷺ ने इशारे से उन को रोका और उन के पहलू में बैठ कर नमाज़ पढ़ाई। आप ﷺ को देख कर हज़रते अबू बक्र رضی الله تعالی عنه और दूसरे मुक्तदी लोग अरकाने नमाज़ अदा करते रहे। नमाज़ के बाद आप ﷺ ने एक खुत्बा भी दिया जिस में बहुत सी वसिय्यतें और अहकामे इस्लाम बयान फ़रमा कर अन्सार के फ़ज़ाइल और इन के हुकूक के बारे में कुछ कलिमात इर्शाद फ़रमाए और सूरए वल अस्र और एक आयत भी तिलावत फ़रमाई।
घर में सात दीनार रखे हुए थे। आप ﷺ ने हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها से फ़रमाया कि तुम उन दीनारों को लाओ ताकि मैं उन दीनारों को खुदा की राह में खर्च कर दूं। चुनान्चे हज़रते अली رضی الله تعالی عنه के जरीए आप ﷺ ने उन दीनारों को तक़्सीम कर दिया और अपने घर में एक ज़र्रा भर भी सोना या चांदी नहीं छोड़ा।
आप ﷺ के मरज़ में कमी बेशी होती रहती थी। खास वफ़ात के दिन या'नी दो शम्बा के रोज़ तबीअत अच्छी थी। हुजरा मस्जिद से मुत्तसिल ही था। आप ने पर्दा उठा कर देखा तो लोग नमाज़े फजर पढ़ रहे थे।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 543*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 365)
अलालत की इब्तिदा 02 :
आप ﷺ के मरज़ में कमी बेशी होती रहती थी। खास वफात के दिन या'नी दो शम्बा के रोज़ तबीअत अच्छी थी। हुजरा मस्जिद से मुत्तसिल ही था। आप ने पर्दा उठा कर देखा तो लोग नमाज़े फुज्र पढ़ रहे थे। येह देख कर खुशी से आप हंस पड़े। लोगों ने समझा कि आप ﷺ मस्जिद में आना चाहते हैं मारे खुशी के तमाम लोग बे क़ाबू हो गए मगर आप ने इशारे से रोका और हुजरे में दाखिल हो कर पर्दा डाल दिया येह सब से आखिरी मौकअ था कि सहाबए किराम ने जमाले नुबुव्वत की ज़ियारत की हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه का बयान है कि आप ﷺ का रुखे अन्वर ऐसा मालूम होता था कि गोया क़ुरआन का कोई वरक है। या'नी सफ़ेद हो गया था।
इस के बाद बार बार गशी तारी होने लगी। हजरते फ़ातिमा رضی الله تعالی عنها की ज़बान से शिद्दते ग़म से येह लफ्ज़ निकल गया : ”हाए रे मेरे बाप की बेचैनी !" हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि ऐ बेटी ! तुम्हारा बाप आज के बाद कभी बेचैन न होगा।
इस के बाद बार बार आप ﷺ ये फरमाते रहे कि उन लोगों के साथ जिन पर खुदा का इन्आम है और कभी येह फरमाते कि खुदा वन्दा ! बड़े रफ़ीक़ में और ला-इलाहा-इल्लल्लाह भी पढ़ते थे और फ़रमाते थे कि बेशक मौत के लिये सख़्तियां हैं। हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها कहती हैं कि तन्दुरुस्ती की हालत में आप ﷺ अकषर फरमाया करते थे कि पैग़म्बरों को इख़्तियार दिया जाता है कि वोह ख़्वाह वफ़ात को कबूल करें या हयाते दुन्या को। जब हुज़ूर ﷺ की ज़बाने मुबारक पर येह कलिमात जारी हुए तो मैं ने समझ लिया कि आप ﷺ ने आखिरत को क़बूल फ़रमा लिया।
वफ़ात से थोड़ी देर पहले हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها के भाई अब्दुर्रहमान बिन अबू बक्र رضی الله تعالی عنه ताज़ा मिस्वाक हाथ में लिये हाजिर हुए। आप ﷺ ने उन की तरफ़ नज़र जमा कर देखा। हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها ने समझा कि मिस्वाक की ख़्वाहिश है। उन्हों ने फ़ौरन ही मिस्वाक ले कर अपने दांतों से नर्म की और दस्ते अक़दस में दे दी आप ﷺ ने मिस्वाक फ़रमाई। सह पहर का वक्त था कि सीनए अक्दस में सांस की घरघराहट महसूस होने लगी इतने में लब मुबारक हिले तो लोगों ने येह अल्फ़ाज़ सुने कि اَلصَّلٰوةَ وَمَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ नमाज़ और लौंडी गुलामों का ख्याल रखो। पास में पानी की एक लगन थी उस में बार बार हाथ डालते और चेह्रए अक़दस पर मलते और कलिमा पढ़ते। चादरे मुबारक को कभी मुंह पर डालते कभी हटा देते। हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها सरे अक्दस को अपने सीने लगाए बैठी हुई थीं। इतने में आप ﷺ ने हाथ उठा कर उंगली से इशारा फ़रमाया और तीन मरतबा येह फ़रमाया कि بَلِ الرَّفِيْقُ اَلْاَعْلٰى (अब कोई नहीं) बल्कि वोह बड़ा रफ़ीक़ चाहिये। येह अल्फ़ाज़ ज़बाने अक्दस पर थे कि ना गहां मुक़द्दस हाथ लटक गए और आंखें छत की तरफ़ देखते हुए खुली की खुली रहीं और आप की कुदसी रूह आलमे कुद्स में पहुंच गई।
(اِنَّ لِلّٰهِ وَاِنَّٓ اِلَيْهِ رٰجِعُوْنَ) اَللّٰهُمَّ صَلِّ وَسَلَّمْ وَبَارِكْ عَلٰى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَّالِهٖ وَاَصْحَابِهٖ اَجْمَعِيْنَ
तारीखे वफ़ात में मुअरि॑खीन का बड़ा इख़्तिलाफ़ है लेकिन इस पर तमाम उलमाए सीरत का इत्तिफ़ाक़ है कि दो शम्बे का दिन और रबीउल अव्वल का महीना था बहर हाल आम तौर पर येही मशहूर है कि 12 रबीउल अव्वल सि. 11 हि. दो शम्बे के दिन तीसरे पहर आप ने विसाल फ़रमाया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 543*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 366)
*वफ़ात का असर :* हुज़ूरे अक्दस ﷺ की वफात से हजराते सहाबए किराम और अहले बैते इज़ाम رضی الله تعالی عنهم को कितना बड़ा सदमा पहुंचा ? और अहले मदीना का क्या हाल हो गया ? इस की तस्वीर कशी के लिये हज़ारों सफ़हात भी मुतहम्मिल नहीं हो सकते। वोह शमए नुबुव्वत के परवाने जो चन्द दिनों तक जमाले नुबुव्वत का दीदार न करते तो उन के दिल बे क़रार और उन की आंखें अश्कबार हो जाती थीं। जाहिर है कि उन आशिकाने रसूल पर जाने आलम ﷺ के दाइमी फ़िराक़ का कितना रूह फरसा और किस कदर जांकाह सदमए अज़ीम हुवा होगा ? जलीलुल कुद्र सहाबए किराम मुबालगा होशो हवास खो बैठे, उन की अक्लें गुम हो गई, आवाज़ें बन्द हो गई और वोह इस क़दर मख़्बूतुल हवास हो गए कि उन के लिये येह सोचना भी मुश्किल हो गया कि क्या कहें ? और क्या करें ?
हज़रते उषमाने गनी رضی الله تعالی عنه पर ऐसा सक्ता तारी हो गया कि वोह इधर उधर भागे भागे फिरते थे मगर किसी से न कुछ कहते थे न किसी की कुछ सुनते थे। हज़रते अली رضی الله تعالی عنه रन्जो मलाल में निढाल हो कर इस तरह बैठ रहे कि उन में उठने बैठने और चलने फिरने की सकत ही नहीं रही। हज़रते अब्दुल्लाह बिन अनीस رضی الله تعالی عنه के क़ल्ब पर ऐसा धचका लगा कि वोह इस सदमे को बरदाश्त न कर सके और उन का हार्ट फेल हो गया।
हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه इस क़दर होशो हवास खो बैठे कि उन्हों ने तलवार खींच ली और नंगी तलवार ले कर मदीने की गलियों में इधर उधर आते जाते थे और येह कहते फिरते थे कि अगर किसी ने येह कहा कि रसूलुल्लाह ﷺ की वफ़ात हो गई तो मैं इस तलवार से उसकी गर्दन उड़ा दूंगा।
हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها का बयान है कि वफ़ात के बाद हज़रते उमर व हज़रते मुगीरा बिन शअबा رضی الله تعالی عنهم इजाज़त ले कर मकान में दाखिल हुए हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه ने हुज़ूर ﷺ को देख कर कहा कि बहुत ही सख़्त गशी तारी हो गई है। जब वोह वहां से चलने लगे तो हज़रते मुगीरा رضی الله تعالی عنه ने कहा कि ऐ उमर ! तुम्हें कुछ खबर भी है ? हुज़ूर ﷺ का विसाल हो चुका है। येह सुन कर हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه आपे से बाहर हो गए और तड़प कर बोले कि ऐ मुग़ीरा ! तुम झूटे हो हुज़ूर ﷺ का उस वक्त तक इन्तिकाल नहीं हो सकता जब तक दुन्या से एक एक मुनाफ़िक का ख़ातिमा न हो जाए।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 546*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 367)
वफ़ात का अषर 02 : मवाहिबे लदुन्निय्यह में तबरी से मन्कूल है कि हुज़ूर ﷺ की वफ़ात के वक्त हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه "सुख” में थे जो मस्जिदे नबवी से एक मील के फासिले पर है। उन की बीवी हज़रते हबीबा बिन्ते ख़ारिजा رضی الله تعالی عنها वहीं रहती थीं। चूंकि दो शम्बे की सुबह को मरज में कमी नज़र आई और कुछ सुकून मालूम हुवा इस लिये हुज़ूर ﷺ ने खुद हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه को इजाज़त दे दी थी कि तुम "सुख" चले जाओ और बीवी बच्चों को देखते आओ।
बुखारी शरीफ़ वगैरा में है कि हज़रते अबू बक्र رضی الله تعالی عنه अपने घोड़े पर सुवार हो कर "सुख" से आए और किसी से कोई बात न कही न सुनी। सीधे हज़रते आइशा رضی الله تعالی عنها के हुजरे में चले गए और हुज़ूर ﷺ के रुखे अन्वर से चादर हटा कर आप ﷺ पर झुके और आप की दोनों आंखों के दरमियान निहायत गर्म जोशी के साथ एक बोसा दिया और कहा कि आप अपनी हुयात और वफ़ात दोनों हालतों में पाकीज़ा रहे। मेरे मां बाप आप पर फ़िदा हों हरगिज़ खुदा वन्दे तआला आप पर दो मौतों को जम्अ नहीं फ़रमाएगा। आप की जो मौत लिखी हुई थी आप उस मौत के साथ वफ़ात पा चुके।
इस के बाद हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه मस्जिद में तशरीफ़ लाए तो उस वक्त हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه तकरीर कर रहे थे। आप ने फरमाया की ऐ उमर बैठ जाओ। हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه ने बैठने से इन्कार कर दिया तो हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه ने उन्हें छोड़ दिया और खुद लोगो को मुतवज्जेह करने के लिये खुत्बा देना शुरू कर दिया कि...
अम्मा बा'द ! जो शख़्स तुम में से मुहम्मद ﷺ की इबादत करता था वोह जान ले कि मुहम्मद ﷺ का विसाल हो गया और जो शख़्स तुम में से खुदा की परस्तिश करता था तो खुदा ज़िन्दा है वोह कभी नहीं मरेगा। फिर इस के बाद हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه ने सूरए आले इमरान की ये आयत तिलावत फ़रमाई :
وَ مَا مُحَمَّدٌ اِلَّا رَسُوْلٌۚ-قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِهِ الرُّسُلُؕ-اَفَاۡىٕنْ مَّاتَ اَوْ قُتِلَ انْقَلَبْتُمْ عَلٰۤى اَعْقَابِكُمْؕ-وَ مَنْ یَّنْقَلِبْ عَلٰى عَقِبَیْهِ فَلَنْ یَّضُرَّ اللّٰهَ شَیْــٴًـاؕ-وَ سَیَجْزِی اللّٰهُ الشّٰكِرِیْنَ
सूरह आले इमरान आयत - 144
_और मुहम्मद (ﷺ) तो एक रसूल हैं इन से पहले बहुत से रसूल हो चुके तो क्या अगर वोह इन्तिकाल फ़रमा जाएं या शहीद हो जाएं तो तुम उलटे पाउं फिर जाओगे ? और जो उलटे पाउं फिरेगा अल्लाह का कुछ नुक्सान न करेगा और अन करीब अल्लाह शुक्र अदा करने वालों को षवाब देगा।_
हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنه कहते है कि हज़रते अबू बक्र رضی الله تعالی عنه ने येह आयत तिलावत की तो मालूम होता था कि गोया कोई इस आयत को जानता ही न था। उन से सुन कर हर शख्स इसी आयत को पढ़ने लगा।
हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه का बयान है कि मैं ने जब हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه की जबान से सूरए आले इमरान की येह आयत सुनी तो मुझे मालूम हो गया कि वाकेई नबी का विसाल हो गया। फिर हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه इजतिराब की हालत में नंगी शमशीर ले कर जो एलान करते फिरते थे कि हुज़ूर ﷺ का विसाल नहीं हुवा इस से रुजूअ किया और उन के साहिब ज़ादे हज़रते अब्दुलाह बिन उमर رضی الله تعالی عنهما कहते हैं कि गोया हम पर एक पर्दा पड़ा हुवा था कि इस आयत की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं गया। हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه के खुत्बे ने इस पर्दे को उठा दिया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 549*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 368)
*तज्हीज़ो तक्फीन :*
चूंकि हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने वसिय्यत फ़रमा दी थी कि मेरी तज्हीज़ो तक्फ़ीन मेरे अहले बैत और अहले खानदान करें। इस लिये येह ख़िदमत आप ﷺ के खानदान ही के लोगों ने अन्जाम दी। चुनान्चे हज़रते फ़ज़्ल बिन अब्बास व हज़रते कुसुम बिन अब्बास व हज़रते अली व हज़रते अब्बास व हज़रते उसामा बिन जैद رضی الله تعالی عنهم ने मिलजुल कर आप ﷺ को गुस्ल दिया और नाफ़ मुबारक और पलकों पर जो पानी के क़तरात और तरी जम्अ थी हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने जोशे महब्बत और फ़र्ते अक़ीदत से उस को ज़बान से चाट कर पी लिया। गुस्ल के बाद तीन सूती कपड़ों का जो "सुहूल" गाउं के बने हुए थे कफ़न बनाया गया उन में क़मीस व इमामा न था।
*नमाज़े जनाज़ा :* जनाज़ा तय्यार हुवा तो लोग नमाज़े जनाज़ा के लिये टूट पड़े। पहले मर्दो ने फिर औरतों ने फिर बच्चो ने नमाज़े जनाज़ा पढ़ी। जनाज़ए मुबारका हुजरए मुक़द्दस के अंदर ही था। बारी बारी से थोड़े थोड़े लोग अंदर जाते थे और नमाज़ पढ़ कर चले आते थे लेकिन कोई इमाम न था।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 550*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 369)
*क़ब्रे अन्वर :* हज़रते अबू तल्हा رضی الله تعالی عنه ने कब्र शरीफ़ तय्यार की जो बगली थी। जिस्मे अतहर को हज़रते अली व हज़रते फ़ज़्ल बिन अब्बास व हज़रते अब्बास व हज़रते कुसुम बिन अब्बास رضی الله تعالی عنهم ने क़ब्रे मुनव्वर में उतारा। लेकिन अबू दावूद की रिवायतों से मालूम होता है कि हज़रते उसामा और अब्दुर्रहमान बिन औफ़ رضی الله تعالی عنهم भी कब्र में उतरे थे।
सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم में येह इख़्तिलाफ़ रूनुमा हुवा कि हुज़ूर ﷺ को कहां दफ्न किया जाए। कुछ लोगों ने कहा कि मस्जिदे नबवी में आप ﷺ का मदफ़न होना चाहिये और कुछ ने येह राय दी कि आप को सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم के कब्रिस्तान में दफ्न करना चाहिये। इस मौकअ पर हज़रते अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنه ने फ़रमाया कि मैं ने रसूलुल्लाह ﷺ से ये सुना है कि हर नबी अपनी वफ़ात के बाद उसी जगह दफ्न किया जाता है जिस जगह उस की वफ़ात हुई हो। हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنه फरमाते है कि इस हदीष को सुन कर लोगों ने हुज़ूर ﷺ के बिछोने को उठाया और उसी जगह (हुजरए आइशा رضی الله تعالی عنها ) में आप की कब्र तय्यार की और आप ﷺ उसी में मदफून हुए।
हुज़ूरे अक्दस ﷺ के गुस्ल शरीफ़ और तज्हीज़ो तक्फ़ीन की सआदत में हिस्सा लेने के लिये ज़ाहिर है कि शमए नुबुव्वत के परवाने किस क़दर बे क़रार रहे होंगे ? मगर जैसा कि हम तहरीर कर चुके कि चूंकि हुज़ूर ﷺ ने खुद ही येह वसिय्यत फ़रमा दी थी कि मेरे गुस्ल और तज्हीज़ो तक्फीन मेरे अहले बैत ही करें। फिर अमीरुल मुअमिनीन हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه ने भी ब हैषिय्यत अमीरुल मुअमिनीन होने के येही हुक्म दिया कि "येह अहले बैत ही का हक़ है" इस लिये हज़रते अब्बास और अहले बैत رضی الله تعالی عنهم ने किवाड़ बन्द कर के गुस्ल दिया और कफ़न पहनाया। और शुरूअ से आखिर तक खुद हज़रते अमीरुल मुअमिनीन और दूसरे तमाम सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم हुजरए मुक़द्दसा के बाहर हाज़िर रहे।
*हुज़ूर ﷺ का तर्का :* हुज़ूरे अक्दस ﷺ की मुक़द्दस ज़िन्दगी इस क़दर ज़ाहिदाना थी कि कुछ अपने पास रखते ही नहीं थे। इस लिये ज़ाहिर है कि आप ﷺ ने वफ़ात के बाद क्या छोड़ा होगा? चुनान्चे हज़रते अम्र बिन अल हारिष رضی الله تعالی عنه का बयान है कि हुज़ूर ﷺ ने अपनी वफात के वक़्त न दिरहम व दीनार छोड़ा न लौंडी व गुलाम न और कुछ। सिर्फ अपना सफ़ेद खच्चर और हथियार और कुछ ज़मीन जो आम मुसलमानों पर सदक़ा कर गए छोड़ा था। बहर हाल फिर भी आप ﷺ के मतरूकात में तीन चीजें थीं। (1) बनू नज़ीर, फ़िदक, खैबर की ज़मीनें (2) सुवारी का जानवर (3) हथियार। येह तीनों चीजें काबिले ज़िक्र हैं।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 551*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 370)
*ज़मीन :-* बनू नज़ीर, फ़िदक, खैबर की ज़मीनों के बागात वगैरा की आमदनियां आप ﷺ अपने और अपनी अज़्वाजे मुतहहरात के साल भर के अख़राजात और फुक़रा व मसाकीन और आम मुसलमानों की हाजात में सर्फ़ फ़रमाते थे। हुज़ूर ﷺ के बाद हज़रते अब्बास और हज़रते फातिमा और बा'ज़ अज़्वाजे मुतहहरात رضی الله تعالی عنهن चाहती थीं कि इन जाएदादों को मीराष के तौर पर वारिषों के दरमियान तक्सीम हो जाना चाहिये। चुनान्चे हज़रते अमीरुल मुअमिनीन अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنه के सामने इन लोगों ने इस की दरख्वास्त पेश की मगर आप और हज़रते उमर वगैरा अकाबिर सहाबा رضی الله تعالی عنهم ने उन लोगों को येह हदीष सुना दी कि "हम (अम्बिया) का कोई वारिष नहीं होता हम ने जो कुछ छोड़ा वोह मुसलमानों पर सदक़ा है।"
और इस हदीष की रोशनी में साफ़ साफ़ कह दिया कि रसूलुल्लाह ﷺ की वसिय्यत के ब मूजिब येह जाएदादें वक्फ़ हो चुकी हैं। लिहाज़ा हुज़ूरे अक्दस ﷺ अपनी मुक़द्दस ज़िन्दगी में जिन मद्दात व मसारिफ़ में इन की आमदनियां खर्च फ़रमाया करते थे उस में कोई तब्दीली नहीं की जा सकती। हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه ने अपनी दौरे ख़िलाफ़त में हज़रते अब्बास व हजरते अली رضی الله تعالی عنهم के इस्रार से बनू नज़ीर की जाएदाद का इन दोनों को इस शर्त पर मुतवल्ली बना दिया था कि इस जाएदाद की आमदनियां इन्हीं मसारिफ़ में खर्च करते रहेंगे जिन में रसूलुल्लाह ﷺ खर्च फरमाया करते थे। फिर इन दोनों में कुछ अनबन हो गई और इन दोनों हज़रात ने येह ख़्वाहिश जाहिर की, कि बनू नज़ीर की जाएदाद तक्सीम कर के आधी हज़रते अब्बास رضی الله تعالی عنه की तौलिय्यत में दे दी जाए और आधी के मुतवल्ली हज़रत अली رضی الله تعالی عنه रहें मगर हज़रते उमर رضی الله تعالی عنه ने इस दरख्वास्त को ना मंज़ूर फ़रमा दिया।
लेकिन खैबर और फ़िदक की ज़मीनें हज़रते उमर बिन अब्दुल अजीज رضی الله تعالی عنه के ज़माने तक खुलफ़ा ही के हाथों में रहीं। हाकिमे मदीना मरवान बिन अल हकम ने इस को अपनी जागीर बना ली थी मगर हज़रते उमर बिन अब्दुल अजीज رضی الله تعالی عنه ने अपने ज़मानए ख़िलाफ़त में फिर वोही अमल दर आमद जारी कर दिया जो हज़रते अबू बक्र व हज़रते उमर رضی الله تعالی عنهما के दौरे ख़िलाफ़त में था।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 553*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 371)
*सुवारी के जानवर :*
ज़ुरकानी अलल मवाहिब वग़ैरा में लिखा हुवा है कि हुज़ूर ﷺ की मिल्किय्यत में सात घोड़े, पांच खच्चर, तीन गधे, दो ऊंटनियां थीं।
लेकिन इस में येह तशरीह नहीं है कि ब वक्ते वफ़ात इन में से कितने जानवर मौजूद थे क्यूं कि हुज़ूर ﷺ अपने जानवर दूसरों को अता फरमाते रहते थे। कुछ नए खरीदते कुछ हदाया और नज़रानों में मिलते भी रहे!
बहर हाल रिवायाते सहीहा से मालूम होता है कि वफाते अक्दस के वक़्त जो सुवारी के जानवर मौजूद थे उन में एक घोड़ा था जिस का नाम "लहीफ" था एक सफेद खच्चर था जिस का नाम “दुलदुल” था येह बहुत ही उम्र दराज़ हुवा। हज़रते अमीरे मुआविया رضی الله تعالی عنه के ज़माने तक ज़िन्दा रहा इतना बूढ़ा हो गया था कि इस के तमाम दांत गिर गए थे और आखिर में अन्धा भी हो गया था। इब्ने असाकिर की तारीख में है कि हज़रते अली رضی الله تعالی عنه भी जंगे ख़वारिज में इस पर सवार हुए थे।
एक अरबी गधा था जिस का नाम " अफ़ीर" था एक ऊंटनी थी, जिस का नाम "अज़बा व क़स्वा" था। येह वोही ऊंटनी थी जिस को ब वक्ते हिजरत आप ने हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ رضی الله تعالی عنه से खरीदा था इस ऊंटनी पर आप ने हिजरत फ़रमाई और इस की पुश्त पर हिज्जतुल वदा में आप ने अरफात व मिना का खुत्बा पढ़ा था।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 554*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 372)
*हथयार :*
चूंकि जिहाद की ज़रूरत हर वक़्त दरपेश रहती थी इसलिये आप ﷺ अस्लिहा खाना में नव या दस तलवारें, सात लोहे की जिरहें, छे कमानें, एक तीरदान, एक ढाल, पांच बरछियां, दो मिग़फर, तीन जुब्बे, एक सियाह रंग का बड़ा झन्डा बाकी सफेद व ज़र्द रंग के छोटे छोटे झन्डे थे और एक खैमा भी था।
हथयारों में तलवारों के बारे में हज़रते शैख अब्दुल हक़ मुहद्दि देहलवी رحمتہ اللہ تعالیٰ علیہ ने तहरीर फ़रमाया कि मुझे इस का इल्म नहीं कि येह सब तलवारें बयक वक़्त जम्अ थीं या मुख्तलिफ अवकात में आप के पास रहीं।
*ज़ुरूफ और मुख़्तलिफ़ सामान :*
ज़ुरूफ और बरतनों में कई प्याले थे एक शीशे का प्याला भी था एक प्याला लकड़ी का था जो फट गया था तो हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه ने उस के शिगाफ़ को बन्द करने के लिये एक चांदी की जन्जीर से उस को जकड़ दिया था।
चमड़े का एक डोल, एक पुरानी मशक, एक पथ्थर का तगार एक बड़ा सा प्याला जिस का नाम "अलसआ" था, एक चमड़े का थेला जिस में आप आईना, कैंची और मिस्वाक रखते थे, एक कंघी, एक सुरमा दानी, एक बहुत बड़ा प्याला जिस का नाम "अल गरा" था, साअ और मुद दो नापने के पैमाने।
इन के इलावा एक चारपाई जिस के पाए सियाह लकड़ी के थे, येह चारपाई हज़रते असअद बिन ज़रारह رضی الله تعالی عنه ने हदिय्यतन ख़िदमते अक्स में पेश की थी। बिछोना और तकिया चमड़े का था जिस में खजूर की छाल भरी हुई थी, मुक़द्दस जूतियां, येह हुज़ूर ﷺ के असबाब व सामानों की एक फेहरिस्त है जिन का तज़किरा अहादीस में मुतफ़र्रिक तौर पर आता है।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 555*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 373)
तबर्रुकाते नुबुव्वत : हुज़ूर ﷺ के इन मतरूका सामानों के इलावा 'बाज् यादगारी तबर्रुकात भी थे जिन को आशिकाने रसूल फ़र्ते अक़ीदत से अपने अपने घरों में महफूज़ किये हुए थे और इन को अपनी जानों से ज़ियादा अज़ीज़ रखते थे। चुनान्चे मूए मुबारक, ना'लैने शरीफ़ैन और एक लकड़ी का प्याला जो चांदी के तारों से जोड़ा हुवा था हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه ने इन तीनों आसारे मुतबर्रिका को अपने घर में महफूज़ रखा था!
इसी तरह एक मोटा कम्बल हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها के पास था जिन को वोह बतौरे तबर्रुक अपने पास रखे हुए थीं और लोगों को उस की ज़ियारत कराती थीं। चुनान्चे हज़रते अबू बरदा رضی الله تعالی عنه का बयान है कि हम लोगों को हज़रते बीबी आइशा رضی الله تعالی عنها की खिदमते 'मुबारका में हाज़िरी का शरफ़ हासिल हुवा तो उन्हों ने एक मोटा कम्बल निकाला और फ़रमाया कि येह वोही कम्बल है जिस में हुज़ूर ﷺ ने वफात पाई!
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 556*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 374)
*तबर्रुकाते नुबुव्वत :* हुज़ूर ﷺ की एक तलवार जिस का नाम "जुलफ़िकार" था। हज़रते अली رضی الله تعالی عنه के पास थी इन के बाद इन खानदान में रही यहां तक कि येह तलवार करबला में हज़रते इमामे हुसैन رضی الله تعالی عنه के पास थी। इस के बाद इन के फ़रज़न्द व जा नशीन हज़रते इमाम ज़ैनुल आबिदीन رضی الله تعالی عنه के पास रही। चुनान्चे हज़रते इमामे हुसैन رضی الله تعالی عنه की शहादत के बाद जब हज़रते इमाम ज़ैनुल आबदीन رضی الله تعالی عنه यज़ीद बिन मुआविया के पास से रुख्सत हो कर मदीने तशरीफ़ लाए तो मश्हूर सहाबी हज़रते मिस्वर बिन मख़रमा رضی الله تعالی عنه हाज़िरे ख़िदमत हुए और अर्ज़ किया कि अगर आप को कोई हाजत हो या मेरे लाइक कोई कारे ख़िदमत हो तो आप मुझे हुक्म दें मैं आप के हुक्म की तामील के लिये हाज़िर हूं। आप رضی الله تعالی عنه ने फ़रमाया मुझे कोई हाजत नहीं।
फिर हज़रते मिस्वर बिन मख़रमा رضی الله تعالی عنه ने येह गुज़ारिश की, कि आप के पास रसूलुल्लाह ﷺ की जो तलवार (जुलफ़िकार) है क्या आप वोह मुझे इनायत फ़रमा सकते हैं? क्यूं कि मुझे ख़तरा है कि कहीं यज़ीद की क़ौम आप पर ग़ालिब आ जाए और येह तबर्रुक आप के हाथ से जाता रहे और अगर आप ने इस मुक़द्दस तलवार को मुझे अता फ़रमा दिया तो खुदा की क़सम ! जब तक मेरी एक सांस बाक़ी रहेगी उन लोगों की इस तलवार तक रसाई भी नहीं हो सकती मगर हज़रते इमाम ज़ैनुल आबिदीन رضی الله تعالی عنه ने उस मुक़द्दस तलवार को अपने से जुदा करना गवारा नहीं फ़रमाया।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 557*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 375)
तबर्रुकाते नुबुव्वत : आप ﷺ की अंगूठी और असाए मुबारक पर जा नशीन होने की बिना पर खुलफ़ाए किराम हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ व हज़रते उमर फारूक व हज़रते उसमाने ग़नी رضی الله تعالی عنهم अपने अपने दौरे खिलाफ़त में क़ाबिज़ रहे मगर अंगूठी हज़रते उसमान رضی الله تعالی عنه के हाथ से कूंएं में गिर कर जाएअ हो गई। उस कूंएं का नाम "बीरे उरैस" है जिस को लोग "बीरे खातिम" भी कहते हैं।
और असाए मुबारक इस तरह जाएअ हुवा कि हज़रते अमीरुल मोमिनीन उसमाने ग़नी رضی الله تعالی عنه इसी मुक़द्दस असाए नबवी को अपने दस्ते मुबारक में ले कर मस्जिदे नबवी के मिम्बर पर खुत्बा पढ़ रहे थे कि बिल्कुल ना गहां बद नसीब "जहजाह गिफारी" उठा और अचानक आपके हाथ से इस मुबारक तबर्रुक को ले कर तोड़ डाला। इस बे अदबी से उस पर येह कहरे इलाही टूट पड़ा कि उस के हाथ में केन्सर हो गया और पूरा हाथ सड़ गल कर टूट पड़ा और इसी अज़ाब में वोह हलाक हो गया।
*तम्बीह :* हमारी तहक़ीक़ के मुताबिक़ हज़रते सय्यदुना जहजाह बिन सईद गिफारी رضی الله تعالی عنه सहाबिये रसूल हैं और हमें किसी का भी कोई क़ौल ऐसा नहीं मिला जिस में उन के सहाबी होने की नफ़ी हो, लिहाज़ा उन के लिये ऐसे अलफ़ाज़ हरगिज़ इस्तिमाल न किये जाएं।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 558*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 376)
*मुसन्निफ़ की तरफ़ से उज़्र :* किसी आम मुसलमान से भी यह तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता कि वोह किसी सहाबी के बारे में जान बुझ कर कोई ना ज़ैबा कलिमा इस्ति'माल करे, यकीनन हज़रते मुसन्निफ़ رحمتہ اللہ के इल्म में न होगा कि येह सहाबी हैं क्यूं कि यहां जो मुआमला था वोह सय्यिदुना उसमाने ग़नी رضی الله تعالی عنه के असा के तोड़ने का था जिस की वजह से शायद मुसन्निफ़ से तसामेह हो गया वर्ना वोह हरगिज़ ऐसी बात सहाबिये रसूल के लिये न लिखते क्यूं कि मुसन्निफ़ ने खुद अपनी किताब में सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم के फ़ज़ाइल बयान फ़रमाए हैं जो कि इन के रासिख सुन्नी सहीहुल अक़ीदा और आशिके सहाबए किराम होने की दलील है।
*सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم के बारे में इस्लामी अक़ीदा :* सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم के मुतअल्लिक़ अहले सुन्नत का मौक़फ़ है
*(1)* सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم के बाहम जो वाकेआत हुए, इन में पड़ना हराम, हराम, सख़्त हराम है।
मुसलमानों को तो येह देखना चाहिये कि वोह सब हज़रात आक़ा ए दो आलम ﷺ के जां निसार और सच्चे गुलाम हैं।
*(2)* सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم अम्बिया न थे, फ़िरिश्ते न थे कि मासूम हों इन में बा'ज़ के लिये लगुज़िशें हुईं मगर इन की किसी बात पर गरिफ़्त अल्लाह عزوجل व रसूल ﷺ के ख़िलाफ़ है।
*तफ़्सील :* मज़कूरा वाके़आ की तफ्तीश करते हुए हम ने मुतद्दद अरबी कुतुबे सियर व तारीख़ वग़ैरा देखीं लेकिन इन में "बद नसीब और खुबीसुन्नक्स" या इस की मिस्ल कलिमात नहीं मिले। चुनान्चे “अल इस्तीआब” में है : तर्जमा : और मरवी है कि येह वोही जहजाह (बिन सईद गिफ़ारी رضی الله تعالی عنه हैं जिन्हों ने ब हालते खुत्बा उसमाने गनी رضی الله تعالی عنه के दस्ते मुबारक से असा (छड़ी) छीन कर अपने घुटने पर रख कर तोड़ दिया था तो (सय्यिदुना) जहजाह رضی الله تعالی عنه को घुटने में ज़ख़्म हो गया यहां तक कि वोह रिहलत फ़रमा गए। वोह असा मुबारक रसूले अकरम ﷺ का था।
*इन की सहाबिय्यत के दलाइल :* कुतुबे तराजिम में इन के मुतअल्लिक़ बयान किया गया है कि "वोह बैअते रिज़वान में हाज़िर थे", और मुतद्दद कुतुब में असा तोड़ने वाला वाके़आ इन्ही का लिखा है, जिस की ताईद "इस्तीआब" से बिल खुसूस होती है कि उन्हों ने पहले इन के ईमान लाने का वाकआ बयान किया और फिर "ھذا ھو الذى تَنَاوَلَ العَصَا" के अलफ़ाज़ के ज़रीए येह वाज़ेह कर दिया कि असा तोड़ने वाला वाक़िआ इन्ही का है।
इसी क़िस्म के दूसरे और भी तबर्रुकाते नबविय्या हैं जो मुख़्तलिफ़ सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم के पास महफूज़ थे जिन का तज़किरा अहादीस और सीरत की किताबों में जा बजा मुतर्रिक तौर पर मज़कूर है और इन मुक़द्दस तबर्रुकात से सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم और ताबिईने इज़ाम رحمتہ اللہ تعالیٰ علیہم को इस क़दर वालिहाना महब्बत थी कि वोह इन को अपनी जानों से भी ज़ियादा अज़ीज़ समझते थे।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 559*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 377)
*[सत्तरहवां बाब] शमाइल व खसाइल :*
हुज़ूरे अक्सदस ﷺ को अल्लाह तआला ने जिस तरह कमाले सीरत में तमाम अव्वलीन व आखिरीन से मुमताज़ और अफ्ज़लो आ'ला बनाया इसी तरह आप को जमाले सूरत में भी बे मिस्ल व बे मिसाल पैदा फ़रमाया। हम और आप हुज़ूरे अकरम ﷺ की शाने बे मिसाल को भला क्या समझ सकते हैं ? हज़राते सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم जो दिन रात सफ़र व हज़र में जमाले नुबुव्वत की तजल्लियां देखते रहे उन्हों ने महबूबे खुदा ﷺ के जमाले बे मिसाल के फ़ज़्लो कमाल की जो मुसव्वरी की है उस को सुन कर येही कहना पड़ता है जो किसी मद्दा रसूल ने क्या खूब कहा है कि (तर्जुमा) यानी अल्लाह तआला ने हज़रते मुहम्मद ﷺ का मिस्ल पैदा फ़रमाया ही नहीं और मैं येही जानता हूं कि वोह कभी न पैदा करेगा।
सहाबिये रसूल और ताजदारे दो आलम ﷺ के दरबारी शाइर हज़रते हस्सान बिन साबित رضی الله تعالی عنه ने अपने क़सीदए हमज़िया में जमाले नुबुव्वत ﷺ की शाने बे मिसाल को इस शान के साथ बयान फ़रमाया कि (तर्जुमा) यानी या रसूलल्लाह ﷺ ! आप से ज़ियादा हुस्नो जमाल वाला मेरी आंख ने कभी किसी को देखा ही नहीं और आप से ज़ियादा कमाल वाला किसी औरत ने जना ही नहीं।, या रसूलल्लाह ﷺ! आप हर ऐब व नुक्सान से पाक पैदा किये गए हैं गोया आप ऐसे ही पैदा किये गए जैसे हसीनो जमील पैदा होना चाहते थे।
हज़रते अल्लामा बूसैरी رحمتہ الله علیہ ने अपने क़सीद ए बुर्दा में फ़रमाया कि (तर्जुमा) या'नी हज़रते महबूबे खुदा अपनी खूबियों में ऐसे यक्ता हैं कि इस मुआमले में इन का कोई शरीक ही नहीं है। क्यूं कि इन में जो हुस्न का जौहर है वोह काबिले तक्सीम ही नहीं।
आ'ला हज़रत मौलाना अहमद रजा खान قدس سره العزيز साहिब किब्ला बरेल्वी ने भी इस मज़्मून की अक्कासी फ़रमाते हुए कितने नफ़ीस अन्दाज़ में फ़रमाया है कि :
*तेरी ख़ल्क़ को हक़ ने जमील किया*
तेरे खुल्क को हक़ ने अज़ीम कहा
*कोई तुझसा हुवा है न होगा शहा*
तेरे ख़ालिक़े हुस्नो अदा की क़सम
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह 561-562*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 378)
शमाइल व खसाइल :
बहर हाल इस पर तमाम उम्मत का ईमान है कि तनासुबे आज़ा और हुस्नो जमाल में हुज़ूर नबिय्ये आखिरुज्ज़मान ﷺ बे मिस्ल व बेमिसाल हैं। चुनान्चे हज़रात मुहुद्दिसीन व मुसन्निफीने सीरत ने रिवायाते सहीहा के साथ आप ﷺ के हर हर उज़्वे शरीफा के तनाब और हुस्नो जमाल को बयान किया है। हम भी अपनी इस मुख़्तसर किताब में "हुल्यए मुबारका" के ज़िक्रे जमील से हुस्नो जमाल पैदा करने के लिये इस उन्वान पर हज़रते मौलाना मुहम्मद कामिल साहिब चराग रब्बानी नो'मानी वलीद पूरी رحمۃ اللہ علیہ के मंजूम हुल्यए मुबारका के चन्द अशआर नक्ल करते हैं ताकि इस आलिमे कामिल की बरकतों से भी येह किताब सरफ़राज़ हो जाए। हज़रते मौलाना मौसूफ़ ने अपनी किताब "पंजए नूर" में तहरीर फ़रमाया कि
*••° हुल्यए मुक़द्दसा °••*
रूहे हक़ का मैं सरापा क्या लिखूं, हुल्यए नूरे ख़ुदा मैं क्या लिखूं
*पर जमाले रहमतुल्लिल आलमी, जल्वागर होगा मकाने क़ब्र में*
इस लिये है आ गया मुझ को ख़याल, मुख़्तसर लिख दूं जमाले बे मिसाल
*ताकि यारों को मेरे पहचान हो, और इस की याद भी आसान हो*
था मियाना क़द व औसत पाक तन, पर सपेदो सुख़ था रंगे बदन
*चांद के टुकड़े थे आ'ज़ा आप के, थे हसीनो गोल सांचे में ढले*
थीं जबीं रौशन कुशादा आप की, चांद में है दाग़ वोह बेदाग़ थी
*दोनों अब्रू थीं मिसाले दो हिलाल, और दोनों को हुवा था इत्तिसाल*
इत्तिसाले दो महे "ईदैन" था, या कि अदना कुर्ब था "क़ौसैन" का
*थीं बड़ी आंखें हसीनो सुर्मगीं, देख कर कुरबान थीं सब हूरे ईं*
कान दोनों ख़ूब सूरत अरजुमन्द, साथ ख़ूबी के दहन बीनी बुलन्द
*साफ़ आईना था चेहरा आप का, सूरत अपनी उस में हर इक देखता*
ता ब सीना रीशे महबूबे इलाह, ख़ूब थी गन्जान मू, रंगे सियाह
*था सपेद अकसर लिबासे पाक तन, हो इज़ारो जुब्बा या पैरहन*
सब्ज़ रहता था इमामा आप का, पर कभी सौदो सपेदो साफ़ था
*मैं कहूं पहचान उम्दा आपकी, दोनों आलम में नहीं ऐसा कोई*
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 563*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 379)
*जिस्मे अतहर :* हज़रते अबू हुरैरा رضی الله تعالی عنه का बयान है कि हुज़ूरे अन्वर ﷺ के जिस्मे अक्दस का रंग गोरा सपेद था ऐसा मालूम होता था कि गोया आप का मुक़द्दस बदन चांदी से ढाल कर बनाया गया है। हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه कहते हैं कि आप ﷺ का जिसमे मुबारक निहायत नर्मो नाज़ुक था। मैंने दीबा व हरीर (रेशमीं कपड़ों) को भी आप ﷺ के बदन से ज़ियादा नर्म व नाज़ुक नहीं देखा और आप ﷺ के जिस्मे मुबारक की खुश्बू से ज़ियादा अच्छी कभी कोई खुश्बू नहीं सूंघी!
हज़रते का'ब बिन मालिक رضی الله تعالی عنه ने फ़रमाया कि जब हुज़ूर ﷺ खुश होते थे तो आप ﷺ का चेहरए अन्वर इस तरह चमक उठता था कि गोया चांद का एक टुकड़ा है और हम लोग इसी कैफियत से हुज़ूर ﷺ की शादमानी व मसर्रत को पहचान लेते थे!
आप ﷺ के रुखे अन्वर पर पसीने के क़तरात मोतियों की तरह ढलकते थे और उस में मुश्को अम्बर से बढ़ कर खुश्बू रहती थी। चुनान्चे हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه की वालिदा हज़रते बीबी उम्मे सुलैम رضی الله تعالی عنها एक चमड़े का बिस्तर हुज़ूर ﷺ के लिये बिछा देती थीं और आप ﷺ उस पर दोपहर को कैलूला फ़रमाया करते थे तो आप के जिसमे अतहर के पसीने को वोह एक शीशी में जम्अ फ़रमा 'लेती थीं फिर उस को अपनी खुश्बू में मिला लिया करती थीं। चुनान्चे हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه ने वसिय्यत की थी कि मेरी वफ़ात के बाद मेरे बदन और कफ़न में वोही खुश्बू लगाई जाए जिस में हुज़ूरे ﷺ अन्वर के जिस्मे अतहर का पसीना मिला हुवा है।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 564*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 380)
*जिस्मे अन्वर का साया न था :* आप ﷺ के क़दे मुबारक का साया न था। हकीम तिरमिज़ी (मुतवफ़्फ़ा सि. 255 हि.) ने अपनी किताब “नवादिरुल उसूल” में हज़रते ज़क्वान ताबेई رحمتہ اللہ تعالیٰ علیہ से यह हदीस नक्ल की है कि सूरज की धूप और चांद की चांदनी में रसूलुल्लाह ﷺ का साया नहीं पड़ता था। इमाम इब्ने सब्अ رحمتہ اللہ تعالیٰ علیہ का क़ौल है कि येह आप ﷺ के ख़साइस में से है कि आप ﷺ का साया ज़मीन पर नहीं पड़ता था और आप ﷺ नूर थे इस लिये जब आप ﷺ धूप या चांदनी में चलते तो आप ﷺ का साया नज़र न आता था!
और बा'ज़ का क़ौल है कि इस की शाहिद वोह हदीस है जिस में आप ﷺ की इस दुआ का ज़िक्र है कि आप ने येह दुआ मांगी कि खुदा वन्दा ! तू मेरे तमाम आ'ज़ा को नूर बना दे और आप ﷺ ने अपनी इस दुआ को इस क़ौल पर ख़त्म फ़रमाया कि : यानी या अल्लाह ! तू मुझ को सरापा नूर बना दे। ज़ाहिर है कि जब आप सरापा नूर थे तो फिर आप का साया कहां से पड़ता? इसी तरह अब्दुल्लाह बिन मुबारक और इब्नुल जौज़ी رحمتہ اللہ تعالیٰ علیہ ने भी हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضی الله تعالی عنه से रिवायत की है कि हुज़ूर ﷺ का साया नहीं था।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 565*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 381)
शमाइल व खसाइल :
*मख्खी, मच्छर, जूओं से महफूज़ :* हज़रते इमाम फ़ख़रुद्दीन राज़ी ने इस रिवायत को नक्ल फ़रमाया है और अल्लामा हिजाज़ी, वगैरा से भी येही मन्कूल है कि बदन तो बदन, आप के कपड़ों पर भी कभी मख्खी नहीं बैठी, न कपड़ों में कभी जूएं पड़ीं, न कभी खटमल या मच्छर ने आप को काटा, इस मज़मून को अबुर्रबीअ सुलैमान बिन सबअ رحمتہ الله تعالیٰ علیہ ने अपनी किताब “शिफ़ाउस्सुदूर फी आ’लामु नुबुव्वतिर्रसूल" में बयान फ़रमाते हुए तहरीर फ़रमाया कि इस की एक वजह तो यह है आप ﷺ नूर थे। फिर मख्खियों की आमद, जूओं का पैदा होना चूंकि गन्दगी बदबू वग़ैरा की वजह से हुवा करता है और आप चूंकि हर क़िस्म की गन्दगियों से पाक और आप का जिस्मे अतहर खुश्बूदार था इस लिये आप इन चीज़ों से महफूज़ रहे। इमाम सबती رحمتہ الله تعالیٰ علیہ ने भी इस मज़मून को "आज़मुल मवारिद" में मुफ़स्सल लिखा है।
*मोहरे नुबुव्वत :* हुज़ूरे अक्सद ﷺ के दोनों शानों के दरमियान कबूतर के अन्डे के बराबर मोहरे नुबुव्वत थी। येह ब ज़ाहिर सुर्खी माइल उभरा हुवा गोश्त था, चुनान्चे हज़रते जाबिर बिन समुरह رضی الله تعالی عنه फ़रमाते हैं कि मैं ने हुज़ूर ﷺ के दोनों शानों के बीच में मोहरे नुबुव्वत को देखा जो कबूतर के अन्डे की मिक्दार में सुर्ख उभरा हुवा एक गुदूद था। लेकिन एक रिवायत में येह भी है कि मोहरे नुबुव्वत कबूतर के अन्डे के बराबर थी और उस पर येह इबारत लिखी हुई थी कि :
اَللّٰهُ وَحْدَهٗ لَا شَرِيْكَ لَهٗ بِوَجْهِِ حَيْثُ كُنْتَ فَاِنَّكَ مَنْصُوْرٌ
(तर्जुमा) यानी एक अल्लाह है उस का कोई शरीक नहीं (ऐ रसूल!) आप जहां भी रहेंगे आप की मदद की जाएगी और एक रिवायत में येह भी है कि :
”كَانَ نُوْرًا يَّتَلَأْ لَأُ“
(तर्जुमा) यानी मोहरे नुबुव्वत एक चमकता हुवा नूर था। रावियों ने इस की ज़ाहिरी शक्ल व सूरत और मिक्दार को कबूतर के अन्डे से तश्बीह दी है।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 567*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 382)
शमाइल व खसाइल :
*कदे मुबारक :* हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه का बयान है कि हुज़ूरे अन्वर ﷺ न बहुत ज़ियादा लम्बे थे न पस्ता क़द बल्कि आप ﷺ दरमियानी क़द वाले थे और आप ﷺ का मुक़द्दस बदन इनतिहाई ख़ूब सूरत था जब चलते थे तो कुछ ख़मीदा हो कर चलते थे,
इसी तरह हज़रते अली رضی الله تعالی عنه फ़रमाते हैं कि आप ﷺ न तवीलुल कामत थे न पस्ता क़द बल्कि आप मियाना क़द थे। ब वक्ते रफ्तार ऐसा मालूम होता था कि गोया आप ﷺ किसी बुलन्दी से उतर रहे हैं। मैं ने आप का मिस्ल न आप से पहले देखा न आप के बाद।
इस पर सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم का इत्तिफ़ाक़ है कि आप ﷺ मियाना क़द थे लेकिन येह आप ﷺ की मो'जिज़ाना शान है कि मियाना क़द होने के बावजूद अगर आप ﷺ हज़ारों इन्सानों के मज्मअ में खड़े होते थे तो आप ﷺ का सरे मुबारक सब से ज़ियादा ऊंचा नज़र आता था।
*क़दे बे साया के सायए मर्हमत*
जिल्ले ममदूद राफ़त पे लाखों सलाम
*ताइराने कुदुस जिस की हैं कुमरियां*
उस सही सरवे क़ामत पे लाखों सलाम
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 567*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 383)
शमाइल व खसाइल :
*सरे अक्दस :* हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने आप ﷺ का हुल्यए मुबारका बयान फ़रमाते हुए इरशाद फ़रमाया कि "जखमुर्रास" यानी आप ﷺ का सरे मुबारक "बड़ा” था (जो शानदार और वजीह होने का निशान है।)
*जिस के आगे सरे सरवरां ख़म रहें*
उस सरे ताजे रिफ़अत पे लाखों सलाम
*मुक़द्दस बाल :-* हुज़ूरे अन्वर ﷺ के मूए मुबारक न घूंघर दार थे न बिल्कुल सीधे बल्कि इन दोनों कैफ़िय्यतों के दरमियान थे। आप ﷺ के मुक़द्दस बाल पहले कानों की लौ तक थे फिर शानों 'तक खूबसूरत गेसू लटकते रहते थे मगर हिज्जतुल वदाअ के मौक पर आप ﷺ ने अपने बालों को उतरवा दिया। आला हज़रत मौलाना शाह अहमद रजा खान किब्ला बरेल्वी رحمۃ اللہ علیہ ने आप ﷺ के मुक़द्दस बालों की इन तीनों सुरतों को अपने दो शेरों में बहुत ही नफीस व लतीफ अन्दाज़ में बयान फ़रमाया है कि
*गोश तक सुनते थे फ़रयाद अब आए ता दौश*
कि बनें खाना बदोशों को सहारे गेसू
*आखिरे हज गमे उम्मत में परेशां हो कर*
तीरह बख़्तों की शफाअत को सिधारे गेसू
आप ﷺ अकसर बालों में तेल भी डालते थे और कभी कभी कंघी भी करते थे और अखीर ज़माने में बीच सर में मांग भी निकालते थे आप ﷺ के मुक़द्दस बाल आखिर उम्र तक सियाह रहे, सर और दाढ़ी शरीफ़ में बीस बालों से ज़ियादा सफ़ेद नहीं हुए थे।
हुज़ूर ए अक्दस ﷺ ने हिज्जतुल वदाअ में जब अपने मुक़द्दस बाल उतरवाए तो वोह सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم में बतौरे तबर्रुक तक्सीम हुए और सहाबए किराम رضی الله تعالی عنهم ने निहायत ही अक़ीदत के साथ इस मुए मुबारक को अपने पास महफूज़ रखा और इस को अपनी जानों से ज़ियादा अज़ीज़ रखते थे। हज़रते बीबी उम्मे सलमह رضی الله تعالی عنها ने इन मुक़द्दस बालों को एक शीशी में रख लिया था जब किसी इन्सान को नज़र लग जाती या कोई मरज होता तो आप उस शीशी को पानी में डुबो कर देती थीं और उस पानी से शिफा हासिल होती थी।
*वोह करम की घटा गेसूए मुश्क सा*
*लक्कए अब्रे राफ़त पे लाखों सलाम*
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 568*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 384)
शमाइल व खसाइल :
*रुखे अन्वर :* हुज़ूरे अक्दस ﷺ का चेहरए मुनव्वरह जमाले 'इलाही का आईना और अन्वारे तजल्ली का मज़हर था। निहायत ही वजीह, पुर गोश्त और किसी क़दर गोलाई लिये हुए था। हज़रते जाबिर बिन समुरह رضی الله تعالی عنه का बयान है कि मैं ने रसूलुल्लाह ﷺ को एक मरतबा चांदनी रात में देखा। मैं एक मरतबा चांद की तरफ़ देखता और एक मरतबा आप के चेहरए अन्वर को देखता तो मुझे आप ﷺ का चेहरा चांद से भी ज़ियादा खूब सूरत नज़र आता था।
हज़रते बरा बिन आज़िब رضی الله تعالی عنه से किसी ने पूछा कि क्या रसूलुल्लाह ﷺ का चेहरा (चमक दमक में) तलवार की मानिन्द था ? तो आपने फ़रमाया कि नहीं बल्कि आप ﷺ का चेहरा चांद के मिस्ल था।हज़रते अली رضی الله تعالی عنه ने आप ﷺ के हुल्यए मुबारका को बयान करते हुए यह कहा कि" जो आप को अचानक देखता वोह आप के रो'ब दाब से डर जाता और पहचानने के बाद आप से मिलता वोह आप से महब्बत करने लगता था।
हज़रते बरा बिन आजिब رضی الله تعالی عنه का कौल है कि रसूलुल्लाह ﷺ तमाम इन्सानों से बढ़ कर खूबरू और सब से ज़ियादा अच्छे अख़्लाक़ वाले थे। हज़रते अब्दुल्लाह बिन सलाम رضی الله تعالی عنه ने आप ﷺ के चेहरए अन्वर के बारे में येह कहा : यानी मैं ने जब हुज़ूर ﷺ के चेहरए अन्वर को बग़ौर देखा तो मैंने पहचान लिया कि आप ﷺ का चेहरा किसी झूटे आदमी का चेहरा नहीं है।
आ'ला हज़रत फ़ाज़िले बरेल्वी अलैहिर्रहमा ने क्या खूब कहा :
*चांद से मुंह पे ताबां दरख़्शां दुरूद*
नमक आगीं सबाहत पे लाखों सलाम
*जिस से तारीक दिल जग मगाने लगे*
उस चमक वाली रंगत पे लाखों सलाम
अरबी ज़बान में भी किसी मद्दाहे रसूल ने आप ﷺ 'के रुखे अन्वर के हुस्नो जमाल का कितना हसीन मंजर और कितनी बेहतरीन तरी पेश की है : या'नी हुज़ूर ﷺ हुस्नो जमाल के भी नबी है, यूं तो इन की हर हर चीज़ हुस्न का मो'जिज़ा है लेकिन ख़ास कर इन का चेहरा तो आयते कुब्रा (बहुत ही बड़ा मो 'जिज़ा) है। इन के रुख़्सार के सेहन में इन के तिल का बिलाल इन की रौशन पेशानी की चमक से सुबह सादिक़ को देख कर अज़ान कहा करता था।
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 570*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 385)
शमाइल व खसाइल :
*मेहराबे अब्रू :* आप ﷺ की भवें दराज़ व बारीक और घने बाल वाली थीं और दोनों भवें इस क़दर मुत्तसिल थीं कि दूर से दोनों मिली हुई मा'लूम होती थीं और इन दोनों भवों के दरमियान एक रग थी जो गुस्से के वक़्त उभर जाती थी।
आ'ला हज़रत رحمۃ اللہ علیہ अब्रूए मुबारक की मदह् में फ़रमाते हैं कि :
*जिन के सज्दे को मेहराबे का'बा झुकी*
उन भवों की लताफ़त पे लाखों सलाम
और हज़रते मोहसिन काकोरवी رحمتہ اللہ تعالیٰ علیہ ने चेहरए अन्वर में मेहराबे अब्रू के हुस्न की तस्वीर कशी करते हुए येह लिखा कि :
*महे कामिल में महे नूर की येह तस्वीरें हैं*
या खिंची मारिकए बद्र में शमशीरें हैं
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 571*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 386)
शमाइल व खसाइल :
*नूरानी आंख :* आप ﷺ की चश्माने मुबारक बड़ी बड़ी और कुदरती तौर पर सुर्मगीं थीं। पलकें घनी और दराज़ थीं पुतली की सियाही खूब सियाह और आंख की सफ़ेदी खूब सफ़ेद थी जिन में बारीक बारीक सुर्ख डोरे थे। आप ﷺ की मुक़द्दस आंखों का येह एजाज़ है कि आप बयक वक़्त आगे पीछे, दाएं बाएं, ऊपर नीचे, दिन रात, अंधेरे उजाले, में यक्सां देखा करते थे। चुनान्चे बुखारी व मुस्लिम की रिवायात में आया है कि यानी ऐ लोगों ! तुम रुकूअ व सुजूद को दुरुस्त तरीक़े से अदा करो क्यूं कि खुदा की कु
क़सम ! मैं तुम लोगों को अपने पीछे से भी देखता रहता हूं।
साहिबे मिरकात ने इस हदीस की शर्ह में फ़रमाया कि : यानी येह बाब आप ﷺ के उन मोजिज़ात में से है जो आप को अता किये गए हैं। फिर आप की आंखों का देखना महसूसात ही तक महदूद नहीं था बल्कि आप गैर मरई व गैर महसूस चीज़ों को भी जो आंखों से देखने के लाइक ही नहीं हैं देख लिया करते थे। चुनान्चे बुखारी शरीफ़ की एक रिवायत है कि : या'नी खुदा की कसम ! तुम्हारा रुकूअ व खुशूअ मेरी निगाहों से पोशीदा नहीं रहता।
प्यारे मुस्तफा ﷺ की नूरानी आंखों के एजाज़ का क्या कहना ? कि पीठ के पीछे से नमाज़ियों के रुकूअ बल्कि उनके खुशूअ को भी देख रहे हैं। "खुशूअ" क्या चीज़ है ? खुशूअ दिल में खौफ़ और आजिज़ी की एक कैफ़िय्यत का नाम है जो आंख से देखने की चीज़ ही नहीं है मगर निगाहे नुबुव्वत का येह मोजिज़ा देखो कि ऐसी चीज़ को भी आप ﷺ ने अपनी आंखों से देख लिया जो आंख से देखने के क़ाबिल ही नहीं है? سبحان الله
चश्माने मुस्तफा ﷺ के एजाज़ की शान का क्या कोई बयान कर सकता है ? आ'ला हज़रत मौलाना अहमद रज़ा खान साहिब किब्ला बरेल्वी رحمۃ اللہ علیہ ने क्या खूब फ़रमाया :
*शश जिहत सम्त मुक़ाबिल शबो रोज़ एक ही हाल*
धूम "वन्नज्म" में है आप की बीनाई की
*फ़र्श ता अर्श सब आईना ज़माइर हाज़िर*
बस क़सम खाइये उम्मी तेरी दानाई की
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 571*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 387)
शमाइल व खसाइल :
*बीनी मुबारक :* आप ﷺ की मुतबर्रक नाक खूब सूरत दराज़ और बुलन्द थी जिस पर एक नूर चमकता था, जो शख्स बगौर नहीं देखता था वोह येह समझता था कि आप की मुबारक नाक बहुत ऊंची है। हालांकि आप ﷺ की नाक बहुत ज़ियादा ऊंची न थी बल्कि बुलन्दी उस नूर की वजह से महसूस होती थी जो आप की मुक़द्दस नाक के ऊपर जल्वा फ़िगन था।
*नीची आंखों की शर्मो हया पर दुरूद*
*ऊंची बीनी की रिफ़अत पे लाखों सलाम*
*मुकद्दस पेशानी :-्* हज़रते हिन्द बिन अबी हाला رضی الله تعالی عنه आप ﷺ के चेहरए अन्वर का हुल्या बयान करते हैं कि यानी आप ﷺ की मुबारक पेशानी कुशादा और चौड़ी थी।
क़ुदरती तौर से आप ﷺ की पेशानी पर एक नूरानी चमक थी। चुनान्चे दरबारे रिसालत के शाइर मद्दाहे रसूल हज़रते हस्सान बिन साबित رضی الله تعالی عنه ने इसी हसीनो जमील नूरानी मंज़र को देख कर येह कहा है कि : या'नी जब अंधेरी रात में आप ﷺ की मुक़द्दस पेशानी जाहिर होती है तो इस तरह चमकती है जिस तरह रात की तारीकी में रौशन चराग चमकते हैं। سبحان الله
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 574*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 388)
शमाइल व खसाइल :
*गोशे मुबारक :* आप ﷺ की आंखों की तरह आप ﷺ के कान में भी मोजिज़ाना शान थी। चुनान्चे आप ﷺ ने खुद अपनी ज़बाने अक्दस से इरशाद फ़रमाया कि : या'नी मैं उन चीज़ों को देखता हूं जिन को तुम में से कोई नहीं देखता और मैं उन आवाज़ों को सुनता हूं जिन को तुम में से कोई नहीं सुनता!
इस हदीस से साबित होता है कि आप ﷺ के सम्अ व बसर की कुव्वत बे मिसाल और मो'जिज़ाना शान रखती थी। क्यूं कि आप ﷺ दूर व नज़दीक की आवाज़ों को यक्सां तौर पर सुन लिया करते थे। चुनान्चे आप के हलीफ़ बनी खुज़ाआ ने, जैसा कि फ़त्हे मक्का के बयान में आप पढ़ चुके हैं, तीन दिन की मसाफ़त से आप को अपनी इमदाद व नुसरत के लिये पुकारा तो आप ने उन की फ़रयाद सुन ली।
अल्लामा ज़ुरकानी ने इस हदीस की शर्ह में फ़रमाया कि : यानी अगर हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने तीन दिन की मसाफ़त से एक फ़रयादी की फ़रयाद सुन ली तो येह आप से कोई बईद नहीं है क्यूं कि आप तो ज़मीन पर बैठे हुए आस्मानों की चरचराहट को सुन लिया करते थे बल्कि अर्श के नीचे चांद के सज्दे में गिरने की आवाज़ को भी सुन लिया करते थे।
*दूरो नज़दीक के सुनने वाले वोह कान*
काने ला'ले करामत पे लाखों सलाम
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 574*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 389)
शमाइल व खसाइल :
*दहन शरीफ़ :* हज़रते हिन्द बिन अबी हाला رضی الله تعالی عنه का बयान है कि आप ﷺ के रुख़्सार नर्म व नाज़ुक और हमवार थे और आप ﷺ का मुंह फ़राख, दांत कुशादा और रौशन थे। जब आप ﷺ गुफ़्तगू फ़रमाते तो आप के दोनों अगले दांतों के दरमियान से एक नूर निकलता था और जब कभी अंधेरे में आप मुस्कुरा देते तो दन्दाने मुबारक की चमक से रौशनी हो जाती थी।
आप ﷺ को कभी जमाई नहीं आई और येह तमाम अम्बिया عَلَیْھِمُ الصَّلٰوةُ وَالسَّلَام का ख़ास्सा है कि इन को कभी जमाई नहीं आती क्यूं कि जमाई शैतान की तरफ़ से हुवा करती है और हज़राते अम्बिया عَلَیْھِمُ الصَّلٰوةُ وَالسَّلَام शैतान के तसल्लुत से महफूज़ व मासूम हैं।
*वोह दहन जिस की हर बात वहये ख़ुदा*
*चश्मए इल्मो हिक्मत पे लाखों सलाम*
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 575*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 390)
शमाइल व खसाइल :
*ज़बाने अक्दस :* आप ﷺ की ज़बाने अक्दस वहये इलाही की तर्जुमान और सर चश्मए आयात व मख्ज़ने मो'जिज़ात है इस की फ़साहत व बलागत इस क़दर हद्दे एजाज़ को पहुंची हुई है कि बड़े बड़े फुसहा व बुलगा आप के कलाम को सुन कर दंग रह जाते थे।
*तेरे आगे यूं हैं दबे लचे फुसहा अरब के बड़े बड़े*
कोई जाने मुंह में ज़बां नहीं, नहीं बल्कि जिस्म में जां नहीं
आप ﷺ की मुक़द्दस ज़बान की हुक्मरानी और शान का येह ए’जाज़ था कि ज़बान से जो फ़रमा दिया वोह एक आन में मो'जिज़ा बन कर आलमे वुजूद में आ गया।
*वोह ज़बां जिस को सब कुन की कुन्जी कहें*
उस की नाफ़िज़ हुकूमत पे लाखों सलाम
*उस की प्यारी फ़साहत पे बेहद दुरूद*
उस की दिलकश बलाग़त पे लाखों सलाम
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 575*
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सीरते मुस्तफ़ा ﷺ (Part- 391)
शमाइल व खसाइल :
*लुआबे दहन :* आप ﷺ का लुआबे दहन (थूक) जख्मियों और बीमारों के लिये शिफ़ा और ज़हरों के लिये तिरयाक़े आ'ज़म था। चुनान्चे आप मोजिज़ात के बयान में पढ़ेंगे कि हज़रते अबू बक्र सिद्दीक رضی الله تعالی عنه के पाउं में गारे सौर के अन्दर सांप ने काटा। उस का ज़हर आप ﷺ के लुआबे दहन से उतर गया और ज़ख़्म अच्छा हो गया, हज़रते अली رضی الله تعالی عنه के आशोबे चश्म के लिये येह लुआबे दहन "शिफ़ाउल ऐन" बन गया।
हज़रते रिफ़ाआ बिन राफेअ رضی الله تعالی عنه की आंख में जंगे बद्र के दिन तीर लगा और फूट गई मगर आप ﷺ के लुआबे दहन से ऐसी शिफा हासिल हुई दर्द भी जाता रहा और आंख की रौशनी भी बरक़रार रही। हज़रते अबू क़तादा رضی الله تعالی عنه के चेहरे पर तीर लगा, आप ﷺ ने उस पर अपना लुआबे दहन लगा दिया फ़ौरन ही ख़ून बन्द हो गया और फिर ज़िन्दगी भर उन को कभी तीर व तलवार ज़ख़्म न लगा।
शिफ़ा के इलावा और भी लुआबे दहन से बड़ी बड़ी मोजिज़ाना बरकात का जुहूर हुवा। चुनान्चे हज़रते अनस رضی الله تعالی عنه के घर में एक कुंआ था आप ﷺ ने उस में अपना लुआबे दहन डाल दिया तो उस का पानी इतना शीरीं हो गया कि मदीनए मुनव्वरह में इस से बढ़ कर कोई शीरीं कुंआं न था।
इमाम बैहक़ी ने येह हदीस रिवायत की है कि रसूलुल्लाह ﷺ आशूरा के दिन दूध पीते बच्चों को बुलाते थे और उन के मुंह में अपना लुआबे दहन डाल देते थे। और उन की माओं को हुक्म देते थे कि वोह रात तक अपने बच्चों को दूध न पिलाएं। आप ﷺ का येही लुआबे दहन उन बच्चों को इस क़दर शिकम सैर और सैराब कर देता था कि उन बच्चों को दिन भर न भूक लगती थी न प्यास।
*जिस के पानी से शादाब जानो जिनां*
उस दहन की तरावत पे लाखों सलाम
*जिस से खारी कूंएं शीरए जां बने*
उस ज़ुलाले हलावत पे लाखों सलाम
*📙 किताब : सीरते मुस्तफ़ा ﷺ सफ़ह - 576*
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